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The Apollo 11 Moon Landing Mystery | Neil Armstrong | Dhruv Rathee

24:48HindiBy Dhruv RatheeTranscribed Jul 16, 2026
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नमस्कार दोस्तों, 20th जुलाई 1969 अपोलो

0:03

11 मिशन का लूनर मॉड्यूल चांद पर लैंड

0:06

करता है। इसमें बैठे हैं एस्ट्रोनॉट्स,

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नील आर्मस्ट्रांग और बस ओल्ड्रिम। लैंडिंग

0:11

के बाद नील आर्मस्ट्रांग दरवाजा खोलने की

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कोशिश करते हैं चांद पर उतरने के लिए। यह

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दरवाजा खोलना आसान नहीं था क्योंकि प्रेशर

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बहुत ज्यादा था, लेकिन थोड़े स्ट्रगल के

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बाद यह खोलने में सक्सेसफुल होते हैं। फिर

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अपने भारी से स्पेस शूट में यह बाहर चांद

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पर उतरने की कोशिश करते हैं। निकलने की

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जगह इतनी ज्यादा नहीं थी, तो अनजाने में

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ऊपर से टकरा कर लूनर मॉड्यूल का एक टुकड़ा

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टूट जाता है। इन दोनों को इसके बारे में

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पता नहीं चलता क्योंकि वहां पर कोई हवा

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नहीं है, तो आवाज ट्रैवल नहीं कर सकती,

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कोई आवाज नहीं सुनाई देती उन्हें। लेकिन

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यह जो टुकड़ा टूटा था, यह एक बहुत ही

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जरूरी पीस था। यह एक एसेंट इंजन आर्मिंग

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स्विच था। इस स्विच के बिना इनका लूनर

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मॉड्यूल वापस से टेक ऑफ नहीं कर सकता था

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और यह वापस धरती पर नहीं जा सकते थे।

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लेकिन इस बात से बेखबर नील आर्मस्ट्रांग

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बाहर निकलते हैं और चांद पर कदम रखते हैं।

1:00

दुनिया के पहले इंसान बन जाते हैं चांद पर

1:03

कदम रखने वाले।

1:07

[संगीत]

1:13

लेकिन क्या सही में ऐसा हुआ था? आज 50 से

1:16

ज्यादा सालों बाद बहुत से लोग मानने से ही

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इंकार कर देते हैं कि इंसान चांद तक गए

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थे। कई लोग थ्योरीज बनाते हैं अपनी और

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कहते हैं कि यह पूरी चीज अपोलो 11 का मिशन

1:27

सिर्फ एक दिखावा था अमेरिका की तरफ से।

1:30

इन्होंने धरती पर ही इस नाटक को फिल्म

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किया था और दुनिया को जाकर झूठ बोला। नहीं

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तो यह झंडा कैसे लहरा रहा है चांद पर बिना

1:36

हवा के? क्या है इस सब की सच्चाई? आइए

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जानने की कोशिश करते हैं पूरी कहानी आज के

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इस वीडियो में। थ्री टू वन

1:48

वी गो टू द

1:51

अदर थिंग बिकज़ दे आर इजी बट बिकज़ दे आर

1:55

हार्ड

2:02

वन

2:08

दोस्तों, आप शायद हैरान हो जाएंगे ये

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जानकर कि इस अपोलो 11 मिशन को प्लान करने

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के पीछे असली वजह थी एक वॉर। स्पेसिफिकली

2:15

कहा जाए तो कोल्ड वॉर जो अमेरिका और

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सोवियत यूनियन के बीच में चलने लग रही थी।

2:23

दोनों देशों के बीच में स्पेस में जाने की

2:25

एक रेस चल रही थी। साल 1957 में सोवियत

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पहला देश बन जाता है दुनिया की पहली

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आर्टिफिशियल सेटेलाइट ल्च करने वाला। इसका

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नाम था स्पुटनिक और यह पहला मैनमेड

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ऑब्जेक्ट था जिसे धरती के ऑर्बिट में

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प्लेस किया गया। अमेरिकन सरकार शॉक हो

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जाती है देखकर कि सोवियत उनसे आगे कैसे

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निकल गए। कुछ महीने बाद 1958 में अमेरिका

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भी अपनी सेटेलाइट ल्च करता है। लेकिन 3

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साल बाद 1961 में अमेरिका को एक और बड़ा

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झटका लगता है। सोवियत कॉस्मोनॉट यूरी

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गगारिन पहले आदमी बन जाते हैं स्पेस में

2:54

जाने वाले। एक बार फिर से सोवियट ने

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अमेरिका को पीछे छोड़ दिया। इसके सिर्फ एक

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हफ्ते बाद जो प्रेसिडेंट थे अमेरिका के

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जॉन एफ केनेडी वह अपने वाइस प्रेसिडेंट को

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एक लेटर लिखते हैं 20 अप्रैल 1961 को। वो

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पूछते हैं उनसे आखिर कैसे हम सोवियट्स को

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हरा सकते हैं बाय पुटिंग अ लैबोरेटरी इन

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स्पेस और बाय अ ट्रिप अराउंड द मून आर वी

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वर्किंग 24 आवर्स अ डे ऑन एकिस्टिंग

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प्रोग्राम्स इफ नॉट व्हाई नॉट। आर वी

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मेकिंग मैक्सिमम एफर्ट? कोई और ऐसा स्पेस

3:21

प्रोग्राम है जो हम जल्दी से कर सकते हैं

3:23

जिसकी वजह से ड्रामेटिक रिजल्ट्स मिले और

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हम इस रेस में आगे निकल जाएं, जीत जाएं।

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इसका जवाब इन्हें कुछ ही दिनों बाद मिल

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जाता है क्योंकि जल्द ही यह रियलाइज कर

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लेते हैं कि अगला बड़ा कदम होगा इंसानों

3:34

को चांद पर भेजना। 25th मई 1961 को अपने

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यह फेमस भाषण में वादा करते हैं दुनिया के

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सामने कि यह दशक खत्म होने से पहले

