Code of Civil Procedure 01 (Sections 1 & 2) I Telegram Link in Description
वेरी गुड इवनिंग ऑल नमस्कार दोस्तों बच्चे
आवाज आ रही है सभी लोगों को वीडियो क्लियर
है सर
यस सर
ऑल गुड
यस सर
सर
ठीक है ठीक है तो बच्चे हमारी पहली क्लास
है सीपीसी की पहली बार हम लोग सीपीसी
पढ़ने जा रहे हैं आज तो सीपीसी के अंदर
देखो एप्रोच कुछ बहुत सीधी रखने वाले हैं।
बिल्कुल भी मैं चीजों को कॉम्प्लिकेट
करूंगा नहीं। जितना सिंपल हो सकता है उतना
सिंपल रखूंगा अपनी क्लासेस को भी और उसके
स्ट्रक्चर को भी। ठीक है? तो आज तो वैसे
भी फर्स्ट क्लास है तो इट इज गोइंग टू बी
इंट्रोडक्टरी। उसमें हम लोग बस अपने आप को
एक एक तरीके से अवगत कराएंगे कि सीपीसी है
क्या? तो कुछ इंपॉर्टेंट प्रोविजंस
पढ़ेंगे और कुछ डेफिनेशंस को देखेंगे। तो
बहुत सिंपल रहने वाला है। तो जिससे कि आप
एकदम एक कॉन्टेक्स्ट में आ जाओ कि सीपीसी
है क्या एक्चुअल में? देखो बच्चे जितना
मेरा एक्सपीरियंस कहता है मैंने पहले भी
एक बार YouTube पर बच्चों को सीपीसी
पढ़ाया है। जितना मेरा एक्सपीरियंस कहता
है सीपीसी में देखो सीपीसी बड़ा ही प्यारा
सब्जेक्ट है। बहुत इजी सब्जेक्ट है। उसमें
ऐसा कभी ही सिचुएशन ऐसी आती है जब टीचर को
बहुत ज्यादा मतलब दिमाग लगा के किसी चीज
को एक्सप्लेन करना पड़े। कुछ ही ऐसे
प्रोविजंस हैं। आई विल से नॉट मोर देन 101
सेक्शन से ज्यादा ऐसे सेशंस नहीं है
जिसमें बहुत ज्यादा दिमाग लगेगा। सब सीधे
साधे से सेक्शंस हैं। लैंग्वेज सिंपल है।
एक बार में समझ में आ जाती है। बस परेशानी
किस बात की आती है? बच्चा चैलेंज्ड क्यों
फील करता है सीपीसी में? एक तो
कॉन्टेक्स्ट। कॉन्टेक्स्ट बहुत जरूरी होता
है बच्चे। प्रोसीजरल लॉ हम जब भी पढ़ते
हैं ना अगर आप उसको एकदम से उठा के कहीं
से भी पढ़ लोगे आपको जिंदगी में नहीं समझ
में आने वाला आपको समझ में आ जाएगा वो कह
क्या रहा है ये लैंग्वेज समझ में आ जाएगी
बट उसका मतलब नहीं समझ में आया होगा जैसे
आप देख रहे हो हम सीआरपीसी पढ़ रहे हैं
एविडेंस पढ़ रहे है चीजें एक सीक्वेंस में
होती जा रही है हमें पता भी नहीं चल रहा
ओवर टाइम हम लोग उस चीज को कवर करते जा
रहे हैं क्योंकि इन एव्री क्लास वी आर
अवेयर अबाउट दी कॉन्टेक्स्ट कि हम किस
कॉन्टेक्स्ट में क्या पढ़ रहे हैं? वही
एग्जजेक्टली सेम एप्रोच कुछ भी कुछ भी
नहीं बदलने वाले। एग्जजेक्टली सेम एप्रोच
रखेंगे सीपीसी के अंदर भी। ठीक है? काफी
मैंने देखा है कई बार टीचर्स अलग-अलग बहुत
ज्यादा ही उसमें अपना दिमाग लगा देते हैं
सीपीसी को पढ़ाने में और वो कॉम्बिनेशंस
बनाने की कोशिश करते हैं बिटवीन दी
ऑर्डर्स एंड दी सेशंस। आई विल से
स्टार्टिंग के लिए शुरुआत के लिए जब हमको
उस सीपीसी पर होल्ड बनाना है। अभी ऐसा कुछ
नहीं करेंगे। क्यों? उसका रीजन ये है।
क्योंकि वो एक ऐसी अप्रोच है जिसके लिए
जरूरी है कि आपको पहले से ही एक अच्छा
खासा आपका जो बैकअप है सीपीसी के ऊपर वो
स्ट्रांग हो। तो मैं अपना एम बहुत आपको
क्लियर कर देता हूं पहली ही क्लास में कि
क्या मेरा एम होने वाला है जिस एम के साथ
मैं आपको सीपीसी पढ़ाऊंगा। बच्चे मेरा ऐ
बस इतना सा है कि जो हमारा सिविल प्रोसीजर
कोड है द वेरी स्टच्यू ये जो है इसको हमें
समझना है। इसमें क्या लिखा है? इसमें क्या
प्रावधान है? उसको हमें समझना है। देखो यह
जो सीपीसी है यह मोर और लेस दो पार्ट में
डिवाइडेड की जा सकती है। पहला भाग है जहां
पर सेक्शंस दिए हुए हैं। बहुत ज्यादा
सेशंस नहीं है। कुछ ही है जिनको हम कवर कर
लेंगे। फिर उसके बाद ऑर्डर्स आते हैं। तो
पहले तो इसको बात को समझना जरूरी है कि
सेक्शन क्या करते हैं? ऑर्डर्स क्या करते
हैं?
बच्चे कुछ ऐसा रिलेशन मान लो कि जो
सेक्शंस हैं वो ब्रॉड लॉ बताते हैं कि
मतलब जैसे कि सेक्शंस हम सीआरपीसी में पढ़
रहे हैं ना वैसे ही सेक्शंस सीपीसी में भी
होते हैं। पर सीपीसी में एक अलग चीज क्या
है? सीपीसी के अंदर रूल्स आ जाते हैं। और
रूल्स किस बारे में होते हैं वो? रूल्स
अलग-अलग चीजों के बारे में होते हैं। आपको
पता है प्रोसीजरल लॉ है। प्रोसीजरल लॉ
मतलब कोर्ट में कैसी प्रक्रिया चलेगी उसके
बारे में होगा। तो सीआरपीसी के अंदर क्या
किया है? हर एक चीज को सेक्शंस के ही अंदर
बताया गया है। और वही रीजन है कि इतने
सारे सेक्शंस हैं ओवर 400। ठीक है? और
उनको हम कवर कर रहे हैं। सीपीसी के अंदर
अच्छी बात क्या है? उन्होंने रूल्स कीेंस
के हिसाब से उनको डिवाइड कर दिया है
बिटवीन दी सेशंस एंड बिटवीन दी रूल्स। और
ये जो रूल्स है उनको अलग-अलग ऑर्डर्स के
अंदर
एक ग्रुप में बांट दिया है कि अच्छा जहां
तक बात केस फाइल करने की है तो यह सारे
रूल्स लगेंगे। जहां तक बात जजमेंट सुनाने
की है ये सारे रूल्स लगेंगे। तो उन्होंने
पहले से ही हमको जहां तक बात मैं सीपीसी
की करूं उन्होंने पहले से ही हमको पूरा
स्ट्रक्चर बना के दिया है। हमें कुछ नहीं
करना। पूरा स्ट्रक्चर सीपीसी के अंदर पहले
से ही बना हुआ है कि देखो यह रहे सेशंस और
ये रहे ऑर्डर्स और ऑर्डर्स के अंदर
रेलेवेंट रूल्स लिखे हुए हैं। तो एज अ
स्टूडेंट हमें उन सारी चीजों को कवर कैसे
करना है? देखो बच्चे कवर करने के लिए तो
जो कंटेंट की मैं बात करूं कंटेंट लगभग
उतना ही है जितना सीआरपीसी के अंदर है। ना
उससे बहुत ज्यादा है ना उससे बहुत कम है।
लगभग लगभग बराबर ही है। और आपको फील भी
होगा कि हम कुछ कुछ वैसा ही अप्रोच ले रहे
हैं। वो क्रिमिनल के कॉन्टेक्स्ट में है।
ये सिविल के कॉन्टेक्स्ट में है। पर यहां
पे हमारा टाइम सेव हो जाता है। सेव इसलिए
हो जाता है दो रीजन की वजह से। एक तो हम
जब सेशंस पढ़ते हैं तो उन पर तो एक-ए
सेक्शन पर एक-ए पॉइंट पर पूरा ध्यान रहता
है हमारा एक-एक चीज। पर जब हम ऑर्डर्स को
पढ़ते हैं तो ऑर्डर्स तो इंपॉर्टेंट है और
उसके अंदर जो रूल्स दिए गए हैं वो भी
इंपॉर्टेंट है। पर क्या होता है इन मोस्ट
ऑफ द केसेस जो ऑर्डर्स के अंदर रूल्स होते
हैं वो एक लाइन का दो लाइन का। कई कभी-कभी
किसी ऑर्डर में बहुत सारे रूल्स होते हैं।
100 से भी ज्यादा। तो जरूरी नहीं है कि हर
एक पढ़े। जो जो इंपॉर्टेंट है उसको पकड़
के चलते हैं जो एग्जाम में आता है और
जिनका इस्तेमाल किया जाता है आमतौर पर
कोर्ट ऑफ लॉ में। तो यहां पर सीपीसी के
अंदर ये जो आइडेंटिफिकेशन वाला प्रोसेस है
वो कंपैरेटिवली इजी है। सीआरपीसी में क्या
है? आपको सारे सेक्शंस पढ़ने ही पढ़ने
हैं। बाय एंड बाय बाय एंड बाय बाय एंड बाय
चलता ही रहेगा वो सफर। पर सीपीसी में
एक्चुअल में आपके पास ये चॉइस है। सेक्शंस
तो आप पढ़ो। ऑर्डर्स भी आप पढ़ो। पर जो
ऑर्डर्स के अंदर रूल्स दिए गए हैं उसमें
आपको फोकस करना है स्पेसिफिकली उन रूल्स
के ऊपर जो कि एग्जाम पर्सेपेक्टिव से आपसे
पूछे जाएंगे। ठीक है? क्योंकि वही इस बात
को हमेशा दिमाग में रखना है कि जब भी मैं
एग्जाम लिखूंगा तो ऑब्वियसली पूरी महाभारत
लिखने का तो मेरे पास टाइम नहीं होगा।
मेरे पास टाइम लिमिटेड है। तो वहां पर
हमारी सोच ये होनी चाहिए कि उस लिमिटेड
टाइम में अपना बेस्ट पॉसिबल रिजल्ट कैसे
दे? और बेस्ट पॉसिबल रिजल्ट कैसे दे
पाओगे? तभी दे पाओगे जब आप पूरी
इंफॉर्मेशन को क्यूरेट करोगे उस आंसर के
हिसाब से। ठीक है? तो इस इस चीज में जो
सीबीसी का स्ट्रक्चर है वो बहुत ही बढ़िया
है। बहुत ही बढ़िया है। एक नंबर बिल्कुल
उसका स्ट्रक्चर है। तो बिल्कुल हम उस चीज
को डिस्टर्ब करेंगे नहीं। आज की क्लास को
सिंपल रखेंगे। सेक्शंस को पढ़ने की कोशिश
करेंगे। सेक्शन वन से ले सेक्शन फोर तक
समझने की कोशिश करेंगे। इन सेक्शंस के
अंदर क्या है और बेसिक बेसिक एक आईडिया ले
जाएंगे। फिर जो कल की क्लास होगी वहां से
हम लोग थोड़ा सा अपना गियर अप करेंगे और
चीजों में थोड़ा सा कॉनसेप्चुअलिटी में
घुसने की कोशिश करेंगे। पर जितना मेरा
एक्सपीरियंस कह रहा है मैंने पुराने जो
मेरे बच्चे रहे हैं उनका भी जितना
एक्सपीरियंस रहा था वो यही था कि शुरू में
थोड़े से हिक अप्स ज्यादा आते हैं। मतलब
शुरू की जो दो तीन चार पांच क्लासेस होंगी
तब थोड़े से हिक अप ज्यादा आएंगे क्योंकि
कुछ नए-नए कांसेप्ट्स इंट्रोड्यूस होंगे
जो अभी तक हमने नहीं पढ़े हैं। तो जब एक
बार वो कवर हो जाते हैं फिर रिपीटेशन बहुत
ज्यादा है। सीपीसी के अंदर रिपीटेशन बहुत
ज्यादा है। ये अच्छी भी बात है, बुरी भी
बात है। अच्छी बात ये है कि बार-बार कुछ
नया नहीं पढ़ना पड़ता। बुरी बात ये है कि
कभी-कभी वो बोरिंग भी हो जाता है। तो एक
बार हम जब कांसेप्चुअल क्लेरिटी ले लेंगे
फिर तो इजी है। कांसेप्चुअल क्लेरिटी वो
मैं आपको दे दूंगा। उसमें आपको परेशान
होने की जरूरत नहीं है। ठीक है? तो
बिल्कुल भी ऐसा नहीं करना। आप लोगों को
बिल्कुल माहौल नहीं बनाना है कि अरे
सीपीसी पढ़ रहे हैं। मैं ये भी कर लूं,
मैं वो भी कर लूं। मैं आपको एक बात
बार-बार बोल रहा हूं। शुरू से बोल रहा हूं
कि आप लोगों ने मेरे से सिक्स मंथ्स का
कोर्स लिया है।
पर आपको सिक्स मंथ्स मुझे अपने देने हैं।
देने हैं मतलब ट्रूली ऑनेस्टली देने हैं।
कुछ भी मत करो एक्स्ट्रा
उन चीजों से जो मैं यहां पे करा रहा हूं।
एस फार एस दी एट सब्जेक्ट्स आर कंसर्न।
मेरे को अपने तरीके से पढ़ाने दो और उसी
तरीके से आप पढ़ो। छ महीने बाद आप फ्री
हो। आप जो जो करना हो वो करना। तो अभी मैं
बोलूंगा अभी सीपीसी में कुछ भी अपनी तरफ
से बच्चे ऐड अप करने की कोशिश मत करना।
अपनी तरफ से ऐड अप करने की कोशिश करने का
मतलब ये है कोई भी कोचिंग के नोट्स कोई भी
किताब कोई भी हो उसको कोई किसी पॉइंट पे
क्लेरिफिकेशन चाहिए। मैं आपके पास हूं।
Google आपके पास है। किताब से भी आप
क्लेरिफिकेशन ले लो। बट अगेन द सेम थिंग
ऐसा मत करना कि आप दूसरे ही रास्ते पे चले
जाओ। क्योंकि यहां पे थोड़ी सी अप्रोच मैं
बेसिक रखूंगा। ऐसे आपको पढ़ाने की कोशिश
करूंगा जैसे कोई बच्चा सीपीसी को पहली बार
पढ़ रहा है। तो उसी एकदम सिंपल चीजों को
रखते हुए कवर करेंगे, समझने की कोशिश
करेंगे। एक बार जब ये स्टच्यूट खत्म हो
जाएगा ना फिर आपको जरूरत ही नहीं पड़ेगी।
फिर तो जरूरत ही नहीं पड़ेगी। आप खुद आपके
पास खुद इतना बड़ा रजिस्टर होगा सीपीसी के
नोट्स का जो आपकी किताब से ज्यादा मोटा
होगा। आपको फिर किसी चीज की जरूरत नहीं
है। तो बस बने रहो। थोड़ा सा बस पेशेंस
रखना पड़ेगा। अपने ऊपर थोड़ा सा होल्ड
करके रखना पड़ेगा। थोड़े से चैलेंजेस
आएंगे पर कर लेंगे सारी चीजों को। ठीक है?
