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प्राण रक्षा विद्या का गुप्त रहस्य: कोई तुम्हारी शक्ति पी रहा है, सावधान! | Osho #oshohindi

36:25HindiTranscribed Jul 29, 2026
0:00

क्या तुमने कभी गौर किया है? तुम सुबह

0:03

बिस्तर से उठते हो। शरीर ने पूरी रात

0:06

विश्राम किया है। आंखें खुलती है। शरीर को

0:10

आराम मिल चुका है। लेकिन भीतर एक बहुत

0:13

गहरी थकान है। एक अनजानी सी कमजोरी। एक

0:18

भारीपन जो बिना किसी कारण के तुम्हें

0:20

जकड़े हुए हैं। तुम सोचते हो कि शायद काम

0:24

का बोझ ज्यादा है। शायद भोजन में कोई कमी

0:28

है। शायद नींद पूरी नहीं हुई। तुम अलग-अलग

0:32

तर्क खोजते हो। नहीं, तुम एक बहुत बड़ी

0:35

भूल कर रहे हो। यह

0:37

[नाक से की जाने वाली आवाज़] थकान

0:38

तुम्हारे शरीर की नहीं है। यह थकान

0:41

तुम्हारे प्राणों की है। तुम्हारी जीवन

0:43

शक्ति को कोई चुपचाप पी रहा है। तुम घर से

0:47

बाहर निकलते हो, किसी से मिलते हो, किसी

0:50

भीड़ वाले कमरे में जाते हो और अचानक

0:53

तुम्हारी सारी ऊर्जा जैसे निचोड़ ली जाती

0:56

है। कोई तुम्हारी अनुमति के बिना तुम्हें

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भीतर से खोखला कर रहा है। और सबसे भयंकर

