प्राण रक्षा विद्या का गुप्त रहस्य: कोई तुम्हारी शक्ति पी रहा है, सावधान! | Osho #oshohindi
क्या तुमने कभी गौर किया है? तुम सुबह
बिस्तर से उठते हो। शरीर ने पूरी रात
विश्राम किया है। आंखें खुलती है। शरीर को
आराम मिल चुका है। लेकिन भीतर एक बहुत
गहरी थकान है। एक अनजानी सी कमजोरी। एक
भारीपन जो बिना किसी कारण के तुम्हें
जकड़े हुए हैं। तुम सोचते हो कि शायद काम
का बोझ ज्यादा है। शायद भोजन में कोई कमी
है। शायद नींद पूरी नहीं हुई। तुम अलग-अलग
तर्क खोजते हो। नहीं, तुम एक बहुत बड़ी
भूल कर रहे हो। यह
[नाक से की जाने वाली आवाज़] थकान
तुम्हारे शरीर की नहीं है। यह थकान
तुम्हारे प्राणों की है। तुम्हारी जीवन
शक्ति को कोई चुपचाप पी रहा है। तुम घर से
बाहर निकलते हो, किसी से मिलते हो, किसी
भीड़ वाले कमरे में जाते हो और अचानक
तुम्हारी सारी ऊर्जा जैसे निचोड़ ली जाती
है। कोई तुम्हारी अनुमति के बिना तुम्हें
भीतर से खोखला कर रहा है। और सबसे भयंकर
बात यह है कि तुमने खुद अपने दरवाजे खुले
छोड़ रखे हैं। तुम्हें
[गला साफ़ करने की आवाज़] लगता है कि
सिर्फ कुदाल चलाने से, पत्थर तोड़ने से या
बहुत अधिक भाग दौड़ करने से ही इंसान थकता
है। यह तुम्हारी सबसे बड़ी भ्रांति है।
शरीर की थकान तो रात भर की नींद से मिट
जाती है। शरीर का तंत्र ऐसा है कि वह खुद
को फिर से तरोताजा कर लेता है। लेकिन जो
थकान नींद के बाद भी बची रह जाए, जो थकान
नहाने के बाद भी ना धुले, जो थकान अच्छे
भोजन के बाद भी ना मिटे, वह थकान यह बता
रही है कि तुम्हारी प्राण ऊर्जा का क्षरण
हो रहा है। तुम्हारे भीतर कोई ऐसा छेद हो
गया है जहां से तुम्हारा जीवन रिस रहा है।
और तुम इसे देख नहीं पा रहे हो क्योंकि
तुम्हारी आंखें सिर्फ स्थूल चीजों को
देखने की आदि हो चुकी हैं। तुम सिर्फ मांस
और हड्डियों के शरीर को जानते हो। तुम उस
ऊर्जा के शरीर को नहीं जानते जो इस मांस
और मज्जा को चलाता है। आजकल इंसान जो सबसे
बड़ी भूल कर रहा है वह यही है कि वह अपने
ऊर्जा के आवरण को बिल्कुल असुरक्षित
छोड़कर जी रहा है। तुम अपने घर के दरवाजों
पर ताले लगाते हो। तुम अपने धन को तिजोरी
में रखते हो। तुम अपने शरीर को कपड़ों से
ढकते हो ताकि सर्दी या गर्मी से बचा जा
सके।
लेकिन तुम अपनी सबसे कीमती चीज अपनी प्राण
ऊर्जा को बिल्कुल नग्न अवस्था में सड़क पर
लेकर घूम रहे हो। कोई भी आता है तुम्हारी
ऊर्जा को नोच लेता है, चूस लेता है और तुम
खाली बर्तन की तरह खनकते हुए घर लौट आते
हो। तुम बाजार जाते हो। वहां की आपाधापी
में बिना कुछ किए तुम थक जाते हो। तुम
अपने कार्यस्थल पर किसी ऐसे व्यक्ति के
पास बैठते हो जो लगातार शिकायत कर रहा है
और 10 मिनट बाद तुम्हें लगता है कि
तुम्हारे सिर में दर्द होने लगा है।
तुम्हारी सांसे भारी हो गई हैं। तुम्हें
लगता है कि यह तनाव है। नहीं यह तनाव नहीं
है। यह चोरी है। तुम्हारे प्राणों की चोरी
5000 साल पहले महर्षि पतंजलि ने एक बहुत
गहरी बात कही थी। उन्होंने मनुष्य के शरीर
को सिर्फ एक ढांचा नहीं माना। उन्होंने
बताया कि हमारे शरीर के चारों ओर एक ऊर्जा
का घेरा होता है। जिसे प्राचीन विज्ञान
में प्राणमय कोष कहा गया है। यह वह आवरण
है जो तुम्हारे भौतिक शरीर की रक्षा करता
है। जैसे पृथ्वी के चारों ओर हवा का एक
घेरा। जो सूरज की खतरनाक किरणों को पृथ्वी
तक आने से रोकता है। अगर वह घेरा टूट जाए
तो पृथ्वी जलकर भस्म हो जाएगी। ठीक वैसे
ही तुम्हारे इस भौतिक शरीर के चारों ओर
तुम्हारी अपनी जीवन शक्ति का एक घेरा है।
एक आभा मंडल है। जब तक यह घेरा मजबूत है।
दुनिया की कोई भी नकारात्मकता, कोई भी
पीड़ा, कोई भी मानसिक बीमारी तुम्हारे
भीतर प्रवेश नहीं कर सकती। लेकिन तुमने इस
विज्ञान को भुला दिया। तुमने अपने इस