ऐसा ही कुछ टीपीए में भी है और टीपीए को
हम लोग थर्सडे से शुरुआत करेंगे। पर टीपीए
कंपैरेटिवली इजी पड़ जाता है। उसमें आपको
कुछ नहीं है। आराम से मैं आपको बहुत इजीली
निकाल दिया। जी बच्चे
सर ये वन आवर की क्लासेस होंगी या वन एंड
हाफ?
भाई बच्चे वही है जो नॉर्मल ड्यूरेशन
हमारा क्लासेस का चलता है। वही ड्यूरेशन
चलेगा। एक एक घंटा 15 मिनट से ले एक घंटा
30 मिनट के बीच में कुछ भी ओके ठीक है चलो
तो हमारा बच्चे जो पहला सेक्शन है वो है
आपको सभी को पता है कि ज्यादातर स्टच्यूट
में जो सेक्शन वन होता है उसका पर्पस क्या
होता है वो उस स्टच्यूट का नाम बताता है
कि नाम क्या है उसकी कमेंसमेंट की डेट
बताता है और उसका एक्सटेंट बताता है। फिर
से मैं आपको हर एक प्रोविजन पे आपको थोड़ा
सा इशारा दे देता रहूंगा साथ के साथ कि
कौन सा प्रोविजन कितना इंपॉर्टेंट है
एग्जाम पर्सपेक्टिव से। तो आज जितने हम
प्रोविजंस पढ़ने वाले हैं चार सेक्शंस
पढ़ने वाले हैं। अ उसमें से बहुत ज्यादा
इंपॉर्टेंट प्रोविजंस है नहीं। जो
डेफिनेशंस मैं पढ़ाऊंगा अभी आपको वो तो सच
में बहुत महत्वपूर्ण है। उनको तो बहुत
ध्यान से पढ़ेंगे। पर जैसे ये पहला सेक्शन
है कुछ भी नहीं। ये कभी एग्जाम में नहीं
आते आपके। ठीक है? ऑब्जेक्टिव में भी वो
शर्म आएगी उसको ऐसा कुछ पूछने में। आप सभी
को पता है सीपीसी का नाम है कोड ऑफ सिविल
प्रोसीजर। ये कब आया था? ये ऐसा कभी-कभी
पूछ लेते हैं बेवकूफी भरा ऑब्जेक्टिव टाइप
क्वेश्चन। ठीक है? 1909 में आया था। ठीक
है? अब ये जो जम्मू एंड कश्मीर वाली चीज
हो चुकी है। उसके बाद ये पूरे के पूरे
भारत में लगता है। बस एक जगह को छोड़ के।
ठीक है? बस एक जगह को छोड़ के। और वो जगह
कौन सी है? दी स्टेट ऑफ नागालैंड।
नागालैंड में सीपीसी लागू नहीं होता है।
तो कभी जैसे ऑब्जेक्टिव टाइप क्वेश्चन
आपसे पूछ ले एक्सटेंट के बारे में तो
स्टेट ऑफ नागालैंड को आपको एक्सक्लूड करना
होगा। और स्टेट ऑफ नागालैंड तो एक राज्य
हो गया। उसके साथसाथ जो भी ट्राइबल एरियाज
है उनको एक्सक्लूड किया गया है। मतलब जो
ट्राइबल पीपल होते हैं हम अपने का्स में
पढ़ रहे हैं ना शेड्यूल ट्राइब्स कुछ वैसा
ही आईडिया वैसा ही प्रिंसिपल ले समझो कि
जो ट्राइबल एरियाज है वहां पे सीपीसी को
एक्सक्लूड किया गया है स्पेसिफिकली। बच्चे
जब भी ट्राइबल्स के लिए किसी भी चीज का
एक्सक्लूजन किया जाता है ना वहां पर पर्पस
यही होता है कि उनके जो कल्चर है उनके जो
ट्रेडिशन है उनके अंदर प्रक्रियाएं बताई
गई है उन सारी चीजों के बारे में मतलब
ट्राइबल्स जो है उनका मानना ये है कि
हमारी अपने आप में एक कम्युनिटी है हमको
हमारे हिसाब से जीने दो हमें ना आपके
कानून की जरूरत है ना किसी की जरूरत है वो
अपने कल्चर ट्रेडिशन के हिसाब से अपने आप
को छोटे-छोटे ग्रुप्स में बांट
रेगुलेट करते रहते हैं और वो खुश है। दैट
इजेंट। तो ये जितने भी प्रोविजंस कभी भी
आप देखते हो ट्राइबल के बारे में
एक्सक्लूजन चाहे वो कास्टी हो चाहे वो
सीपीसी हो वहां पर एजेंडा यही होता है कि
अननेसेसरीली इंटरफेयर करने की कोशिश नहीं
करनी है। तो पहले तो यहां पर जेएन के का
भी प्रोविजन था। था जम्मू एंड कश्मीर में
भी नहीं लागू होता था बिकॉज़ ऑफ 370 बट अब
वो सीन खत्म हो चुका है तो वहां पे तो
लागू हो गया बट स्टेट ऑफ नागालैंड स्टिल
एक्सक्लूडेड और जो ट्राइबल एरियाज है वहां
से भी एक्सक्लूजन है फिर से मैं बोल रहा
हूं सब्जेक्टिव कभी नहीं फंसेगी ऐसी बात
ऑब्जेक्टिव आएगी ऑब्जेक्टिव आए तो ट्राइबल
एरियाज और स्टेट ऑफ नागालैंड आपको याद
रखना है इतना याद रखोगे चलेगा इस पर बहुत
ज्यादा दिमाग लगाने की जरूरत नहीं है बस
एक छोटी सी बात और है कि जो गवर्नमेंट है
उसको हमने क्या किया है पावर दी है सीटीसी
के अंदर कि अगर वो चाहे तो नोटिफिकेशन से
नोटिफिकेशन का सहारा लेते हुए ये जो हमारा
सिविल प्रोसीजर कोड है उसको स्टेट ऑफ
नागालैंड पे भी लागू कर सकती है और ऐसे
ट्राइबल एरियाज पर लागू कर सकती है जो
उसको ठीक लगे और उनको लागू करते वक्त उसको
सीपीसी में कुछ बदलाव करने हैं कुछ
मॉडिफिकेशन करने है ऐसा भी कर सकती है तो
कहने का मतलब है कि एक्सक्लूजन तो है
स्टेट ऑफ नागालैंड पे लागू नहीं होगा
ट्राइबल एरियाज पर लागू नहीं होगा बट एट
दी सेम टाइम जो हमारी राज्य सरकार है उसको
ये पावर दी गई है कि अगर वो चाहे तो वो
सीपीसी को स्वीकार कर सकती है और सीपीसी
को लागू कर सकती है ठीक है जिन बदलावों के
साथ जरूरी हो उन बदलावों के साथ तो आपको
क्या याद रखना है कि पावर दी गई है पावर
किसको दी गई है स्टेट गवर्नमेंट को ठीक है
स्टेट गवर्नमेंट चाहती है जैसे स्टेट ऑफ
नागालैंड है एक्सक्लूड कर रखा है। अब
नागालैंड की गवर्नमेंट को लग रहा है फॉर
व्हाटएवर रीजन कि सीपीसी को लागू कर लेना
चाहिए। ठीक है? तो अगर वो चाहते हैं तो
उसको लागू कर सकते हैं। इतनी सी बात है।
उनको बस चॉइस दे रखी है। ठीक है? तो ये तो
हो गया सेक्शन वन जिसमें थोड़ी सी ये बस
नागालैंड वाली बात है। बस इतना सा याद रख
लो। नागालैंड ऑब्लिक मतलब नोट्स में जो
लिखना है आपको नागालैंड ऑब्लिक ट्राइबल
एरिया इज एक्सक्लूडेड। और उसके एक नीचे
लाइन में लिख लो पावर गिवन टू दी स्टेट
गवर्नमेंट। ठीक है? पावर गिवन टू दी स्टेट
गवर्नमेंट का मतलब कि अगर वो चाहे तो
सीपीसी को एक्सेप्ट भी कर सकते हैं। ठीक
है? बस इतना सा। उसके आगे कुछ लिखने की
जरूरत नहीं।
शुरुआत होती है अब। जो कॉनसेप्चुअल शुरुआत
शुरुआत है वो होती है अब। जो बच्चे सेक्शन
टू का सेक्शन टू है सीपीसी का। इसमें
अलग-अलग वर्ड्स की डेफिनेशंस प्रोवाइड की
गई है। वैसे तो बहुत सारी डेफिनेशंस है और
मैं यह नहीं कह रहा कि वो डेफिनेशनंस
इंपॉर्टेंट नहीं है। बट सबसे इंपॉर्टेंट
डेफिनेशंस जो है वो हम आज की क्लास में
कवर करेंगे और बाकी के जो शब्द है बाय एंड
बाय जैसे के जैसे सेक्शंस आते रहेंगे उनको
हम डील करते रहेंगे। पर ये ऐसी डेफिनेशंस
है जो आपको जरूर ही पड़ेगी एग्जाम में
लिखने की। ठीक है? इनको आपको मेंशन करना
पड़ेगा क्योंकि ऐसी स्थिति आ सकती है जब
इसी के ऊपर बात उठ जाए। ना केवल
ऑब्जेक्टिव टाइप क्वेश्चन बल्कि
सब्जेक्टिव टाइप क्वेश्चन आल्सो। तो
डेफिनेशंस पे खासा ध्यान देना और
डेफिनेशंस पे कैसी अप्रोच रखनी है। फिर से
मैं बता रहा हूं। बच्चे सीपीसी अभी हमने
पढ़ना शुरू नहीं किया। ठीक है? अभी हम
उसकी शुरुआत कर रहे हैं। तो हमें नहीं पता
कि अंदर हम किन चीजों का सामना करने वाले
हैं। क्या-क्या स्थितियां आने वाली है। तो
आप इस चीज को दिमाग में रख के ही डेफिनेशन
को पढ़ना। ऐसा मत सोचना कि मैं अभी
डेफिनेशन पढ़ रहा हूं। तो मेरे को एक एक
शब्द या एक एक चीज या पूरा एक्सप्रेशन समझ
में आ जाए कि कब हो रहा है, कैसे हो रहा
है। वो तो आपको तब समझ में आएगा जब आप
सीपीसी पूरा पढ़ लोगे कि अच्छा अच्छा
अच्छा अच्छा ये ऐसा होता है ये कोर्ट ऐसा
करता है। अच्छा अभी बस हमारा पर्पस यह
होगा कि जो लिखा हुआ है यहां जो डेफिनेशन
में बात कही गई है उसका हम एक आईडिया ले
पाए जिससे क्या होगा ये शब्द बार-बार
आएंगे आगे वाले सेक्शंस में कल जो हम
पढ़ेंगे अगली क्लासेस में जो हम पढ़ेंगे
वहां पर ये बार-बार शब्दों का इस्तेमाल
होगा तो वहां पर हम समझ पाए कि यहां पर इस
सेक्शन ये सेक्शन कहने की कोशिश क्या कर
रहा है बस इतना सा एजेंडा है अभी इन
डेफिनेशन के पीछे तो अपने सर में बहुत
ज्यादा दर्द नहीं करना है। बहुत लाइटली लो
और सुनो मैं कह क्या रहा हूं। ठीक है? जो
सबसे पहली डेफिनेशन है जिस पर हमको खासा
ध्यान देना है वो डेफिनेशन है बच्चे
किसकी? डिक्री की। किसकी? डिग्री की। ये
एक ऐसा शब्द है जो हमारे सामने आ चुका है
पहले भी। पर थोड़ा सा कॉन्टेक्स्ट डिफरेंट
था। आपको याद होगा जब हम हिंदू मैरिज एक्ट
पढ़ रहे थे तो वहां पर हमने थोड़ा सा ये
डिग्री वाली बात को डिस्कस किया था। उसके
ऊपर एक केस भी पढ़ा था। पर वो चलो जो भी
चीज रही हो जो भी कॉन्टेक्स्ट रहा हो जहां
तक सीपीसी की बात है वहां पे डिग्री को
कैसे डिफाइन किया जा रहा है? डिग्री को
बताया जा रहा है कि डिग्री एक फॉर्मल
ध्यान से सुनना बच्चे। शब्दों को देखना।
एक फॉर्मल एक्सप्रेशन है। फॉर्मल एक्स
एक्सप्रेशन है। किस चीज का फॉर्मल
एक्सप्रेशन है? एक एडजुडिकेशन का। किसका?
