The Apollo 11 Moon Landing Mystery | Neil Armstrong | Dhruv Rathee
नमस्कार दोस्तों, 20th जुलाई 1969 अपोलो
11 मिशन का लूनर मॉड्यूल चांद पर लैंड
करता है। इसमें बैठे हैं एस्ट्रोनॉट्स,
नील आर्मस्ट्रांग और बस ओल्ड्रिम। लैंडिंग
के बाद नील आर्मस्ट्रांग दरवाजा खोलने की
कोशिश करते हैं चांद पर उतरने के लिए। यह
दरवाजा खोलना आसान नहीं था क्योंकि प्रेशर
बहुत ज्यादा था, लेकिन थोड़े स्ट्रगल के
बाद यह खोलने में सक्सेसफुल होते हैं। फिर
अपने भारी से स्पेस शूट में यह बाहर चांद
पर उतरने की कोशिश करते हैं। निकलने की
जगह इतनी ज्यादा नहीं थी, तो अनजाने में
ऊपर से टकरा कर लूनर मॉड्यूल का एक टुकड़ा
टूट जाता है। इन दोनों को इसके बारे में
पता नहीं चलता क्योंकि वहां पर कोई हवा
नहीं है, तो आवाज ट्रैवल नहीं कर सकती,
कोई आवाज नहीं सुनाई देती उन्हें। लेकिन
यह जो टुकड़ा टूटा था, यह एक बहुत ही
जरूरी पीस था। यह एक एसेंट इंजन आर्मिंग
स्विच था। इस स्विच के बिना इनका लूनर
मॉड्यूल वापस से टेक ऑफ नहीं कर सकता था
और यह वापस धरती पर नहीं जा सकते थे।
लेकिन इस बात से बेखबर नील आर्मस्ट्रांग
बाहर निकलते हैं और चांद पर कदम रखते हैं।
दुनिया के पहले इंसान बन जाते हैं चांद पर
कदम रखने वाले।
[संगीत]
लेकिन क्या सही में ऐसा हुआ था? आज 50 से
ज्यादा सालों बाद बहुत से लोग मानने से ही
इंकार कर देते हैं कि इंसान चांद तक गए
थे। कई लोग थ्योरीज बनाते हैं अपनी और
कहते हैं कि यह पूरी चीज अपोलो 11 का मिशन
सिर्फ एक दिखावा था अमेरिका की तरफ से।
इन्होंने धरती पर ही इस नाटक को फिल्म
किया था और दुनिया को जाकर झूठ बोला। नहीं
तो यह झंडा कैसे लहरा रहा है चांद पर बिना
हवा के? क्या है इस सब की सच्चाई? आइए
जानने की कोशिश करते हैं पूरी कहानी आज के
इस वीडियो में। थ्री टू वन
वी गो टू द
अदर थिंग बिकज़ दे आर इजी बट बिकज़ दे आर
हार्ड
वन
दोस्तों, आप शायद हैरान हो जाएंगे ये
जानकर कि इस अपोलो 11 मिशन को प्लान करने
के पीछे असली वजह थी एक वॉर। स्पेसिफिकली
कहा जाए तो कोल्ड वॉर जो अमेरिका और
सोवियत यूनियन के बीच में चलने लग रही थी।
दोनों देशों के बीच में स्पेस में जाने की
एक रेस चल रही थी। साल 1957 में सोवियत
पहला देश बन जाता है दुनिया की पहली
आर्टिफिशियल सेटेलाइट ल्च करने वाला। इसका
नाम था स्पुटनिक और यह पहला मैनमेड
ऑब्जेक्ट था जिसे धरती के ऑर्बिट में
प्लेस किया गया। अमेरिकन सरकार शॉक हो
जाती है देखकर कि सोवियत उनसे आगे कैसे
निकल गए। कुछ महीने बाद 1958 में अमेरिका
भी अपनी सेटेलाइट ल्च करता है। लेकिन 3
साल बाद 1961 में अमेरिका को एक और बड़ा
झटका लगता है। सोवियत कॉस्मोनॉट यूरी
गगारिन पहले आदमी बन जाते हैं स्पेस में
जाने वाले। एक बार फिर से सोवियट ने
अमेरिका को पीछे छोड़ दिया। इसके सिर्फ एक
हफ्ते बाद जो प्रेसिडेंट थे अमेरिका के
जॉन एफ केनेडी वह अपने वाइस प्रेसिडेंट को
एक लेटर लिखते हैं 20 अप्रैल 1961 को। वो
पूछते हैं उनसे आखिर कैसे हम सोवियट्स को
हरा सकते हैं बाय पुटिंग अ लैबोरेटरी इन
स्पेस और बाय अ ट्रिप अराउंड द मून आर वी
वर्किंग 24 आवर्स अ डे ऑन एकिस्टिंग
प्रोग्राम्स इफ नॉट व्हाई नॉट। आर वी
मेकिंग मैक्सिमम एफर्ट? कोई और ऐसा स्पेस
प्रोग्राम है जो हम जल्दी से कर सकते हैं
जिसकी वजह से ड्रामेटिक रिजल्ट्स मिले और
हम इस रेस में आगे निकल जाएं, जीत जाएं।
इसका जवाब इन्हें कुछ ही दिनों बाद मिल
जाता है क्योंकि जल्द ही यह रियलाइज कर