प्राणमय कोष को इतना कमजोर कर लिया है।
इसमें इतने छेद कर लिए हैं कि अब कोई भी
आसानी से तुम्हारी ऊर्जा को सोख सकता है।
प्राचीन ऋषियों ने कोई हवाहवाई बातें नहीं
की थी। उनका विज्ञान बहुत ही ठोस और जीवन
के बहुत करीब था। उन्होंने देखा कि जब दो
इंसान पास आते हैं तो सिर्फ उनके शरीर ही
पास नहीं आते। उनके आभा मंडल भी एक दूसरे
से टकराते हैं और जिसका आभा मंडल कमजोर
होता है, वह अपनी जीवन शक्ति खोने लगता
है। महर्षि पतंजलि ने इसी ऊर्जा को
संरक्षित करने के सूत्र दिए थे। उन्होंने
बताया था कि कैसे इंसान अपने प्राणों को
भीतर समेट सकता है।
[नाक से की जाने वाली आवाज़] लेकिन तुमने
उन सूत्रों को महज कुछ श्वास की कसरतों तक
सीमित कर दिया। तुम भूल गए कि हर संबंध
में, हर बातचीत में, हर मुलाकात में ऊर्जा
का लेनदेन हो रहा है। अब जरा आधुनिक
विज्ञान की तरफ देखो। तुम प्राचीन बातों
को शायद पुराना समझकर खारिज कर दो। लेकिन
आज का विज्ञान ठीक वही बात कह रहा है जो
हजारों साल पहले कही गई थी। आज के
वैज्ञानिक उपकरणों ने यह साबित कर दिया है
कि मनुष्य के हृदय का अपना एक बहुत
शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र होता है। जब
तुम किसी मशीन पर अपने हृदय की जांच
करवाते हो तो वह मशीन तुम्हारे हृदय की
धड़कन का जो चित्र बनाती है वह असल में
उसी विद्युत चुंबकीय ऊर्जा का चित्र है।
विज्ञान कहता है कि यह चुंबकीय क्षेत्र
तुम्हारे शरीर से कई फुट दूर तक फैला होता
है। हर इंसान एक चलता फिरता चुंबक है। जब
तुम किसी ऐसे व्यक्ति के संपर्क में आते
हो जो भीतर से खाली है, जो भीतर से
नकारात्मक है, जो भीतर से बीमार है,
शारीरिक रूप से नहीं बल्कि मानसिक और
भावनात्मक रूप से तो उसका चुंबकीय क्षेत्र
तुम्हारे चुंबकीय क्षेत्र से टकराता है।
विज्ञान का यह बहुत ही साधारण सा नियम है
कि ऊर्जा हमेशा उच्च स्तर से निम्न स्तर
की ओर बहती है। जैसे पानी हमेशा ऊंचाई से
ढलान की तरफ बहता है। ठीक उसी तरह जब तुम
किसी ऐसे इंसान के पास बैठते हो जो ऊर्जा
से खाली है तो तुम्हारी ऊर्जा अपने आप
उसकी तरफ बहने लगती है। तुम्हारी जीवन
शक्ति का यह चुंबकीय क्षेत्र उस खाली
इंसान को भरने लगता है। विज्ञान इसे बायो
इलेक्ट्रोमैग्नेटिक इंटरेक्शन कहता है। यह
कोई जादू टोना नहीं है। यह कोई रहस्य की
बात नहीं है। यह विशुद्ध भौतिकी और जीव
विज्ञान है। जब तुम किसी ऊर्जा चूसने वाले
व्यक्ति से बात करते हो तो तुम्हारे
मस्तिष्क की तरंगे बदलने लगती हैं।
तुम्हारे हृदय की धड़कन का तालमेल
गड़बड़ाने लगता है। तुम्हारे खून में बहने
वाले रसायन बदल जाते हैं। विज्ञान ने यह
जांचा है कि जब दो लोग बात करते हैं तो
उनकी मस्तिष्क तरंगे एक दूसरे की नकल करने
लगती हैं। अगर सामने वाला इंसान तनाव में
है, क्रोध में है या निराशा में है तो
उसका चुंबकीय क्षेत्र इतना हावी होता है
कि वह तुम्हारे मस्तिष्क को भी उसी अवस्था
में खींच लेता है। और इस पूरी प्रक्रिया
में वह तुम्हारी ऊर्जा को सोख कर खुद
थोड़ा बेहतर महसूस करने लगता है। जबकि तुम
पूरी तरह से टूट जाते हो। अब तुम्हें यह
समझना होगा कि यह लोग कौन है जो तुम्हारी
ऊर्जा चूस रहे हैं। यह कहीं बाहर से नहीं
आते। इनके सिर पर कोई सींग नहीं होते। यह
देखने में बिल्कुल तुम्हारे और मेरे जैसे
होते हैं। अक्सर यह तुम्हारे बहुत करीब
होते हैं। तुम्हारे अपने परिवार में हो
सकते हैं। तुम्हारे मित्रों में हो सकते
हैं। तुम्हारे साथ काम करने वाले हो सकते
हैं। यह तुम्हारे जीवन में अलग-अलग मुखौटे
पहन कर आते हैं। तुम्हें इन ऊर्जा चूसने
वालों के सबसे खतरनाक चेहरों को पहचानना
होगा। क्योंकि जब तक तुम बीमारी को नहीं
पहचानोगे, तुम उससे अपना बचाव कैसे करोगे?