1:03

बात यह है कि तुमने खुद अपने दरवाजे खुले

1:06

छोड़ रखे हैं। तुम्हें

1:08

[गला साफ़ करने की आवाज़] लगता है कि

1:09

सिर्फ कुदाल चलाने से, पत्थर तोड़ने से या

1:13

बहुत अधिक भाग दौड़ करने से ही इंसान थकता

1:16

है। यह तुम्हारी सबसे बड़ी भ्रांति है।

1:20

शरीर की थकान तो रात भर की नींद से मिट

1:23

जाती है। शरीर का तंत्र ऐसा है कि वह खुद

1:26

को फिर से तरोताजा कर लेता है। लेकिन जो

1:29

थकान नींद के बाद भी बची रह जाए, जो थकान

1:33

नहाने के बाद भी ना धुले, जो थकान अच्छे

1:36

भोजन के बाद भी ना मिटे, वह थकान यह बता

1:39

रही है कि तुम्हारी प्राण ऊर्जा का क्षरण

1:42

हो रहा है। तुम्हारे भीतर कोई ऐसा छेद हो

1:45

गया है जहां से तुम्हारा जीवन रिस रहा है।

1:47

और तुम इसे देख नहीं पा रहे हो क्योंकि

1:50

तुम्हारी आंखें सिर्फ स्थूल चीजों को

1:52

देखने की आदि हो चुकी हैं। तुम सिर्फ मांस

1:56

और हड्डियों के शरीर को जानते हो। तुम उस

1:59

ऊर्जा के शरीर को नहीं जानते जो इस मांस

2:02

और मज्जा को चलाता है। आजकल इंसान जो सबसे

2:07

बड़ी भूल कर रहा है वह यही है कि वह अपने

2:11

ऊर्जा के आवरण को बिल्कुल असुरक्षित

2:14

छोड़कर जी रहा है। तुम अपने घर के दरवाजों

2:17

पर ताले लगाते हो। तुम अपने धन को तिजोरी

2:20

में रखते हो। तुम अपने शरीर को कपड़ों से

2:23

ढकते हो ताकि सर्दी या गर्मी से बचा जा

2:25

सके।

2:27

लेकिन तुम अपनी सबसे कीमती चीज अपनी प्राण

2:31

ऊर्जा को बिल्कुल नग्न अवस्था में सड़क पर

2:35

लेकर घूम रहे हो। कोई भी आता है तुम्हारी

2:39

ऊर्जा को नोच लेता है, चूस लेता है और तुम

2:43

खाली बर्तन की तरह खनकते हुए घर लौट आते

2:46

हो। तुम बाजार जाते हो। वहां की आपाधापी

2:50

में बिना कुछ किए तुम थक जाते हो। तुम

2:53

अपने कार्यस्थल पर किसी ऐसे व्यक्ति के

2:55

पास बैठते हो जो लगातार शिकायत कर रहा है

3:00

और 10 मिनट बाद तुम्हें लगता है कि

3:02

तुम्हारे सिर में दर्द होने लगा है।

3:04

तुम्हारी सांसे भारी हो गई हैं। तुम्हें

3:06

लगता है कि यह तनाव है। नहीं यह तनाव नहीं

3:10

है। यह चोरी है। तुम्हारे प्राणों की चोरी

3:13

5000 साल पहले महर्षि पतंजलि ने एक बहुत

3:18

गहरी बात कही थी। उन्होंने मनुष्य के शरीर

3:22

को सिर्फ एक ढांचा नहीं माना। उन्होंने

3:25

बताया कि हमारे शरीर के चारों ओर एक ऊर्जा

3:28

का घेरा होता है। जिसे प्राचीन विज्ञान

3:30

में प्राणमय कोष कहा गया है। यह वह आवरण

3:34

है जो तुम्हारे भौतिक शरीर की रक्षा करता

3:37

है। जैसे पृथ्वी के चारों ओर हवा का एक

3:40

घेरा। जो सूरज की खतरनाक किरणों को पृथ्वी

3:45

तक आने से रोकता है। अगर वह घेरा टूट जाए

3:50

तो पृथ्वी जलकर भस्म हो जाएगी। ठीक वैसे

3:53

ही तुम्हारे इस भौतिक शरीर के चारों ओर

3:57

तुम्हारी अपनी जीवन शक्ति का एक घेरा है।

4:00

एक आभा मंडल है। जब तक यह घेरा मजबूत है।

4:04

दुनिया की कोई भी नकारात्मकता, कोई भी

4:06

पीड़ा, कोई भी मानसिक बीमारी तुम्हारे

4:10

भीतर प्रवेश नहीं कर सकती। लेकिन तुमने इस

4:13

विज्ञान को भुला दिया। तुमने अपने इस

4:17

प्राणमय कोष को इतना कमजोर कर लिया है।

4:20

इसमें इतने छेद कर लिए हैं कि अब कोई भी

4:23

आसानी से तुम्हारी ऊर्जा को सोख सकता है।

4:26

प्राचीन ऋषियों ने कोई हवाहवाई बातें नहीं

4:29

की थी। उनका विज्ञान बहुत ही ठोस और जीवन

4:33

के बहुत करीब था। उन्होंने देखा कि जब दो

4:35

इंसान पास आते हैं तो सिर्फ उनके शरीर ही

4:39

पास नहीं आते। उनके आभा मंडल भी एक दूसरे

4:43

से टकराते हैं और जिसका आभा मंडल कमजोर

4:47

होता है, वह अपनी जीवन शक्ति खोने लगता

4:50

है। महर्षि पतंजलि ने इसी ऊर्जा को

4:53

संरक्षित करने के सूत्र दिए थे। उन्होंने

4:56

बताया था कि कैसे इंसान अपने प्राणों को

4:59

भीतर समेट सकता है।

5:01

[नाक से की जाने वाली आवाज़] लेकिन तुमने

5:02

उन सूत्रों को महज कुछ श्वास की कसरतों तक

5:06

सीमित कर दिया। तुम भूल गए कि हर संबंध

5:09

में, हर बातचीत में, हर मुलाकात में ऊर्जा

5:13

का लेनदेन हो रहा है। अब जरा आधुनिक

5:16

विज्ञान की तरफ देखो। तुम प्राचीन बातों

5:19

को शायद पुराना समझकर खारिज कर दो। लेकिन

5:22

आज का विज्ञान ठीक वही बात कह रहा है जो

5:25

हजारों साल पहले कही गई थी। आज के

5:28

वैज्ञानिक उपकरणों ने यह साबित कर दिया है

5:33

कि मनुष्य के हृदय का अपना एक बहुत

5:35

शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र होता है। जब

5:38

तुम किसी मशीन पर अपने हृदय की जांच

5:40

करवाते हो तो वह मशीन तुम्हारे हृदय की

5:43

धड़कन का जो चित्र बनाती है वह असल में

5:46

उसी विद्युत चुंबकीय ऊर्जा का चित्र है।

5:50

विज्ञान कहता है कि यह चुंबकीय क्षेत्र

5:53

तुम्हारे शरीर से कई फुट दूर तक फैला होता

5:56

है। हर इंसान एक चलता फिरता चुंबक है। जब

6:01

तुम किसी ऐसे व्यक्ति के संपर्क में आते

6:03

हो जो भीतर से खाली है, जो भीतर से

6:07

नकारात्मक है, जो भीतर से बीमार है,

6:10

शारीरिक रूप से नहीं बल्कि मानसिक और

6:14

भावनात्मक रूप से तो उसका चुंबकीय क्षेत्र

6:17

तुम्हारे चुंबकीय क्षेत्र से टकराता है।

6:20

विज्ञान का यह बहुत ही साधारण सा नियम है

6:23

कि ऊर्जा हमेशा उच्च स्तर से निम्न स्तर

6:26

की ओर बहती है। जैसे पानी हमेशा ऊंचाई से

6:29

ढलान की तरफ बहता है। ठीक उसी तरह जब तुम

6:32

किसी ऐसे इंसान के पास बैठते हो जो ऊर्जा

6:35

से खाली है तो तुम्हारी ऊर्जा अपने आप

6:39

उसकी तरफ बहने लगती है। तुम्हारी जीवन

6:42

शक्ति का यह चुंबकीय क्षेत्र उस खाली

6:45

इंसान को भरने लगता है। विज्ञान इसे बायो

6:49

इलेक्ट्रोमैग्नेटिक इंटरेक्शन कहता है। यह

6:52

कोई जादू टोना नहीं है। यह कोई रहस्य की

6:55

बात नहीं है। यह विशुद्ध भौतिकी और जीव

6:58

विज्ञान है। जब तुम किसी ऊर्जा चूसने वाले

7:01

व्यक्ति से बात करते हो तो तुम्हारे

7:03

मस्तिष्क की तरंगे बदलने लगती हैं।

7:06

तुम्हारे हृदय की धड़कन का तालमेल

7:09

गड़बड़ाने लगता है। तुम्हारे खून में बहने

7:12

वाले रसायन बदल जाते हैं। विज्ञान ने यह

7:14

जांचा है कि जब दो लोग बात करते हैं तो

7:17

उनकी मस्तिष्क तरंगे एक दूसरे की नकल करने

7:21

लगती हैं। अगर सामने वाला इंसान तनाव में

7:24

है, क्रोध में है या निराशा में है तो

7:28

उसका चुंबकीय क्षेत्र इतना हावी होता है

7:31

कि वह तुम्हारे मस्तिष्क को भी उसी अवस्था

7:34

में खींच लेता है। और इस पूरी प्रक्रिया

7:38

में वह तुम्हारी ऊर्जा को सोख कर खुद

7:41

थोड़ा बेहतर महसूस करने लगता है। जबकि तुम

7:44

पूरी तरह से टूट जाते हो। अब तुम्हें यह

7:47

समझना होगा कि यह लोग कौन है जो तुम्हारी

7:50

ऊर्जा चूस रहे हैं। यह कहीं बाहर से नहीं

7:54

आते। इनके सिर पर कोई सींग नहीं होते। यह

7:57

देखने में बिल्कुल तुम्हारे और मेरे जैसे

8:01

होते हैं। अक्सर यह तुम्हारे बहुत करीब

8:03

होते हैं। तुम्हारे अपने परिवार में हो

8:06

सकते हैं। तुम्हारे मित्रों में हो सकते

8:09

हैं। तुम्हारे साथ काम करने वाले हो सकते

8:11

हैं। यह तुम्हारे जीवन में अलग-अलग मुखौटे

8:14

पहन कर आते हैं। तुम्हें इन ऊर्जा चूसने

8:18

वालों के सबसे खतरनाक चेहरों को पहचानना

8:21

होगा। क्योंकि जब तक तुम बीमारी को नहीं

8:24

पहचानोगे, तुम उससे अपना बचाव कैसे करोगे?