लेते हैं कि अगला बड़ा कदम होगा इंसानों
को चांद पर भेजना। 25th मई 1961 को अपने
यह फेमस भाषण में वादा करते हैं दुनिया के
सामने कि यह दशक खत्म होने से पहले
इंसानों को चांद पर भेज देंगे। और इतना ही
नहीं जो इंसान चांद पर जाएगा उसे सेफली
वापस धरती पर लेकर भी आएंगे।
बिफोर दिस डेड आउट ऑफ लैंडिंग मैन ऑन द
मून एंड रिटर्निंग हिम सेफली टू द अर्थ
बहुत से लोगों के लिए ये एक अनबिलीवेबल
अनाउंसमेंट थी। साल 1961 इमेजिन करो
दोस्तों। कोई स्मार्टफोनस नहीं थे। कोई
इंटरनेट नहीं था। जीपीएस की टेक्नोलॉजी तक
नहीं थी। कंप्यूटरटर्स इतने पुराने हुआ
करते थे और ऐसे जमाने में यह प्रॉमिस करने
लग रहे हैं कि हम इंसानों को चांद तक
भेजेंगे। इसके लिए यह अगले 5 सालों में 7
से 9 बिलियन एडिशनल फंडिंग देते हैं स्पेस
प्रोग्राम को। पूरी स्पेस एजेंसी इस एक
मकसद को पूरा करने के लिए काम पर लग जाती
है। कुछ ही महीने बाद टेस्टिंग ऑलरेडी
शुरू हो जाती है। सबसे पहले ये टेस्ट करते
हैं उन रॉकेट्स को जिनका ये इस्तेमाल
करेंगे धरती से बाहर निकलने के लिए। फिर
टेस्टिंग करी जाती है कमांड मॉड्यूल्स की
हीट शील्ड्स की कितना वो गर्मी से बचा
पाएंगे। सर्विस मॉड्यूल्स के प्रोपल्शन
की। 1963 से लेकर 1967 के बीच में कई सारे
टेस्ट्स किए जाते हैं जो कि सारे अनमैंड
होते हैं। यानी कि कोई इंसान नहीं बैठे
होते रॉकेटों में जब यह टेस्टिंग कर रहे
होते हैं। फरवरी 1967 में यह पहले मैंड
टेस्ट की प्लानिंग करते हैं। यानी कि ऐसा
टेस्ट जिसमें एस्ट्रोनॉट्स एक्चुअली में
स्पेसक्राफ्ट में बैठ के ऊपर तक जाएंगे।
इस मिशन को नाम दिया जाता है अपोलो वन।
लेकिन धरती पर ही हो रहे टेस्ट के दौरान
27 जनवरी 1967 को इनके केबिन में आग लग
जाती है और जो तीन एस्ट्रोनॉट्स प्रिपेयर
कर रहे थे ऊपर तक जाने के लिए वो तीनों
मारे जाते हैं। इस दर्दनाक हादसे के बाद
नासा हार नहीं मानता बल्कि अपने आगे के
टेस्ट जारी रखता है। अपोलो 4, अपोलो 5 और
अपोलो सिक्स ये सारे मिशनंस अनमैंड होते
हैं फिर से टेस्टिंग के लिए। अक्टूबर 1968
में अपोलो 7 मिशन लॉन्च किया जाता है। एक
बार फिर से अटेम्प्ट किया जाता है।
इंसानों को बिठाकर स्पेस में भेजा जाएगा
और यह सक्सेसफुल रहता है। सिर्फ 2 महीने
बाद दिसंबर 1968 में अपोलो एट मिशन लॉन्च
किया जाता है जिसमें तीन एस्ट्रोनॉट्स को
बिठाकर चांद के पास भेजा जाता है। 3 महीने
बाद मार्च 1969 अपोलो न मिशन ल्च किया
जाता है। इसमें लूनर मॉड्यूल को टेस्ट
किया जाता है। यानी वो हिस्सा
स्पेसक्राफ्ट का जो एक्चुअली में चांद पर
उतरेगा और 2 महीने बाद मई 1969 अपोलो 10
मिशन इस मिशन में तीन एस्ट्रोनॉट्स को
ऑलमोस्ट हर चीज प्रैक्टिस के लिए कराई
जाती है जो अपोलो 11 मिशन में कराई जाएगी
एक्सेप्ट कि वो चांद पर लैंड करें। आप
स्पीड देख रहे हो किस तेजी से नासा यहां
पर एक के बाद एक मिशन लॉन्च किए जा रहा
था। हर 2 से 3 महीने के गैप में एक नया
मिशन जिसमें नेक्स्ट चीज टेस्ट करी जाएगी।
रॉकेट्स की टेस्टिंग, स्पेसक्राफ्ट की
टेस्टिंग, चांद तक जाने की टेस्टिंग और इन
सारी टेस्टिंग्स के बाद फाइनली जाकर 16th
जुलाई 1969 को अपोलो 11 मिशन लॉन्च किया
जाता है।
टू वन जीरो ऑल इंजन रनिंग लुक्फ वी हैव
लुप 32 मिनट्स द आवर।
इस मिशन का हिस्सा थे तीन एस्ट्रोनॉट्स।
38 साल के कमांडर नील आर्मस्ट्रांग जो इस
मिशन को लीड कर रहे थे। कमांड के मॉड्यूल
पायलट माइकल कोलिंस और लूनर मॉड्यूल के