पहला चेहरा बहुत ही मासूम होता है। यह वह
इंसान है जो हमेशा खुद को बेचारा दिखाता
है। जब भी वह तुमसे मिलेगा उसके पास अपनी
पीड़ा की, अपने दुखों की एक लंबी कहानी
होगी। वह दुनिया का सबसे सताया हुआ इंसान
है। उसके साथ हमेशा कुछ ना कुछ बुरा ही
होता है। तुम जब भी उससे पूछोगे कि वह
कैसा है? वह गहरी और ठंडी सांस लेगा और
फिर अपने दुखों का पिटारा खोल देगा। यह
व्यक्ति तुम्हारी सहानुभूति का भूखा होता
है। याद रखना सहानुभूति वह पुल है जिस पर
चलकर तुम्हारी ऊर्जा दूसरे व्यक्ति तक
पहुंचती है। जब तुम ऐसे बेचारे इंसान की
बात सुनते हो तो तुम्हें उस पर दया आती
है। तुम उसे सांत्वना देने की कोशिश करते
हो। तुम कहते हो कि सब ठीक हो जाएगा। तुम
उसकी समस्या सुलझाने की कोशिश करते हो।
लेकिन असल में वह अपनी समस्या सुलझाना ही
नहीं चाहता। उसका दुख ही उसका अस्तित्व
है। अगर उसका दुख छीन गया तो उसके पास बात
करने को कुछ नहीं बचेगा। वह सिर्फ
तुम्हारा ध्यान चाहता है। तुम्हारी ऊर्जा
चाहता है। तुम जब उसके साथ होते हो तो तुम
अपनी ऊर्जा उसके भीतर उंडेल रहे होते हो।
एक घंटे बाद वह इंसान मुस्कुराता हुआ
थोड़ा हल्का होकर चला जाएगा और तुम अपने
बिस्तर पर निढाल होकर गिर पड़ोगे। तुम्हें
लगेगा कि सारा संसार तुम्हारे कंधों पर आ
गया [गहरी सांस लेने की आवाज़] है। यह
बेचारा दिखने वाला इंसान तुम्हारे प्राणों
का सबसे बड़ा शोषक है। वह तुम्हारे भीतर
दया की भावना जगाता है और उसी दया के
रास्ते तुम्हारी जीवन शक्ति को पी जाता
है। दूसरा चेहरा वह है जिसे हमेशा हर बात
में नाटक चाहिए। विवाद चाहिए। यह व्यक्ति
शांति से नहीं बैठ सकता। अगर इसके जीवन
में सब कुछ ठीक चल रहा हो तो यह खुद ही
कोई ना कोई गड़बड़ी पैदा कर देगा। इसे हम
विवाद खड़ा करने वाला इंसान कह सकते हैं।
यह अचानक से क्रोधित हो जाएगा। छोटी-छोटी
बातों पर बड़ा हंगामा खड़ा कर देगा। यह
लोगों को आपस में लड़ाएगा। जब यह कमरे में
आता है तो तुम्हें एक अजीब सी घबराहट
महसूस होती है। तुम्हें लगता है कि अभी
कुछ फटने वाला है। अभी कोई विस्फोट होने
वाला है। इस तरह के व्यक्ति का विज्ञान
समझो। जब यह क्रोध करता है या जोर से
चिल्लाता है या रोने धोने का नाटक करता है
तो यह तुम्हारे भीतर भय या बेचैनी पैदा
करता है। भय भी ऊर्जा खोने का एक बहुत
बड़ा कारण है। जब तुम डरते हो या घबराते
हो तो तुम्हारे आभा मंडल में दरार जाती
है। यह नाटक करने वाला इंसान तुम्हारे
शांत सरोवर में पत्थर मारता है। लहरें
पैदा करता है और जब तुम अशांत हो जाते हो
तो उस अशांति से पैदा होने वाली ऊर्जा को
वह ग्रहण कर लेता है। वह खुद को बहुत
शक्तिशाली महसूस करता है क्योंकि उसने
तुम्हें हिला दिया। वह तुम्हारी शांति को
तोड़कर अपनी ऊर्जा की भूख मिटाता है। ऐसे
व्यक्ति के साथ तुम कभी भी चैन की सांस
नहीं ले सकते। तुम हमेशा चौकन्ने रहते हो
कि पता नहीं अब यह क्या नया बखेरा खड़ा कर
दे। यह लगातार चौकन्नापन ही तुम्हारी
ऊर्जा को सोखता रहता है। तीसरा चेहरा और
भी खतरनाक है। यह वह व्यक्ति है जो
तुम्हें हमेशा नीचा दिखाने की कोशिश करता
है। इसे सिर्फ अपनी श्रेष्ठता साबित करनी
है। तुम चाहे जो भी करो वो उसमें कोई ना
कोई कमी निकाल देगा। तुम अगर कोई नई बात
बताओगे तो वह कहेगा कि उसे यह पहले से पता
था। तुम अगर अपनी किसी सफलता की बात करोगे
तो वह उसे छोटी बता देगा। यह तुम्हारी
बातों को हमेशा काटेगा। यह तुम्हें यह
एहसास दिलाता रहेगा कि तुम मूर्ख हो। तुम
नासमझ हो और वह बहुत ज्ञानी है। इस
प्रक्रिया में क्या होता है? जब वह
तुम्हें नीचा दिखाता है तो तुम्हारे भीतर
अपना बचाव करने की इच्छा पैदा होती है।
तुम उससे तर्क करने लगते हो। तुम उसे सही
साबित करने की कोशिश करते हो कि तुम गलत
नहीं हो। तुम उसे समझाने में अपनी पूरी
ताकत लगा देते हो। और ठीक यही तुम उसकी
चाल में फंस जाते हो। तर्क वितर्क में
उलझकर तुम अपनी कीमती ऊर्जा उसके सामने
फेंक रहे हो। वह तुम्हारी किसी बात को
नहीं मान रहा है। वह सिर्फ तुम्हें उकसा
रहा है ताकि तुम बोलते रहो। तुम सफाई देते
रहो। तुम लड़ते रहो। तुम्हारी यह सफाई
देने की छटपटाहट तुम्हारा यह गुस्सा उसके
लिए भोजन है। वह भीतर ही भीतर खुश होता है
कि उसने तुम्हें अपने नियंत्रण में ले
लिया। जब तुम बहस करके पूरी तरह थक जाते
हो। तब वह तुम्हें एक उपहास भरी नजर से
देखता है और चला जाता है। वह तुम्हारी
ऊर्जा से भर चुका होता है और तुम एक हारे
हुए सैनिक की तरह खाली हो जाते हो। चौथा
