अंग्रेजों ने कैसे लूटा भारत | The Great British Loot
दोस्तों मैं हूं अंग्रेज।
मैं जा रहा हूं भारत पे कब्जा करने।
पहले मैं वहां के राजाओं के तलवे चाटूंगा।
फिर फूट डालो और राज करूंगा। तो चैनल को
सब्सक्राइब कर लीजिए और वीडियो को पूरा
देखें। इतिहास के पन्नों को अगर पलट कर
देखें तो एक समय ऐसा था जब विश्व के
मानचित्र पर भारत का स्थान किसी चमकते हुए
सूर्य के समान था। यह वह दौर था जब भारत
को केवल कविताओं में ही नहीं बल्कि
वास्तविकता में सोने की चिड़िया कहा जाता
था। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस सोने
का असली अर्थ क्या था? यह केवल राजाओं के
खजाने में पड़ा सोना चांदी या कोहिनूर
हीरा नहीं था। भारत की असली दौलत थी उसकी
उपजाऊ मिट्टी, उसके कुशल कारीगर और उससे
भी बढ़कर यहां के जंगलों में महकने वाले
मसाले, काली मिर्च जिसे पश्चिमी दुनिया
में काला सोना कहा जाता था। इलायची और
दालचीनी की महक ने सात समंदर पार बैठे
यूरोप वासियों की नींद उड़ा रखी थी। उस
समय यूरोप की सर्दियां जानलेवा होती थी और
मांस को सुरक्षित रखने के लिए भारतीय
मसालों की सख्त जरूरत थी। यही वह जरूरत थी
जिसने लालच का रूप लिया और दुनिया के सबसे
बड़े साम्राज्य की नींव रखी। 17वीं
शताब्दी की शुरुआत हो रही थी। ब्रिटेन में
उस समय गृह युद्ध और आर्थिक तंगी के बादल
मंडरा रहे थे। वहां की अर्थव्यवस्था मुख्य
रूप से खेती पर निर्भर थी, लेकिन वह
नाकाफ़ साबित हो रही थी। ऐसे में ब्रिटेन
के कुछ अमीर व्यापारियों और रईसों ने एक
योजना बनाई। उनकी नजरें पूर्व की ओर थी।
जहां भारत और इंडोनेशिया जैसे देश मसालों
से भरे पड़े थे। तारीख थी 31 दिसंबर 1600।
लंदन के एक अंधेरे कमरे में जॉन वाट्स और
थॉमस स्माइथी जैसे व्यापारियों ने एक बैठक
की। उन्होंने ब्रिटेन की तत्कालीन महारानी
एलिजाबेथ प्रथम के सामने एक प्रस्ताव रखा।
प्रस्ताव यह था कि उन्हें पूर्वी देशों के
साथ व्यापार करने का एकाधिकार दिया जाए।
महारानी ने शाही फरमान पर हस्ताक्षर कर
दिए और इस तरह जन्म हुआ इतिहास की सबसे
खतरनाक कॉरपोरेट कंपनी का द गवर्नर एंड
कंपनी ऑफ मर्चेंट्स ऑफ लंदन ट्रेडिंग इन
टू द ईस्ट इंडीज जिसे [संगीत] दुनिया ने
बाद में ईस्ट इंडिया कंपनी के नाम से
जाना। यह केवल एक कंपनी नहीं थी। यह एक
ऐसा विचार था जो तराजू लेकर निकला था।
लेकिन जिसकी नजरें तलवार पर थी। ब्रिटेन
से भारत का सफर आसान नहीं था। तूफानी
समुद्रों, समुद्री लुटेरों और बीमारियों
से लड़ते हुए 1608 में एक ब्रिटिश जहाज
हेक्टर भारत के पश्चिमी तट पर सूरत
बंदरगाह पर लंगर डालता है। इस जहाज से
उतरने वाला व्यक्ति था कैप्टन विलियम
हॉकिंस। लेकिन अंग्रेजों के लिए भारत का
दरवाजा खुला नहीं था। उस समय भारत पर
मुगलों का शासन था और समुद्र के रास्तों
पर पहले से ही पुर्तगालियों का कब्जा था।
पुर्तगाली व्यापारी मुगलों के दरबार में
अपनी पैठ बना चुके थे और वे किसी भी कीमत