पायलट एडविन बस ओल्ड्रिन। ये तीन नाम
इतिहास के पन्नों में रचे जाते हैं। नील
आर्मस्ट्रांग और बस ऑल्ट्रिन तो बड़े फेमस
नाम बन जाते हैं। इनको हर कोई जानता है आज
के दिन। लेकिन माइकल कोलिंस को इतना नहीं
जाना जाता। क्यों है ऐसा? इसके पीछे एक
बड़ा इंटरेस्टिंग रीज़न है। आगे आपको
बताऊंगा। तो इस अपोलो 11 मिशन का जो
स्पेसक्राफ्ट था, इसके तीन मेन हिस्से थे
दोस्तों। कमांड मॉड्यूल, सर्विस मॉड्यूल
और लूनार मॉड्यूल। पहले दो को एक साथ रख
के सीएसएम बोला जाता है। कमांड एंड सर्विस
मॉड्यूल। मकसद यह था यहां पर कि जो लूनार
मॉड्यूल होगा सिर्फ वही हिस्सा डिटच होकर
चांद पर लैंड करेगा। और फिर वापस जाने के
लिए लूनार मॉड्यूल को उड़ाकर वापस अटैच
किया जाएगा सीएसएम से जिससे एस्ट्रोनॉट्स
धरती पर वापस आएंगे। इस पूरे स्पेसक्राफ्ट
को लॉन्च करने के लिए एक सैटन वी5 रॉकेट
का इस्तेमाल किया गया। लॉन्च से पहले इस
रॉकेट में 1 मिलियन गैलंस केरोसिन लिक्विड
ऑक्सीजन और लिक्विड हाइड्रोजन लोड किया
गया। तो इस पूरे रॉकेट का वजन 30 लाख किलो
था। इसकी मदद से यह स्पेसक्राफ्ट गया अर्थ
के ऑर्बिट में पहुंचा। ऑर्बिट तक पहुंचने
में 10 मिनट से भी कम का समय लगा। और फिर
अर्थ के ऑर्बिट का करीब डेढ़ चक्कर लगाया
इन्होंने। फिर इन्हें परमिशन मिल गई मिशन
कंट्रोल से। मिशन कंट्रोल धरती पर मौजूद
था। उन्होंने कम्युनिकेट करके परमिशन दे
दी कि ट्रांस लून्यर इंजेक्शन कर लिया
जाए। मतलब धरती के ऑर्बिट से निकलकर मून
के ऑर्बिट की तरफ स्पेसक्राफ्ट को ले जा
दिया जाए। अर्थ के ऑर्बिट से बाहर निकलने
के लिए भी सैटर्न V5 रॉकेट का ही इस्तेमाल
किया गया था। इसकी तीसरी स्टेज थी रॉकेट
की। यह सब लॉन्च के 5 घंटे के अंदर-अंदर
ही हो गया। इसके बाद एक्चुअली में चांद तक
पहुंचने में कई दिनों का समय लगा।
एस्ट्रोनॉट्स ने इंतजार किया अंदर बैठकर
कभी खाना खाया, कभी सोए, कभी फोटो खींची
अपनी। 19 जुलाई 1969 ऑलमोस्ट 4 लाख कि.मी.
ट्रैवल करने के बाद अपोलो 11 का
स्पेसक्राफ्ट चांद के ऑर्बिट में पहुंचता
है। यहां पर इसका काम होता है दो में
स्प्लिट हो जाना। कमांड एंड सर्विस
मॉड्यूल लूनार मॉड्यूल से अलग हो जाता है।
कमांड मॉड्यूल में बैठे थे माइकल कोलिंस
और स्पेसक्राफ्ट के इस हिस्से को निक नेम
दिया गया कोलंबिया। और दूसरी तरफ लूनार
मॉड्यूल का नाम था ईगल और इसमें बैठे थे
नील आर्मस्ट्रांग और बस ओल्ड्रिन। बात यह
थी कि यह जो कमांड एंड सर्विस मॉड्यूल था,
इसका काम था यह चांद के ऑर्बिट में ही बने
रहे। सिर्फ लूनार मॉड्यूल अलग होकर चांद
पर लैंड करेगा। यानी कि चांद पर कदम रखने
का मौका सिर्फ नील आर्मस्ट्रांग और बस
ओल्ड्रिन को मिलेगा और माइकल कोलिंस को
नहीं मिलेगा। यही रीज़न है शायद कि माइकल
कोलिंस का नाम हर कोई इतना जानता नहीं है।
हालांकि वो इस अपोलो 11 मिशन का पार्ट
जरूर थे लेकिन उन्होंने चांद पर कदम नहीं
रखा था। लेकिन फिर भी देखा जाए तो माइकल
कोलिंस का जो हिस्सा था इस मिशन में वह
शायद सबसे ज्यादा जरूरी था क्योंकि बाद
में आकर उस लूनार मॉड्यूल को वापस सीएसएम
के साथ अटैच होना था और अगर माइकल कोलिंस
नहीं होते तो नील आर्मस्ट्रांग और बस
वाल्ट्रिन जिंदा नहीं वापस लौट पाते। अब
8:00 बजे के करीब लूनार मॉड्यूल चांद पर
नीचे उतरने जा रहा था। ठीक 8:10 पर एक
अलार्म बजने लग जाता है। 122 अलार्म।
अब ना तो नील आर्मस्ट्रांग ना ही बस
ऑल्ड्रिन जानते थे कि इस अलार्म का मतलब