चेहरा उस इंसान का है जो कभी चुप नहीं
होता। जो सिर्फ बोलना जानता है सुनना
नहीं। जब भी वह तुमसे मिलेगा वह तुम्हें
एक दीवार की तरह इस्तेमाल करेगा। वह बस
बोलता जाएगा, बोलता जाएगा। अपनी कहानियां,
अपनी बातें, अपनी शिकायतें, अपनी
उपलब्धियां।
तुम क्या सोचते हो? तुम कैसा महसूस कर रहे
हो? इससे उसे कोई लेना देना नहीं है। तुम
बस एक कान हो जिसमें उसे अपने शब्दों का
कचरा डालना है। शब्दों में बहुत ऊर्जा
होती है। जब कोई लगातार तुम्हारे ऊपर
शब्दों की बौछार कर रहा होता है तो वह असल
में अपने मन के भारीपन को तुम्हारे मन में
उतार रहा होता है। तुम वहां खड़े-खड़े
उबने लगते हो। तुम्हारा मन करता है कि
वहां से भाग जाओ। लेकिन तुम शिष्टाचार के
कारण, शराफत के कारण वहां खड़े रहते हो और
हां में हां मिलाते रहते हो। तुम खुद को
सिकोड़ लेते हो ताकि उस व्यक्ति के शब्दों
का प्रहार कम हो सके। लेकिन तुम्हारा आभा
मंडल छल्ली हो रहा होता है। वह इंसान अपनी
बातों के जरिए तुम्हारे प्राणमय कोष में
सेंध लगा रहा है। जब वह अपना पूरा भाषण
खत्म करके जाता है तो उसे बहुत हल्का
महसूस होता है। क्योंकि उसने अपना सारा
बोझ तुम्हारे सिर पर डाल दिया है और तुम
सिर दर्द से तड़पने लगते हो। ऐसे लोग
तुम्हारे जीवन की शांति को शब्दों के शोर
में डुबोकर तुम्हारी ऊर्जा की चोरी करते
हैं। और पांचवा चेहरा वह है जो तुम्हारे
भीतर अपराध बोध जगाता है। यह चेहरा बहुत
सूक्ष्मता से काम करता है। यह तुम्हें कभी
सीधा कुछ नहीं कहेगा। लेकिन इसके व्यवहार
से, इसके शब्दों के ढंग से तुम्हें हमेशा
यह लगेगा कि तुमने कुछ गलत किया है। तुमने
पर्याप्त नहीं किया। तुम एक अच्छे बेटे
नहीं हो। तुम एक अच्छे मित्र नहीं हो। तुम
एक अच्छे इंसान नहीं हो। वह बार-बार
तुम्हें तुम्हारी कमियों की याद दिलाएगा।
उन चीजों की याद दिलाएगा जो तुम नहीं कर
पाए। अपराध बोध मनुष्य के भीतर की ऊर्जा
को चूसने वाला सबसे बड़ा कीड़ा है। जब तुम
अपराध बोध से भर जाते हो तो तुम खुद को ही
भीतर से खाने लगते हो। तुम्हारी ऊर्जा
सिकुड़ने लगती है। तुम्हारी जीवन शक्ति का
बहाव उल्टा हो जाता है। और जो इंसान
तुम्हारे भीतर यह अपराध बोध जगा रहा है,
वह असल में तुम्हें अपने नियंत्रण में कर
रहा है। वह चाहता है कि तुम उसकी हां में
हां मिलाओ। तुम उसके अनुसार चलो क्योंकि
तुम खुद को गलत मान चुके हो। वह तुम्हारी
इस आत्म ग्लानि का फायदा उठाता है। वह
तुम्हें मानसिक रूप से पंगू बना देता है।
जब तुम खुद को ही दोषी मान लेते हो तो तुम
अपनी ऊर्जा की चाबी खुद उसके हाथों में
सौंप देते हो। वह फिर अपनी मर्जी से
तुम्हारा इस्तेमाल करता है। यह वे पांच
चेहरे हैं जो तुम्हारे आसपास हर दिन मौजूद
हैं। यह कोई बाहरी दुश्मन नहीं है। यह
तुम्हारी ही दुनिया का हिस्सा है। समस्या
यह नहीं है कि यह लोग मौजूद हैं। समस्या
यह है कि तुम इनके प्रति जागे हुए नहीं
हो। तुमने कभी यह विज्ञान नहीं समझा कि
जीवन सिर्फ खाना खाने और सो जाने का नाम
नहीं है। जीवन ऊर्जा का एक निरंतर प्रवाह
है। हर पल तुम्हारी ऊर्जा या तो बढ़ रही
है या घट रही है। हर मुलाकात हर शब्द हर
स्पर्श तुम्हारे चुंबकीय क्षेत्र पर
प्रभाव डाल रहा है। तुम्हें क्या लगता है
कि जब तुम अकारण ही उदास हो जाते हो तो वह
क्या है? वह कोई आसमान से गिरी हुई उदासी
नहीं है। वह किसी और की फेंकी हुई राख है
जो तुम्हारे साफ आंगन में आ गिरी है।
तुमने अपने आंगन की कोई चार दीवारी नहीं
बनाई। तुमने कोई सुरक्षा का घेरा नहीं
बनाया। इसीलिए जो भी सड़क से गुजरता है
अपना कचरा तुम्हारे भीतर फेंक जाता है और
तुम उस कचरे को अपना मानकर उसे साफ करने
में उसे ढोने में अपना पूरा जीवन लगा देते
हो। तुम्हें यह बहुत स्पष्ट रूप से समझना
होगा कि तुम्हारे प्राणों की रक्षा करने
कोई और नहीं आएगा। यह तुम्हारा अपना जीवन
है। यह तुम्हारी अपनी ऊर्जा है। जिस तरह
से तुम अपने शरीर को बीमारियों से बचाते
हो, दूषित भोजन खाने से बचते हो, गंदा
पानी नहीं पीते, उसी तरह तुम्हें अपनी
जीवन ऊर्जा को भी दूषित होने से बचाना
होगा। यह बात अगर गहरे में तुम्हारे भीतर
बैठ गई तो तुम्हारे जीवन की आधी समस्याएं
तो वैसे ही खत्म हो जाएंगी। तुम्हें पता
चल जाएगा कि तुम्हारी थकान शारीरिक कम और
चुंबकीय ज्यादा है। तुम्हारी बेचैनी
तुम्हारी अपनी नहीं है। वह उधार ली गई है।
अब प्रश्न यह उठता है कि जब यह बीमारी
इतनी गहरी है, जब यह ऊर्जा की चोरी हर दिन
हर पल हो रही है, तो इसे रोका कैसे जाए?