एक एडजुडिकेशन का। एजुडिकेशन होता है मतलब
डिसीजन का। निर्णय का। ठीक है?
जो जो कि जहां तक उस कोर्ट का सवाल है जो
यह फॉर्मल एक्सप्रेशन दे रहा है। अब सुनना
सबसे महत्वपूर्ण बात डिग्री की
कंक्लूसिवली
कौन सा शब्द है? कंक्लूसिवली
डिटरमाइन करता है। क्या करता है?
कंक्लूसिवली डिटरमाइन राइट्स ऑफ दी
पार्टीज।
जो भी पार्टीज इनवॉल्व है किसी भी केस के
अंदर कोर्ट के सामने उनके बीच में जो भी
राइट्स इनवॉल्व है उनको कंक्लूसिवली
निर्णायक रूप से हमेशा के लिए डिटरमाइन
करता है।
वो जो भी मुद्दों से जुड़े हुए हो।
ठीक है?
और यह जो आखरी बात यह जो डिग्री है यह दो
प्रकार की हो सकती है बच्चे। देयर आर टू
टाइप्स ऑफ डिग्रीज। पहली प्रीिलिमिनरी
डिग्री। दूसरी फाइनल डिग्री। अभी इस बात
को तो रख दो साइड में कि प्रीिलिमिनरी
डिग्री क्या होता है? फाइनल डिग्री क्या
होता है? इसको रख दो साइड में। पहले इस
बात पे आ जाओ। यह क्या कहने की कोशिश कर
रहे हैं? डिग्री का मतलब क्या है?
बच्चे अगर मैं साधारण भाषा में आपको
समझाने की कोशिश करूं तो डिग्री की जो
डेफिनेशन बताई जा रही है वह बस इतना सा कह
रही है कि डिग्री का मतलब है जब भी कोई
कोर्ट ध्यान से सुनना जब भी कोई कोर्ट
किसी भी मुद्दे में किसी भी केस के अंदर
किसी भी कंट्रोवर्सी के अंदर
जो भी पार्टीज इनवॉल्वड है उसके सामने दो
पार्टीज हैं उनके उनके राइट्स को ध्यान से
सुनना। उनके राइट्स को उनके अधिकारों को
हर लड़ाई बच्चे है तो अधिकारों की ही
लड़ाई है। ठीक है? यहां पर सिविल नेचर है
उन अधिकारों का इसलिए हम सीपीसी के अंदर
पढ़ रहे हैं। तो जो पार्टीज है उनके
अधिकारों को कंक्लूसिवली डिटरमाइन करते
हैं। ये जो शब्द मैं बोल रहा हूं
कंक्लूसिवली
ये असल में असली पहचान है डिग्री की। मतलब
जो यह कोर्ट डिसाइड कर रहा है ना यह कोर्ट
जो डिटरमाइन कर रहा है ना यह किसी भी चीज
को कंक्लूसिवली डिसाइड कर रहा है।
कंक्लूसिवली मतलब वो जो भी फैसला ले रहा
है किसी भी पॉइंट के बारे में वो फैसला
उस चीज को पूरी तरीके से उसको खत्म करता
है। उस डिस्प्यूट को पूरी तरीके से खत्म
करता है। को पूरी तरीके से डिसाइड करता
है। उस पर पूरी तरीके से निर्णय देता है।
ऐसा नहीं है कि आज कुछ दे दिया कल को कुछ
और दे देगा। नहीं किसी भी पॉइंट को ध्यान
से सुनना इस बात को। किसी भी पॉइंट को
चाहे वो कितना ही छोटा पॉइंट क्यों ना हो।
किसी भी पॉइंट को जब वो कंक्लूसिवली
डिसाइड करता है, डिटरमाइन करता है,
निर्णायक रूप से डिटरमाइन करता है, उसको
हम बोलते हैं डिग्री।
अब यहां पर दिमाग में दो दो लेडर बनाओ। दो
कॉन्टेक्स्ट को बनाओ। पहला डिग्री का मतलब
है किसी भी चीज को, किसी भी पॉइंट को
कंक्लूसिवली डिटरमाइन करना। यह पहली बात।
पर इसका मतलब यह नहीं है कि जब पूरा केस
खत्म हो जाएगा,
जब पूरा केस कोर्ट डिसाइड कर रहा होगा
तभी डिग्री आएगी।
दो बातों में फर्क है। देखो मैं क्या कह
रहा हूं
बच्चे? किसी भी सिनेरियो में, किसी भी
स्थिति में जब कोर्ट के सामने कोई भी सवाल
उठते हैं, दो पार्टीज लड़ रही होती हैं तो
जरूरी नहीं है कि एक ही पॉइंट पे लड़ाई हो
रही हो। कई पॉइंट्स पे लड़ाई है। मानो तीन
तीन पॉइंट इनवर्ड है। पॉइंट नंबर वन,
पॉइंट नंबर टू, पॉइंट नंबर थ्री। आप में
से कुछ बच्चे हैं जिन्होंने मेरे साथ
जजमेंट राइटिंग की भी क्लासेस ली है। तो
उनको काफी इसकी एक्सपीरियंस हो गया है कि
कैसे हम लोग डिवाइड करते हैं इश्यूज को और
नॉर्मली आप जजमेंट भी पढ़ते हो कभी आप
देखते हो कि हर एक केस में कई सारे
पॉइंट्स इनवॉल्व होते हैं जिसको कोर्ट को
डिसाइड करना पड़ता है किसी भी सिचुएशन को
सॉल्व करने के लिए। ठीक है?
तो हमारा यह जो डेफिनेशन है डिग्री का वो
यह कह रहा है जब भी कोई कोर्ट किसी भी
पॉइंट को
जब भी कोई कोड किसी भी पॉइंट को
कंक्लूसिवली डिटरमाइन करता है
उसको हम डिग्री बोलते हैं। कहने का मतलब
है जहां तक उस पॉइंट की बात है जिसको वो
डिटरमाइन कर रहा है उसको तो कंक्लूसिवली
डिसाइड कर दिया। अब उसको दोबारा नहीं
देखेगा। उसकी बात खत्म। पर ये जरूरी नहीं
है। ये डिग्री तभी आएगी जब सारे के सारे
पॉइंट्स डिसाइड हो जाएंगे।
ऐसा बिल्कुल जरूरी नहीं। अगर एक पॉइंट पर
भी कंक्लूसिव डिसीजन आ गया है तो उसको
डिग्री बोल सकते हैं। दो पॉइंट पर आ गया
है उसको भी डिग्री बोल सकते हैं। और अगर
केस के सारे ही पॉइंट्स में आ गया है उसको
भी डिग्री बोल सकते हैं।
इसलिए डिग्री होने की पहचान ये नहीं है।
ध्यान से सुनना। बच्चे 90% बच्चे इस बात
को नहीं समझ पाते। डिग्री होने की पहचान
ये नहीं है कि किसी केस को पूरी तरीके से
डिसाइड कर दिया गया।
डिग्री होने की यह पहचान है कि किसी भी
पॉइंट को कंक्लूसिवली डिसाइड कर दिया जाए।
चाहे उसकी वजह से पूरा केस डिसाइड हुआ या
नहीं हुआ। और इसी बात की वजह से
ये दो शब्द निकल के आते हैं। दो प्रकार की
डिग्रियां निकल के आती है।
प्रीलिमिनरी डिग्री और फाइनल डिग्री।
दोनों डिग्रियां है।
प्रीिमरी भी डिग्री है, फाइनल भी डिग्री
है। पर फर्क क्या है? किसी भी डिग्री को
प्रीिमरी तब बोलते हैं जब वो किसी केस में
इनवॉल्वड किसी पॉइंट को तो डिसाइड करती
है।
पर अभी पूरा केस खत्म नहीं हुआ है। बाकी
पॉइंटों पर डिसीजन आना अभी भी बाकी है। तो
जब ऐसी स्थिति होती है कि कई सारे पॉइंट्स
इन्वॉल्व है। किसी एक को कंक्लूसली
डिटरमाइन कर रहा है कोर्ट।
ऐसी स्थिति को बोलते हैं कि वह एक
प्रीलिमिनरी डिग्री है।
पर जब कोर्ट किसी केस में इनवॉल्व सारे
पॉइंट्स को डिटरमाइन कर देता है
कंक्लूसिवली
तब आती है फाइनल डिग्री। तो ये दो प्रकार
हैं डिग्री के। दोनों ही डिक्री है। जो एक
पॉइंट पर आई थी वह भी डिक्री थी और जो
सारे पॉइंट्स पर आई है वो भी डिक्री है।
इसलिए क्राइटेरिया ये नहीं है कि केस पूरी
तरीके से डिसाइड हुआ या नहीं। क्राइटेरिया
ये है कि जो भी पॉइंट डिसाइड हुआ है वो
कंक्लूसिवली डिसाइड हुआ है या नहीं। अगर
कोई भी पॉइंट कंक्लूसिवली डिसाइड हुआ है।
भले ही पूरा केस डिसाइड ना हुआ हो
प्रीिलिमिनरी डिग्री। और अगर पॉइंट
कंक्लूसिवली डिसाइड भी हुए हैं और पूरा
केस भी डिस्पोज ऑफ हो गया है। फाइनल
यह है बच्चे हमारे जो डिक्री शब्द है उसकी
डेफिनेशन और उसके दो प्रकार। ठीक है? अभी
भी मैं समझ रहा हूं क्योंकि अभी शुरुआत
है। आप लोग नए हो सीपीसी के लिए तो काफी
चीजें अभी उतना कॉन्फिडेंस नहीं आ रहा
होगा। पर ये जो मैंने बातें बोली है जो
आपको दो दो एस्टेब्लिश क्राइटेरिया बताए
हैं क्या? किसी भी पॉइंट का कंक्लूसिवली
डिटरमाइन होना और उसके दो प्रकार सारे
पॉइंट्स का और केवल किसी इंडिविजुअल
पॉइंट्स का जिसकी वजह से प्रीिलिमरी और
फाइनल डिग्री का डिस्क्रिमिनेशन आता है।
इन बातों को अपने नोट्स में लिख लो। ये
चीज बार-बार आएगी। बार-बार आएगी। जब तक हम
कंप्लीट करेंगे ना सीपीसी कम से कम 100
बार तो ये चीज बार-बार उठेगी। ठीक है? समझ
में आ रहा है मोटा तौर। मतलब मैं जो बोल
रहा हूं वो आपको समझ में आ रहा है? यस बोल
देंगे बच्चे एक बार सभी लोग।
यस सर।
यस सर।
सर
यस सर।
बस इतना अपने अंदर स्टैंडर्ड रखो कि जो
मैं बोल रहा हूं उतना समझ में आना चाहिए।
उसके बियों्ड कुछ भी नहीं।
सर का और फाइनल का एक बार कंक्लूड कर दिया
डिफरेंस में। नहीं नहीं देखो वही इस इसी
बात पे मैं बार-बार आपको एम्फेसाइज कर रहा
हूं क्योंकि इसमें बहुत बच्चे गलती करते
हैं। देखो बच्चे डिग्री ये जो शब्द है
पहले शब्दों को तोड़ो। हम डेफिनेशन किसकी
पढ़ रहे हैं? डिग्री की। ठीक है? डिग्री
का मतलब होता है कि जब भी कोई जब भी कोर्ट
किसी भी पॉइंट को कंक्लूसिवली डिटरमाइन
करता है उसको हम डिग्री बोलते हैं। बात
खत्म। फिर आते हैं हम दूसरी बात पे कि
डिग्री जो है वो दो टाइप्स की होती है।
प्रीलिमरी फाइनल है दोनों ही डिग्री।
प्रीिलिमरी डिग्री वो होती है जब कोर्ट
किसी पॉइंट को कंक्लूसिवली डिटरमाइन करता
है। पर वो केवल किसी केस का कोई इनवॉल्वड
एक पॉइंट है। उसकी वजह से पूरा केस डिसाइड
नहीं हुआ। ठीक है? जब भी कोर्ट किसी एक
इंडिविजुअल पॉइंट को या कुछ पॉइंट्स को
डिसाइड कर रहा है पर पूरा केस डिसाइड नहीं
हो रहा है। उसको बोलते हैं प्रिलिमिनरी
डिग्री। पर जब कोर्ट सारे पॉइंट्स को
डिसाइड कर देता है कंक्लूसिवली उसको बोलते
हैं हम फाइनल डिग्री। तो ये टू डिफरेंट
टाइप्स है। एक है डिग्री होने का कांसेप्ट
एक है उसके दो प्रकार। इन दोनों को अलग
रखना अपने दिमाग के अंदर अपने नोट्स के
अंदर। क्लियर है?