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इंसानों को चांद पर भेज देंगे। और इतना ही

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नहीं जो इंसान चांद पर जाएगा उसे सेफली

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वापस धरती पर लेकर भी आएंगे।

3:50

बिफोर दिस डेड आउट ऑफ लैंडिंग मैन ऑन द

3:53

मून एंड रिटर्निंग हिम सेफली टू द अर्थ

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बहुत से लोगों के लिए ये एक अनबिलीवेबल

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अनाउंसमेंट थी। साल 1961 इमेजिन करो

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दोस्तों। कोई स्मार्टफोनस नहीं थे। कोई

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इंटरनेट नहीं था। जीपीएस की टेक्नोलॉजी तक

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नहीं थी। कंप्यूटरटर्स इतने पुराने हुआ

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करते थे और ऐसे जमाने में यह प्रॉमिस करने

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लग रहे हैं कि हम इंसानों को चांद तक

4:10

भेजेंगे। इसके लिए यह अगले 5 सालों में 7

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से 9 बिलियन एडिशनल फंडिंग देते हैं स्पेस

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प्रोग्राम को। पूरी स्पेस एजेंसी इस एक

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मकसद को पूरा करने के लिए काम पर लग जाती

4:21

है। कुछ ही महीने बाद टेस्टिंग ऑलरेडी

4:23

शुरू हो जाती है। सबसे पहले ये टेस्ट करते

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हैं उन रॉकेट्स को जिनका ये इस्तेमाल

4:27

करेंगे धरती से बाहर निकलने के लिए। फिर

4:30

टेस्टिंग करी जाती है कमांड मॉड्यूल्स की

4:32

हीट शील्ड्स की कितना वो गर्मी से बचा

4:34

पाएंगे। सर्विस मॉड्यूल्स के प्रोपल्शन

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की। 1963 से लेकर 1967 के बीच में कई सारे

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टेस्ट्स किए जाते हैं जो कि सारे अनमैंड

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होते हैं। यानी कि कोई इंसान नहीं बैठे

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होते रॉकेटों में जब यह टेस्टिंग कर रहे

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होते हैं। फरवरी 1967 में यह पहले मैंड

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टेस्ट की प्लानिंग करते हैं। यानी कि ऐसा

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टेस्ट जिसमें एस्ट्रोनॉट्स एक्चुअली में

4:53

स्पेसक्राफ्ट में बैठ के ऊपर तक जाएंगे।

4:56

इस मिशन को नाम दिया जाता है अपोलो वन।

4:58

लेकिन धरती पर ही हो रहे टेस्ट के दौरान

5:00

27 जनवरी 1967 को इनके केबिन में आग लग

5:04

जाती है और जो तीन एस्ट्रोनॉट्स प्रिपेयर

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कर रहे थे ऊपर तक जाने के लिए वो तीनों

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मारे जाते हैं। इस दर्दनाक हादसे के बाद

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नासा हार नहीं मानता बल्कि अपने आगे के

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टेस्ट जारी रखता है। अपोलो 4, अपोलो 5 और

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अपोलो सिक्स ये सारे मिशनंस अनमैंड होते

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हैं फिर से टेस्टिंग के लिए। अक्टूबर 1968

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में अपोलो 7 मिशन लॉन्च किया जाता है। एक

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बार फिर से अटेम्प्ट किया जाता है।

5:27

इंसानों को बिठाकर स्पेस में भेजा जाएगा

5:29

और यह सक्सेसफुल रहता है। सिर्फ 2 महीने

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बाद दिसंबर 1968 में अपोलो एट मिशन लॉन्च

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किया जाता है जिसमें तीन एस्ट्रोनॉट्स को

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बिठाकर चांद के पास भेजा जाता है। 3 महीने

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बाद मार्च 1969 अपोलो न मिशन ल्च किया

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जाता है। इसमें लूनर मॉड्यूल को टेस्ट

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किया जाता है। यानी वो हिस्सा

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स्पेसक्राफ्ट का जो एक्चुअली में चांद पर

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उतरेगा और 2 महीने बाद मई 1969 अपोलो 10

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मिशन इस मिशन में तीन एस्ट्रोनॉट्स को

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ऑलमोस्ट हर चीज प्रैक्टिस के लिए कराई

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जाती है जो अपोलो 11 मिशन में कराई जाएगी

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एक्सेप्ट कि वो चांद पर लैंड करें। आप

6:01

स्पीड देख रहे हो किस तेजी से नासा यहां

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पर एक के बाद एक मिशन लॉन्च किए जा रहा

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था। हर 2 से 3 महीने के गैप में एक नया

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मिशन जिसमें नेक्स्ट चीज टेस्ट करी जाएगी।

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रॉकेट्स की टेस्टिंग, स्पेसक्राफ्ट की

6:12

टेस्टिंग, चांद तक जाने की टेस्टिंग और इन

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सारी टेस्टिंग्स के बाद फाइनली जाकर 16th

6:17

जुलाई 1969 को अपोलो 11 मिशन लॉन्च किया

6:21

जाता है।

6:22

टू वन जीरो ऑल इंजन रनिंग लुक्फ वी हैव

6:27

लुप 32 मिनट्स द आवर।

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इस मिशन का हिस्सा थे तीन एस्ट्रोनॉट्स।

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38 साल के कमांडर नील आर्मस्ट्रांग जो इस

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मिशन को लीड कर रहे थे। कमांड के मॉड्यूल

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पायलट माइकल कोलिंस और लूनर मॉड्यूल के

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पायलट एडविन बस ओल्ड्रिन। ये तीन नाम

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इतिहास के पन्नों में रचे जाते हैं। नील

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आर्मस्ट्रांग और बस ऑल्ट्रिन तो बड़े फेमस

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नाम बन जाते हैं। इनको हर कोई जानता है आज

6:53

के दिन। लेकिन माइकल कोलिंस को इतना नहीं

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जाना जाता। क्यों है ऐसा? इसके पीछे एक

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बड़ा इंटरेस्टिंग रीज़न है। आगे आपको