कैसे हम अपने इस टूटे हुए आभा मंडल को फिर
से जोड़ें? कैसे हम उन प्राचीन सूत्रों को
आज के इस आधुनिक जीवन में उतारे ताकि हम
भीतर से एक मजबूत किला बन सके ताकि कोई भी
हमारी अनुमति के बिना हमारे प्राणों में
सेंध ना लगा सके। यह कोई विचार से नहीं
होगा। यह सिर्फ सोचने से नहीं होगा कि मैं
अपनी ऊर्जा बचाऊंगा। इसके लिए तुम्हें
अपने शरीर और पृथ्वी के बीच के विज्ञान को
समझना होगा। इसके लिए तुम्हें एक बहुत ही
ठोस एक बहुत ही गहरी प्रक्रिया से गुजरना
होगा जो तुम्हारे उस प्राणमय कोष
[गला साफ़ करने की आवाज़] को फिर से लोहे
जैसा मजबूत बना दे। वह प्रक्रिया जो
तुम्हें वापस तुम्हारी जड़ों से जोड़ दे।
वह समाधान जो तुम्हें भीतर से इतना भरा
हुआ कर दे कि किसी की नकारात्मकता तुम्हें
छू भी ना सके। वह उपाय क्या है और उस विधि
को अपने जीवन में कैसे उतारना है यह अब
तुम्हें पूरी गहराई से समझना होगा। अब हम
उस विधि की तरफ आते हैं जो तुम्हारे जीवन
की दिशा पूरी तरह बदल देगी। तुमने बीमारी
को समझ लिया। तुमने उस अदृश्य चोरी को
पहचान लिया जो हर पल तुम्हारे भीतर घट रही
है। अब समय है उस अजय ढाल को बनाने का जो
तुम्हें इन प्रहारों से बचाएगी। यह कोई
पूजा पाठ नहीं है। यह कोई अंधा कर्मकांड
भी नहीं है जिसे तुम बिना समझे। मस्तिष्क
को भी उसी अवस्था में खींच लेता है। और इस
पूरी प्रक्रिया में वह
[गला साफ़ करने की आवाज़] तुम्हारी ऊर्जा
को सोख कर खुद थोड़ा बेहतर महसूस करने
लगता है। जबकि तुम पूरी तरह से टूट जाते
हो। अब तुम्हें यह समझना होगा कि यह लोग
कौन हैं जो तुम्हारी ऊर्जा चूस रहे हैं।
यह कहीं बाहर से नहीं आते। इनके सिर पर
कोई सींग नहीं होते। जब तुम इस प्रयोग को
करते हो तो तुम्हारे शरीर और मन में असल
में क्या घटता है? हमारा शरीर मिट्टी से
बना है। प्राचीन ऋषियों ने इसे ऐसे ही कोई
काव्य में नहीं कहा था। तुम्हारा यह मांस,
तुम्हारी हड्डियां, तुम्हारा रक्त सब कुछ
इसी धरती का ही तो हिस्सा है। जब तुम तनाव
में होते हो, जब कोई तुम्हारी जीवन शक्ति
चूस लेता है। या जब तुम बहुत ज्यादा सोचते
और उलझते हो तो तुम्हारे शरीर में एक
अनावश्यक ताप पैदा हो जाता है। तुम्हारे
भीतर एक प्रकार का विद्युतीय तनाव बहुत
ज्यादा बढ़ जाता है। यह तनाव ही तुम्हारी
बेचैनी का असली कारण है। यह बिल्कुल वैसा
ही है [गला साफ़ करने की आवाज़] जैसे
आसमान में बादलों के टकराने से भारी बिजली
पैदा होती है। अगर उस बिजली को धरती में
उतरने का सीधा रास्ता ना मिले तो वह सब
कुछ जलाकर राख कर सकती है। इसलिए ऊंचे और
बड़े भवनों पर एक धातु का तार लगाया जाता
है। जिसे पृथ्वी के भीतर बहुत गहराई तक
गाड़ दिया जाता है ताकि जब बिजली गिरे तो
वह सीधा धरती में समा जाए और भवन पूरी तरह
सुरक्षित रहे। तुम्हारा शरीर भी एक भवन
है। और जब तुम्हारे भीतर क्रोध, भय, चिंता
या किसी और इंसान की फेंकी हुई
नकारात्मकता की कड़ी बिजली कड़कती है तो
तुम्हें भी उस बिजली को धरती में उतारना
होता है। धरती के पास एक असीमित क्षमता
है। वह हर तरह के विष को हर तरह के ताप को
अपने भीतर सोख सकती है। धरती के गर्भ में
एक अत्यंत शांत ठंडी ऊर्जा है। जब
तुम्हारे शरीर का उबलता हुआ ताप धरती की
इस अनंत शांति से मिलता है तो वह सारा
तनाव क्षण भर में शून्य हो जाता है।
ऋषियों ने इस क्रिया को इसलिए बनाया था
क्योंकि वे जानते थे कि मनुष्य का मन जब
भी भटकेगा उसे वापस अपनी जड़ों की ओर धरती
की ओर ही लौटना पड़ेगा। यह तुम्हारे ऊर्जा
के आवरण को बंद करने और उसे एक लोहे के
घेरे में बदलने का सबसे प्राकृतिक तरीका
है। इस विधि के लिए तुम्हें क्या चाहिए?