पर अंग्रेजों को यहां टिकने नहीं देना
चाहते थे। जब हॉकिंस ने आगरा जाकर मुगल
बादशाह जहांगीर से मुलाकात की और व्यापार
की अनुमति मांगी तो पुर्तगालियों के दबाव
में जहांगीर ने उन्हें खाली हाथ लौटा
दिया। यह अंग्रेजों के लिए एक बड़ा झटका
था लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। उन्हें
[संगीत] पता था कि अगर भारत के खजाने तक
पहुंचना है तो उन्हें कूटनीति का रास्ता
अपनाना होगा। अंग्रेजों ने अपनी रणनीति
बदली। 1615 में ब्रिटेन के राजा जेम्स
प्रथम ने अपने सबसे चतुर राजदूत सर थॉमस
रो को जहांगीर के दरबार में भेजा। थॉमस रो
एक साधारण व्यापारी नहीं थे। वे एक मंझे
हुए कूटनीतिज थे। वे अपने साथ ब्रिटेन से
मखमली कपड़े, शराब और नायाब पेंटिंग्स
लेकर आए थे जो मुगल बादशाह को लुभाने के
लिए काफी थी। थॉमस रो ने लगभग 3 साल तक
मुगलों के दरबार में समय बिताया। उन्होंने
जहांगीर को यह विश्वास दिला दिया कि
अंग्रेज केवल व्यापारी हैं और उनका
उद्देश्य मुगलों की सुरक्षा करना और
उन्हें राजस्व देना है। आखिरकार जहांगीर
का दिल पसीज गया। उसने वह ऐतिहासिक
दस्तावेज जारी किया जिसने भारत के भाग्य
को हमेशा के लिए बदल दिया। जहांगीर ने
ईस्ट इंडिया कंपनी को सूरत में अपनी पहली
फैक्ट्री कारखाना लगाने की अनुमति दे दी।
उस समय किसी को अंदाजा नहीं था कि कागज का
वह एक टुकड़ा आने वाली सदियों में भारत के
लिए गुलामी की जंजीर बन जाएगा। अनुमति
मिलते ही अंग्रेजों ने अपनी चाले चलनी
शुरू कर दी। 1619 तक उन्होंने सूरत, आगरा,
अहमदाबाद और भड़ूच में अपने व्यापारिक
केंद्र स्थापित कर लिए। उनकी नजर अब केवल
मसालों पर नहीं थी, बल्कि वे भारत के सूती
कपड़े, रेशम, नील और शोरा जो बारूद बनाने
के काम आता था, पर भी कब्जा जमाना चाहते
थे, धीरे-धीरे उन्होंने दक्षिण भारत की ओर
रुख किया और 1639 में मद्रास अब चेन्नई
में अपनी पकड़ मजबूत की। इसके बाद 1668
में इंग्लैंड के राजा चार्ल्स द्वितीय को
पुर्तगालियों से दहेज में बॉम्बे अब मुंबई
का द्वीप मिला। जिसे उन्होंने मात्र 10
पाउंड वार्षिक किराए पर ईस्ट इंडिया कंपनी
को सौंप दिया। अब अंग्रेजों के पास पश्चिम
में बॉम्बे और दक्षिण में मद्रास जैसे
मजबूत गढ़ थे। लेकिन उनकी सबसे ललचाई
नजरें भारत के सबसे अमीर सूबे बंगाल पर
थीं। कोलकाता अब कोलकाता उस समय व्यापार
का केंद्र था। 1690 के आसपास जॉब चार्नॉक
ने कोलकाता में एक व्यापारिक कोठी की नींव
रखी। 1700 तक आते-आते अंग्रेजों ने यहां
फोर्ट विलियम का निर्माण शुरू कर दिया। यह
केवल एक गोदाम नहीं था बल्कि एक किलेबंदी
थी। 17वीं सदी खत्म होते-होते ईस्ट इंडिया
कंपनी भारत में अपनी जड़े जमा चुकी थी।
लेकिन अब उनका मुकाबला केवल भारतीय
व्यापारियों से नहीं था। फ्रांस की फ्रेंच
ईस्ट इंडिया कंपनी और डच ईस्ट इंडिया
कंपनी भी भारत की संपत्ति को नोचने के लिए
कतार में थी। इन यूरोपीय शक्तियों के बीच
भारत की धरती पर कई युद्ध हुए। लेकिन अपनी