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बताऊंगा। तो इस अपोलो 11 मिशन का जो

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स्पेसक्राफ्ट था, इसके तीन मेन हिस्से थे

7:03

दोस्तों। कमांड मॉड्यूल, सर्विस मॉड्यूल

7:06

और लूनार मॉड्यूल। पहले दो को एक साथ रख

7:08

के सीएसएम बोला जाता है। कमांड एंड सर्विस

7:11

मॉड्यूल। मकसद यह था यहां पर कि जो लूनार

7:13

मॉड्यूल होगा सिर्फ वही हिस्सा डिटच होकर

7:16

चांद पर लैंड करेगा। और फिर वापस जाने के

7:19

लिए लूनार मॉड्यूल को उड़ाकर वापस अटैच

7:21

किया जाएगा सीएसएम से जिससे एस्ट्रोनॉट्स

7:23

धरती पर वापस आएंगे। इस पूरे स्पेसक्राफ्ट

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को लॉन्च करने के लिए एक सैटन वी5 रॉकेट

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का इस्तेमाल किया गया। लॉन्च से पहले इस

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रॉकेट में 1 मिलियन गैलंस केरोसिन लिक्विड

7:33

ऑक्सीजन और लिक्विड हाइड्रोजन लोड किया

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गया। तो इस पूरे रॉकेट का वजन 30 लाख किलो

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था। इसकी मदद से यह स्पेसक्राफ्ट गया अर्थ

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के ऑर्बिट में पहुंचा। ऑर्बिट तक पहुंचने

7:44

में 10 मिनट से भी कम का समय लगा। और फिर

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अर्थ के ऑर्बिट का करीब डेढ़ चक्कर लगाया

7:48

इन्होंने। फिर इन्हें परमिशन मिल गई मिशन

7:50

कंट्रोल से। मिशन कंट्रोल धरती पर मौजूद

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था। उन्होंने कम्युनिकेट करके परमिशन दे

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दी कि ट्रांस लून्यर इंजेक्शन कर लिया

7:57

जाए। मतलब धरती के ऑर्बिट से निकलकर मून

8:00

के ऑर्बिट की तरफ स्पेसक्राफ्ट को ले जा

8:02

दिया जाए। अर्थ के ऑर्बिट से बाहर निकलने

8:04

के लिए भी सैटर्न V5 रॉकेट का ही इस्तेमाल

8:06

किया गया था। इसकी तीसरी स्टेज थी रॉकेट

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की। यह सब लॉन्च के 5 घंटे के अंदर-अंदर

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ही हो गया। इसके बाद एक्चुअली में चांद तक

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पहुंचने में कई दिनों का समय लगा।

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एस्ट्रोनॉट्स ने इंतजार किया अंदर बैठकर

8:17

कभी खाना खाया, कभी सोए, कभी फोटो खींची

8:20

अपनी। 19 जुलाई 1969 ऑलमोस्ट 4 लाख कि.मी.

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ट्रैवल करने के बाद अपोलो 11 का

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स्पेसक्राफ्ट चांद के ऑर्बिट में पहुंचता

8:29

है। यहां पर इसका काम होता है दो में

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स्प्लिट हो जाना। कमांड एंड सर्विस

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मॉड्यूल लूनार मॉड्यूल से अलग हो जाता है।

8:36

कमांड मॉड्यूल में बैठे थे माइकल कोलिंस

8:38

और स्पेसक्राफ्ट के इस हिस्से को निक नेम

8:40

दिया गया कोलंबिया। और दूसरी तरफ लूनार

8:42

मॉड्यूल का नाम था ईगल और इसमें बैठे थे

8:45

नील आर्मस्ट्रांग और बस ओल्ड्रिन। बात यह

8:47

थी कि यह जो कमांड एंड सर्विस मॉड्यूल था,

8:49

इसका काम था यह चांद के ऑर्बिट में ही बने

8:52

रहे। सिर्फ लूनार मॉड्यूल अलग होकर चांद

8:55

पर लैंड करेगा। यानी कि चांद पर कदम रखने

8:58

का मौका सिर्फ नील आर्मस्ट्रांग और बस

9:00

ओल्ड्रिन को मिलेगा और माइकल कोलिंस को

9:02

नहीं मिलेगा। यही रीज़न है शायद कि माइकल

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कोलिंस का नाम हर कोई इतना जानता नहीं है।

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हालांकि वो इस अपोलो 11 मिशन का पार्ट

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जरूर थे लेकिन उन्होंने चांद पर कदम नहीं

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रखा था। लेकिन फिर भी देखा जाए तो माइकल

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कोलिंस का जो हिस्सा था इस मिशन में वह

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शायद सबसे ज्यादा जरूरी था क्योंकि बाद

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में आकर उस लूनार मॉड्यूल को वापस सीएसएम

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के साथ अटैच होना था और अगर माइकल कोलिंस

9:21

नहीं होते तो नील आर्मस्ट्रांग और बस

9:23

वाल्ट्रिन जिंदा नहीं वापस लौट पाते। अब

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8:00 बजे के करीब लूनार मॉड्यूल चांद पर

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नीचे उतरने जा रहा था। ठीक 8:10 पर एक

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अलार्म बजने लग जाता है। 122 अलार्म।

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अब ना तो नील आर्मस्ट्रांग ना ही बस

9:39

ऑल्ड्रिन जानते थे कि इस अलार्म का मतलब

9:41

क्या है। वो मिशन कंट्रोल से कम्युनिकेट

9:43

करके पूछते हैं कि क्या करना चाहिए। वो

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कहते हैं इग्नोर करो आगे चलते रहो।

9:48

गो

9:50

बाद में पता चलता है यह 122 एक्चुअली में

9:53

वार्निंग थी कि जो अपोलो का गाइडेंस

9:55

कंप्यूटर था कंप्यूटर का प्रोसेसिंग

9:57

सिस्टम ओवरलोड हो रहा था। लेकिन थैंकफुली

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डिजाइन ऐसा किया गया था कंप्यूटर का कि जो

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एसेंशियल प्रोग्राम्स हैं जो मिशन के लिए