कोई बहुत बड़ा आयोजन नहीं करना है। इसके
लिए सबसे अच्छी जगह वह है जहां तुम्हारे
पैर सीधे प्राकृतिक धरती को छू सके। कोई
भी बगीचा, तुम्हारे घर का कोई कच्चा
हिस्सा या मुलायम घास का मैदान समय का
चुनाव तुम्हें खुद करना है। लेकिन सबसे
उत्तम समय तब होता है जब सूरज उग रहा हो
या जब दिन ढल रहा हो। अगर तुम्हारे जीवन
में कोई ऐसा व्यक्ति है जो तुम्हारी जीवन
शक्ति चूसता है और तुम उससे अभी-अभी मिलकर
आए हो तो उससे मिलने के तुरंत बाद यह
प्रयोग करना सबसे ज्यादा आवश्यक है। इस
प्रयोग को करने से पहले तुम्हारे शरीर पर
कोई भी कृत्रिम या रेशमी कपड़ा नहीं होना
चाहिए। जितना हो सके सूती और ढीले कपड़े
पहनो। तुम्हारे पैरों में जूते या चप्पल
बिल्कुल नहीं होने चाहिए। तुम्हारा पूरी
तरह नंगे पैर होना इस पूरी प्रक्रिया की
सबसे बड़ी और अनिवार्य शर्त है। तुम्हारे
और धरती के बीच कोई रबर, कोई चमड़ा या कोई
अन्य वस्तु नहीं होनी चाहिए। क्योंकि यह
चीजें ऊर्जा के सीधे प्रवाह को रोक देती
हैं। यह विधि तब सबसे ज्यादा असर करती है
जब तुम इसे पूरे खाली पेट और एक बहुत ही
शांत मन के साथ करते हो। अब इस प्रक्रिया
के पहले चरण को बहुत ध्यान से समझो।
तुम्हें नंगे पैर धरती पर सीधा खड़ा होना
है। तुम्हारे दोनों पैरों के बीच लगभग
तुम्हारे कंधों जितनी दूरी होनी चाहिए।
पैरों के पंजे सामने की ओर सीधे हो। अपनी
आंखें धीरे से बंद कर लो। अब अपना पूरा
ध्यान अपने पैरों के तलवों पर ले जाओ।
तुम्हें बस यह गहराई से महसूस करना है कि
तुम्हारे पैर धरती की मिट्टी को कैसे छू
रहे हैं। वहां कैसा स्पर्श है? क्या
मिट्टी ठंडी है? क्या घास में कोई नमी है?
इस पहले चरण में तुम्हें बस अपने तलवों और
धरती के उस मिलन बिंदु को पूरी तरह महसूस
करना है। इसे कम से कम 2 मिनट तक करना है।
अगर तुम इसे सही से कर रहे हो तो तुम्हें
महसूस होगा कि तुम्हारे पैर धीरे-धीरे
भारी होने लगे हैं। वे धरती से चिपकने
लगे।
यहां एक बहुत आम गलती यह होती है कि लोग
खड़े तो होते हैं लेकिन उनका ध्यान कल की
चिंताओं या कामकाज में उलझा रहता है।
तुम्हें अपना ध्यान पूरी तरह खींचकर सिर्फ
और सिर्फ अपने पैरों के तलवों पर रखना है।
दूसरा चरण तुम्हारी रीड की हड्डी से जुड़ा
है। खड़े रहते हुए तुम्हें अपनी रीड को
बिल्कुल सीधा करना है। जैसे कोई आसमान से
तुम्हें एक अदृश्य धागे से ऊपर खींच रहा
हो। लेकिन ध्यान रहे रीड सीधी होनी चाहिए।
अकड़ी हुई या सख्त बिल्कुल नहीं। तुम्हारे
कंधे बिल्कुल ढीले होने चाहिए। लोग अक्सर
तनाव में अपने कंधों को सिकोड़ कर रखते
हैं और उन्हें इसका पता भी नहीं चलता।
तुम्हें अपने दोनों कंधों को नीचे की ओर
गिरा देना है। उन्हें पूरी तरह शिथिल कर
देना है। तुम्हारे हाथ तुम्हारे शरीर के
दोनों तरफ बिल्कुल बेजान लटक रहे हो।
हथेलियां थोड़ी खुली हुई हो। इस अवस्था
में तुम्हें एक मिनट तक बिना हिले रुकना
है और महसूस करना है कि तुम्हारे शरीर का
ऊपरी हिस्सा बिल्कुल हल्का हो गया है और
सारा वजन नीचे पैरों की तरफ खिसक रहा है।
तीसरा चरण तुम्हारी सांसों का है। अब
तुम्हें बहुत ही धीमी और गहरी सांस लेनी
है। जब तुम सांस अंदर खींचो तो ऐसी कल्पना
करो कि तुम हवा को नाक से नहीं बल्कि अपने
पैरों के तलवों से खींच रहे हो। जैसे धरती
के भीतर से कोई ठंडी और नीली ऊर्जा
तुम्हारे तलवों से होते हुए तुम्हारे
पैरों से होते हुए तुम्हारी नाभि तक ऊपर आ
रही है। सांस को नाभि तक पहुंचने दो। नाभि
तुम्हारे शरीर का सबसे अहम केंद्र है।
नाभि के पास आकर सांस को दो पल के लिए रोक
लो। यहां कोई हड़बड़ी नहीं करनी है। इस
चरण को बहुत ही शांति से, बहुत ही प्रेम
से करना है। जब सांस नाभि पर रुकेगी तो