8:26

पहला चेहरा बहुत ही मासूम होता है। यह वह

8:29

इंसान है जो हमेशा खुद को बेचारा दिखाता

8:32

है। जब भी वह तुमसे मिलेगा उसके पास अपनी

8:36

पीड़ा की, अपने दुखों की एक लंबी कहानी

8:40

होगी। वह दुनिया का सबसे सताया हुआ इंसान

8:43

है। उसके साथ हमेशा कुछ ना कुछ बुरा ही

8:46

होता है। तुम जब भी उससे पूछोगे कि वह

8:49

कैसा है? वह गहरी और ठंडी सांस लेगा और

8:52

फिर अपने दुखों का पिटारा खोल देगा। यह

8:55

व्यक्ति तुम्हारी सहानुभूति का भूखा होता

8:57

है। याद रखना सहानुभूति वह पुल है जिस पर

9:03

चलकर तुम्हारी ऊर्जा दूसरे व्यक्ति तक

9:06

पहुंचती है। जब तुम ऐसे बेचारे इंसान की

9:10

बात सुनते हो तो तुम्हें उस पर दया आती

9:13

है। तुम उसे सांत्वना देने की कोशिश करते

9:16

हो। तुम कहते हो कि सब ठीक हो जाएगा। तुम

9:19

उसकी समस्या सुलझाने की कोशिश करते हो।

9:23

लेकिन असल में वह अपनी समस्या सुलझाना ही

9:26

नहीं चाहता। उसका दुख ही उसका अस्तित्व

9:29

है। अगर उसका दुख छीन गया तो उसके पास बात

9:33

करने को कुछ नहीं बचेगा। वह सिर्फ

9:36

तुम्हारा ध्यान चाहता है। तुम्हारी ऊर्जा

9:39

चाहता है। तुम जब उसके साथ होते हो तो तुम

9:43

अपनी ऊर्जा उसके भीतर उंडेल रहे होते हो।

9:46

एक घंटे बाद वह इंसान मुस्कुराता हुआ

9:49

थोड़ा हल्का होकर चला जाएगा और तुम अपने

9:51

बिस्तर पर निढाल होकर गिर पड़ोगे। तुम्हें

9:55

लगेगा कि सारा संसार तुम्हारे कंधों पर आ

9:59

गया [गहरी सांस लेने की आवाज़] है। यह

10:00

बेचारा दिखने वाला इंसान तुम्हारे प्राणों

10:03

का सबसे बड़ा शोषक है। वह तुम्हारे भीतर

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दया की भावना जगाता है और उसी दया के

10:10

रास्ते तुम्हारी जीवन शक्ति को पी जाता

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है। दूसरा चेहरा वह है जिसे हमेशा हर बात

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में नाटक चाहिए। विवाद चाहिए। यह व्यक्ति

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शांति से नहीं बैठ सकता। अगर इसके जीवन

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में सब कुछ ठीक चल रहा हो तो यह खुद ही

10:31

कोई ना कोई गड़बड़ी पैदा कर देगा। इसे हम

10:34

विवाद खड़ा करने वाला इंसान कह सकते हैं।

10:37

यह अचानक से क्रोधित हो जाएगा। छोटी-छोटी

10:40

बातों पर बड़ा हंगामा खड़ा कर देगा। यह

10:43

लोगों को आपस में लड़ाएगा। जब यह कमरे में

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आता है तो तुम्हें एक अजीब सी घबराहट

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महसूस होती है। तुम्हें लगता है कि अभी

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कुछ फटने वाला है। अभी कोई विस्फोट होने

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वाला है। इस तरह के व्यक्ति का विज्ञान

11:00

समझो। जब यह क्रोध करता है या जोर से

11:04

चिल्लाता है या रोने धोने का नाटक करता है

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तो यह तुम्हारे भीतर भय या बेचैनी पैदा

11:11

करता है। भय भी ऊर्जा खोने का एक बहुत

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बड़ा कारण है। जब तुम डरते हो या घबराते

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हो तो तुम्हारे आभा मंडल में दरार जाती

11:21

है। यह नाटक करने वाला इंसान तुम्हारे

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शांत सरोवर में पत्थर मारता है। लहरें

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पैदा करता है और जब तुम अशांत हो जाते हो

11:33

तो उस अशांति से पैदा होने वाली ऊर्जा को

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वह ग्रहण कर लेता है। वह खुद को बहुत

11:40

शक्तिशाली महसूस करता है क्योंकि उसने

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तुम्हें हिला दिया। वह तुम्हारी शांति को

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तोड़कर अपनी ऊर्जा की भूख मिटाता है। ऐसे

11:52

व्यक्ति के साथ तुम कभी भी चैन की सांस

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नहीं ले सकते। तुम हमेशा चौकन्ने रहते हो

11:58

कि पता नहीं अब यह क्या नया बखेरा खड़ा कर

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दे। यह लगातार चौकन्नापन ही तुम्हारी

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ऊर्जा को सोखता रहता है। तीसरा चेहरा और

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भी खतरनाक है। यह वह व्यक्ति है जो

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तुम्हें हमेशा नीचा दिखाने की कोशिश करता

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है। इसे सिर्फ अपनी श्रेष्ठता साबित करनी

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है। तुम चाहे जो भी करो वो उसमें कोई ना

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कोई कमी निकाल देगा। तुम अगर कोई नई बात

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बताओगे तो वह कहेगा कि उसे यह पहले से पता

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था। तुम अगर अपनी किसी सफलता की बात करोगे

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तो वह उसे छोटी बता देगा। यह तुम्हारी

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बातों को हमेशा काटेगा। यह तुम्हें यह

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एहसास दिलाता रहेगा कि तुम मूर्ख हो। तुम

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नासमझ हो और वह बहुत ज्ञानी है। इस

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प्रक्रिया में क्या होता है? जब वह

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तुम्हें नीचा दिखाता है तो तुम्हारे भीतर

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अपना बचाव करने की इच्छा पैदा होती है।

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तुम उससे तर्क करने लगते हो। तुम उसे सही

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साबित करने की कोशिश करते हो कि तुम गलत

13:00

नहीं हो। तुम उसे समझाने में अपनी पूरी

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ताकत लगा देते हो। और ठीक यही तुम उसकी

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चाल में फंस जाते हो। तर्क वितर्क में

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उलझकर तुम अपनी कीमती ऊर्जा उसके सामने

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फेंक रहे हो। वह तुम्हारी किसी बात को

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नहीं मान रहा है। वह सिर्फ तुम्हें उकसा

13:18

रहा है ताकि तुम बोलते रहो। तुम सफाई देते

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रहो। तुम लड़ते रहो। तुम्हारी यह सफाई

13:24

देने की छटपटाहट तुम्हारा यह गुस्सा उसके

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लिए भोजन है। वह भीतर ही भीतर खुश होता है

13:33

कि उसने तुम्हें अपने नियंत्रण में ले

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लिया। जब तुम बहस करके पूरी तरह थक जाते

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हो। तब वह तुम्हें एक उपहास भरी नजर से