क्या है। वो मिशन कंट्रोल से कम्युनिकेट
करके पूछते हैं कि क्या करना चाहिए। वो
कहते हैं इग्नोर करो आगे चलते रहो।
गो
बाद में पता चलता है यह 122 एक्चुअली में
वार्निंग थी कि जो अपोलो का गाइडेंस
कंप्यूटर था कंप्यूटर का प्रोसेसिंग
सिस्टम ओवरलोड हो रहा था। लेकिन थैंकफुली
डिजाइन ऐसा किया गया था कंप्यूटर का कि जो
एसेंशियल प्रोग्राम्स हैं जो मिशन के लिए
क्रिटिकल है वो चलते रहे। ओवरलोड होने के
बाद भी कंप्यूटर में ऑटोमेटिक लैंडिंग का
प्रोग्राम डला हुआ था जो एक्चुअली में
चांद के सरफेस पर लूनार मॉड्यूल को
ऑटोमेटिकली उतार देता। लेकिन करीब 150
मीटर की हाइट पर नील आर्मस्ट्रांग कंट्रोल
खुद से ले लेते हैं। वो नोटिस करते हैं कि
ये लूनार मॉड्यूल ऐसी जगह पर लैंड करने जा
रहा था जहां बड़े-बड़े पत्थर मौजूद थे।
लैंडिंग की जगह बदलती है और एक्चुअल
लैंडिंग साइड से करीब 4 मील दूर एक और जगह
डिसाइड करी जाती है जहां लैंड होगा। 8:16
पर बस ऑल्ट्रेन फ्यूल का इंडिकेटर देखते
हैं। सिर्फ 5% फ्यूल बचा है।
इतने कम फ्यूल को देखकर मिशन कंट्रोल एक
काउंटडाउन इनिशिएट कर देता है। यह
काउंटडाउन डिसाइड करेगा कि यह लैंड करें
या फिर इस मिशन को अवॉर्ड कर दिया जाए।
क्रिटिकल फ्यूल
60 सेकंड कॉल गिवन 30 सेकंड कॉल फाइनली
लिटरली लास्ट मिनट पर सिर्फ 30 सेकंड बचे
थे इस काउंटडाउन में। नील आर्मस्ट्रांग
धरती पर एक रेडियो मैसेज भेजते हैं।
[संगीत]
यानी कि ईगल सक्सेसफुली लैंड कर चुका है।
फिर नील आर्मस्ट्रांग अपना स्पेस सूट
तैयार करते हैं। दरवाजा खोलते हैं और चांद
पर अपना पहला कदम रखते हैं।
इस मोमेंट को 60 मिलियन लोग लाइव देखने लग
रहे थे टेलीविजन पर। उनके पहले शब्द
दुनिया को सुनाई देते हैं।
इनके पीछे बस ओल्ड्रिन भी चांद की जमीन पर
अपना कदम रखते हैं और करीब अगले ढाई घंटे
तक ये चांद की मिट्टी और पत्थरों के
सैंपल्स कलेक्ट करते हैं फोटोज खींचते
हैं। कई साइंटिफिक इंस्ट्रूमेंट्स भी
सेटअप करते हैं। हालांकि यह बात सच है कि
कोल्ड वॉर एक बड़ा रीजन था जिसकी वजह से
यह मून लैंडिंग करी गई। लेकिन क्योंकि मून
लैंडिंग करी जा रही थी। इतनी बड़ी चीज थी
यह तो ऑब्वियसली साइंटिफिक इंस्ट्रूमेंट्स
भी यह साथ में लेकर गए थे और कई साइंटिफिक
ऑब्जेक्टिव्स भी थे इस मिशन के। जैसे कि
ये एक टेलीविजन कैमरा सेटअप करते हैं मून
पर जो सिग्नल्स ट्रांसमिट कर सके धरती पर।
यह एक डिवाइस लेकर आते हैं अपने साथ जिससे
कि सोलर विंड को मेजर किया जा सके जो चांद
पर आ रही है। एक ऐसा डिवाइस इंस्टॉल करते
हैं जिससे कि लेजर बीम्स धरती पर भेजी जा
सके और उन लेजर बीम्स का इस्तेमाल करके
एग्जैक्ट डिस्टेंस बताया जा सके धरती और
चांद के बीच। साथ ही साथ एक पैसिव
साइज्मोमीटर भी होता है जो चांद पर हो रहे
अर्थक्वेक्स को मेजर कर सके। हालांकि
उन्हें अर्थक्वेक्स नहीं उन्हें मून
क्वेक्स कहेंगे। टोटल में 23 किलो पत्थर
और मिट्टी का सैंपल यह चांद से कलेक्ट
करते हैं और पीछे वहां छोड़ जाते हैं एक
अमेरिकन झंडा और एक प्लेट जिस पर लिखा है
हियर मेन फ्रॉम द प्लेनेट अर्थ फर्स्ट सेट
फुट अपॉन द मून। जुलाई 1969 एडी वी केम इन
पीस फॉर ऑल मैनकाइंड। लूनर मॉड्यूल को
करीब 21 घंटे तक चांद पर रहना था। उसके
बाद इसे वापस ऊपर जाकर सीएसएम मॉड्यूल से
अटैच हो जाना था। लेकिन ऊपर जाने के लिए
प्रोपल्शन की जरूरत है जिसके लिए इंजन
चाहिए। और दोनों नील आर्मस्ट्रांग और बस
ओल्ड्रिन इस बात से अनजान थे कि बाहर