10:04

क्रिटिकल है वो चलते रहे। ओवरलोड होने के

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बाद भी कंप्यूटर में ऑटोमेटिक लैंडिंग का

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प्रोग्राम डला हुआ था जो एक्चुअली में

10:10

चांद के सरफेस पर लूनार मॉड्यूल को

10:11

ऑटोमेटिकली उतार देता। लेकिन करीब 150

10:14

मीटर की हाइट पर नील आर्मस्ट्रांग कंट्रोल

10:16

खुद से ले लेते हैं। वो नोटिस करते हैं कि

10:19

ये लूनार मॉड्यूल ऐसी जगह पर लैंड करने जा

10:22

रहा था जहां बड़े-बड़े पत्थर मौजूद थे।

10:24

लैंडिंग की जगह बदलती है और एक्चुअल

10:25

लैंडिंग साइड से करीब 4 मील दूर एक और जगह

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डिसाइड करी जाती है जहां लैंड होगा। 8:16

10:31

पर बस ऑल्ट्रेन फ्यूल का इंडिकेटर देखते

10:34

हैं। सिर्फ 5% फ्यूल बचा है।

10:42

इतने कम फ्यूल को देखकर मिशन कंट्रोल एक

10:44

काउंटडाउन इनिशिएट कर देता है। यह

10:46

काउंटडाउन डिसाइड करेगा कि यह लैंड करें

10:48

या फिर इस मिशन को अवॉर्ड कर दिया जाए।

10:51

क्रिटिकल फ्यूल

10:54

60 सेकंड कॉल गिवन 30 सेकंड कॉल फाइनली

10:59

लिटरली लास्ट मिनट पर सिर्फ 30 सेकंड बचे

11:02

थे इस काउंटडाउन में। नील आर्मस्ट्रांग

11:04

धरती पर एक रेडियो मैसेज भेजते हैं।

11:07

[संगीत]

11:15

यानी कि ईगल सक्सेसफुली लैंड कर चुका है।

11:17

फिर नील आर्मस्ट्रांग अपना स्पेस सूट

11:19

तैयार करते हैं। दरवाजा खोलते हैं और चांद

11:22

पर अपना पहला कदम रखते हैं।

11:26

इस मोमेंट को 60 मिलियन लोग लाइव देखने लग

11:30

रहे थे टेलीविजन पर। उनके पहले शब्द

11:33

दुनिया को सुनाई देते हैं।

11:42

इनके पीछे बस ओल्ड्रिन भी चांद की जमीन पर

11:44

अपना कदम रखते हैं और करीब अगले ढाई घंटे

11:46

तक ये चांद की मिट्टी और पत्थरों के

11:48

सैंपल्स कलेक्ट करते हैं फोटोज खींचते

11:51

हैं। कई साइंटिफिक इंस्ट्रूमेंट्स भी

11:52

सेटअप करते हैं। हालांकि यह बात सच है कि

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कोल्ड वॉर एक बड़ा रीजन था जिसकी वजह से

11:57

यह मून लैंडिंग करी गई। लेकिन क्योंकि मून

11:59

लैंडिंग करी जा रही थी। इतनी बड़ी चीज थी

12:02

यह तो ऑब्वियसली साइंटिफिक इंस्ट्रूमेंट्स

12:04

भी यह साथ में लेकर गए थे और कई साइंटिफिक

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ऑब्जेक्टिव्स भी थे इस मिशन के। जैसे कि

12:08

ये एक टेलीविजन कैमरा सेटअप करते हैं मून

12:10

पर जो सिग्नल्स ट्रांसमिट कर सके धरती पर।

12:12

यह एक डिवाइस लेकर आते हैं अपने साथ जिससे

12:14

कि सोलर विंड को मेजर किया जा सके जो चांद

12:17

पर आ रही है। एक ऐसा डिवाइस इंस्टॉल करते

12:19

हैं जिससे कि लेजर बीम्स धरती पर भेजी जा

12:21

सके और उन लेजर बीम्स का इस्तेमाल करके

12:24

एग्जैक्ट डिस्टेंस बताया जा सके धरती और

12:26

चांद के बीच। साथ ही साथ एक पैसिव

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साइज्मोमीटर भी होता है जो चांद पर हो रहे

12:30

अर्थक्वेक्स को मेजर कर सके। हालांकि

12:32

उन्हें अर्थक्वेक्स नहीं उन्हें मून

12:33

क्वेक्स कहेंगे। टोटल में 23 किलो पत्थर

12:36

और मिट्टी का सैंपल यह चांद से कलेक्ट

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करते हैं और पीछे वहां छोड़ जाते हैं एक