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देखता है और चला जाता है। वह तुम्हारी

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ऊर्जा से भर चुका होता है और तुम एक हारे

13:47

हुए सैनिक की तरह खाली हो जाते हो। चौथा

13:50

चेहरा उस इंसान का है जो कभी चुप नहीं

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होता। जो सिर्फ बोलना जानता है सुनना

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नहीं। जब भी वह तुमसे मिलेगा वह तुम्हें

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एक दीवार की तरह इस्तेमाल करेगा। वह बस

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बोलता जाएगा, बोलता जाएगा। अपनी कहानियां,

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अपनी बातें, अपनी शिकायतें, अपनी

14:10

उपलब्धियां।

14:11

तुम क्या सोचते हो? तुम कैसा महसूस कर रहे

14:15

हो? इससे उसे कोई लेना देना नहीं है। तुम

14:19

बस एक कान हो जिसमें उसे अपने शब्दों का

14:23

कचरा डालना है। शब्दों में बहुत ऊर्जा

14:27

होती है। जब कोई लगातार तुम्हारे ऊपर

14:30

शब्दों की बौछार कर रहा होता है तो वह असल

14:34

में अपने मन के भारीपन को तुम्हारे मन में

14:37

उतार रहा होता है। तुम वहां खड़े-खड़े

14:40

उबने लगते हो। तुम्हारा मन करता है कि

14:42

वहां से भाग जाओ। लेकिन तुम शिष्टाचार के

14:45

कारण, शराफत के कारण वहां खड़े रहते हो और

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हां में हां मिलाते रहते हो। तुम खुद को

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सिकोड़ लेते हो ताकि उस व्यक्ति के शब्दों

14:55

का प्रहार कम हो सके। लेकिन तुम्हारा आभा

14:58

मंडल छल्ली हो रहा होता है। वह इंसान अपनी

15:02

बातों के जरिए तुम्हारे प्राणमय कोष में

15:04

सेंध लगा रहा है। जब वह अपना पूरा भाषण

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खत्म करके जाता है तो उसे बहुत हल्का

15:11

महसूस होता है। क्योंकि उसने अपना सारा

15:15

बोझ तुम्हारे सिर पर डाल दिया है और तुम

15:18

सिर दर्द से तड़पने लगते हो। ऐसे लोग

15:21

तुम्हारे जीवन की शांति को शब्दों के शोर

15:24

में डुबोकर तुम्हारी ऊर्जा की चोरी करते

15:26

हैं। और पांचवा चेहरा वह है जो तुम्हारे

15:29

भीतर अपराध बोध जगाता है। यह चेहरा बहुत

15:33

सूक्ष्मता से काम करता है। यह तुम्हें कभी

15:36

सीधा कुछ नहीं कहेगा। लेकिन इसके व्यवहार

15:39

से, इसके शब्दों के ढंग से तुम्हें हमेशा

15:43

यह लगेगा कि तुमने कुछ गलत किया है। तुमने

15:46

पर्याप्त नहीं किया। तुम एक अच्छे बेटे

15:49

नहीं हो। तुम एक अच्छे मित्र नहीं हो। तुम

15:53

एक अच्छे इंसान नहीं हो। वह बार-बार

15:56

तुम्हें तुम्हारी कमियों की याद दिलाएगा।

16:00

उन चीजों की याद दिलाएगा जो तुम नहीं कर

16:03

पाए। अपराध बोध मनुष्य के भीतर की ऊर्जा

16:07

को चूसने वाला सबसे बड़ा कीड़ा है। जब तुम

16:11

अपराध बोध से भर जाते हो तो तुम खुद को ही

16:14

भीतर से खाने लगते हो। तुम्हारी ऊर्जा

16:17

सिकुड़ने लगती है। तुम्हारी जीवन शक्ति का

16:20

बहाव उल्टा हो जाता है। और जो इंसान

16:24

तुम्हारे भीतर यह अपराध बोध जगा रहा है,

16:27

वह असल में तुम्हें अपने नियंत्रण में कर

16:30

रहा है। वह चाहता है कि तुम उसकी हां में

16:32

हां मिलाओ। तुम उसके अनुसार चलो क्योंकि

16:35

तुम खुद को गलत मान चुके हो। वह तुम्हारी

16:39

इस आत्म ग्लानि का फायदा उठाता है। वह

16:43

तुम्हें मानसिक रूप से पंगू बना देता है।

16:45

जब तुम खुद को ही दोषी मान लेते हो तो तुम

16:48

अपनी ऊर्जा की चाबी खुद उसके हाथों में

16:51

सौंप देते हो। वह फिर अपनी मर्जी से

16:54

तुम्हारा इस्तेमाल करता है। यह वे पांच

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चेहरे हैं जो तुम्हारे आसपास हर दिन मौजूद