निकलते वक्त उस इंजन को चलाने के लिए जो
स्विच होता है वो स्विच ही टूट गया था। इस
चीज की बात मैंने वीडियो के शुरू में करी
थी। जब वो वापस लौटते हैं अपने लूनार
मॉड्यूल में तब वो रियलाइज करते हैं कि
यहां पर क्या हो गया है। वो मिशन कंट्रोल
को इस डैमेज के बारे में बताते हैं और
सिचुएशन को रिसॉल्व करने के लिए कोई सलूशन
ढूंढते हैं। इस पूरी प्रॉब्लम का एक बड़ा
ही इंटरेस्टिंग सॉल्यूशन निकलता है। स्विच
क्या होता है? स्विच बेसिकली एक
इलेक्ट्रिकल सर्किट को वापस जोड़ने का काम
करता है। बस ऑल्ट्रिन ने रियलाइज किया कि
अगर वो सर्किट टूट गया है तो कोई ऐसी चीज
हो जिसका मैं इस्तेमाल कर सकूं उस सर्किट
को वापस जोड़ने के लिए। वह आसपास देखते
हैं और उन्हें अपना बॉल पॉइंट पेन दिखाई
देता है। वह उस बॉल पॉइंट पेन का इस्तेमाल
करते हैं उस सर्किट को वापस जोड़ने के लिए
और इंजन को वापस चालू करने के लिए। फाइनली
लूनार मॉड्यूल रीअटैच हो जाता है सीएसएम
मॉड्यूल के साथ और स्पेसक्राफ्ट को धरती
की ओर मोड़ते हैं इसमें बैठे तीनों
एस्ट्रोनॉट्स। धरती पर लैंड करने के लिए
प्लान था कि कमांड मॉड्यूल और सर्विस
मॉड्यूल अब एक दूसरे से अलग होंगे। सर्विस
मॉड्यूल एक्चुअली में अर्थ के एटमॉस्फेयर
की वजह से डिस्ट्रॉय हो जाएगा। लेकिन यहां
पर खतरा यह था कि अगर सर्विस मॉड्यूल
ज्यादा खराब हो गया उसके डिब्री इधर-उधर
उड़ने लग गए वो कमांड मॉड्यूल के साथ जाकर
टकरा सकते हैं और एस्ट्रोनॉट्स जो बैठे
होंगे उसमें वो मारे जाएंगे। इस चीज को
अवॉइड करने के लिए नासा का प्लान था कि
सर्विस मॉड्यूल में थ्रस्टिंग होगी जो उसे
थोड़ी दूर ले जाएगी कमांड मॉड्यूल से ताकि
वो टकराए ना एक दूसरे से। लेकिन जब ये
एस्ट्रोनॉट्स वापस लौट रहे थे धरती पर तब
पता चलता है कि सर्विस मॉड्यूल की
थ्रस्टिंग तो काम ही नहीं कर रही। ये
तीनों एस्ट्रोनॉट्स कमांड मॉड्यूल में
बैठे हैं। देखते हैं अपने पास सर्विस
मॉड्यूल कैसे टूटने लग रहा है। उसके डेबरी
इधर-उधर उड़ने लग रहे हैं। और यह एक बहुत
बड़ा मिरेकल होता है कि उसके टूटे हुए
पीसेस कमांड मॉड्यूल को हिट नहीं करते।
उसका कमांड मॉड्यूल सेफ रहता है।
एस्ट्रोनॉट्स के मरने का रिस्क इतना
ज्यादा हाई था इस मिशन में कि यूएस
प्रेसिडेंट निक्न ने अपनी एक अल्टरनेट
स्पीच तैयार कर रखी थी इन केस ये
एस्ट्रोनॉट्स मारे जाते। इमेजिन कर सकते
हो लिटरली एक अल्टरनेट भाषण। इन्होंने
लिखा था इसमें फेट हैज़ ऑर्डेंड दैट द मैन
हु वेंट टू द मून टू एक्सप्लोर इन पीस विल
स्टे ऑन द मून टू रेस्ट इन पीस। दी ब्रेव
मैन नील आर्मस्ट्रांग एंड एडविन ऑल्ड्रिन
नो दैट देयर इज नो होप फॉर देयर रिकवरी।
दीज़ टू मैन आर लंग डाउन देयर लाइफ्स इन
मैनकाइंड्स मोस्ट नोबल गोल द सर्च फॉर
ट्रुथ एंड अंडरस्टैंडिंग। लेकिन थैंकफुली
ऐसा होता नहीं। कमांड मॉड्यूल सेफली अर्थ
की एटमॉस्फेयर से नीचे आ जाता है। पैराशूट
डिप्लॉय करता है और समुद्र में लैंड कर
जाता है। तीनों के तीनों एस्ट्रोनॉट्स
जिंदा हैं, सेफ हैं। समुद्र में इन
एस्ट्रोनॉट्स को रेस्क्यू शिप्स के द्वारा
इवाकुएट कर लिया जाता है। यह सही मायनों
में एक चमत्कार था कि ये जिंदा वापस लौट
कर आ सके। क्योंकि ऐसा नहीं है कि इस मिशन
में हर चीज जैसा प्लान करी गई थी वैसे ही
हुई। ऑलमोस्ट हर स्टेप पर प्रॉब्लम्स
इन्हें फेस करनी पड़ी। इन्होंने उन
प्रॉब्लम से सक्सेसफुली डील किया और यह
जिंदा वापस बचकर आ सके। एक इंटरेस्टिंग