तुम्हें वहां एक हल्का सा दबाव, एक हल्की
सी धड़कन महसूस होगी। चौथा चरण बाहर
निकलने वाली सांस का है। यह सबसे
महत्वपूर्ण हिस्सा है। जब तुम सांस को
बाहर छोड़ोगे तो तुम्हें पूरे मन से यह
भाव करना है कि तुम्हारे शरीर का सारा
तनाव, तुम्हारी सारी थकान,
[गला साफ़ करने की आवाज़] तुम्हारा सारा
डर और वह सारी नकारात्मकता
जो किसी ने तुम्हारे भीतर डाल दी थी, वह
एक काले धुएं की तरह तुम्हारी नाभि से
नीचे की ओर जा रही है। वह तुम्हारे पैरों
से होते हुए तुम्हारे तलवुओं से बाहर
निकलकर गहरी धरती में समा रही है। सांस को
बाहर छोड़ते समय तुम्हारा पूरा शरीर एकदम
ढीला पड़ जाना चाहिए। जैसे
[नाक से की जाने वाली आवाज़] तुमने अपने
कंधों से कोई बहुत भारी बोरी नीचे फेंक दी
हो। तुम्हें यह स्पष्ट रूप से देखना है कि
वह काला धुआ धरती के बहुत भीतर जा रहा है।
जहां धरती की असीम अग्नि उसे जलाकर शुद्ध
कर रही है। इस तीसरे और चौथे चरण को
मिलाकर तुम्हें कम से कम 11 बार दोहराना
है। इसमें लगभग पांच से सात मिनट का समय
लगेगा। पांचवा चरण तुम्हारी कल्पना की
शक्ति का है। जब तुम 11 बार यह सांस की
प्रक्रिया पूरी कर लो तो अपनी सांस को
अपने आप सामान्य रूप से चलने दो। अब अपनी
बंद आंखों से ही यह स्पष्ट कल्पना करो कि
तुम्हारे पैरों के तलवों से कुछ सुनहरी
जड़े निकल रही हैं। बिल्कुल वैसे ही जैसे
किसी बहुत पुराने और विशाल बरगद के पेड़
से जड़े निकलती हैं। यह प्रकाश की जड़े
हैं। यह तुम्हारे तलवों से निकलकर धरती के
भीतर गहराई तक जा रही हैं। नीचे और नीचे।
यह जड़े तुम्हें धरती के बिल्कुल केंद्र
से जोड़ रही हैं। तुम्हें एक बहुत ही गहरा
स्थायित्व महसूस होगा। तुम्हें लगेगा कि
अब चाहे कोई कितना भी बड़ा तूफान आ जाए,
चाहे कोई इंसान तुम्हारे सामने कितना भी
चिल्लाए या रोए, वह तुम्हें हिला नहीं
सकता। क्योंकि अब तुम सिर्फ एक साधारण
इंसान नहीं हो। तुम इस विशाल धरती से पूरी
तरह जुड़ गए हो। तुम एक बहुत बड़े और
मजबूत पेड़ की तरह हो गए हो। इस भाव में
तुम्हें तीन से चार मिनट तक खड़ा रहना है।
छठा चरण तुम्हारे आभा मंडल को पूरी तरह
बंद करने का है। जब तुम अपनी जड़ों को
महसूस कर लो तो अब तुम्हें अपने दोनों
हाथों की उंगलियों को आपस में फंसा लेना
है और उन्हें अपनी नाभि के ठीक ऊपर रखना
है। जैसे तुमने कोई पक्का ताला लगा दिया
हो। यह तुम्हारे ऊर्जा चक्र को बंद करने
की प्राचीन मुद्रा है। जब तुम अपने हाथों
को इस तरह जोड़ते हो तो तुम्हारे शरीर की
विद्युत का घेरा पूरा हो जाता है। अब
तुम्हारी ऊर्जा तुम्हारे ही भीतर गोलगोल
घूमने लगेगी। वह किसी भी हाल में बाहर
नहीं जा पाएगी। अब तुम्हें यह कड़ा संकल्प
लेना है कि तुम्हारा आभा मंडल एक सुनहरे
रंग के प्रकाश से घिर गया है। यह प्रकाश
एक कवच की तरह तुम्हारे पूरे शरीर के
चारों ओर है। यह इतना मजबूत है कि कोई भी
बाहरी विचार, कोई भी बाहरी ऊर्जा या किसी
की बुरी नजर इसे किसी भी कीमत पर भेद नहीं
सकती। इस अवस्था में तुम्हें 2 मिनट तक
खड़ा रहना है। और सातवां तथा अंतिम चरण है
कृतज्ञता। अपनी आंखें बहुत ही धीरे से
खोलो। अपने हाथों को खोलकर अपनी छाती के
पास लाओ और धरती माता को पूरे हृदय से
धन्यवाद दो। उसने तुम्हारा सारा विष पी
लिया और तुम्हें अपने प्राणों की शुद्ध और
ताजी ऊर्जा से भर दिया। अपने दोनों हाथों
को आपस में रगड़कर अपने चेहरे पर फेरो।
तुम पाओगे कि तुम्हारे भीतर एक अद्भुत
सन्नाटा छा गया है। एक ऐसी शांति जो तुमने
पहले कभी महसूस नहीं की होगी। अगर यह विधि
सही तरीके से हो रही है तो तुम अपने शरीर
में कुछ बहुत ही स्पष्ट और सीधे बदलाव
देखोगे। सबसे पहला लक्षण यह होगा कि
तुम्हारे हाथों की हथेलियों में और
उंगलियों के पोरों में एक अजीब सी गर्माहट