17:00

हैं। यह कोई बाहरी दुश्मन नहीं है। यह

17:03

तुम्हारी ही दुनिया का हिस्सा है। समस्या

17:05

यह नहीं है कि यह लोग मौजूद हैं। समस्या

17:08

यह है कि तुम इनके प्रति जागे हुए नहीं

17:10

हो। तुमने कभी यह विज्ञान नहीं समझा कि

17:13

जीवन सिर्फ खाना खाने और सो जाने का नाम

17:16

नहीं है। जीवन ऊर्जा का एक निरंतर प्रवाह

17:19

है। हर पल तुम्हारी ऊर्जा या तो बढ़ रही

17:24

है या घट रही है। हर मुलाकात हर शब्द हर

17:29

स्पर्श तुम्हारे चुंबकीय क्षेत्र पर

17:32

प्रभाव डाल रहा है। तुम्हें क्या लगता है

17:34

कि जब तुम अकारण ही उदास हो जाते हो तो वह

17:38

क्या है? वह कोई आसमान से गिरी हुई उदासी

17:41

नहीं है। वह किसी और की फेंकी हुई राख है

17:45

जो तुम्हारे साफ आंगन में आ गिरी है।

17:47

तुमने अपने आंगन की कोई चार दीवारी नहीं

17:50

बनाई। तुमने कोई सुरक्षा का घेरा नहीं

17:53

बनाया। इसीलिए जो भी सड़क से गुजरता है

17:58

अपना कचरा तुम्हारे भीतर फेंक जाता है और

18:02

तुम उस कचरे को अपना मानकर उसे साफ करने

18:06

में उसे ढोने में अपना पूरा जीवन लगा देते

18:10

हो। तुम्हें यह बहुत स्पष्ट रूप से समझना

18:13

होगा कि तुम्हारे प्राणों की रक्षा करने

18:15

कोई और नहीं आएगा। यह तुम्हारा अपना जीवन

18:18

है। यह तुम्हारी अपनी ऊर्जा है। जिस तरह

18:22

से तुम अपने शरीर को बीमारियों से बचाते

18:24

हो, दूषित भोजन खाने से बचते हो, गंदा

18:28

पानी नहीं पीते, उसी तरह तुम्हें अपनी

18:31

जीवन ऊर्जा को भी दूषित होने से बचाना

18:34

होगा। यह बात अगर गहरे में तुम्हारे भीतर

18:37

बैठ गई तो तुम्हारे जीवन की आधी समस्याएं

18:41

तो वैसे ही खत्म हो जाएंगी। तुम्हें पता

18:44

चल जाएगा कि तुम्हारी थकान शारीरिक कम और

18:47

चुंबकीय ज्यादा है। तुम्हारी बेचैनी

18:50

तुम्हारी अपनी नहीं है। वह उधार ली गई है।

18:54

अब प्रश्न यह उठता है कि जब यह बीमारी

18:57

इतनी गहरी है, जब यह ऊर्जा की चोरी हर दिन

19:01

हर पल हो रही है, तो इसे रोका कैसे जाए?

19:05

कैसे हम अपने इस टूटे हुए आभा मंडल को फिर

19:09

से जोड़ें? कैसे हम उन प्राचीन सूत्रों को

19:12

आज के इस आधुनिक जीवन में उतारे ताकि हम

19:15

भीतर से एक मजबूत किला बन सके ताकि कोई भी

19:19

हमारी अनुमति के बिना हमारे प्राणों में

19:24

सेंध ना लगा सके। यह कोई विचार से नहीं

19:27

होगा। यह सिर्फ सोचने से नहीं होगा कि मैं

19:30

अपनी ऊर्जा बचाऊंगा। इसके लिए तुम्हें

19:33

अपने शरीर और पृथ्वी के बीच के विज्ञान को

19:36

समझना होगा। इसके लिए तुम्हें एक बहुत ही

19:40

ठोस एक बहुत ही गहरी प्रक्रिया से गुजरना

19:43

होगा जो तुम्हारे उस प्राणमय कोष

19:47

[गला साफ़ करने की आवाज़] को फिर से लोहे

19:48

जैसा मजबूत बना दे। वह प्रक्रिया जो

19:51

तुम्हें वापस तुम्हारी जड़ों से जोड़ दे।

19:54

वह समाधान जो तुम्हें भीतर से इतना भरा

19:57

हुआ कर दे कि किसी की नकारात्मकता तुम्हें

20:00

छू भी ना सके। वह उपाय क्या है और उस विधि

20:05

को अपने जीवन में कैसे उतारना है यह अब

20:08

तुम्हें पूरी गहराई से समझना होगा। अब हम

20:11

उस विधि की तरफ आते हैं जो तुम्हारे जीवन

20:15

की दिशा पूरी तरह बदल देगी। तुमने बीमारी

20:18

को समझ लिया। तुमने उस अदृश्य चोरी को

20:21

पहचान लिया जो हर पल तुम्हारे भीतर घट रही

20:24

है। अब समय है उस अजय ढाल को बनाने का जो

20:29

तुम्हें इन प्रहारों से बचाएगी। यह कोई

20:32

पूजा पाठ नहीं है। यह कोई अंधा कर्मकांड

20:36

भी नहीं है जिसे तुम बिना समझे। मस्तिष्क

20:39

को भी उसी अवस्था में खींच लेता है। और इस

20:43

पूरी प्रक्रिया में वह

20:45

[गला साफ़ करने की आवाज़] तुम्हारी ऊर्जा

20:46

को सोख कर खुद थोड़ा बेहतर महसूस करने

20:49

लगता है। जबकि तुम पूरी तरह से टूट जाते

20:52

हो। अब तुम्हें यह समझना होगा कि यह लोग

20:55

कौन हैं जो तुम्हारी ऊर्जा चूस रहे हैं।

20:58

यह कहीं बाहर से नहीं आते। इनके सिर पर

21:02

कोई सींग नहीं होते। जब तुम इस प्रयोग को

21:05

करते हो तो तुम्हारे शरीर और मन में असल

21:08

में क्या घटता है? हमारा शरीर मिट्टी से

21:11

बना है। प्राचीन ऋषियों ने इसे ऐसे ही कोई

21:14

काव्य में नहीं कहा था। तुम्हारा यह मांस,

21:18

तुम्हारी हड्डियां, तुम्हारा रक्त सब कुछ

21:21

इसी धरती का ही तो हिस्सा है। जब तुम तनाव

21:24

में होते हो, जब कोई तुम्हारी जीवन शक्ति

21:28

चूस लेता है। या जब तुम बहुत ज्यादा सोचते

21:32

और उलझते हो तो तुम्हारे शरीर में एक

21:35

अनावश्यक ताप पैदा हो जाता है। तुम्हारे

21:38

भीतर एक प्रकार का विद्युतीय तनाव बहुत

21:43

ज्यादा बढ़ जाता है। यह तनाव ही तुम्हारी

21:46

बेचैनी का असली कारण है। यह बिल्कुल वैसा

21:49

ही है [गला साफ़ करने की आवाज़] जैसे

21:50

आसमान में बादलों के टकराने से भारी बिजली

21:54

पैदा होती है। अगर उस बिजली को धरती में

21:57

उतरने का सीधा रास्ता ना मिले तो वह सब

22:00

कुछ जलाकर राख कर सकती है। इसलिए ऊंचे और

22:04

बड़े भवनों पर एक धातु का तार लगाया जाता

22:06

है। जिसे पृथ्वी के भीतर बहुत गहराई तक

22:09

गाड़ दिया जाता है ताकि जब बिजली गिरे तो

22:12

वह सीधा धरती में समा जाए और भवन पूरी तरह

22:16

सुरक्षित रहे। तुम्हारा शरीर भी एक भवन

22:20

है। और जब तुम्हारे भीतर क्रोध, भय, चिंता

22:24

या किसी और इंसान की फेंकी हुई

22:26

नकारात्मकता की कड़ी बिजली कड़कती है तो

22:29

तुम्हें भी उस बिजली को धरती में उतारना

22:32

होता है। धरती के पास एक असीमित क्षमता

22:36

है। वह हर तरह के विष को हर तरह के ताप को

22:40

अपने भीतर सोख सकती है। धरती के गर्भ में

22:44

एक अत्यंत शांत ठंडी ऊर्जा है। जब

22:49

तुम्हारे शरीर का उबलता हुआ ताप धरती की

22:52

इस अनंत शांति से मिलता है तो वह सारा

22:56

तनाव क्षण भर में शून्य हो जाता है।

23:00

ऋषियों ने इस क्रिया को इसलिए बनाया था

23:02

क्योंकि वे जानते थे कि मनुष्य का मन जब

23:05

भी भटकेगा उसे वापस अपनी जड़ों की ओर धरती

23:09

की ओर ही लौटना पड़ेगा। यह तुम्हारे ऊर्जा

23:13

के आवरण को बंद करने और उसे एक लोहे के

23:17

घेरे में बदलने का सबसे प्राकृतिक तरीका

23:20

है। इस विधि के लिए तुम्हें क्या चाहिए?