चीज यहां पर यह है कि वापस लौटने के बाद
इन तीनों एस्ट्रोनॉट्स को क्वारेंटाइन
किया गया दो हफ्ते तक। यह किसी भी और
इंसान के कांटेक्ट में नहीं आएंगे क्योंकि
खतरा यह था कि कोई पैथोज्स हो सकते हैं।
कोई ऐसे वायरसेस या बैक्टीरिया जो
इन्होंने चांद पर पाए होंगे वापस धरती पर
आकर कोई बड़ी अजीबोगरीब बीमारी हो जाए
इन्हें। कोई नहीं जानता था। लेकिन एक बारी
फिर से थैंकफुली ऐसा कुछ हुआ नहीं। अपोलो
11 की मून लैंडिंग दुनिया भर के अखबारों
में खबर बनती है जो यूएस के प्रेसिडेंट
केनेडी ने कहा था हम दशक खत्म होने से
पहले तक इंसानों को चांद पर लैंड करा
देंगे वो नासा ने कर दिखाया
[संगीत]
इन 1969 द पब्लिक हैड लिटल रीज़ टू
क्वेश्चन मैनकाइंड हिस्टोरिक फर्स्ट ऑन द
मून आफ्टर ऑल द अचीवमेंट वास अ सेलिब्रेशन
ऑफ़ टेक्नोलॉजिकल सुपसी
अमेरिका हैड फाइनली वन द स्पेस रेस
लेकिन कितने चांस की बात नहीं है कि 1970
में ये डेकेड खत्म हो जाता और एक साल पहले
1969 में अमेरिका मून तक पहुंच गया। कहीं
ऐसा तो नहीं कि कोल्ड वॉर में अपना
एडवांटेज दिखाने के लिए अमेरिका ने ये एक
फेक मून लैंडिंग का ऑपरेशन प्लान किया।
कहीं उनका एक्चुअली मून लैंडिंग का मिशन
फेल हो गया हो और उन्होंने बैकअप के तौर
पर यह फेक मिशन प्लान किया था दुनिया को
दिखाने के लिए। यह एक एग्जांपल है दोस्तों
बहुत सारी कांस्परेसी थ्योरीज का जो बनाई
जाती हैं इस मून लैंडिंग के इंसिडेंट को
लेकर। लेकिन सच्चाई यही है दोस्तों ये
सारी कंस्परेसी थ्योरीज ऑलरेडी कई बार
डिबंक करी जा चुकी हैं। अगर अमेरिका की
तरफ से ये एक फर्जी अटेम्प्ट होता दुनिया
को बेवकूफ बनाने का तो सोवियत इसे कभी
मानता नहीं। लेकिन द ग्रेट सोवियत
इनसाइक्लोपीडिया जो 1970 और 1979 के बीच
में पब्लिश हुई थी। उसके थर्ड एडिशन में
कई बारी इस मून लैंडिंग को एक फ़क्चुअल चीज
बताया गया। सोवियट के आर्टिकल्स में कई
बार यह लिखा गया है कि अपोलो लैंडिंग थर्ड
हिस्टोरिक इवेंट था स्पेस एज का। सबसे
पहले स्पुतनिक की लॉन्च 1957 में। दूसरा
1961 में यूरी गगारन की फ्लाइट और तीसरा
मून लैंडिंग। तो सोवियत ने एक्चुअली में
इस चीज को एकनॉलेज किया था। लेकिन फिर
झंडे का क्या? जो झंडा चांद पर प्लांट
किया गया था वो वेव क्यों करने लग रहा है?
चांद पर तो कोई हवा नहीं होती। इसका एक
बड़ा सिंपल सा रीज़न है दोस्तों। जिस झंडे
को नील आर्मस्ट्रंग और बस ऑल्ट्रिन चांद
पर लेकर गए थे वो स्पेशली डिज़ झंडा था।
आमतौर पर झंडों में एक लंबी वर्टिकल रोड
डली होती है। लेकिन इस वाले में एक
हॉरिजॉन्टल रोड भी डली हुई थी। झंडे के
बिल्कुल ऊपर जिससे कि झंडा हमेशा
एक्सटेंडेड आउट रहे। क्योंकि नासा में काम
करने वाला हर कोई जानता था कि झंडे को अगर
हम चांद पर जाकर प्लांट करेंगे तो वो
लहराएगा नहीं। वहां पर हवा नहीं है। इसलिए
एक हॉरिजॉन्टल रोड ऊपर ऐड कर देते हैं
ताकि झंडा हमेशा ही फ्लैट दिखे। अब अपोलो
11 के मिशन में एक्चुअली में इस
हॉरिजॉन्टल रोड को एक्सटेंड करने में
थोड़ी प्रॉब्लम हो रही थी। तो पूरी एंड तक
एक्सटेंड नहीं हो पाई है। जिसकी वजह से एक
रिल दिखने लगा। वेव्स आ गई फ्लैग में और
इसीलिए लोगों को लगता है कि ये झंडा लहरा
रहा है। लेकिन एक्चुअली में ये झंडा लहरा
नहीं रहा है। सिर्फ उन वीडियोस में आपको
झंडा लहराता हुआ दिखेगा जहां पर
एस्ट्रोनॉट्स इसे पकड़ कर हिलाने लग रहे
हैं। इसके पीछे रीज़न यह है कि यह