बेहतर नौसेना और धूर्त रणनीतियों के कारण
अंग्रेज सब पर भारी पड़े। सन 1707 में
मुगल बादशाह औरंगजेब की मृत्यु हो गई।
औरंगजेब के जाने के बाद मुग़ल साम्राज्य
ताश के पत्तों की तरह बिखरने लगा। दिल्ली
की गद्दी कमजोर पड़ गई और अलग-अलग राज्यों
के नवाब और राजा स्वतंत्र होने लगे।
अंग्रेजों ने इसी अराजकता का इंतजार किया
था। उन्होंने देख लिया था कि भारत के राजा
आपस में लड़ रहे हैं। उनमें एकता की कमी
है और जाति पाति का भेदभाव समाज को खोखला
कर रहा है। अंग्रेज समझ गए थे कि अब समय आ
गया है तराजू को एक तरफ रखने का और तलवार
उठाने का। वे अब केवल मुनाफा कमाने वाले
व्यापारी नहीं रहना चाहते थे। वे अब भारत
की जमीन और राजस्व पर अपना अधिकार चाहते
थे। 1750 का दशक आते-आते भारत के आसमान पर
काले बादल मंडराने लगे थे जो आने वाले 200
वर्षों के तूफान का संकेत दे रहे थे।
18वीं शताब्दी के मध्य तक भारत का बंगाल
प्रांत दुनिया के सबसे समृद्ध क्षेत्रों
में से एक था। उस समय बंगाल में आज का
पश्चिम बंगाल, बांग्लादेश, बिहार और ओसा
शामिल थे। मुगलों की कमजोर होती पकड़ के
बीच बंगाल के नवाब स्वतंत्र शासक की तरह
व्यवहार करने लगे थे। अंग्रेजों की ललचाई
आंखें इसी खजाने पर टिकी थी। वे बंगाल से
रेशम और सूती कपड़े का भारी व्यापार करते
थे। लेकिन वे टैक्स कर देने से कतराते थे।
1756 में बंगाल की गद्दी पर एक युवा और
तेजतर्रार नवाब बैठा सिराजुद्दौला। सिराज
को अंग्रेजों की मंशा पहले दिन से ही खटक
रही थी। उन्होंने [संगीत] देखा कि अंग्रेज
ना केवल टैक्स चोरी कर रहे हैं बल्कि
कोलकाता में अपनी कोठी फोर्ट विलियम की
किलेबंदी कर रहे हैं और वहां हथियार जमा
कर रहे हैं। नवाब ने सख्त लहजे में
अंग्रेजों को संदेश भिजवाया तुम व्यापारी
हो व्यापारी बनकर रहो। किले बनाना
तुम्हारा काम नहीं है। अंग्रेजों ने नवाब
के आदेश को अनसुना कर दिया। इस अपमान का
बदला लेने के लिए सिराजुद्दौला ने अपनी
विशाल सेना के साथ कोलकाता पर हमला बोल
दिया और अंग्रेजों को वहां से खदेड़ दिया।
यह अंग्रेजों के लिए एक शर्मनाक हार थी।
जब यह खबर मद्रास में बैठे ब्रिटिश
अधिकारी रॉबर्ट क्लाइव तक पहुंची तो वह
तिलमिला उठा। क्लाइव एक धूर्त और क्रूर
सेनापति था। वह समझ गया था कि सीधी लड़ाई
में सिराज की विशाल सेना को हराना
नामुमकिन है। इसलिए उसने वह रास्ता चुना
जिसमें अंग्रेज माहिर थे। षड्यंत्र और
धोखा। क्लाइव अपनी सेना लेकर बंगाल
पहुंचा। लेकिन उसने तलवार चलाने से पहले
नवाब के दरबार में गद्दारों को ढूंढना
शुरू किया। उसे शिकार मिल गया मीर जाफर।
मीर जाफर नवाब सिराज उद्दौला का सेनापति
था। लेकिन उसके दिल में नवाब बनने की हसरत
थी। रॉबर्ट क्लाइव ने मीर जाफर के साथ एक
गुप्त समझौता किया। तुम युद्ध के मैदान
में अपनी सेना को लड़ने से रोक दो। हम
सिराज को हरा देंगे और इनाम में तुम्हें
बंगाल का नवाब बना देंगे। सौदा पक्का हो
गया। भारत की गुलामी के दस्तावेज पर