23:23

कोई बहुत बड़ा आयोजन नहीं करना है। इसके

23:26

लिए सबसे अच्छी जगह वह है जहां तुम्हारे

23:29

पैर सीधे प्राकृतिक धरती को छू सके। कोई

23:33

भी बगीचा, तुम्हारे घर का कोई कच्चा

23:36

हिस्सा या मुलायम घास का मैदान समय का

23:40

चुनाव तुम्हें खुद करना है। लेकिन सबसे

23:43

उत्तम समय तब होता है जब सूरज उग रहा हो

23:46

या जब दिन ढल रहा हो। अगर तुम्हारे जीवन

23:49

में कोई ऐसा व्यक्ति है जो तुम्हारी जीवन

23:51

शक्ति चूसता है और तुम उससे अभी-अभी मिलकर

23:56

आए हो तो उससे मिलने के तुरंत बाद यह

24:00

प्रयोग करना सबसे ज्यादा आवश्यक है। इस

24:04

प्रयोग को करने से पहले तुम्हारे शरीर पर

24:08

कोई भी कृत्रिम या रेशमी कपड़ा नहीं होना

24:11

चाहिए। जितना हो सके सूती और ढीले कपड़े

24:16

पहनो। तुम्हारे पैरों में जूते या चप्पल

24:19

बिल्कुल नहीं होने चाहिए। तुम्हारा पूरी

24:21

तरह नंगे पैर होना इस पूरी प्रक्रिया की

24:23

सबसे बड़ी और अनिवार्य शर्त है। तुम्हारे

24:26

और धरती के बीच कोई रबर, कोई चमड़ा या कोई

24:29

अन्य वस्तु नहीं होनी चाहिए। क्योंकि यह

24:33

चीजें ऊर्जा के सीधे प्रवाह को रोक देती

24:36

हैं। यह विधि तब सबसे ज्यादा असर करती है

24:40

जब तुम इसे पूरे खाली पेट और एक बहुत ही

24:44

शांत मन के साथ करते हो। अब इस प्रक्रिया

24:47

के पहले चरण को बहुत ध्यान से समझो।

24:50

तुम्हें नंगे पैर धरती पर सीधा खड़ा होना

24:53

है। तुम्हारे दोनों पैरों के बीच लगभग

24:58

तुम्हारे कंधों जितनी दूरी होनी चाहिए।

25:01

पैरों के पंजे सामने की ओर सीधे हो। अपनी

25:04

आंखें धीरे से बंद कर लो। अब अपना पूरा

25:07

ध्यान अपने पैरों के तलवों पर ले जाओ।

25:10

तुम्हें बस यह गहराई से महसूस करना है कि

25:13

तुम्हारे पैर धरती की मिट्टी को कैसे छू

25:15

रहे हैं। वहां कैसा स्पर्श है? क्या

25:19

मिट्टी ठंडी है? क्या घास में कोई नमी है?