यस सर।
सर एक ही केस में कई प्रीिलिमिनरी डिग्री
हो सकती है।
हां बिल्कुल हो सकती है। जितने भी
इन्वॉल्व हो फाइनल
फाइनली ओके सर।
फाइनल डिग्री एक होती है।
ठीक है जी बच्चे। सर ये सेक्शन वन में सर
ये क्लोज फोर था सर ये थोड़ा मतलब ईस्ट
गोदावरी वेस्ट गोदावरी लैंड वाला जो दिया
हुआ था
एक्सक्लूड कर दो देखो एक एक और मैं चीज
बता रहा हूं जो चीज मैं यहां पे नहीं करूं
ना कवर उसको अपने आप समझ जाया करो कि उसको
पढ़ना नहीं है।
ठीक है
जो दूसरी डेफिनेशन है जो हमारे लिए
महत्वपूर्ण है।
अच्छा अभी अभी डिग्री की डेफिनेशन बची हुई
है। तो यहां पर एक इंक्लूजन दिया हुआ है।
फिर से फिर से थोड़ी सी हमको यहां पर
समझदारी देनी पड़ेगी क्योंकि हमने अभी
सीपीसी पढ़ा नहीं और ये आगे आने वाली
बातों का जिक्र कर रहा है थोड़ा सा
इंक्लूजन। ठीक है? तो ध्यान से सुनिए। ये
जो डिग्री शब्द है उसमें हम इंक्लूड
करेंगे जब भी किसी प्लेेंट को
रिजेक्ट किया जाता है तब।
ठीक है? अभी ये देख रहे हो आप प्लेेंट
क्या होता है? रिजेक्शन क्या होता है? ये
सब चीजें हमने अभी पढ़ी नहीं है। ये तो
बल्कि अभी काफी आगे जाके आएंगी। या फिर
कोई भी क्वेश्चन जब डिटरमाइन होता है
सेक्शन 144 के अंदर देख रहे हो 144 दो
महीने लग जाएंगे पहुंचने में।
पर अब क्या करें? अब हमें पढ़नी तो है
डेफिनेशन। तो इसको कैसे समझेंगे? समझदारी
से समझेंगे। कैसे समझेंगे?
जो पहला पॉइंट है जो कह रहा है कि जब भी
कोई प्लेेंट रिजेक्ट होगा उसको भी डिग्री
मानेंगे। इसका सीधा सा मतलब है
कि जब भी मानो कोई व्यक्ति गया और किसी ने
केस फाइल किया। जब कोई व्यक्ति केस फाइल
करता है सिविल कोर्ट के अंदर बच्चे उसको
हम बोलते हैं प्लट।
जो वो ले जाता है कि साहब मेरे को यह
रिलीफ चाहिए आपसे।
उसको बोलते हैं प्लेंट। ठीक है? आपने बहुत
सुना होगा एक शब्द प्लेंटिफ। सिविल केसेस
में जो व्यक्ति रिलीफ मांग रहा होता है
उसको हम बोलते हैं प्लिंटिफ। तो उसी से
निकला है ये शब्द प्लिंट। जो रिलीफ मांग
रहा है वो कोर्ट के सामने लेके जाता है
अपनी गुहार को। तो कभी किसी भी वजह से अभी
हम रीजन की पीछे नहीं जाएंगे। जब भी कोर्ट
किसी भी वजह से किसी प्लेंट को रिजेक्ट कर
देता है मतलब किसी के केस की सुनवाई को
अस्वीकार कर देता है
उसको भी डिग्री ही माना जाता है।
ठीक है?
उसको भी डिग्री ही माना जाता है। क्योंकि
वही बात वही लॉजिक लगाओ। कोर्ट किसी भी
पॉइंट को कंक्लूसिवली डिटरमाइन कर रहा है।
तो जब भी कोर्ट ने किसी भी प्लेट को
रिजेक्ट किया होगा बच्चे कोई ना कोई तो
उसका आधार रहा होगा और एक कॉमन आधार ले लो
जो आमतौर पर बहुत चलता है लिमिटेशन का
कानून। अब हमारा लिमिटेशन एक्ट है वह कहता
है कि आपको कोर्ट से रिलीफ चाहिए तो सबके
लिए उसने टाइम लाइन बता दी है कि अगर ये
वाला रिलीफ चाहिए तो कम से कम तीन साल के
अंदर आओ। ये वाला चाहिए तो 12 साल के अंदर
आओ और अलग-अलग उन्होंने स्टैंडर्ड सेटल कर
रखे हैं। मानो लिमिटेशन की वजह से कोई
व्यक्ति समय के बाद आ रहा है। तो कोर्ट
किसी प्लेन को रिजेक्ट कर रहा है। फॉर
एग्जांपल हजारों रीजन हो सकते हैं किसी भी
प्लेन को रिजेक्ट होने के। पर एक एग्जांपल
ले लो।
तो उसको भी एक डिग्री ही माना जाता है।
ठीक है? क्योंकि जहां तक किसी भी केस की
एडमिसिबिलिटी की बात है
उसको वो कंक्लूसिवली डिटरमाइन कर रहा है।
और जैसा कि मैंने बोला किसी भी डिग्री
होने के लिए बिल्कुल भी जरूरी नहीं है कि
कोई पूरा का पूरे केस में सुनवाई हो गई हो
या किसी के किसी केस के फैक्ट्स के ही
बारे में वो पॉइंट होना चाहिए। बिल्कुल
जरूरी नहीं है।
बस एक सिंपल सी बात दिमाग में रखनी। जब भी
कोई कोर्ट किसी पॉइंट को कंक्लूसिवली
डिटरमाइन करता है, रिजेक्ट कर रहा है भाई।
कंक्लूसिवली डिटरमाइन कर रहा है। ऐसा तो
कह कह नहीं रहा होगा कि कल दोबारा आ जाना।
तो उसको भी डिग्री मानते हैं। ठीक है? तो
अपने नोट्स में लिख लो। रिजेक्शन ऑफ प्लेट
इज आल्सो
अ डिग्री। और फिर आ जाओ इस दूसरे पॉइंट
पर। अब यहां पर थोड़ा सा मैं आपको चाहूंगा
कि आप थोड़ा सा पेशेंस रखो क्योंकि ये जो
सेक्शन 144 है यह बहुत ही ज्यादा
स्पेसिफिक है। अभी इसमें हमको जाने की
जरूरत नहीं है। छोटा सेक्शन नहीं है। बड़ा
सेक्शन है। 111 लाइन का सेक्शन है।
यहां पर अभी अपने नोट्स में जैसे ही आपने
ये रिजेक्शन ऑफ प्लेेंट वाली बात लिखी उसी
के नीचे लिख दो कि सेक्शन 144 के अंदर जब
हम 144 पे पहुंचेंगे तो हम उसका
इंटररिलेशन समझ लेंगे। सेक्शन 144 के अंदर
जो भी डिटरमिनेशंस होंगे, डिटरमिनेशंस
होंगे मतलब जो भी चीज डिसाइड की जाएगी
उसको भी डिग्री ही कंसीडर किया जाएगा।
ठीक है? तो जहां तक डेफिनेशन की बात आप
देख रहे हो लेवल बाय लेवल जहां तक उसके
मीनिंग की बात है जब भी कोई पॉइंट
कंक्लूसिवली डिटरमाइन होता है उसको डिग्री
कहते हैं। फिर उसके टू टाइप्स की पार्ट आ
गई कि कोई सिंगल पॉइंट या कोई कुछ पॉइंट्स
डिटरमाइन हो रहे हैं तो वो प्रिलिमिनरी
डिग्री है। कोई केस पूरी तरीके से डिस्पोज
ऑफ हो रहा है तो वो फाइनल डिग्री है। फिर
आते हैं इंक्लूसिव कैटेगरीज कि कौन-कौन सी
चीजें स्पेसिफिकली इंक्लूड करी गई है।
जिसमें पहला हो गया कि कोई भी प्लेट जब
रिजेक्ट होता है वह एक डिग्री है और एक हो
गया 144 वाला। तो हमने तीन बातें पढ़ ली
डिक्री की डेफिनेशन और फिर आती है आखरी
बात और आखरी कैटेगरी है एक्सक्लूजंस की
क्या-क्या चीजें डिग्री की डेफिनेशन में
इंक्लूड नहीं होंगी।
ठीक है?
इसमें जो पहली कैटेगरी है
वह बताई जा रही है कि जब भी
कोई एडजुडिकेशन हुआ मतलब कोई भी निर्णय
लिया गया
जिसके अगेंस्ट अपील
फाइल की जा सकती है पर वो जो अपील है
ध्यान से सुनना ये बातें भी आपको आगे चलके
ही समझ में आएंगी पर कोशिश करो कि जितना
दिमाग में फिट हो पाए उतना अच्छा है
जब भी किसी भी बात पर निर्णय लिया लिया
गया है। किसी भी पॉइंट पे निर्णय लिया गया
है। पहली बात।
दूसरी बात उसके खिलाफ अपील फाइल की जा
सकती है। उस निर्णय के खिलाफ और तीसरी बात
वो जो अपील है जो फाइल की जा रही है उस
चीज के निर्णय के खिलाफ उसको जो हमारा
सीपीसी है अपील फ्रॉम डिग्री नहीं मानता
है।
बल्कि अपील फ्रॉम एन ऑर्डर मानता है।
क्या मानता है? अपील फ्रॉम एन ऑर्डर।
अब देखो एक और शब्द आपके सामने आ रहा है।
अगली डेफिनेशन भी इसी शब्द की है।
बच्चे सीपीसी के अंदर
जो भी ये कोर्ट की पूरी ये जो न्यायिक
प्रक्रिया है जिसमें वो डिसीजन सुना रहे
हैं। चीजों को डिसाइड कर रहे हैं। उनको
ब्रॉडली हमारे सीपीसी ने दो भागों में
बांटा है।
ठीक है?