12:41

अमेरिकन झंडा और एक प्लेट जिस पर लिखा है

12:44

हियर मेन फ्रॉम द प्लेनेट अर्थ फर्स्ट सेट

12:47

फुट अपॉन द मून। जुलाई 1969 एडी वी केम इन

12:51

पीस फॉर ऑल मैनकाइंड। लूनर मॉड्यूल को

12:53

करीब 21 घंटे तक चांद पर रहना था। उसके

12:56

बाद इसे वापस ऊपर जाकर सीएसएम मॉड्यूल से

12:58

अटैच हो जाना था। लेकिन ऊपर जाने के लिए

13:01

प्रोपल्शन की जरूरत है जिसके लिए इंजन

13:04

चाहिए। और दोनों नील आर्मस्ट्रांग और बस

13:06

ओल्ड्रिन इस बात से अनजान थे कि बाहर

13:08

निकलते वक्त उस इंजन को चलाने के लिए जो

13:10

स्विच होता है वो स्विच ही टूट गया था। इस

13:14

चीज की बात मैंने वीडियो के शुरू में करी

13:16

थी। जब वो वापस लौटते हैं अपने लूनार

13:17

मॉड्यूल में तब वो रियलाइज करते हैं कि

13:20

यहां पर क्या हो गया है। वो मिशन कंट्रोल

13:21

को इस डैमेज के बारे में बताते हैं और

13:23

सिचुएशन को रिसॉल्व करने के लिए कोई सलूशन

13:26

ढूंढते हैं। इस पूरी प्रॉब्लम का एक बड़ा

13:28

ही इंटरेस्टिंग सॉल्यूशन निकलता है। स्विच

13:30

क्या होता है? स्विच बेसिकली एक

13:32

इलेक्ट्रिकल सर्किट को वापस जोड़ने का काम

13:34

करता है। बस ऑल्ट्रिन ने रियलाइज किया कि

13:36

अगर वो सर्किट टूट गया है तो कोई ऐसी चीज

13:39

हो जिसका मैं इस्तेमाल कर सकूं उस सर्किट

13:41

को वापस जोड़ने के लिए। वह आसपास देखते

13:43

हैं और उन्हें अपना बॉल पॉइंट पेन दिखाई

13:45

देता है। वह उस बॉल पॉइंट पेन का इस्तेमाल

13:47

करते हैं उस सर्किट को वापस जोड़ने के लिए

13:49

और इंजन को वापस चालू करने के लिए। फाइनली

13:52

लूनार मॉड्यूल रीअटैच हो जाता है सीएसएम

13:55

मॉड्यूल के साथ और स्पेसक्राफ्ट को धरती

13:57

की ओर मोड़ते हैं इसमें बैठे तीनों

13:59

एस्ट्रोनॉट्स। धरती पर लैंड करने के लिए

14:02

प्लान था कि कमांड मॉड्यूल और सर्विस

14:04

मॉड्यूल अब एक दूसरे से अलग होंगे। सर्विस

14:06

मॉड्यूल एक्चुअली में अर्थ के एटमॉस्फेयर

14:08

की वजह से डिस्ट्रॉय हो जाएगा। लेकिन यहां

14:09

पर खतरा यह था कि अगर सर्विस मॉड्यूल

14:11

ज्यादा खराब हो गया उसके डिब्री इधर-उधर

14:13

उड़ने लग गए वो कमांड मॉड्यूल के साथ जाकर

14:16

टकरा सकते हैं और एस्ट्रोनॉट्स जो बैठे

14:17

होंगे उसमें वो मारे जाएंगे। इस चीज को

14:19

अवॉइड करने के लिए नासा का प्लान था कि

14:21

सर्विस मॉड्यूल में थ्रस्टिंग होगी जो उसे

14:23

थोड़ी दूर ले जाएगी कमांड मॉड्यूल से ताकि

14:26

वो टकराए ना एक दूसरे से। लेकिन जब ये

14:28

एस्ट्रोनॉट्स वापस लौट रहे थे धरती पर तब

14:30

पता चलता है कि सर्विस मॉड्यूल की

14:32

थ्रस्टिंग तो काम ही नहीं कर रही। ये

14:34

तीनों एस्ट्रोनॉट्स कमांड मॉड्यूल में

14:36

बैठे हैं। देखते हैं अपने पास सर्विस

14:38

मॉड्यूल कैसे टूटने लग रहा है। उसके डेबरी

14:40

इधर-उधर उड़ने लग रहे हैं। और यह एक बहुत

14:42

बड़ा मिरेकल होता है कि उसके टूटे हुए

14:45

पीसेस कमांड मॉड्यूल को हिट नहीं करते।

14:47

उसका कमांड मॉड्यूल सेफ रहता है।

14:49

एस्ट्रोनॉट्स के मरने का रिस्क इतना

14:51

ज्यादा हाई था इस मिशन में कि यूएस

14:53

प्रेसिडेंट निक्न ने अपनी एक अल्टरनेट

14:55

स्पीच तैयार कर रखी थी इन केस ये

14:57

एस्ट्रोनॉट्स मारे जाते। इमेजिन कर सकते

15:00

हो लिटरली एक अल्टरनेट भाषण। इन्होंने

15:02

लिखा था इसमें फेट हैज़ ऑर्डेंड दैट द मैन

15:04

हु वेंट टू द मून टू एक्सप्लोर इन पीस विल

15:06

स्टे ऑन द मून टू रेस्ट इन पीस। दी ब्रेव

15:09

मैन नील आर्मस्ट्रांग एंड एडविन ऑल्ड्रिन

15:12

नो दैट देयर इज नो होप फॉर देयर रिकवरी।

15:14

दीज़ टू मैन आर लंग डाउन देयर लाइफ्स इन

15:16

मैनकाइंड्स मोस्ट नोबल गोल द सर्च फॉर

15:19

ट्रुथ एंड अंडरस्टैंडिंग। लेकिन थैंकफुली

15:21

ऐसा होता नहीं। कमांड मॉड्यूल सेफली अर्थ

15:24

की एटमॉस्फेयर से नीचे आ जाता है। पैराशूट

15:26

डिप्लॉय करता है और समुद्र में लैंड कर

15:29

जाता है। तीनों के तीनों एस्ट्रोनॉट्स

15:31

जिंदा हैं, सेफ हैं। समुद्र में इन

15:33

एस्ट्रोनॉट्स को रेस्क्यू शिप्स के द्वारा

15:35

इवाकुएट कर लिया जाता है। यह सही मायनों

15:37

में एक चमत्कार था कि ये जिंदा वापस लौट

15:39

कर आ सके। क्योंकि ऐसा नहीं है कि इस मिशन

15:41

में हर चीज जैसा प्लान करी गई थी वैसे ही

15:44

हुई। ऑलमोस्ट हर स्टेप पर प्रॉब्लम्स

15:46

इन्हें फेस करनी पड़ी। इन्होंने उन

15:48

प्रॉब्लम से सक्सेसफुली डील किया और यह

15:50

जिंदा वापस बचकर आ सके। एक इंटरेस्टिंग

15:52

चीज यहां पर यह है कि वापस लौटने के बाद

15:54

इन तीनों एस्ट्रोनॉट्स को क्वारेंटाइन

15:56

किया गया दो हफ्ते तक। यह किसी भी और

15:58

इंसान के कांटेक्ट में नहीं आएंगे क्योंकि

16:00

खतरा यह था कि कोई पैथोज्स हो सकते हैं।

16:02

कोई ऐसे वायरसेस या बैक्टीरिया जो

16:04

इन्होंने चांद पर पाए होंगे वापस धरती पर

16:06

आकर कोई बड़ी अजीबोगरीब बीमारी हो जाए

16:09

इन्हें। कोई नहीं जानता था। लेकिन एक बारी

16:11

फिर से थैंकफुली ऐसा कुछ हुआ नहीं। अपोलो

16:13

11 की मून लैंडिंग दुनिया भर के अखबारों

16:15

में खबर बनती है जो यूएस के प्रेसिडेंट

16:17

केनेडी ने कहा था हम दशक खत्म होने से

16:20

पहले तक इंसानों को चांद पर लैंड करा

16:22

देंगे वो नासा ने कर दिखाया

16:25

[संगीत]