25:22

इस पहले चरण में तुम्हें बस अपने तलवों और

25:26

धरती के उस मिलन बिंदु को पूरी तरह महसूस

25:29

करना है। इसे कम से कम 2 मिनट तक करना है।

25:32

अगर तुम इसे सही से कर रहे हो तो तुम्हें

25:35

महसूस होगा कि तुम्हारे पैर धीरे-धीरे

25:38

भारी होने लगे हैं। वे धरती से चिपकने

25:41

लगे।

25:42

यहां एक बहुत आम गलती यह होती है कि लोग

25:45

खड़े तो होते हैं लेकिन उनका ध्यान कल की

25:49

चिंताओं या कामकाज में उलझा रहता है।

25:52

तुम्हें अपना ध्यान पूरी तरह खींचकर सिर्फ

25:56

और सिर्फ अपने पैरों के तलवों पर रखना है।

25:59

दूसरा चरण तुम्हारी रीड की हड्डी से जुड़ा

26:02

है। खड़े रहते हुए तुम्हें अपनी रीड को

26:06

बिल्कुल सीधा करना है। जैसे कोई आसमान से

26:10

तुम्हें एक अदृश्य धागे से ऊपर खींच रहा

26:13

हो। लेकिन ध्यान रहे रीड सीधी होनी चाहिए।

26:18

अकड़ी हुई या सख्त बिल्कुल नहीं। तुम्हारे

26:21

कंधे बिल्कुल ढीले होने चाहिए। लोग अक्सर

26:24

तनाव में अपने कंधों को सिकोड़ कर रखते

26:26

हैं और उन्हें इसका पता भी नहीं चलता।

26:29

तुम्हें अपने दोनों कंधों को नीचे की ओर

26:31

गिरा देना है। उन्हें पूरी तरह शिथिल कर

26:35

देना है। तुम्हारे हाथ तुम्हारे शरीर के

26:38

दोनों तरफ बिल्कुल बेजान लटक रहे हो।

26:41

हथेलियां थोड़ी खुली हुई हो। इस अवस्था

26:44

में तुम्हें एक मिनट तक बिना हिले रुकना

26:48

है और महसूस करना है कि तुम्हारे शरीर का

26:51

ऊपरी हिस्सा बिल्कुल हल्का हो गया है और

26:54

सारा वजन नीचे पैरों की तरफ खिसक रहा है।

26:58

तीसरा चरण तुम्हारी सांसों का है। अब

27:00

तुम्हें बहुत ही धीमी और गहरी सांस लेनी

27:04

है। जब तुम सांस अंदर खींचो तो ऐसी कल्पना

27:09

करो कि तुम हवा को नाक से नहीं बल्कि अपने

27:12

पैरों के तलवों से खींच रहे हो। जैसे धरती

27:16

के भीतर से कोई ठंडी और नीली ऊर्जा

27:18

तुम्हारे तलवों से होते हुए तुम्हारे

27:20

पैरों से होते हुए तुम्हारी नाभि तक ऊपर आ

27:23

रही है। सांस को नाभि तक पहुंचने दो। नाभि

27:28

तुम्हारे शरीर का सबसे अहम केंद्र है।

27:31

नाभि के पास आकर सांस को दो पल के लिए रोक

27:34

लो। यहां कोई हड़बड़ी नहीं करनी है। इस

27:38

चरण को बहुत ही शांति से, बहुत ही प्रेम

27:41

से करना है। जब सांस नाभि पर रुकेगी तो

27:45

तुम्हें वहां एक हल्का सा दबाव, एक हल्की

27:48

सी धड़कन महसूस होगी। चौथा चरण बाहर

27:52

निकलने वाली सांस का है। यह सबसे

27:54

महत्वपूर्ण हिस्सा है। जब तुम सांस को

27:58

बाहर छोड़ोगे तो तुम्हें पूरे मन से यह

28:02

भाव करना है कि तुम्हारे शरीर का सारा

28:04

तनाव, तुम्हारी सारी थकान,

28:07

[गला साफ़ करने की आवाज़] तुम्हारा सारा

28:09

डर और वह सारी नकारात्मकता

28:12

जो किसी ने तुम्हारे भीतर डाल दी थी, वह

28:15

एक काले धुएं की तरह तुम्हारी नाभि से

28:17

नीचे की ओर जा रही है। वह तुम्हारे पैरों

28:20

से होते हुए तुम्हारे तलवुओं से बाहर

28:22

निकलकर गहरी धरती में समा रही है। सांस को

28:26

बाहर छोड़ते समय तुम्हारा पूरा शरीर एकदम

28:30

ढीला पड़ जाना चाहिए। जैसे

28:32

[नाक से की जाने वाली आवाज़] तुमने अपने

28:33

कंधों से कोई बहुत भारी बोरी नीचे फेंक दी

28:37

हो। तुम्हें यह स्पष्ट रूप से देखना है कि

28:41

वह काला धुआ धरती के बहुत भीतर जा रहा है।

28:44

जहां धरती की असीम अग्नि उसे जलाकर शुद्ध

28:48

कर रही है। इस तीसरे और चौथे चरण को

28:51

मिलाकर तुम्हें कम से कम 11 बार दोहराना

28:53

है। इसमें लगभग पांच से सात मिनट का समय

28:57

लगेगा। पांचवा चरण तुम्हारी कल्पना की

29:00

शक्ति का है। जब तुम 11 बार यह सांस की

29:03

प्रक्रिया पूरी कर लो तो अपनी सांस को

29:06

अपने आप सामान्य रूप से चलने दो। अब अपनी

29:09

बंद आंखों से ही यह स्पष्ट कल्पना करो कि

29:12

तुम्हारे पैरों के तलवों से कुछ सुनहरी

29:14

जड़े निकल रही हैं। बिल्कुल वैसे ही जैसे

29:18

किसी बहुत पुराने और विशाल बरगद के पेड़

29:21

से जड़े निकलती हैं। यह प्रकाश की जड़े

29:24

हैं। यह तुम्हारे तलवों से निकलकर धरती के

29:27

भीतर गहराई तक जा रही हैं। नीचे और नीचे।

29:32

यह जड़े तुम्हें धरती के बिल्कुल केंद्र

29:36

से जोड़ रही हैं। तुम्हें एक बहुत ही गहरा

29:39

स्थायित्व महसूस होगा। तुम्हें लगेगा कि

29:42

अब चाहे कोई कितना भी बड़ा तूफान आ जाए,

29:46

चाहे कोई इंसान तुम्हारे सामने कितना भी

29:48

चिल्लाए या रोए, वह तुम्हें हिला नहीं

29:51

सकता। क्योंकि अब तुम सिर्फ एक साधारण

29:55

इंसान नहीं हो। तुम इस विशाल धरती से पूरी

29:58

तरह जुड़ गए हो। तुम एक बहुत बड़े और

30:01

मजबूत पेड़ की तरह हो गए हो। इस भाव में

30:05

तुम्हें तीन से चार मिनट तक खड़ा रहना है।

30:07

छठा चरण तुम्हारे आभा मंडल को पूरी तरह

30:10

बंद करने का है। जब तुम अपनी जड़ों को

30:13

महसूस कर लो तो अब तुम्हें अपने दोनों

30:16

हाथों की उंगलियों को आपस में फंसा लेना

30:19

है और उन्हें अपनी नाभि के ठीक ऊपर रखना

30:22

है। जैसे तुमने कोई पक्का ताला लगा दिया

30:24

हो। यह तुम्हारे ऊर्जा चक्र को बंद करने

30:27

की प्राचीन मुद्रा है। जब तुम अपने हाथों

30:31

को इस तरह जोड़ते हो तो तुम्हारे शरीर की

30:34

विद्युत का घेरा पूरा हो जाता है। अब

30:37

तुम्हारी ऊर्जा तुम्हारे ही भीतर गोलगोल

30:40

घूमने लगेगी। वह किसी भी हाल में बाहर

30:43

नहीं जा पाएगी। अब तुम्हें यह कड़ा संकल्प

30:46