हस्ताक्षर हो चुके थे। तारीख थी 23 जून
1757। नदिया जिले के प्लासी के मैदान में
दोनों सेनाएं आमने-सामने थी। एक तरफ
सिराजुद्दौला की 50,000 सैनिकों की विशाल
फौज थी, और दूसरी तरफ रॉबर्ट क्लाइव के
पास मात्र 3000 सैनिक थे। देखने वालों को
लग रहा था कि अंग्रेज कुछ ही घंटों में
कुचले जाएंगे। लेकिन जैसे ही युद्ध का
बिगुल बजा, इतिहास का सबसे बड़ा धोखा
सामने आया। नवाब की सेना का एक बड़ा
हिस्सा जिसकी कमान मीर जाफर के हाथ में
थी, वह मूर्ति बनकर खड़ा रहा। उन्होंने
अपनी तलवारें मयान से बाहर ही नहीं
निकाली। सिराज उद्दौला हक्का बक्का रह
गया। अपने ही सेनापति के विश्वासघात से
उसका मनोबल टूट गया। युद्ध के मैदान में
बारिश ने भी नवाब की बारूद गीली कर दी।
जबकि अंग्रेजों ने अपनी बारूद बचा ली थी।
प्लासी का युद्ध कोई युद्ध नहीं बल्कि एक
सौदा था। शाम होते-होते सिराज उद्दौला को
भागना पड़ा और बाद में मीर जाफर के बेटे
ने उनकी हत्या कर दी। भारत के इतिहास में
यह वह काला दिन था जब एक विदेशी कंपनी ने
भारत के सबसे अमीर सूबे पर परोक्ष रूप से
कब्जा कर लिया। वादे के मुताबिक क्लाइव ने
मीर जाफर को बंगाल का नवाब तो बना दिया
लेकिन वह केवल नाम का राजा था। असली डोर
अंग्रेजों के हाथ में थी। अंग्रेज उसे
सोने की बोरी समझते थे और जब चाहे धन मांग
लेते थे। जब मीर जाफर ने आनाकानी की तो
उसे हटाकर उसके दामाद मीर कासिम को नवाब
बना दिया गया। लेकिन मीर कासिम स्वाभिमानी
निकला। उसने अंग्रेजों की लूट पर रोक
लगाने की कोशिश की और अपनी राजधानी मुंगेर
ले गया। नतीजतन 1764 में बक्सर का युद्ध
हुआ। इस बार मुकाबला कड़ा था। मीर कासिम
ने अवध के नवाब और मुगल बादशाह शाह आलम
द्वितीय के साथ मिलकर अंग्रेजों को चुनौती
दी। लेकिन ब्रिटिश सेना का अनुशासन और
आधुनिक हथियार उन पर भारी पड़े। बक्सर की
जीत प्लासी से भी ज्यादा महत्वपूर्ण थी।
1765 में इलाहाबाद की संधि हुई जिसने
अंग्रेजों को बंगाल, बिहार और ओसा की
दीवानी दिला दी। इसका मतलब था कि अब इन
राज्यों से राजस्व वसूलने का कानूनी
अधिकार ईस्ट इंडिया कंपनी का हो गया। अब
उन्हें व्यापार के लिए ब्रिटेन से सोना
लाने की जरूरत नहीं थी। वे भारत के पैसे
से ही भारत का सामान खरीदते और मुनाफा
कमाते। यहीं से कंपनी का असली राज्य शुरू
हुआ। बंगाल पर कब्जा करने के बाद
अंग्रेजों की भूख बढ़ गई। अब उनकी नजर
मैसूर, मराठा और पंजाब जैसे शक्तिशाली
राज्यों पर थी। मैसूर में टीपू सुल्तान
जैसे शेर ने अंग्रेजों को लोहे के चने
चबवाए। लेकिन अंततः 1799 में अपनों की
गद्दारी और अंग्रेजों की घेराबंदी के कारण
वे शहीद हो गए। इसके बाद लॉर्ड वेलेजली ने
एक नई चाल चली सहायक संधि। यह एक मीठा जहर
था। अंग्रेज भारतीय राजाओं से कहते, हम
आपको अपनी सेना किराए पर देंगे आपकी
सुरक्षा के लिए। लेकिन बदले में आपको
हमारी सेना का खर्चा उठाना होगा और अपने
दरबार में हमारा एक रेजिडेंट रखना होगा।