कुछ कॉन्टेक्स्ट में उन डिसीजंस को उन
निर्णयों को हमारा सीपीसी डिग्री कहता है।
इसके कुछ फीचर्स होते हैं जो हम अभी पढ़
रहे हैं कि ऐसा होना चाहिए किसी पॉइंट को
कंक्लूसिवली डिटरमाइन किया होना चाहिए तो
वो डिग्री है। और जो भी चीजें डिग्री नहीं
कहलाई जा सकती
उनको ऑर्डर मानता है।
इन दो शब्दों में हमारा सीपीसी हमेशा
कोशिश करता है कि डिफरेंशिएट करें
और दोनों में अगर मैं आपको एक नॉर्मल भाषा
में समझाने की कोशिश करूं फर्क क्या है?
डिग्री में फाइनलिटी होती है। फाइनलिटी
मतलब एक ऐसी स्थिति होती है जहां पर किसी
पॉइंट को डिसाइड कर दिया गया। बात खत्म।
याद है ना? कंक्लूसिवली डिटरमाइन करना।
ऑर्डर के अंदर
किसी पॉइंट को डिसाइड तो किया गया है।
निर्णय तो आया है पर उसके पास
वो फाइनलिटी नहीं है जो एक डिग्री के पास
है। वो कंक्लूसिवनेस नहीं है। उसमें बदलाव
हो सकते हैं। उसको बदला जा सकता है।
तो असल में
जो लिटरल डिफरेंस है जो लॉजिकल डिफरेंस है
किसी भी डिग्री होने में किसी भी ऑर्डर
होने में वो उनके नेचर पे ही आधारित है।
डिग्री में थोड़ा सा प्रभाव ज्यादा होता
है। कंक्लूसिवनेस ज्यादा होती है। ऑर्डर
में कंपैरेटिवली कम होती है।
ठीक है? तो यह वाला जो एक्सक्लूजन है पहला
वाला वो इसी डिस्क्रिमिनेशन को इसी
डिस्टिंग को टैप कर रहा है और बोल रहा है
कि जब भी हमारा सीपीसी
किसी भी निर्णय के खिलाफ
अपील का प्रावधान कर रहा है और उसको अपील
फ्रॉम ऑर्डर मान रहा है ना कि अपील फ्रॉम
डिग्री तो वो जो चीज है जिससे अपील आ रही
है उसको हम डिग्री कंसीडर नहीं कर सकते।
अब आप देख रहे हो कितनी घुमा फिरा के बात
बोली जा रही है। और कितनी लॉजिकल बात है।
सीधी सी बात है। जब सीपीसी ही उसको खुद ही
अपील फ्रॉम एन ऑर्डर मान रहा है और मैंने
अभी आपको बताया कि सीपीसी फर्क करता है
डिग्री में और ऑर्डर में तो उसको क्यों
मानेंगे भाई डिग्री? क्यों मानेंगे?
जब आपका सीपीसी ही उसको ऑर्डर मान रहा है
तो क्यों मानेंगे डिग्री? तो पहला
एक्सक्लूजन ये हो गया। बस वही है। किसी भी
चीज को कॉम्प्लिकेटेड तरीके से कैसे लिखा
जाए वो काम यहां पर किया गया है। तो कहने
की बात क्या है? एक लाइन जब भी किसी
निर्णय के खिलाफ अपील फाइल की जा सकती है
और उसको अपील फ्रॉम ऑर्डर मानता है हमारा
सीपीसी
उसको डिग्री नहीं कंसीडर किया जा सकता। और
दूसरी कैटेगरी कौन सी है जो डिग्री की
डेफिनेशन में बिल्कुल नहीं आएगी। वह भी
आर्डर है। यह क्या कौन सा आर्डर है? ऐसा
ऑर्डर
जिसके तहत डिसमिस किया जा रहा है।
ध्यान से सुनना बच्चे।
एक ऐसा ऑर्डर
जो जिसके अंदर डिसमिस किया जा रहा है किसी
भी सूट को।
पर यहां पर जो वजह है डिसमिस करने की वह
डिफॉल्ट है। डिफॉल्ट है।
अब यहां पर थोड़ा सा आपको सावधानी देनी
पड़ेगी। इसका जो संबंध है इस बी पॉइंट का
इस पहले वाले पॉइंट से है। जहां पर हमने
पढ़ा था कि जब भी कोर्ट किसी भी प्लेन को
रिजेक्ट कर देगा उसको हम डिग्री मानेंगे।
उसका ऑोजिट यह है कि जब भी कोर्ट किसी
प्लेेंट को डिसमिस कर देगा, किसी भी केस
को डिसमिस कर देगा, उसको हम डिग्री नहीं
मानेंगे। दोनों में फर्क क्या है?
बच्चे जब भी कोर्ट किसी प्लेंट को रिजेक्ट
करता है उसका मतलब यह होता है कि केस फाइल
किया गया कोर्ट के सामने और उसमें कोई
ऐसी कमी थी जिसकी वजह से कोर्ट को कोर्ट
के पास आधार ही नहीं रहा कि वो उस केस की
सुनवाई करे। जैसे कि लिमिटेशन एक एग्जांपल
हो गया। समय निकल चुका है। कोर्ट को नहीं
लग रहा कि माफी करनी चाहिए देरी को तो वो
मना कर देगा। रिजेक्ट कर देगा।
पर मानिए कोई प्लेट फाइल की गई
उसमें कानूनी परेशानी कोई भी नहीं है। सब
कुछ ठीक है। पर उसके अंदर कोई गलती हो गई
है। कोई डिफॉल्ट हो गया है। किसी को
पार्टी बनाना था। किसी को पार्टी नहीं
बनाया। कुछ गलत लिख गया है। कुछ ऊंचनीच हो
गई है। या फिर कोर्ट फी इतनी लगानी थी,
उतनी लगानी थी, कम ज्यादा हो गई है वो। आप
देख रहे हो परेशानी यहां पर भी है किसी भी
प्लेट के साथ पर वो कोई फंडामेंटल परेशानी
नहीं है कि जिसकी वजह से कोर्ट उसको
सुनवाई ना कर पाए। परेशानी ऐसी है जिसको
ठीक किया जा सकता है। तो यहां पर कोर्ट
उसको मना तो कर रहा है, डिसमिस तो कर रहा
है पर डिसमिस करने का आधार यह नहीं है कि
मैं कानूनी तौर पर इस केस को सुन ही नहीं
सकता क्योंकि इसमें यह परेशानी है वो
परेशानी है।
आधार यह है कि उसके अंदर कोई कमी है। कोई
डिफॉल्ट है।
तो यह जो कोर्ट बोलता है कि आपके इस
प्लेेंट में कोई डिफॉल्ट है, कोई परेशानी
है, इसको हम बोलते हैं ऑर्डर जारी करना
डिसमिसल का। जैसा कि शब्द खुद में बोल रहा
है कि वो एक ऑर्डर है। मतलब आप अपनी
परेशानी को ठीक कर लो। जिस भी परेशानी की
वजह से वो डिसमिस हुआ है आपका सूट। उसको
दोबारा कोर्ट के सामने पेश कर दो। तो आप
देख रहे हो निर्णय लिया कानून ने कोर्ट ने
निर्णय लिया पर उसमें कंक्लूसिव नेचर नहीं
है। आप बदलाव कर रहे हो, सुधार कर रहे हो,
कोर्ट के सामने जा रहे हो कि भाई आपने जिस
डिफॉल्ट की वजह से मेरा डिसमिस किया था अब
मैंने ठीक कर दिया।
ठीक है? तो ये जो डिफरशिएशन है हमको दिमाग
में रखना है। जब किसी प्लेट का रिजेक्शन
होता है तो उसको डिग्री मानते हैं। जब
किसी को डिसमिस किया जाता है किसी सूट को
किसी डिफॉल्ट की वजह से, किसी कमी की वजह
से, किसी चूक की वजह से, उसको हम ऑर्डर
बोलते हैं। उसको डिग्री की डेफिनेशन में
नहीं डालेंगे। ठीक है? तो ये तीन बातें हो
गई। और इसके बाद क्या आती है?
जो यह हमने डिस्टिंशन समझा कि एक
प्रीिलिमरी डिग्री होती है, एक फाइनल
डिग्री होती है। उसके बारे में ये आखिरी
भाग है। ये कहता है कि कोई भी डिग्री
ध्यान से देखिएगा। कोई भी डिग्री
प्रिलिमिनरी तब कहलाती है जब उसके बाद भी
फदर प्रोसीडिंग्स होनी है कोर्ट के सामने।
उस उस केस को उस सूट को डिसाइड करने के
लिए।
वही बात कई सारे पॉइंट्स इन्वॉल्व है।
आपने एक को डिसाइड कर दिया, दो को डिसाइड
कर दिया। अभी बाकी के बचे हुए हैं उनका भी
डिसीजन होना है। जब सारे डिसाइड हो जाएंगे
तभी केस डिसाइड हो पाएगा। तो ऐसी स्थिति
कौन सी है? प्रीिलिमरी डिग्री जैसा कि
मैंने आपको बताया। और फाइनल डिग्री कौन सी
होती है? उसकी जस्ट अपोजिट। जब कोर्ट
कंप्लीटली डिस्पोज कर देता है जो भी पॉइंट
इनवॉल्व थे कोर्ट के सामने उन सब पर एक
अपना डिसीजन दे देता है निर्णय दे देता है
कंक्लूजन तब हम बोलते हैं कि फाइनल डिग्री
आ गई है ठीक है तो ये तो हो गया हमारा
प्रीलिमरी और फाइनल डिग्री में डिस्टिंशन
ठीक है तो जहां तक बात डेफिनेशन की है
जहां तक बात डिग्री की डेफिनेशन की है
आपको बस कुछ बातें याद रखनी है बिल्कुल भी
जरूरी नहीं है। मैं आपको फिर से बोल रहा
हूं। स्मार्ट प्ले करना पड़ेगा। आपको
एग्जाम क्रैक करना है। बेवकूफों की तरह हर
चीज रटते मत रह जाना। समझना है और स्मार्ट
प्ले करना है। टोटल चार या पांच बातें
हैं। उससे ज्यादा नहीं है। उनको क्रॉस चेक
कर लो दिमाग में और नोट्स में। अगर इतना
लिख लिया है, इतना समझ लिया है, यू आर वेल
वेल एंड गुड टू गो। पहला पॉइंट डिक्री का
मतलब होता है जब भी कोई कोर्ट किसी भी
पॉइंट को कंक्लूसिवली
स्पेसिफिक वर्ड्स कंक्लूसिवली डिटरमाइन
करता है। पहली बात डिग्री दो प्रकार की
होती है। प्रिलिमिनरी डिग्री और फाइनल
डिग्री। ठीक है? डिग्री की डेफिनेशन में
वह स्थिति भी गिरती है जब कोर्ट किसी
प्लेट को रिजेक्ट करता है। डिग्री की
डेफिनेशन में वह स्थिति भी गिरती है जब
कोर्ट 100 सेक्शन 144 के अंदर एडजुडिकेट
करता है। वो मैं आपको बता दूंगा जब हम 144
पर पहुंचेंगे।
डिग्री की डेफिनेशन में दो चीजें नहीं
गिरती है। पहले याद करना है ऑर्डर और
डिग्री का डिमार्केशन। कोई भी एक ऐसा
डिसीजन जिसके खिलाफ जो अपील फाइल की जा
रही है वो एस अपील फ्रॉम एन ऑर्डर फाइल
करी जा रही है। जो सीपीसी है उसको ऑर्डर
के खिलाफ अपील मान रहा है वो डिग्री की
डेफिनेशन में नहीं गिरेगा। ठीक है? और एक
ऐसा ऑर्डर जिससे किसी सूट को डिसमिस किया
गया है डिफॉल्ट की वजह से।
ठीक है? उसको ऑर्डर माना जाएगा डिग्री