16:27

इन 1969 द पब्लिक हैड लिटल रीज़ टू

16:30

क्वेश्चन मैनकाइंड हिस्टोरिक फर्स्ट ऑन द

16:33

मून आफ्टर ऑल द अचीवमेंट वास अ सेलिब्रेशन

16:36

ऑफ़ टेक्नोलॉजिकल सुपसी

16:39

अमेरिका हैड फाइनली वन द स्पेस रेस

16:43

लेकिन कितने चांस की बात नहीं है कि 1970

16:46

में ये डेकेड खत्म हो जाता और एक साल पहले

16:50

1969 में अमेरिका मून तक पहुंच गया। कहीं

16:53

ऐसा तो नहीं कि कोल्ड वॉर में अपना

16:55

एडवांटेज दिखाने के लिए अमेरिका ने ये एक

16:58

फेक मून लैंडिंग का ऑपरेशन प्लान किया।

17:01

कहीं उनका एक्चुअली मून लैंडिंग का मिशन

17:03

फेल हो गया हो और उन्होंने बैकअप के तौर

17:05

पर यह फेक मिशन प्लान किया था दुनिया को

17:07

दिखाने के लिए। यह एक एग्जांपल है दोस्तों

17:10

बहुत सारी कांस्परेसी थ्योरीज का जो बनाई

17:12

जाती हैं इस मून लैंडिंग के इंसिडेंट को

17:14

लेकर। लेकिन सच्चाई यही है दोस्तों ये

17:16

सारी कंस्परेसी थ्योरीज ऑलरेडी कई बार

17:18

डिबंक करी जा चुकी हैं। अगर अमेरिका की

17:21

तरफ से ये एक फर्जी अटेम्प्ट होता दुनिया

17:23

को बेवकूफ बनाने का तो सोवियत इसे कभी

17:26

मानता नहीं। लेकिन द ग्रेट सोवियत

17:28

इनसाइक्लोपीडिया जो 1970 और 1979 के बीच

17:31

में पब्लिश हुई थी। उसके थर्ड एडिशन में

17:33

कई बारी इस मून लैंडिंग को एक फ़क्चुअल चीज

17:36

बताया गया। सोवियट के आर्टिकल्स में कई

17:38

बार यह लिखा गया है कि अपोलो लैंडिंग थर्ड

17:41

हिस्टोरिक इवेंट था स्पेस एज का। सबसे

17:43

पहले स्पुतनिक की लॉन्च 1957 में। दूसरा

17:46

1961 में यूरी गगारन की फ्लाइट और तीसरा

17:50

मून लैंडिंग। तो सोवियत ने एक्चुअली में

17:52

इस चीज को एकनॉलेज किया था। लेकिन फिर

17:54

झंडे का क्या? जो झंडा चांद पर प्लांट

17:57

किया गया था वो वेव क्यों करने लग रहा है?