जिस राजा ने यह संधि मानी, उसने अपनी
आजादी बेच दी। धीरे-धीरे अंग्रेज उस राज्य
की विदेश नीति और आंतरिक मामलों में दखल
देने लगते और अगर राजा सेना का पैसा नहीं
चुका पाता तो उसका आधा राज्य हड़प लेते।
हैदराबाद के निजाम से लेकर मराठों तक कई
राज्य इस जाल में फंसे जो नहीं झुके उन पर
हड़प नीति थोप दी गई जैसा कि झांसी और
सतारा के साथ हुआ। 1850 आते-आते भारत का
नक्शा बदल चुका था। कश्मीर से कन्याकुमारी
तक भगवा और हरे झंडों की जगह अब यूनियन
जैक लहरा रहा था। तराजू लेकर आए सौदागर अब
भारत की तकदीर लिखने वाले विधाता बन बैठे
थे। प्लासी और बक्सर के युद्धों ने
अंग्रेजों को भारत का शासक तो बना दिया था
लेकिन अब उनका अगला लक्ष्य भारत की आत्मा
को कुचलना था। यह वह दौर था जब सोने की
चिड़िया के पंख नोचे जा रहे थे। ब्रिटेन
में औद्योगिक क्रांति शुरू हो चुकी थी और
वहां की मशीनों को चलाने के लिए कच्चे माल
की भूख थी। अंग्रेजों ने तय किया कि भारत
अब दुनिया को सामान बेचने वाला देश नहीं
बल्कि ब्रिटेन की फैक्ट्रियों के लिए
कच्चा माल पैदा करने वाला खेत बनकर रह
जाएगा। एक समय था जब भारतीय जुलाहों
द्वारा बुना गया कपड़ा पूरी दुनिया में
मशहूर था। ढाका की मलमल इतनी बारीक होती
थी कि पूरा थान एक अंगूठी से निकल जाता
था। लेकिन ब्रिटेन के मैनचेस्टर और
लंकाशायर में बनी मिलों का कपड़ा भारत के
हाथ से बुने कपड़े का मुकाबला नहीं कर पा
रहा था। अंग्रेजों ने एक क्रूर नीति
अपनाई। उन्होंने भारतीय कपड़ों पर ब्रिटेन
में भारी टैक्स लगा दिया। जबकि ब्रिटेन से
आने वाले मशीनी कपड़े को भारत में टैक्स
फ्री कर दिया। नतीजा यह हुआ कि सस्ता
विदेशी कपड़ा भारतीय बाजारों में भर गया।
लाखों बुनकर बेरोजगार हो गए। कहा जाता है
कि बंगाल के कुशल कारीगरों के अंगूठे तक
काट दिए गए ताकि वे दोबारा वैसा बारीक
कपड़ा ना बुन [संगीत] सके जो भारत कभी
कपड़ा निर्यात करता था। अब वह अपने तन को
ढकने के लिए विदेशी कपड़ों का मोहताज हो
गया। भारत की आत्मनिर्भरता की रीड तोड़ दी
गई थी। 1853 में जब पहली ट्रेन मुंबई से
ठाणे के बीच चली तो इसे भारत के विकास का
प्रतीक बताया गया। लेकिन सच्चाई कुछ और
थी। अंग्रेजों ने रेलवे का जाल भारतीयों
की सुविधा के लिए नहीं बल्कि अपनी लूट को
आसान बनाने के लिए बिछाया था। रेल की
पटरियां भारत की छाती पर बिछाई गई वे नसें
थी जिनके जरिए देश के कोने-कोने से अनाज,
कपास और खनिज खींचकर बंदरगाहों तक
पहुंचाया जाता था और वहां से सीधे ब्रिटेन
भेज दिया जाता था। इसके अलावा रेलवे का
मुख्य उद्देश्य यह था कि अगर कहीं भी
भारतीय विद्रोह करें तो ब्रिटिश सेना को
चंद घंटों में वहां पहुंचाकर विद्रोह को
कुचला जा सके। यह विकास भारतीयों के खून
पसीने की कमाई से बना था। लेकिन इसमें सफर
करने पर भी भारतीयों के साथ कुत्तों
[संगीत] जैसा बर्ताव होता था। इस दौर का
सबसे भयानक अध्याय था नील की खेती।
ब्रिटेन के कपड़ा उद्योगों को रंगने के