महसूस होगी। जैसे रक्त का प्रवाह बहुत तेज
हो गया हो। तुम्हारे पैरों के तलवों में
एक भारीपन आएगा। जैसे उनमें कोई चुंबक लगा
हो जो तुम्हें जमीन से बांधे हुए हैं। और
सबसे बड़ी बात तुम्हारे मन में चलने वाली
व्यर्थ विचारों की भिड़भाड़ अचानक से धीमी
पड़ जाएगी। तुम्हारी सांसे बहुत गहरी और
लंबी हो जाएंगी। अगर तुम्हें ऐसा महसूस हो
रहा है तो समझ लो कि तुम्हारी ऊर्जा धरती
से पूरी तरह जुड़ चुकी है और तुम्हारा
आभामंडल साफ हो गया है। लेकिन इस
प्रक्रिया में तुम्हें कुछ गलतियों से
बचना होगा। इन गलतियों से बचोगे तभी पूरे
परिणाम मिलेंगे। लोग अक्सर सबसे बड़ी गलती
यह करते हैं कि वे इसे बंद कमरों में
चिकने पत्थरों के फर्श पर खड़े होकर करने
लगते हैं। पत्थर का फर्श या किसी भी तरह
की कृत्रिम चादर धरती की ऊर्जा को तुम तक
पहुंचने नहीं देते। दूसरी गलती लोग यह
करते हैं कि वे सांस छोड़ते समय अपनी छाती
को तान कर रखते हैं। याद रखो तुम्हें
पूर्ण समर्पण करना है। तुम्हें अकड़ना
नहीं है। छाती तनी हुई नहीं होनी चाहिए।
शरीर बिल्कुल बांस की तरह लचीला होना
चाहिए जो हवा के साथ झुक सकता है। और
तीसरी गलती है विचारों से लड़ना। जब तुम
खड़े होगे तो शुरुआत में कई विचार आएंगे।
तुम्हें उनसे लड़ना या उलझना नहीं है। बस
अपना पूरा ध्यान वापस अपने तलवों और धरती
के स्पर्श पर ले आना है। इस विधि को
तुम्हें शुरुआत में लगातार 21 दिन तक हर
दिन करना चाहिए। 21 दिन में तुम्हारे शरीर
का एक-एक अणु इस नई ऊर्जा को पहचान लेगा।
पहले सात दिनों में ही तुम देखोगे कि जिन
छोटी-छोटी बातों पर तुम्हें पहले बहुत
जल्दी गुस्सा आ जाता था या तुम निराश हो
जाते थे अब उन बातों का तुम पर कोई असर
नहीं पड़ता। तुम पहले से कहीं ज्यादा शांत
और स्थिर रहने लगे हो। और कुछ महीनों के
बाद तुम्हारा आभा मंडल इतना मजबूत हो
जाएगा कि ऊर्जा चूसने वाले लोग खुद ही
तुमसे दूर भागने लगेंगे क्योंकि उन्हें
तुम्हारे भीतर से अपना वह पुराना भोजन
नहीं मिलेगा। जब तुम इस प्रयोग को सीख जाओ
तो इसे अपने दैनिक जीवन में गहराई से उतार
लो। मैं तुम्हें तीन बहुत ही सटीक बातें
बता रहा हूं जिन्हें तुम्हें आज से ही
अपनाना है। पहला जब भी तुम्हें लगे कि
सामने वाला व्यक्ति सिर्फ शिकायत कर रहा
है, ड्रामा कर रहा है और तुम्हारी जीवन
शक्ति चूस रहा है तो बिना उसे बताए तुरंत
अपने दोनों पैरों को जमीन पर मजबूती से
टिका दो और अपनी सांसों को नाभि तक गहरा
कर लो। तुम देखोगे कि उसकी बातों का असर
तुम पर उसी क्षण होना बंद हो गया है। तुम
एक पारदर्शी कांच की तरह हो जाओगे जिसके
आर पार उसकी बातें निकल जाएंगी लेकिन भीतर
कुछ नहीं रुकेगा। दूसरा जब भी तुम किसी
बहुत भिड़भाड़ वाली जगह से अस्पताल से या
किसी उदास माहौल से घर लौटो तो सबसे पहले
अपने पैरों को नमक मिले हुए पानी से धो
लो। नमक में वह गुण होता है जो तुम्हारे
शरीर से चिपकी हुई किसी भी बाहरी और
नकारात्मक ऊर्जा को तुरंत काट देता है। यह
तुम्हारे आभामंडल को साफ करने का सबसे तेज
उपाय है। और तीसरा कभी भी किसी की समस्या
को अपने ऊपर मत लो। इंसानियत के नाते
सहानुभूति रखो। मदद करो। लेकिन उस दुख में
उतरो मत। तुम इस दुनिया के तारणहार नहीं
हो। तुम बस एक दर्शक हो। दूर से देखना
सीखो। उलझना नहीं। अगर तुम इन बातों को
अपने भीतर उतार लोगे तो तुम्हारे प्राणों
का दीपक कभी बुझेगा नहीं। वह हमेशा पूरे
प्रकाश के साथ जलता रहेगा और तुम्हारे
जीवन में वह सच्ची शांति उतरेगी जिसकी तुम
असल में तलाश कर रहे हो। यह ज्ञान
तुम्हारे भीतर हमेशा से था। यह कोई नई बात
नहीं है। यह बस उसी का स्मरण है जो तुम
भूल गए थे।
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