17:59

चांद पर तो कोई हवा नहीं होती। इसका एक

18:01

बड़ा सिंपल सा रीज़न है दोस्तों। जिस झंडे

18:03

को नील आर्मस्ट्रंग और बस ऑल्ट्रिन चांद

18:05

पर लेकर गए थे वो स्पेशली डिज़ झंडा था।

18:08

आमतौर पर झंडों में एक लंबी वर्टिकल रोड

18:11

डली होती है। लेकिन इस वाले में एक

18:13

हॉरिजॉन्टल रोड भी डली हुई थी। झंडे के

18:15

बिल्कुल ऊपर जिससे कि झंडा हमेशा

18:17

एक्सटेंडेड आउट रहे। क्योंकि नासा में काम

18:19

करने वाला हर कोई जानता था कि झंडे को अगर

18:21

हम चांद पर जाकर प्लांट करेंगे तो वो

18:23

लहराएगा नहीं। वहां पर हवा नहीं है। इसलिए

18:25

एक हॉरिजॉन्टल रोड ऊपर ऐड कर देते हैं

18:27

ताकि झंडा हमेशा ही फ्लैट दिखे। अब अपोलो

18:30

11 के मिशन में एक्चुअली में इस

18:31

हॉरिजॉन्टल रोड को एक्सटेंड करने में

18:33

थोड़ी प्रॉब्लम हो रही थी। तो पूरी एंड तक

18:36

एक्सटेंड नहीं हो पाई है। जिसकी वजह से एक

18:38

रिल दिखने लगा। वेव्स आ गई फ्लैग में और

18:41

इसीलिए लोगों को लगता है कि ये झंडा लहरा

18:43

रहा है। लेकिन एक्चुअली में ये झंडा लहरा

18:45

नहीं रहा है। सिर्फ उन वीडियोस में आपको

18:47

झंडा लहराता हुआ दिखेगा जहां पर

18:48

एस्ट्रोनॉट्स इसे पकड़ कर हिलाने लग रहे

18:50

हैं। इसके पीछे रीज़न यह है कि यह

18:52

एलुमिनियम की रोड्स थी झंडे में और वो

18:54

स्प्रिंग की तरह एक्ट कर रही थी। तो बहुत

18:56

थोड़ी देर के लिए झंडा हिलता और फिर

18:57

एब्सोलुटली स्टिल रह जाता। एक तीसरी बड़ी

19:00

पॉपुलर थ्योरी यहां पर उठाई जाती है कि जो

19:02

फोटो यहां पर नील आर्मस्ट्रांग और ओल्डरिन

19:04

ने ली है। इन फोटोज में कोई स्टार्स क्यों

19:06

नहीं दिखाई दे रहे? इसका जवाब भी बड़ा

19:08

सिंपल है। एक्चुअली में मून लैंडिंग दिन

19:11

के समय में हुई थी। ऐसे टाइम में जब चांद

19:13

पर सूरज की रोशनी पड़ने लग रही थी। और जो

19:16

वाइट कलर के स्पेस सूट्स पहने हुए थे

19:17

एस्ट्रोनॉट्स ने वो भी काफी ज्यादा

19:19

रिफ्लेक्ट करने लग रहे थे। तो उस जमाने के

19:21

कैमरास कोई इतने बड़े हाई प्रोफेशनल तो

19:23

नहीं होते थे। वैसे आज के दिन भी जितने

19:25

फोन के कैमरास हैं उनसे अगर आप कोई रात के

19:28

समय में फोटो खींचने की कोशिश करोगे

19:30

जिसमें फ्लैश जल रहा हो तो पीछे स्टार्स

19:32

नहीं दिखेंगे आपको फोटोज में। एक और

19:34

थ्योरी यहां पर उठाई जाती है शैडोस को

19:36

लेकर कि ये शैडोस इतनी इधर-उधर क्यों हो

19:38

रखी हैं। लोग यहां पर आर्गुमेंट उठाते हैं

19:40

क्योंकि ये हॉलीवुड की तरह फिल्म बनाई जा

19:42

रही थी तो कोई सिंगल सोर्स ऑफ लाइट नहीं

19:43

था। इसलिए ये शैडोस इतनी इधर-उधर होकर दिख

19:45

रही हैं। लेकिन रियलिटी में एक्चुअली में

19:47

सन ओनली सोर्स ऑफ लाइट नहीं था। जो चांद

19:50

का सरफेस था वो भी एक तरीके से

19:52

कॉम्प्लीमेंट्री सोर्स ऑफ लाइट एक्ट कर

19:54

रहा था क्योंकि वो इतनी ज्यादा रोशनी

19:55

रिफ्लेक्ट करने लग रहा था। इसकी वजह से

19:57

लाइट हर डायरेक्शन में स्कैटर करी और

19:59

शैडोज़ इतनी अजीबोगरीब बनी। एक और सवाल

20:02

यहां पर उठाया जाता है। एक बस ऑल्ट्रेन की

20:04

फोटो जो नील आर्स्ट्रोंग ने ली है उसमें

20:06

नील आर्स्ट्रोंग की रिफ्लेक्शन दिखने लग

20:07

रही है। लेकिन नील आर्स्ट्रोंग के हाथ में

20:09

कोई कैमरा नहीं है। यह कैसे हो सकता है?