लिए नील की जरूरत [संगीत] थी। अंग्रेजों
ने बिहार और बंगाल के किसानों को अपनी
उपजाऊ जमीन पर चावल या गेहूं उगाने से रोक
दिया और जबरदस्ती नील उगाने का फरमान
सुनाया। यह एक ऐसा सौदा था जिसमें किसान
की बर्बादी तय थी। नील की जड़े इतनी गहरी
होती थी कि वह जमीन की सारी ताकत खींच
लेती थी जिससे वह खेत बंजर हो जाता था।
अगर किसान नील उगाने से मना करता तो
ब्रिटिश बागान मालिक कोड़े बरसाते। उनके
घरों को आग लगा देते और उनकी महिलाओं को
बेइज्जत करते। किसान अपनी ही जमीन पर
गुलाम बन गया था। उसे वह फसल उगानी पड़ती
थी जिसे वह खा नहीं सकता था और बदले में
उसे जो दाम मिलते थे, उससे एक वक्त की
रोटी भी नहीं आती थी। नीलदर्पण नाटक में
इस दर्द को जिस तरह दिखाया गया, उसने समाज
को झझोर कर रख दिया। अंग्रेजी राज का सबसे
काला सच था अकाल। 18वीं और 19वीं सदी के
अंत में भारत ने ऐसे भयानक अकाल देखे
जिनका जिक्र आते ही रूह कांप जाती है।
1876, 1878 का भीषण अकाल और 1899 का अकाल
प्राकृतिक आपदा से ज्यादा एक सरकारी हत्या
थी। जब मद्रास, मैसूर और महाराष्ट्र में
बारिश नहीं हुई और फसलें सूख गई तब भी
अंग्रेजों ने अनाज का निर्यात नहीं रोका।
भारत के गोदामों में पड़ा गेहूं और चावल
जहाजों में भरकर ब्रिटेन भेजा जा रहा था
ताकि वहां के लोग भूखे ना रहें और युद्ध
के लिए अनाज जमा रहे। इधर भारत में लोग
भूख से तड़प-तड़प कर मर रहे थे। सड़कों पर
लाशों के ढेर लगे थे। लोग पेड़ों की छाल
और मिट्टी खाने को मजबूर थे। माएं अपने
बच्चों को चंद सिक्कों के लिए बेचने को
तैयार थी ताकि उन्हें एक रोटी मिल सके। एक
तरफ भारत में 50 लाख से ज्यादा लोग भूख से
मर रहे थे और दूसरी तरफ 1877 में वायसराय
लॉर्ड लिटन दिल्ली में रानी विक्टोरिया के
सम्मान में एक भव्य दिल्ली दरबार का आयोजन
कर रहा था। जहां शराब और पकवानों की
नदियां बह रही थी। यह दृश्य नीरों के
बांसुरी बजाने जैसा था जब रोम जल रहा था।
लूट और भूख के साथ-साथ अंग्रेजों ने
भारतीयों के आत्मसम्मान को भी कुचल दिया
था। अब वे भारत में मेहमान नहीं बल्कि
मालिक थे। क्लबों और पार्कों के बाहर
तख्तियां लटकी होती थी। कुत्तों और
भारतीयों का प्रवेश वर्जित है। रेल के
डिब्बों में भारतीयों को अंग्रेजों के
सामने बैठने की अनुमति नहीं थी। अंग्रेजों
ने अपनी शिक्षा नीति के जरिए एक ऐसा वर्ग
तैयार करने की कोशिश की जो रंग और रूप में
भारतीय हो। लेकिन सोच और नैतिकता में
अंग्रेज हो। उनका मकसद ऐसे क्लर्क बाबू
पैदा करना था जो उनके प्रशासन को चला सकें
ना कि ऐसे नागरिक जो सवाल पूछ सकें। इतना
अत्याचार सहने के बाद भारत की धरती अब
कांपने लगी थी। किसानों का गुस्सा, राजाओं
का खोया हुआ राज्य, सैनिकों का अपमान और
आम आदमी की भूख, यह सब बारूद के ढेर की
तरह जमा हो रहा था। लोगों को समझ आ गया था
कि यह विदेशी शासक उनके कभी नहीं हो सकते।
यह अंधकार का युग अपने चरम पर था और जैसा
कि कहा जाता है रात जितनी काली होती है