लेना है कि तुम्हारा आभा मंडल एक सुनहरे

30:50

रंग के प्रकाश से घिर गया है। यह प्रकाश

30:53

एक कवच की तरह तुम्हारे पूरे शरीर के

30:56

चारों ओर है। यह इतना मजबूत है कि कोई भी

31:00

बाहरी विचार, कोई भी बाहरी ऊर्जा या किसी

31:04

की बुरी नजर इसे किसी भी कीमत पर भेद नहीं

31:08

सकती। इस अवस्था में तुम्हें 2 मिनट तक

31:11

खड़ा रहना है। और सातवां तथा अंतिम चरण है

31:15

कृतज्ञता। अपनी आंखें बहुत ही धीरे से

31:18

खोलो। अपने हाथों को खोलकर अपनी छाती के

31:22

पास लाओ और धरती माता को पूरे हृदय से

31:25

धन्यवाद दो। उसने तुम्हारा सारा विष पी

31:28

लिया और तुम्हें अपने प्राणों की शुद्ध और

31:32

ताजी ऊर्जा से भर दिया। अपने दोनों हाथों

31:36

को आपस में रगड़कर अपने चेहरे पर फेरो।

31:39

तुम पाओगे कि तुम्हारे भीतर एक अद्भुत

31:42

सन्नाटा छा गया है। एक ऐसी शांति जो तुमने

31:46

पहले कभी महसूस नहीं की होगी। अगर यह विधि

31:49

सही तरीके से हो रही है तो तुम अपने शरीर

31:53

में कुछ बहुत ही स्पष्ट और सीधे बदलाव

31:55

देखोगे। सबसे पहला लक्षण यह होगा कि

31:59

तुम्हारे हाथों की हथेलियों में और

32:02

उंगलियों के पोरों में एक अजीब सी गर्माहट

32:06

महसूस होगी। जैसे रक्त का प्रवाह बहुत तेज

32:09

हो गया हो। तुम्हारे पैरों के तलवों में

32:11

एक भारीपन आएगा। जैसे उनमें कोई चुंबक लगा

32:14

हो जो तुम्हें जमीन से बांधे हुए हैं। और

32:17

सबसे बड़ी बात तुम्हारे मन में चलने वाली

32:20

व्यर्थ विचारों की भिड़भाड़ अचानक से धीमी

32:23

पड़ जाएगी। तुम्हारी सांसे बहुत गहरी और

32:26

लंबी हो जाएंगी। अगर तुम्हें ऐसा महसूस हो

32:30

रहा है तो समझ लो कि तुम्हारी ऊर्जा धरती

32:33

से पूरी तरह जुड़ चुकी है और तुम्हारा

32:36

आभामंडल साफ हो गया है। लेकिन इस

32:38

प्रक्रिया में तुम्हें कुछ गलतियों से

32:41

बचना होगा। इन गलतियों से बचोगे तभी पूरे

32:45

परिणाम मिलेंगे। लोग अक्सर सबसे बड़ी गलती

32:49

यह करते हैं कि वे इसे बंद कमरों में

32:52

चिकने पत्थरों के फर्श पर खड़े होकर करने

32:55

लगते हैं। पत्थर का फर्श या किसी भी तरह

33:00

की कृत्रिम चादर धरती की ऊर्जा को तुम तक

33:03

पहुंचने नहीं देते। दूसरी गलती लोग यह

33:06

करते हैं कि वे सांस छोड़ते समय अपनी छाती

33:09

को तान कर रखते हैं। याद रखो तुम्हें

33:13

पूर्ण समर्पण करना है। तुम्हें अकड़ना

33:15

नहीं है। छाती तनी हुई नहीं होनी चाहिए।

33:20

शरीर बिल्कुल बांस की तरह लचीला होना

33:23

चाहिए जो हवा के साथ झुक सकता है। और

33:26

तीसरी गलती है विचारों से लड़ना। जब तुम

33:30

खड़े होगे तो शुरुआत में कई विचार आएंगे।

33:33

तुम्हें उनसे लड़ना या उलझना नहीं है। बस

33:37

अपना पूरा ध्यान वापस अपने तलवों और धरती

33:41

के स्पर्श पर ले आना है। इस विधि को

33:43

तुम्हें शुरुआत में लगातार 21 दिन तक हर

33:47

दिन करना चाहिए। 21 दिन में तुम्हारे शरीर

33:50

का एक-एक अणु इस नई ऊर्जा को पहचान लेगा।

33:55

पहले सात दिनों में ही तुम देखोगे कि जिन

33:58

छोटी-छोटी बातों पर तुम्हें पहले बहुत

34:00

जल्दी गुस्सा आ जाता था या तुम निराश हो

34:03

जाते थे अब उन बातों का तुम पर कोई असर

34:06

नहीं पड़ता। तुम पहले से कहीं ज्यादा शांत

34:10

और स्थिर रहने लगे हो। और कुछ महीनों के

34:13

बाद तुम्हारा आभा मंडल इतना मजबूत हो

34:18

जाएगा कि ऊर्जा चूसने वाले लोग खुद ही

34:22

तुमसे दूर भागने लगेंगे क्योंकि उन्हें

34:25

तुम्हारे भीतर से अपना वह पुराना भोजन

34:27

नहीं मिलेगा। जब तुम इस प्रयोग को सीख जाओ

34:31

तो इसे अपने दैनिक जीवन में गहराई से उतार

34:34

लो। मैं तुम्हें तीन बहुत ही सटीक बातें

34:38

बता रहा हूं जिन्हें तुम्हें आज से ही

34:40

अपनाना है। पहला जब भी तुम्हें लगे कि

34:44

सामने वाला व्यक्ति सिर्फ शिकायत कर रहा

34:46

है, ड्रामा कर रहा है और तुम्हारी जीवन

34:49

शक्ति चूस रहा है तो बिना उसे बताए तुरंत

34:52

अपने दोनों पैरों को जमीन पर मजबूती से

34:55

टिका दो और अपनी सांसों को नाभि तक गहरा

34:57

कर लो। तुम देखोगे कि उसकी बातों का असर

35:01

तुम पर उसी क्षण होना बंद हो गया है। तुम

35:04

एक पारदर्शी कांच की तरह हो जाओगे जिसके

35:07

आर पार उसकी बातें निकल जाएंगी लेकिन भीतर

35:11

कुछ नहीं रुकेगा। दूसरा जब भी तुम किसी

35:14

बहुत भिड़भाड़ वाली जगह से अस्पताल से या

35:18

किसी उदास माहौल से घर लौटो तो सबसे पहले

35:21

अपने पैरों को नमक मिले हुए पानी से धो

35:24

लो। नमक में वह गुण होता है जो तुम्हारे

35:28

शरीर से चिपकी हुई किसी भी बाहरी और

35:30

नकारात्मक ऊर्जा को तुरंत काट देता है। यह

35:33

तुम्हारे आभामंडल को साफ करने का सबसे तेज

35:36

उपाय है। और तीसरा कभी भी किसी की समस्या

35:40

को अपने ऊपर मत लो। इंसानियत के नाते

35:44

सहानुभूति रखो। मदद करो। लेकिन उस दुख में

35:48

उतरो मत। तुम इस दुनिया के तारणहार नहीं

35:52

हो। तुम बस एक दर्शक हो। दूर से देखना

35:56

सीखो। उलझना नहीं। अगर तुम इन बातों को

36:00

अपने भीतर उतार लोगे तो तुम्हारे प्राणों

36:02

का दीपक कभी बुझेगा नहीं। वह हमेशा पूरे

36:05

प्रकाश के साथ जलता रहेगा और तुम्हारे

36:07

जीवन में वह सच्ची शांति उतरेगी जिसकी तुम

36:10

असल में तलाश कर रहे हो। यह ज्ञान

36:14

तुम्हारे भीतर हमेशा से था। यह कोई नई बात

36:18

नहीं है। यह बस उसी का स्मरण है जो तुम

36:21

भूल गए थे।

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