20:12

यह इसलिए हो सकता है क्योंकि कैमरा

20:13

उन्होंने हाथ में नहीं पकड़ा था बल्कि

20:15

कैमरा उनके सूट में ही माउंटेड था और वो

20:17

वहीं से ही कंट्रोल कर सकते थे। और फिर वो

20:20

वाली फोटोस किसने ली जब नील आर्मस्ट्रांग

20:22

लूनार मॉड्यूल से नीचे उतर रहे थे। तो

20:24

इसका जवाब भी सिंपल है। वहां लूनार

20:26

मॉड्यूल में मल्टीपल कैमरास मौजूद थे।

20:28

लेकिन इन सब फर्जी थ्योरीज से हटकर अगर हम

20:31

एक्चुअल क्रिटिसिज्म की बात करें। ऐसा

20:33

नहीं था दोस्तों कि मून लैंडिंग के बाद हर

20:35

कोई तालियां बजाने लग रहा था। वाह नासा

20:37

कितना अच्छा कर दिया। बहुत से लोगों ने

20:39

काफी स्ट्रांग क्रिटिसिज्म किया नासा का

20:41

और अमेरिकन सरकार का मून लैंडिंग के बाद।

20:44

एक्चुअली मून लैंडिंग होने से पहले भी कई

20:46

लोग क्रिटिसाइज करने लग रहे थे इस चीज को।

20:48

जनवरी 1962 में न्यूयॉर्क टाइम्स ने एक

20:50

आर्टिकल पब्लिश किया था जिसमें उन्होंने

20:53

बताया कि जितना पैसा चांद पर जाने के लिए

20:55

स्पेंड किया जा रहा है। इतने पैसे से करीब

20:58

120 यूनिवर्सिटीज बन सकती हैं जो हार्वर्ड

21:00

के साइज की होंगी। मतलब क्या हमें इतना

21:02

पैसा चांद पर जाने के लिए स्पेंड करना

21:04

चाहिए? या फिर हर यूएस की स्टेट में एक

21:07

हार्वर्ड यूनिवर्सिटी खोल दें। उस पर हम

21:08

पैसा स्पेंड करें। बेसिकली मेन पॉइंट ऑफ

21:10

क्रिटिसिज्म यह था कि देश में इतनी सारी

21:13

प्रॉब्लम्स हैं। एजुकेशन की, इनकम इनकलिटी

21:16

की और उस समय अमेरिका और वियतनाम वॉर के

21:18

कॉन्सक्वेंसेस भी झेलने लग रहा था। तो

21:20

क्यों इस पर इतना पैसा बर्बाद किया? लेकिन

21:22

असलियत में मून लैंडिंग के कई ऐसे छुपे

21:24

हुए फायदे निकले जिसके बारे में किसी ने

21:26

सोचा तक नहीं था। जैसे कि कंप्यूटर चिप्स

21:29

में एडवांसमेंट्स। 1962 में माइक्रोचिप्स

21:31

को निकले हुए सिर्फ 3 साल हुए थे। और

21:33

आईबीएम ने डिसाइड किया था कि अर्ली 1960

21:36

में वो अपने कंप्यूटरटर्स में इन चिप्स को

21:37

नहीं इस्तेमाल करेंगे।

21:38

हियर इज अ पैकेज इंटीग्रेटेड सर्किट इनाइड

21:40

दिस पैकेज इज अ चिप ऑफ़ सिलिकॉन व्हिच

21:42

प्रोवाइड्स द इलेक्ट्रिकल इक्विपमेंट ऑफ़

21:44

मेनी ट्रांजिस्टर्स रेजिस्टर्स एंड

21:46

डायोड्स ऑल इंटरकनेक्टेड टू प्रोवाइड द

21:48

डिजायर फंक्शन।

21:49

लेकिन नासा की तरफ से इतनी डिमांड आने लगी

21:51

इंटीग्रेटेड सर्किट्स बनाने के लिए। तो

21:53

आईवीएम ने इस पर काम करना शुरू किया और

21:56

क्योंकि इतनी डिमांड थी इसका प्राइस 90%

21:59

से नीचे गिर गया अगले 5 सालों में। ऐसे ही

22:01

नासा ने बेसिकली टेस्ट किया कि हम क्या

22:03

कंप्यूटरटर्स पर रिलाई कर सकते हैं

22:05

इंसानों की जिंदगियों के लिए। अगर

22:06

एस्ट्रोनॉट्स चांद पर होकर आ सकते हैं इन

22:09

कंप्यूटर चिप्स पर रिलाई करते हुए तो हम

22:11

रोजमर्रा की जिंदगी में तो ऑब्वियसली

22:13

रिलाई कर ही सकते हैं इन कंप्यूटर चिप्स

22:15

पे। टेक्नोलॉजी की ग्रोथ बड़ी तेजी से हुई

22:18

इस मून लैंडिंग के बाद। लेकिन फिर भी

22:20

अपोलो 11 मिशन के सिर्फ 3 साल बाद दिसंबर

22:23

1972 में आखिरी मून मिशन किया जाता है

22:27

अपोलो 17। और तब से लेकर अब तक दोस्तों

22:30

ऑलमोस्ट 50 साल हो चुके हैं। इन 50 सालों

22:33

में कोई भी और इंसान चांद पर नहीं गया है।

22:36

यह शायद से एक सबसे बड़ा प्रूफ है इस चीज

22:38

का कि अपोलो प्रोग्राम कितना महंगा था। 4

22:41

लाख से ज्यादा इंजीनियर्स, टेक्नशियंस और

22:42

साइंटिस्ट ने इस पर काम किया था और टोटल

22:44

कॉस्ट तब पड़ी थी इसकी 24 बिलियन। आज के

22:47

दिन के डॉलर्स में यह $ बिलियन से ज्यादा

22:50

की कॉस्ट है। शुरुआत में सिर्फ जर्नलिस्ट

22:52

इसे क्रिटिसाइज कर रहे थे। लेकिन 1972 तक

22:54

आते-आते आम जनता की भी जो फैसिनेशन थी

22:57

नासा को लेकर, मून को लेकर वह खत्म हो गई

23:00

थी। जैसे-जैसे वियतनाम वॉर आगे चलती रही,

23:02

देश में आम लोगों की प्रॉब्लम्स बढ़ती

23:04

रही।

23:05

थाउजेंड्स ऑफ़ डेमोंस्ट्रेटर्स अपोज द

23:07

वियतनाम वॉर असेंबल इन द नेशन कैपिटल फॉर

23:10

अ मास प्रोटेस्ट।

23:11

उनको यह स्पेस प्रोग्राम एक बहुत बड़ा

23:14

पैसे की वेस्टेज लगा। हालांकि नासा ने

23:16

प्लांस बनाए थे अपोलो 20 तक मिशनंस करने

23:18

के। लेकिन पॉलिटिशियंस को जनता की सुननी

23:21

पड़ी और स्पेस प्रोग्राम पर जितना पैसा

23:23

खर्च किया जा रहा था उसे कट डाउन करना

23:25

पड़ा। दिसंबर 2017 में फॉर्मर प्रेसिडेंट

23:28

डोनल्ड ट्रंप ने कहा था कि वो फंडिंग

23:30

बढ़ाएंगे जिससे कि चांद पर लोगों को वापस

23:32

भेजा जा सके 204 तक।

23:34

रिटर्निंग अमेरिकन एस्ट्रोनॉट्स टू द मून

23:37

फॉर द फर्स्ट टाइम सिंस 1972 फॉर लॉन्ग

23:40

टर्म एक्सप्लोरेशन दिस टाइम। लेकिन बाद

23:43

में उन्होंने अपनी स्टेटमेंट बदल ली और

23:45

कहा कि नासा को चांद पर नहीं बल्कि मार्स

23:47

पर फोकस करना चाहिए। लेकिन 50 साल बाद

23:49

जाकर आज के दिन नासा ने अब फिर से प्लान

23:52

बनाया है लोगों को चांद पर भेजने का। इनका

23:55

नया आर्टिमिस प्रोग्राम। फिर से अनमैंड

23:58

रॉकेट्स के साथ टेस्टिंग करी जाएगी। लेकिन

23:59

नासा का प्लान है कि 2025-26 तक वो पहली

24:02

औरत को चांद पर भेजेंगे और उसके बाद वह

24:05

कहते हैं कि फर्स्ट पर्सन ऑफ कलर को भी

24:07

चांद पर भेजा जाएगा। एक बात तो शायद पक्का

24:09

कही जा सकती है कि इस दशक के खत्म होने से

24:12

पहले हम दोबारा से इंसानों को चांद पर

24:15

देखेंगे। वीडियो पसंद आया और स्पेस

24:17

रिलेटेड वीडियोस देख सकते हैं इस

24:19

प्लेलिस्ट पर क्लिक करके। ऐसे ही बहुत से

24:21

इंटरेस्टिंग टॉपिक्स पर बनाए हुए हैं और

24:23

मिलते हैं फिर अगले वीडियो में। बहुत-बहुत

24:25

धन्यवाद।

24:29

[संगीत]

24:36

[संगीत]

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