सवेरा उतना ही करीब होता है। भारत के सीने
में दबी यह आग अब ज्वालामुखी बनकर फटने
वाली थी। 1857 की क्रांति हालांकि कुचल दी
गई थी, लेकिन उसने यह साबित कर दिया कि
भारत अब चुप नहीं बैठेगा। 19वीं सदी का
अंत होते-होते कांग्रेस की स्थापना और नए
विचारकों के उदय ने आजादी की लड़ाई को एक
नई दिशा दे दी थी। सदी बदल रही थी और उसके
साथ बदल रहा था भारत का मिजाज। अब भारत वह
लाचार देश नहीं था जो केवल सहना जानता था।
1857 की क्रांति जिसे अंग्रेजों ने सिपाही
विद्रोह कहकर खारिज कर दिया था। दरअसल वह
आजादी की पहली सामूहिक हुंकार थी। मंगल
पांडे की बंदूक से निकली उस एक गोली ने
बैरकपुर में जो चिंगारी जलाई उसने रानी
लक्ष्मीबाई, तात्या टोपे और कुंवर सिंह
जैसे सुरमाओं के जरिए पूरे उत्तर भारत को
जला दिया था। भले ही अंग्रेजों ने उस
विद्रोह को अपनी क्रूरता से दबा दिया और
ईस्ट इंडिया कंपनी की जगह सीधे ब्रिटिश
क्राउन महारानी विक्टोरिया का शासन लागू
कर दिया। लेकिन भारतीयों के दिलों से डर
हमेशा के लिए खत्म हो चुका था। 20वीं सदी
की शुरुआत में अंग्रेजों ने फूट डालो और
राज करो कि नीति को और तेज कर दिया। 1905
में बंगाल का विभाजन इसी साजिश का हिस्सा
था। लेकिन अंग्रेजों की क्रूरता की सारी
हदें तब पार हो गई जब बैसाखी का दिन आया।
13 अप्रैल 1919 अमृतसर के जलियांवाला बाग
में हजारों निहत्ते लोग, बच्चे, बूढ़े और
महिलाएं शांतिपूर्ण सभा कर रहे थे। तभी
जनरल डायर अपनी फौज के साथ वहां पहुंचा।
उसने बाहर निकलने का एकमात्र रास्ता बंद
किया और बिना किसी चेतावनी के गोली चलाने
का आदेश दे दिया। 10 मिनट तक गोलियां
बरसती रहीं। वहां की मिट्टी खून से लाल हो
गई। कुआं लाशों से भर गया। इस नरसंहार ने
भारत की अंतरात्मा को झकझोर दिया। अब भारत
सुधार नहीं चाहता था। अब उसे पूर्ण
स्वराज्य चाहिए था। इस घटना ने एक 12 साल
के बच्चे भगत सिंह के मन में क्रांति के
बीज बो दिए और रविंद्र नाथ टैगोर जैसे
शांत कवियों को भी अपनी सर की उपाधि
लौटाने पर मजबूर कर दिया। इस दौरान आजादी
की लड़ाई दो धाराओं में बहने लगी। एक तरफ
थे महात्मा गांधी जो लाठी और सत्य के
सहारे एक ऐसा युद्ध लड़ रहे थे जिसमें
हथियार नहीं उठते थे। उनका असहयोग आंदोलन
और दांडी यात्रा नमक सत्याग्रह अंग्रेजों
के लिए पहेली बन गए थे। अंग्रेज गोलियां
चला सकते थे। लेकिन उन निहत्ते लोगों का
क्या करते जो हंसते-हंसते जेल जाने को
तैयार थे। गांधी जी ने आम आदमी को यह
एहसास दिलाया कि मुट्ठी भर अंग्रेज
करोड़ों भारतीयों पर तभी तक राज कर रहे
हैं जब तक हम उन्हें करने दे रहे हैं।
दूसरी तरफ थे वे दीवाने जो अपनी जवानी देश
पर कुर्बान करने को बेताब थे। चंद्रशेखर
आजाद, भगत सिंह, राजगुरु सुखदेव और राम
प्रसाद बिस्मिल। इनका मानना था कि बहरे
कानों को सुनाने के लिए धमाकों की जरूरत
होती है। काकोरी में सरकारी खजाना लूटने
से लेकर असेंबली में बम फेंकने तक इन