नहीं माना जाएगा। छह पॉइंट हो गए। और
आखिरी सातवा पॉइंट है प्रीिलिमिनरी और
फाइनल डिग्री का डेफिनेशन। जब भी कोर्ट के
सामने किसी पॉइंट को डिटरमाइन करने के बाद
भी कुछ पॉइंट्स बचते हैं उस केस को फाइनली
डिसाइड करने के लिए ऐसी डिग्री को हम
प्रिलिमिनरी डिग्री बोलते हैं। और जब भी
कोर्ट सारे पॉइंट्स को डिटरमाइन कर देता
है कंक्लूसिवली उसको हम बोलते हैं फाइनल
डिग्री। तो दीज़ आर दी सेवन पॉइंट्स जो
यहां भी फिट हो जाने चाहिए और पेपर पे भी।
क्या सभी के हो गए? यस बोल दो फटाफट से
क्लियर है
यस सर
सरस
यस सर
सर अपील फ्रॉम एन आर्डर थोड़ा एक बार और
क्लियर कर दीजिए
अपील फ्रॉम एन आर्डर मतलब सीपीसी का कानून
उस डिसीजन के खिलाफ जो अपील फाइल की जा
रही है उसको अपील फ्रॉम ऑर्डर मानता है।
ऐसी जब भी स्थिति होगी उसको हम डिग्री
नहीं मानेंगे। देखो बच्चे सीपीसी के अंदर
ये डिमार्केशन बार-बार चलेगा और उसने
दोनों के बारे में अलग-अलग कानून बनाए
हैं। कब ऑर्डर के खिलाफ अपील फाइल कर करी
जा सकती है। कब डिग्री के खिलाफ अपील फाइल
की जा सकती है और सब पूरा पूरा स्ट्रक्चर
अलग-अलग है। अगर सीपीसी ही उसको आर्डर के
खिलाफ अपील मान रहा है तो उसको डिग्री
नहीं मान सकते। बस इतनी सी बात है। ठीक
है।
ओके सर।
सर वो डिफॉल्ट का एक एग्जांपल देंगे।
डिफॉल्ट का बच्चे देखो आपको देखो एग्जांपल
से ज्यादा महत्वपूर्ण है आपके दिमाग में
कि मानो आप उस गद्दी पर बैठे हो आपके
सामने कोई केस आया कोई प्लेंट आपके सामने
फाइल हुई है। अब अगर उस प्लेेंट में जो
परेशानी है जो दिक्कत है वो ऐसी दिक्कत है
जिसकी वजह से आप उस पॉइंट को उस केस को
डिटरमाइन नहीं कर सकते हो। उसमें कानूनी
वाध्यता है, लीगल प्रॉब्लम है तो आप उस
प्लेेंट को क्या कर देते हो? रिजेक्ट कर
देते हो। और जब आप प्लेेंट को रिजेक्ट
करते हो तो वही वाली बात आ जाती है कि
किसी भी पॉइंट को जिस भी आधार पे आपने
उसको रिजेक्ट किया होगा उस पॉइंट को आपने
कंक्लूसिवली डिटरमाइन कर दिया है। जैसे
लिमिटेशन का एक एग्जांपल पर वही कोई
प्लेंट फाइल हुई, कोई केस फाइल हुआ। उसमें
कोई परेशानी, कोई डिफॉल्ट है, कोई गलती
है, कोई चूक है। एक ऐसी चूक, एक ऐसी गलती
जिसमें सुधार किया जा सकता है। जिसको ठीक
किया जा सकता है। जैसे कोर्ट फी कोर्ट फी
पी पे करनी थी। आप केस फाइल कर रहे थे।
सही से कैलकुलेट नहीं कर पाए। वकील साहब
ने गलती कर दी। कम लग गई, ज्यादा लग गई जो
भी हजार सिनेरियोस हो सकते हैं। तो ये एक
ऐसी चीज है जिसको कंपनसेट करा जा सकता है।
और कोर्ट फीट लो कोर्ट को दे दो। नए
प्लेंट के साथ बात खत्म। तो कभी भी जब
डिफॉल्ट की वजह से सूट डिसमिस हो रहा है,
किसी चूक की वजह से सूट डिसमिस हो रहा है
ना कि ना कि कानूनी प्रक्रिया की वजह से
ऐसी स्थिति को हम ऑर्डर मानते हैं ना कि
डिग्री क्योंकि बच्चे किसी पॉइंट को
कंक्लूसिवली डिटरमाइन तो कर नहीं रहे। कोई
कमी है हम कह रहे हैं इसमें कमी है भैया
ठीक करो।
ठीक है ना? क्लियर है?
जी सर।
सर
हां जी। सर जुरिसडिक्शन की वजह से जो
डिफॉल्ट हुआ है उसको क्या? ऑर्डर बोलेंगे
या डिग्री
आप बताओ
सर ऑर्डर ही होना चाहिए सर ऑर्डर ही होना
चाहिए सर हम देखो दो चीजें हैं यहां पर
सीपीसी इसके बारे में वही बहुत डिटेल्ड
प्रक्रिया करता है तभी मैं थोड़ा सा बच
रहा हूं इस सवालों से देखो जुरिसडिक्शन का
क्वेश्चन बहुत ही महत्वपूर्ण क्वेश्चन
होता है। आप सही जुरिडिक्शन में अपना सूट
फाइल करो वो बहुत ही जरूरी होता है। पर जब
भी किसी कोर्ट के सामने सूट आता है कोई
जिसके जिसके ऊपर उसका जुरिसडिक्शन नहीं
बनता है वहां पर कोर्ट को भी कुछ
जिम्मेदारियां बताई ही गई है। कोर्ट के
पास भी कई ऐसी परिस्थितियों में ये पावर
है कि वो खुद से उस केस को ट्रांसफर कर
सकता है ऐसे कोर्ट में जहां पर
जुरिसडिक्शन बनता है। तो इन पॉइंट्स का
बहुत क्लियर आंसर देना इज नॉट इज नॉट दी
वे टू गो फॉर क्योंकि बहुत डिटेल्ड
प्रोविजंस है। हां जो आप समझ रहे हो कि एक
ऐसी स्थिति है जिसमें उसमें कोई कानूनी
वाध्यता नहीं है। वो बस एक गलती है जिसको
सुधारा जा सकता है।
कोर्ट ये बोल सकता है कि भ आप इस प्लेंट
को दूसरी कोर्ट में लगा।
बिल्कुल बिल्कुल क्योंकि किसी पॉइंट को
कंक्लूसिवली वो वाली चीज नहीं आ रही। कोई
लागू कानूनी बाध्यता नहीं आ रही।
थैंक यू सर।
हां हां जी।
सर शंकर चंद्रकांत का केस था सर 995 का।
उसमें कहा है कि मोर देन टू फाइनल डिग्री
आ सकती है।
मोर देन
अभी केसेस पर आएंगे बच्चे। अभी तो पहली
क्लास है। डेफिनेशन पढ़ रहे हैं। करेक्ट
ये जो मैं बातें बोल रहा हूं उतना ही समझ
में आना चाहिए। अभी आपको एक सेकंड रुक
जाओ। बच्ची कौन बीच में बोलने की कोशिश कर
रही है बार-बार?
सर मेरा क्वेश्चन था कि ऐसा भी कभी
सिचुएशन होती है कि कंक्लूसिवली डिटरमाइन
नहीं कर रहा हो कोई केस। कोर्ट।
हम कंक्लूसिवली डिटरमाइन नहीं कर रहा हो
केस को।
सर मतलब आपने बोला कि किसी किसी जो ऑर्डर
पास हो रहा है या डिग्री डिग्री को
कंक्लूसिवली डिटरमाइनिंग होना चाहिए तो
ऐसी भी कोई सिचुएशन होती है जब कोर्ट के
पास ऐसा कुछ इंटेंशन हो कि मैं
कंक्लूसिवली डिटरमाइन नहीं कर रहे हैं
तो तो केस पेंडिंग बना रहेगा कैसे डिस्पोज
ऑफ तो करना पड़ेगा ना ऊपर से डंडा रहता है
केस क्यों नहीं डिसाइड कर रहे हो आप कभी
तो करोगे
यस सर
है ना जब भी किसी एक पॉइंट को डिसाइड
करोगे पूरे केस को डिसाइड नहीं करोगे
प्रीमियर डिग्री हो जाएगी पर कभी तो एक
साल बाद दो साल बाद तीन साल बाद कभी तो
उसको करना पड़ेगा ना डिटरमाइन जब भी करोगे
आप डिक्री दोगे इधर या उधर इन व्हाटएवर
सेंस कभी तो कंक्लूसिवली डिटरमाइन करोगे
यस सर
ठीक है
सर
सर ये पार्टली फाइनल क्या होता है
हां ये ये एक एक चीज है जो हमको मैं आपको
समझाऊंगा क्योंकि इसमें थोड़ा सा हमको
समझदारी का लेवल थोड़ा सा डेवलप करना
पड़ेगा। तो अभी मैं इसको नहीं उसमें नहीं
जाना चाह रहा क्योंकि उसमें थोड़ी सी अभी
टेक्निकिटी है। आई विल कम टू दैट।
ओके सर।
सर
सर
सर
हां हां हां बच्चे
सर अगर हम डिग्री और ऑर्डर में हम
डिफरेंशिएट करना चाहे तो बस हमें इतना ही
हमें ध्यान रखना होगा कि मतलब ऑर्डर में
हम किसी भी मॉडिफिकेशंस के बाद हम उसे
दोबारा रिप्रेजेंट कर सकते हैं। बट डिग्री
कैन नॉट बी रिप्रेजेंटेड। देखो डिग्री और
जो आपका ऑर्डर है उसमें जहां तक लीगल
डिफरशिएशन की बात है बहुत डिफरेंस होते
हैं। पांच छ सात पॉइंट्स तक बना देते हैं
लोग बुक्स में आप गूगल गूगल पर सर्च करोगे
और ऑनेस्टली वो सारे डिफरेंसेस है। बट हां
क्योंकि दिस इस द वेरी फर्स्ट क्लास। तो
जो सबसे सबसे फंडामेंटल डिफरेंस है एक
डिग्री होने में और एक ऑर्डर होने में जो
उनकी डेफिनेशन से दिखता है हमें अपना कुछ
बहुत ज्यादा उसमें रॉकेट साइंस नहीं लगाना
वो यही बात है जो फाइनल का नेचर है ना
डिग्री का वो उसको बहुत आगे ले जाता है
ऑर्डर से कंपेरेटिवली पर बाकी की भी चीजें
हैं जो आगे आएंगी बाकी और भी डिफरेंसेस
सर जी बी वाला सर जी बी वाला समझा दीजिए
जिसमें लिखा है व्यतिक्रम के लिए खारिज
करने का कोई आदेश आएगा सर सर
में लिखा है कौन सा बी वाला बचे जिसमें
डिग्री नहीं मानी जाएगी हां ये वाला तो
अभी तो इसी को तो एक्सप्लेन कर रहा हूं
मैं तब से कि डिसमिसल कर रहे हो आप किसी
प्लेेंट को डिफॉल्ट की वजह से उसमें कोई
कमी है कोई दिक्कत है कोई परेशानी है उसको
आप डिसमिस कर रहे हो तो ऐसी को हम ऑर्डर
बोलते हैं ना कि डिग्री इसका संबंध इस
वाले बॉक्स से है ये वाला जो रिजेक्शन
वाली बात है जिसको हम डिग्री मान रहे हैं
और यह वाली एक बात है जिसमें डिफ़ॉल्ट की
वजह से उसको ऑर्डर पार है। डायरेक्टली
रिलेटेड है।
ओके सर।
ठीक है। चलो आगे बढ़ो। अभी देखो ये अब देख
रहे हो आप हमारा एक एक बिल्कुल फंडामेंटल
बेसिस पे कॉनसेप्चुअल क्लेरिटी धीरे-धीरे
ये बढ़ती जाएगी। बढ़ती जाएगी। क्योंकि अब
देखो अभी जिस बातों को हम डिस्कस कर रहे
हैं, जिस पे हमारे सवाल जवाब हो रहे हैं।
देखो वही बात आ गई। आ गया ऑर्डर है ना? तो
जहां तक बात ऑर्डर की है,
ऑर्डर को कैसे डिफाइन कर रहा है हमारा