एलुमिनियम की रोड्स थी झंडे में और वो
स्प्रिंग की तरह एक्ट कर रही थी। तो बहुत
थोड़ी देर के लिए झंडा हिलता और फिर
एब्सोलुटली स्टिल रह जाता। एक तीसरी बड़ी
पॉपुलर थ्योरी यहां पर उठाई जाती है कि जो
फोटो यहां पर नील आर्मस्ट्रांग और ओल्डरिन
ने ली है। इन फोटोज में कोई स्टार्स क्यों
नहीं दिखाई दे रहे? इसका जवाब भी बड़ा
सिंपल है। एक्चुअली में मून लैंडिंग दिन
के समय में हुई थी। ऐसे टाइम में जब चांद
पर सूरज की रोशनी पड़ने लग रही थी। और जो
वाइट कलर के स्पेस सूट्स पहने हुए थे
एस्ट्रोनॉट्स ने वो भी काफी ज्यादा
रिफ्लेक्ट करने लग रहे थे। तो उस जमाने के
कैमरास कोई इतने बड़े हाई प्रोफेशनल तो
नहीं होते थे। वैसे आज के दिन भी जितने
फोन के कैमरास हैं उनसे अगर आप कोई रात के
समय में फोटो खींचने की कोशिश करोगे
जिसमें फ्लैश जल रहा हो तो पीछे स्टार्स
नहीं दिखेंगे आपको फोटोज में। एक और
थ्योरी यहां पर उठाई जाती है शैडोस को
लेकर कि ये शैडोस इतनी इधर-उधर क्यों हो
रखी हैं। लोग यहां पर आर्गुमेंट उठाते हैं
क्योंकि ये हॉलीवुड की तरह फिल्म बनाई जा
रही थी तो कोई सिंगल सोर्स ऑफ लाइट नहीं
था। इसलिए ये शैडोस इतनी इधर-उधर होकर दिख
रही हैं। लेकिन रियलिटी में एक्चुअली में
सन ओनली सोर्स ऑफ लाइट नहीं था। जो चांद
का सरफेस था वो भी एक तरीके से
कॉम्प्लीमेंट्री सोर्स ऑफ लाइट एक्ट कर
रहा था क्योंकि वो इतनी ज्यादा रोशनी
रिफ्लेक्ट करने लग रहा था। इसकी वजह से
लाइट हर डायरेक्शन में स्कैटर करी और
शैडोज़ इतनी अजीबोगरीब बनी। एक और सवाल
यहां पर उठाया जाता है। एक बस ऑल्ट्रेन की
फोटो जो नील आर्स्ट्रोंग ने ली है उसमें
नील आर्स्ट्रोंग की रिफ्लेक्शन दिखने लग
रही है। लेकिन नील आर्स्ट्रोंग के हाथ में
कोई कैमरा नहीं है। यह कैसे हो सकता है?
यह इसलिए हो सकता है क्योंकि कैमरा
उन्होंने हाथ में नहीं पकड़ा था बल्कि
कैमरा उनके सूट में ही माउंटेड था और वो
वहीं से ही कंट्रोल कर सकते थे। और फिर वो
वाली फोटोस किसने ली जब नील आर्मस्ट्रांग
लूनार मॉड्यूल से नीचे उतर रहे थे। तो
इसका जवाब भी सिंपल है। वहां लूनार
मॉड्यूल में मल्टीपल कैमरास मौजूद थे।
लेकिन इन सब फर्जी थ्योरीज से हटकर अगर हम
एक्चुअल क्रिटिसिज्म की बात करें। ऐसा
नहीं था दोस्तों कि मून लैंडिंग के बाद हर
कोई तालियां बजाने लग रहा था। वाह नासा
कितना अच्छा कर दिया। बहुत से लोगों ने
काफी स्ट्रांग क्रिटिसिज्म किया नासा का
और अमेरिकन सरकार का मून लैंडिंग के बाद।
एक्चुअली मून लैंडिंग होने से पहले भी कई
लोग क्रिटिसाइज करने लग रहे थे इस चीज को।
जनवरी 1962 में न्यूयॉर्क टाइम्स ने एक
आर्टिकल पब्लिश किया था जिसमें उन्होंने
बताया कि जितना पैसा चांद पर जाने के लिए
स्पेंड किया जा रहा है। इतने पैसे से करीब
120 यूनिवर्सिटीज बन सकती हैं जो हार्वर्ड
के साइज की होंगी। मतलब क्या हमें इतना
पैसा चांद पर जाने के लिए स्पेंड करना
चाहिए? या फिर हर यूएस की स्टेट में एक
हार्वर्ड यूनिवर्सिटी खोल दें। उस पर हम
पैसा स्पेंड करें। बेसिकली मेन पॉइंट ऑफ
क्रिटिसिज्म यह था कि देश में इतनी सारी
प्रॉब्लम्स हैं। एजुकेशन की, इनकम इनकलिटी
की और उस समय अमेरिका और वियतनाम वॉर के
कॉन्सक्वेंसेस भी झेलने लग रहा था। तो
क्यों इस पर इतना पैसा बर्बाद किया? लेकिन
असलियत में मून लैंडिंग के कई ऐसे छुपे
हुए फायदे निकले जिसके बारे में किसी ने
सोचा तक नहीं था। जैसे कि कंप्यूटर चिप्स
में एडवांसमेंट्स। 1962 में माइक्रोचिप्स