क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों की नींद हराम
कर दी। जब [संगीत] 23 साल के भगत सिंह ने
फांसी के फंदे को चूमा तो उनके चेहरे पर
मुस्कान थी। उनकी शहादत ने देश के हर युवा
को बारूद बना दिया। 1939 में दूसरा विश्व
युद्ध शुरू हुआ। हिटलर की सेना ब्रिटेन पर
कहर बरपा रही थी। अंग्रेज कमजोर पड़ रहे
थे। इसी मौके का फायदा उठाने के लिए भारत
के शेर सुभाष चंद्र बोस देश से बाहर
निकले। उन्होंने नारा दिया तुम मुझे खून
दो। मैं तुम्हें आजादी दूंगा। उन्होंने
जापान और जर्मनी की मदद से आजाद हिंद फौज
को फिर से खड़ा किया। जब आईएनए के सैनिक
कदम कदम बढ़ाए जाग आते हुए बर्मा म्यांमार
के रास्ते भारत की ओर बढ़े तो ब्रिटिश
भारतीय सेना के अंदर भी बगावत की लहर दौड़
गई। अंग्रेजों को सबसे बड़ा झटका 1946 में
लगा। जब बंबई मुंबई में रॉयल इंडियन नेवी
नौसेना का विद्रोह हुआ। भारतीय सैनिकों ने
जहाजों पर से यूनियन जैक उतार फेंका और
तिरंगा फहरा दिया। अब अंग्रेजों को यकीन
हो गया था कि वे सेना के दम पर भी भारत को
नहीं दबा सकते। ब्रिटेन खुद युद्ध में
इतना बर्बाद हो चुका था कि उसके पास अब
भारत जैसे विशाल देश को संभालने की ना तो
ताकत थी और ना ही पैसा। आखिरकार वह समय आ
गया जिसका सदियों से इंतजार था। ब्रिटेन
के प्रधानमंत्री क्लीमेंट एटली ने घोषणा
की कि अंग्रेज भारत छोड़ देंगे। लॉर्ड
माउंटबेटन को अंतिम वायसराय बनाकर भारत
भेजा गया ताकि सत्ता का हस्तांतरण किया जा
सके। लेकिन जाते-जाते भी अंग्रेज भारत को
एक ऐसा जख्म दे गए जो कभी नहीं भरेगा
विभाजन। देश को धर्म के नाम पर दो टुकड़ों
में बांट दिया गया। भारत और पाकिस्तान।
नक्शे पर खींची गई रेड्लिफ लाइन ने दिलों
को भी बांट दिया। आजादी का जश्न तो था
लेकिन साथ में दंगों की चीखें भी थी।
लाखों लोग बेघर हुए। ट्रेनें लाशों से
भरकर आईं। यह आजादी की बहुत भारी कीमत थी।
14 15 अगस्त की मध्य रात्रि को जब पूरी
दुनिया सो रही थी, भारत अपनी जिंदगी और
आजादी की ओर जाग रहा था। दिल्ली के लाल
किले से यूनियन जैक उतारा गया और शान से
तिरंगा फहराया गया। पंडित जवाहरलाल नेहरू
ने अपना ऐतिहासिक भाषण ट्रिस्ट विद
डेस्टिनी दिया। वे अंग्रेज जो 350 साल
पहले एक तराजू लेकर सूरत के तट पर भीख
मांगने आए थे। आज अपने जहाज लेकर वापस लौट
रहे थे। वे अपने पीछे एक ऐसा देश छोड़ गए
थे जो आर्थिक रूप से कंगाल था। सामाजिक
रूप से बटा हुआ था। लेकिन जो अब आजाद था।
ईस्ट इंडिया कंपनी और ब्रिटिश राज का
इतिहास हमें सिखाता है कि जब हम अपने घर
के झगड़ों में उलझते हैं तो बाहरी
शक्तियां उसका फायदा उठाती हैं। भारत को
सोने की चिड़िया से एक गरीब देश बनाने
वाले अंग्रेज चले गए। लेकिन वे अपने पीछे
लोकतंत्र, रेलवे और एक ऐसा राष्ट्र छोड़
गए जिसने अपनी राख से दोबारा उठना सीखा।
आज भारत फिर से विश्व पटल पर एक महाशक्ति
बनकर उभर रहा है।
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