सीपीसी? ऑर्डर में भी वही शब्द इस्तेमाल
हो रहा है। ऑर्डर क्या है? ऑर्डर भी
फॉर्मल एक्सप्रेशन है और इसमें भी डिसीजन
दिया जा रहा है
और सिविल कोर्ट दे रहा है सीपीसी है। तो
इसको तो हमको बहुत ज्यादा भाव नहीं देना
है। पर फॉरल फॉर्मल एक्सप्रेशन है किसी भी
डिसीजन का। पर आर्डर को कैसे डिफाइन किया
जा रहा है कि हर एक वो डिसीजन
एक सिविल कोर्ट का जो डिग्री नहीं है
वो ऑर्डर
ये वही बच्ची जो पूछ रही थी ना सर ऑर्डर
और डिग्री में क्या डिफरेंस
ऑर्डर हर वो चीज है हर वो डिसीजन जब भी
कोर्ट किसी भी पॉइंट पर कोई भी निर्णय
देता है
अगर वो डिग्री की डेफिनेशन में नहीं गिर
रहा और डिग्री की डेफिनेशन क्या है? जो
अभी हमने पढ़े सात पॉइंट्स जिसमें आखरी के
तीन तो इंपॉर्टेंट नहीं है कि आखरी में
प्रिलिमिनरी और उसमें फर्क बता रहे हैं।
जो आपका पांचवा और छठवा था उसमें
एक्सक्लूजन है जो शुरू के चार थे।
क्या-क्या चीजें डिग्री की डेफिनेशन में
गिर रही थी। जब भी किसी भी पॉइंट को
कंक्लूसिवली डिटरमाइन कर रहे थे। प्ले का
रिजेक्शन 144 वाली बात तो जो भी डिसीजन
ध्यान से सुनना इस बात को।
जो भी डिसीजन जो भी निर्णय किसी भी कोर्ट
का डिग्री नहीं माना जा सकता उसको ऑर्डर
मानते हैं। तो कहने का मतलब क्या है? पहली
चीज सबसे महत्वपूर्ण बात कोर्ट ने जितने
भी डिसीजंस हैं सिविल सीपीसी ने जितने भी
डिसीजंस हैं कोर्ट के उनको दो कैटेगरी में
बांटा है। कितने में? दो में। जिसमें छोटी
कैटेगरी एक्सक्लूसिव कैटेगरी है डिग्री
की। क्योंकि डिग्री की जो कैटेगरी है वह
बंधी हुई है अपनी डेफिनेशन से। केवल वही
चीजें जो उस डेफिनेशन को सेटिसफाई करेंगी
वही डिग्री कहलाएंगी।
कंक्लूसिवली डिटरमाइन करना चाहिए डिग्री
के लिए। और जो बाकी के सारे के सारे
डिसीजंस होंगे जो डिग्री की डेफिनेशन में
नहीं गिर पा रहे क्योंकि वो कंक्लूसिवली
डिटरमाइन नहीं कर रहे। इसको खटखटाओ।
वो सारे के सारे डिसीजंस जो किसी भी पॉइंट
को कंक्लूसिवली डिटरमाइन नहीं कर रहे वो
सारे ऑर्डर्स हो जाएंगे। खत्म। कितना
सिंपल है। ठीक है? क्लियर है? ऑर्डर की
डेफिनेशन समझ में आ गई है बच्चे? यस बोल
दो एक बार सभी लोग।
यस सर।
ठीक है।
कोई सर कोई एग्जांपल जो कंक्लूसिव प्रूफ
की डेफिनेशन में ना आए।
हां। देखो एग्जांपल्स अभी मैं दूंगा भी तो
समझ नहीं आएंगे क्योंकि हम लोग अभी उस पे
सिविल प्रक्रिया में ज्यादा हद तक आगे बढ़े
नहीं है। बस आप अपने दिमाग को यह समझाने
की कोशिश करो। ठीक है? और वो क्या पॉइंट
है कि जब भी कोर्ट जो है किसी भी चीज को
इस तरीके से डिसाइड कर रहा है कि जहां तक
इस चीज का सवाल है उस पे उसने डिसीजन दे
दिया। अब उस पे वो चर्चा करने नहीं वाला
है। उसको वो डिस्कस करने नहीं वाला है। वो
पॉइंट हो गया उसका डिसाइड। कंक्लूसिवली
डिटरमाइन कर दिया उसने उस चीज को। यह
स्थिति किधर की तरफ जाएगी? डिग्री की तरफ।
और जब भी कोई कोर्ट डिसीजन तो ले रहा है
यहां पर ऑर्डर में भी डिसीजन है पर वहां
पर वो कंक्लूसिविटी नहीं है। कोर्ट उस उस
अपने डिसीजन को वो वैल्यू नहीं दे रहा। वो
पावर नहीं दे रहा जिससे ये लगे कि उस उस
पॉइंट का जहां तक सवाल है उससे उसने अपना
दिमाग हटा लिया। उस चीज को उसने डिसाइड कर
लिया है। ये स्थिति ऑर्डर में आ रही है।
ठीक है? इस इस बात को समझो। अगर इतना समझ
में आ रहा है उतना काफी है। ठीक है
सर एक डिफरेंस और कंक्लूड जो कर सकते हैं
वो होगा कि डिग्री में राइट ऑफ पार्टीज को
डिटरमाइन करते हैं एंड ऑर्डर में नहीं
करते।
सो ये राइट ऑफ पार्टीज एक्सक्टली है क्या?
हां ये ये देखो ये एक ऐसा सवाल है जो
डायरेक्टली व्हाट हैज़ बीन रिटेन इन दी
डेफिनेशन ओनली वहां से निकल के आ रहा है
कि ये राइट ऑफ पार्टीज क्या है? देखो जिस
तरीके से मैं इसको समझता हूं और मैं चाहता
हूं कि आप भी उसको उसी तरीके से समझो।
देखो कोई भी जब कोई भी प्रोसीडिंग्स हो
ठीक है
वहां पर जो भी स्थिति बनती है चाहे कोई भी
नेचर हो उसका चाहे प्रॉपर्टी का डिस्प्यूट
हो चाहे फैमिली का डिस्प्यूट हो या जो भी
चीजें सिविल सिविल प्रोसीडिंग्स की
कैटेगरी में गिर सकती है काफी ब्रॉड है ये
हर एक स्थिति में आप उस उस फैक्ट्स को
एनालाइज करो
ओवर दी एंड आप एक ही चीज पाओगे
कि यह जो दो पार्टियां आपस में एक दूसरे
से लड़ रही हैं प्लेंटिफ डिफेंडेंट यह जो
बहसबाजी चल रही है सालों से
यह इन लोगों को अपना अधिकार साबित करने के
ही पीछे पूरा झगड़ा है। एक व्यक्ति कह रहा
है कि मेरा अधिकार है। एक व्यक्ति कह रहा
है कि आपका अधिकार नहीं है। मेरा अधिकार
है। फॉर एग्जांपल किसी प्रॉपर्टी का
डिस्प्यूट ले। एक कह रहा है मेरी लैंड है।
दूसरा कह रहा है मेरी लैंड है। जब कह रहा
है कि ये विल नकली है तो क्या कहना चाह
रहा है? क्योंकि यह विल नकली है। आपकी
लैंड नहीं है। आपका राइट नहीं है। तो इन
इन एसेंस एव्री केस एव्री प्रोसीडिंग्स
इज अबाउट दी फाइट्स ओवर दी राइट्स कि
पार्टीज के राइट्स एस्टेब्लिश होने चाहिए
किसी भी केस के अंदर। अब ये डिमार्केशन
कहां से आ रहा है कि डिग्री में लिखा हुआ
है स्पेसिफिकली कि पार्टीज के राइट्स को
डिटरमाइन हो रहे हैं। बच्चे वो एसेंशियल
है, लॉजिकल है। जब हर केस ही
पार्टीज के राइट्स के बारे में है तो उस
पर डिसीजन दोगे आप कुछ तो बोलोगे यह विल
है असली है या नकली है दोनों में से कुछ
भी बोलो आप पार्टीज के राइट को ही
डिटरमाइन कर रहे हो इन द एंड ठीक है चाहे
इसके चाहे उसके पहली चीज दूसरी चीज ऑर्डर
में ये बात मिसिंग क्यों है इसकी एक वजह
तो ये है कि ऑर्डर जो है मैंने जैसे कि
बोला बहुत ब्रॉडर टर्म है क्योंकि इसके
अंदर अंदर वो कंक्लूसिविटी नहीं है। ऑर्डर
एक ऐसी चीज है जब भी कोई भी कोर्ट किसी भी
पॉइंट पर डिसीजन लेता है। ठीक है? किसी भी
चीज के बारे में डिसीजन ले रहा है। वो
जरूरी नहीं है सीधे तौर पर किसी चीज को
डिसाइड कर रहा हो कि ये विल असली है या
नकली।
किसी भी छोटी सी जुड़े हुए पॉइंट पे भी एक
डिसीजन दे रहा है। जो पूरी तरीके से उसको
कंक्लूसिवली डिटरमाइन नहीं कर रहा चीज को।
वो भी ऑर्डर की डेफिनेशन में गिर सकता है।
तो ऑर्डर में भी कई बार ऐसा होगा कि
राइट्स इन्वॉल्वड होंगे। बिकॉज़ दैट इज
वेरी लॉजिकल। क्योंकि हर केस में बहुत
सारे राइट्स का ही क्लैश होता है। बट
ऑर्डर के सिनेरियो में इट इज नॉट नेसेसरी
बिकॉज़ मेनी टाइम्स देयर आर ऑर्डर्स फ्रॉम
द कोर्ट। कई बार कोर्ट ऐसे ऑर्डर्स भी
देता है जो सीधे तरीके से किसी भी पार्टी
के राइट्स को हिट नहीं करते हैं। बट दे आर
क्रूशियल। दे प्ले प्ले अ क्रूशियल रोल इन
अ केस। ठीक है
सर। हां जी बच्चे
सर जैसे ऑर्डर ऑर्डर क्या बोल जो डिग्री
है सर वो राइट क्रिएट कर रहा है सर ठीक है
सर डिटरमाइन कर रहा है क्रिएट थोड़ी
डिटरमाइन कर रहा है राइट को
तो सर लायबिलिटी भी होगा वहां पे
क्या होगा
लायबिलिटी भी डिटरमिनेशन हो रहा होगा अगले
पार्टी के लिए
राइट और लायबिलिटी और लायबिलिटी क्या आप
ये सोचो कि राइट का जो भी आप अपोजिट
कॉन्टेक्स्ट समझना चाहते हो जैसे मैं आपको
प्रैक्टिकल लाइफ में बताऊ नुकसान एक ऐसी
चीज है एक का फायदा दूसरे का नुकसान जब एक
का अधिकार स्वीकार कर रहे हो तो दूसरे का
अधिकार अस्वीकार कर रहे हो दैट मींस उसका
नुकसान हो रहा है तो ऑब्वियसली अगर एक को
बेनिफिट होगा तो दूसरे को कॉन्सिक्वेंस
होगा एंड दैट इज समथिंग वो हमेशा हैंड इन
हैंड ही जाएंगे अब वो जरिसेंस में बोलते
है ना क्या बोलता है वो जरिडिकल
कोरिलेटिव
हां कोरिलेटिव
पर क्या होता है बच्चे राइट का लायबिलिटी
होता है
सर राइट का ड्यूटी सर राइट का ड्यूटी होता
है। हां जो भी है मतलब जो भी अपोजिट है
दैट विल ब्लाइडली बी इनवॉल्व। ठीक है
सर एक क्वेश्चन मेरा भी है।
सर जैसे कोई केस है सर जैसे कोई केस है
उसमें चार चार डिस्प्यूटेड पॉइंट्स है और
कोर्ट ने किसी एक पॉइंट पे डिसीजन दे दिया
सर। लेकिन वो ऑर्डर नहीं है। सॉरी डिग्री
नहीं है सर ऑर्डर है। तो सर जो जिस पार्टी
के अगेंस्ट ये आर्डर गया है वो पार्टी इस
इस ऑर्डर के अगेंस्ट अपील में जा सकती है
या नहीं जा सकती है?