को निकले हुए सिर्फ 3 साल हुए थे। और
आईबीएम ने डिसाइड किया था कि अर्ली 1960
में वो अपने कंप्यूटरटर्स में इन चिप्स को
नहीं इस्तेमाल करेंगे।
हियर इज अ पैकेज इंटीग्रेटेड सर्किट इनाइड
दिस पैकेज इज अ चिप ऑफ़ सिलिकॉन व्हिच
प्रोवाइड्स द इलेक्ट्रिकल इक्विपमेंट ऑफ़
मेनी ट्रांजिस्टर्स रेजिस्टर्स एंड
डायोड्स ऑल इंटरकनेक्टेड टू प्रोवाइड द
डिजायर फंक्शन।
लेकिन नासा की तरफ से इतनी डिमांड आने लगी
इंटीग्रेटेड सर्किट्स बनाने के लिए। तो
आईवीएम ने इस पर काम करना शुरू किया और
क्योंकि इतनी डिमांड थी इसका प्राइस 90%
से नीचे गिर गया अगले 5 सालों में। ऐसे ही
नासा ने बेसिकली टेस्ट किया कि हम क्या
कंप्यूटरटर्स पर रिलाई कर सकते हैं
इंसानों की जिंदगियों के लिए। अगर
एस्ट्रोनॉट्स चांद पर होकर आ सकते हैं इन
कंप्यूटर चिप्स पर रिलाई करते हुए तो हम
रोजमर्रा की जिंदगी में तो ऑब्वियसली
रिलाई कर ही सकते हैं इन कंप्यूटर चिप्स
पे। टेक्नोलॉजी की ग्रोथ बड़ी तेजी से हुई
इस मून लैंडिंग के बाद। लेकिन फिर भी
अपोलो 11 मिशन के सिर्फ 3 साल बाद दिसंबर
1972 में आखिरी मून मिशन किया जाता है
अपोलो 17। और तब से लेकर अब तक दोस्तों
ऑलमोस्ट 50 साल हो चुके हैं। इन 50 सालों
में कोई भी और इंसान चांद पर नहीं गया है।
यह शायद से एक सबसे बड़ा प्रूफ है इस चीज
का कि अपोलो प्रोग्राम कितना महंगा था। 4
लाख से ज्यादा इंजीनियर्स, टेक्नशियंस और
साइंटिस्ट ने इस पर काम किया था और टोटल
कॉस्ट तब पड़ी थी इसकी 24 बिलियन। आज के
दिन के डॉलर्स में यह $ बिलियन से ज्यादा
की कॉस्ट है। शुरुआत में सिर्फ जर्नलिस्ट
इसे क्रिटिसाइज कर रहे थे। लेकिन 1972 तक
आते-आते आम जनता की भी जो फैसिनेशन थी
नासा को लेकर, मून को लेकर वह खत्म हो गई
थी। जैसे-जैसे वियतनाम वॉर आगे चलती रही,
देश में आम लोगों की प्रॉब्लम्स बढ़ती
रही।
थाउजेंड्स ऑफ़ डेमोंस्ट्रेटर्स अपोज द
वियतनाम वॉर असेंबल इन द नेशन कैपिटल फॉर
अ मास प्रोटेस्ट।
उनको यह स्पेस प्रोग्राम एक बहुत बड़ा
पैसे की वेस्टेज लगा। हालांकि नासा ने
प्लांस बनाए थे अपोलो 20 तक मिशनंस करने
के। लेकिन पॉलिटिशियंस को जनता की सुननी
पड़ी और स्पेस प्रोग्राम पर जितना पैसा
खर्च किया जा रहा था उसे कट डाउन करना
पड़ा। दिसंबर 2017 में फॉर्मर प्रेसिडेंट
डोनल्ड ट्रंप ने कहा था कि वो फंडिंग
बढ़ाएंगे जिससे कि चांद पर लोगों को वापस
भेजा जा सके 204 तक।
रिटर्निंग अमेरिकन एस्ट्रोनॉट्स टू द मून
फॉर द फर्स्ट टाइम सिंस 1972 फॉर लॉन्ग
टर्म एक्सप्लोरेशन दिस टाइम। लेकिन बाद
में उन्होंने अपनी स्टेटमेंट बदल ली और
कहा कि नासा को चांद पर नहीं बल्कि मार्स
पर फोकस करना चाहिए। लेकिन 50 साल बाद
जाकर आज के दिन नासा ने अब फिर से प्लान
बनाया है लोगों को चांद पर भेजने का। इनका
नया आर्टिमिस प्रोग्राम। फिर से अनमैंड
रॉकेट्स के साथ टेस्टिंग करी जाएगी। लेकिन
नासा का प्लान है कि 2025-26 तक वो पहली
औरत को चांद पर भेजेंगे और उसके बाद वह
कहते हैं कि फर्स्ट पर्सन ऑफ कलर को भी
चांद पर भेजा जाएगा। एक बात तो शायद पक्का
कही जा सकती है कि इस दशक के खत्म होने से
पहले हम दोबारा से इंसानों को चांद पर
देखेंगे। वीडियो पसंद आया और स्पेस
रिलेटेड वीडियोस देख सकते हैं इस
प्लेलिस्ट पर क्लिक करके। ऐसे ही बहुत से
इंटरेस्टिंग टॉपिक्स पर बनाए हुए हैं और
मिलते हैं फिर अगले वीडियो में। बहुत-बहुत
धन्यवाद।
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