देखो ये एक ऐसा सवाल है जो हम अभी जिस
पोजीशन पे अभी है उससे आगे क्या पूछ रहे
हो? आप पूछ रहे हो कि ऑर्डर्स के खिलाफ हम
अपील फाइल कर सकते हैं या नहीं? वो अभी
बहुत बाद में आएगा बच्चे। अपील कब होती
है? फाइल कब नहीं होती है? कौन से ऑर्डर्स
के खिलाफ अपील फाइल कर सकते हो? किसके
खिलाफ नहीं? दैट इज नॉट द कंड अभी
डेफिनेशन पढ़ रहे हैं बच्चे अभी समझ रहे
हैं ऑर्डर है क्या उसको तो समझ ले
ओके सर
सर कोई ऐसा एग्जांपल जो
सर सिंपली
हां
हम बोलो बच्चे बारी-बारी से बोलो
सर सिंपली ऐसे कंसीडर कर सकते हैं क्या
जैसे मेंटेनेंस का केस है अगर वो फाइनली
डिसाइड नहीं हुआ है और उसमें इंट्रिम
ऑर्डर किया है जैसे
तो उसको ऐसे ये कंसीडर किया जा सकता है आई
थिंक
एक एक ये अच्छी अच्छी वो बनाई है। देखो आई
विल नॉट कमेंट ऑन दैट क्योंकि मेरे को एक
बार क्रॉस चेक करना पड़ेगा। बट जितना मेरी
समझदारी करी है फॉर एग्जांपल हमने सेक्शन
24 पढ़ा था उसका
एचएमए का हिंदू मैरिज एक्ट के अंदर जिसके
अंदर केस के चलते चलते द कोर्ट हैड दी
पावर कि वो मेंटेनेंस देने का ऑर्डर दे
सकता था। याद करो द टर्म दैट वास यूज्ड
वास ऑर्डर। तो ये कैसी परिस्थिति है कि वो
ऐसा नहीं कह रहा कि आपको जिंदगी भर
मेंटेनेंस देना है या वो पॉइंट हमेशा के
लिए डिटरमाइन हो गया। इट वास समथिंग जो
उसने
फॉर अ लिटिल बिटस
राइट और जब सेक्शन 25 के अंदर जब वो
परमानेंट एलुमिनी भी दे रहा था तो डिग्री
का होना जरूरी था बट उस चीज को भी डिग्री
मानेंगे। दैट इज अ क्वेश्चन क्योंकि उसमें
चेंजेस हो सकते थे एस पर दी सरकमस्ट्ससेस।
राइट?
हां जी। तो इसको एक बार हम लोग क्रॉस चेक
करेंगे कि कौन सी कैटेगरी में गिरना
चाहिए। ठीक है
सर जब कोर्ट कोई भी डिग्री पास करती है तो
सर उस पर लिखा हुआ होता है ना डिग्री तो
वो जो अपील में जाके
नहीं सर जब अपील में जाके जब ऑर्डर बन
जाता है तो मतलब कुछ रिटर्न होता है या
फिर ऐसे ओरली उसको मतलब वो किया जाता है
बोला जाता है
नहीं मैं समझा ही नहीं आपके क्वेश्चन को
मतलब एक डिग्री
सर जैसे कोई भी डिग्री है
सर जैसे ये बोला है ना कि मतलब डिग्री
होती है वो डिग्री अगर अपील उसका किया जा
रहा है तो सीपीसी में उसको ऑर्डर बोला
जाता है अगर अगर वो डिग्री अपील में जा
रही है तो
नहीं नहीं कहां बोला किसने बोला
उस वाले पॉइंट को आप समझ नहीं पाए अच्छा
देखो देखो वो जो वाला पॉइंट है ना वो
लैंग्वेज ऐसी है देखो यही तो है पता है
यही वजह होती है कि आपको टीचर्स की जरूरत
पड़ती है क्योंकि आपके स्टच्यूट साथ नहीं
देता वो कोशिश करता है कि आपको जितना
कंफ्यूज कर सके वो बच्चे बी वाला जो पॉइंट
है वो कह रहा है कि सीपीसी देखो सीपीसी जो
है दोनों के अपील के बारे बारे में
प्रावधान करता है। डिग्री के खिलाफ भी आप
अपील फाइल कर सकते हो। उसके लिए कुछ
सरकमस्ट्ससेस है, कुछ सिचुएशन है। ऑर्डर्स
के खिलाफ भी आप अपील फाइल कर सकते हो।
दोनों की अलग-अलग जगह प्रावधान बनाए गए
हैं और अलग-अलग प्रावधान बनाए हैं सीपीसी
ने। तो वो बस पॉइंट इतना से कह रहा है कि
सीपीसी के अंदर जब भी किसी अपील को ऑर्डर
के खिलाफ अपील माना जाता है तो उसको
डिक्री नहीं मानी। बस इतनी सी बात है। आ
रही है बात समझ में? सर वो कहना चाह रही
है कि जैसे कोई डिग्री कोर्ट ने इशू की तो
वो रिटन में होती है कि ओरल में होती है?
रिटन में
आगे जाके अगर
नहीं नहीं सर वो होती तो जैसे रिटन में है
तो लेकिन वो दूसरा कांसेप्ट है सर उसको
शायद मैं गलत समझ रही थी जस्ट सर जैसे वो
डिग्री होती है अपील में जाके हम उसे
ऑर्डर बोलते हैं। मैं ये समझ रही थी कि
डिग्री अपील में जाके ऑर्डर बन जाती है।
डिग्री डिग्री ही रहती है बच्चे। डिग्री
के खिलाफ डिग्री की तरह अपील होगा। ऑर्डर
के खिलाफ ऑर्डर की तरह अपील होगा। अपील
कभी आएंगे। हम लोग जंप क्यों कर रहे मेरे
को समझ नहीं आ रहा
सर ऐसे ऐसे ही मैंने समझा था लेकिन मैंने
सब पढ़ा सही से आपने समझाया फिर मुझे समझ
में आया फिर मैंने पूछा नहीं आपसे
हां तो ये तो डेफिनेशनल वाली वीडियोस है
आई विल सजेस्ट की इसको एक एक बार और देख
लेना ठीक है बढ़े आगे बढ़े
लास्ट क्वेश्चन है ये
कोई एक एग्जांपल जिससे थोड़ा हम लोग
अरे एक्स सीपीसी इतना मोटा है भाई इतने
एग्जांपल्स आएंगे कि पागल हो जाओगे पढ़ते
पढ़ते एग्जांपल आएंगे बच्चे अभी अभी
डेफिनेशन पढ़ रहे है अभी देखो दो ही
डेफिनेशन पढ़ी है
आ जाओ आगे।
ओके सर।
अगली जो डेफिनेशन है वो है डिग्री होल्डर
की। ठीक है? किसकी? डिग्री होल्डर की।
इसका मतलब क्या है? बहुत सिंपल सी
डेफिनेशंस है। अपनी तरफ से कंफ्यूज मत
करना। बहुत ध्यान से सुनना जो मैं बोल रहा
हूं। देखो ये मैं लाता हूं आपको समझाने के
लिए। और ये आपके पास रहेगा। आपके
स्टैच्यूट में भी लिखा हुआ है। और अभी
बहुत ध्यान से सुनना। मैं बोल क्या रहा
हूं क्योंकि मैं आपको एक स्ट्रक्चर बना के
देता हूं। उसको अपने दिमाग में जाने दिया
करो। देखो डिग्री होल्डर का मतलब क्या है?
जहां तक बात इस शब्द की है इस एक्सप्रेशन
की है डिग्री होल्डर की। इसका मतलब है कि
कोई भी व्यक्ति
जिसके फेवर में ध्यान से देखना। जिसके
फेवर में एक डिग्री पास की गई है।
यहां तक तो आप बड़े खुश हो रहे होंगे कि
सर बड़ा आसान था। या फिर
कोई भी ऑर्डर
जिसका एग्जीक्यूशन कराया जा सकता है वो
दिया गया हो।
कहने का मतलब है यह जो डिग्री होल्डर यह
जो एक्सप्रेशन है बार-बार आएगा सीपीसी में
ये बच्चे एक न्यूट्रल एक्सप्रेशन है।
न्यूट्रल एक्सप्रेशन का मतलब एक ऐसा
व्यक्ति
जिसके फेवर में किसी पॉइंट को डिसाइड किया
गया है। जिसके फेवर में जिसके जिसको
राइट्स दिए गए हैं। जिसके अधिकारों को
स्वीकार किया गया है।
उसको बोलते हैं डिग्री होल्डर।
डिग्री होल्डर।
तो एक ऐसा व्यक्ति जिसके फेवर में डिग्री
पास की गई है
वो कहलाता है डिग्री होल्डर।
पर ना केवल इतना। एक ऐसा व्यक्ति जिसके
फेवर में कोई ऑर्डर भी पास किया गया है।
उसके लिए कोई ऐसा शब्द नहीं बनाया। ऑर्डर
होल्डर बना भी सकते थे क्योंकि हर जगह
फर्क कर रहे हैं तो यहां पे भी कर सकते थे
ऑर्डर के लिए ऑर्डर होल्डर बना देते पर
ऐसा नहीं किया गया है सीपीसी के
एक ऐसा व्यक्ति जिसके फेवर में ऑर्डर भी
पास किया गया है
उसको भी डिग्री होल्डर ही बोलते हैं।
ठीक है? तो अपने नोट्स में लिख लो डिग्री
होल्डर।
पहली कैटेगरी में वह लोग जिनके फेवर में
डिग्री पास की गई है।
दूसरी कैटेगरी में वो लोग जिनके फेवर में
आर्डर पास किए गए हैं।
अब आते हैं इस एग्जीक्यूशन वाली बात पे।
ये स्पेसिफिकली लिखा हुआ है इस डेफिनेशन
के अंदर कि जिस व्यक्ति के फेवर में आर्डर
पास किया गया है उसको भी डिग्री होल्डर
मान लेंगे। पर ये जरूरी है कि वो आर्डर
ऐसा होना चाहिए जिसका एग्जीक्यूशन हो सके।
अब यह शब्द है एग्जीक्यूशन। बच्चे यह एक
लीगल शब्द है। हमारे सीपीसी के अंदर एक
पूरा का पूरा ऑर्डर है जो इस एग्जीक्यूशन
की ही व्याख्या करता है। पर अगर मैं आम
भाषा में अभी आपको समझाने की कोशिश करूं।
एग्जीक्यूशन का मतलब होता है कि कोई कोर्ट
ने आर्डर दे दिया। आपके फेवर में आदेश
जारी कर दिया। अब उस ऑर्डर के अनुसार जो
भी उसमें चीजें लिखी गई हैं उनको फॉलो
करवाने की शक्ति
कोर्ट आपकी सहायता करेगा कि कोर्ट ने जो
भी आदेश दिया है उसको पूरा किया जाए जो भी
उसके लिए रिक्वायर्ड है उसको करा जाए।
उसको बोलते हैं एग्जीक्यूशन कराना। उसकी
डिटेल में जाने की जरूरत नहीं। अभी बस एक
बात समझनी है हमको जिसको मैं आपको समझाने
की कोशिश कर रहा हूं। जहां तक उस व्यक्ति
की बात है जिसके फेवर में डिग्री आई है
उसको तो डिग्री होल्डर बोलने में कोई
परेशानी नहीं है। पर वो जो व्यक्ति है
जिसके फेवर में आर्डर आया है अगर वो आर्डर
ऐसा है जिसका एग्जीक्यूशन सक्षम है उसका
एग्जीक्यूशन कराया जा सकता है। और मैं
आपको बता दूं यहां पे भी सीपीसी कुछ नहीं
कर रहा है। आपको घुमाने की कोशिश कर रहा
है। कन्फ्यूजन करने की कोशिश कर रहा है।
इसका कोई भी पपस नहीं है। इन मोस्ट ऑफ़ द
केसेस इन मोस्ट ऑफ़ द सिनेरियोज़
जब भी कोई ऑर्डर किसी व्यक्ति के फेवर में
डिटरमाइन होता है,
उसका एग्जीक्यूशन हो सकता है। वरना उस
ऑर्डर का पर्पस ही क्या है? जब उसका
एग्जीक्यूशन ही नहीं कराया जा सकता। तो
ठीक है? तो बस आपको लिखने के लिए यह याद
रखना पड़ेगा कि एक ऐसा व्यक्ति जिसके फेवर
में आर्डर जारी किया गया है जिसका
एग्जीक्यूशन कराया जा सकता है
उसको भी डिग्री होल्डर बोल सकते हैं। तो
वो लोग जिनके फेवर में डिग्री आई है वो
डिग्री होल्डर है। वो लोग जिनके फेवर में
ऑर्डर आया है प्लस एग्जीक्यूशन वाली बात।
वो लोग भी डिग्री होल्डर ही कहलाते हैं।
ठीक है?
यह हो गई हमारी डेफिनेशन किसकी? डिग्री
होल्डर की। दोनों कैटेगरी के लोग आ गए।
अब यह जो डिग्री होल्डर का जो अपोजिट वर्ड
होता है ठीक है?
वो होता है जजमेंट डेटर। डिग्री होल्डर
कौन हो गया? जिसके फेवर में डिग्री आई है।
जिसके फेवर में आर्डर आया है। पर उसका
अपोजिट है जजमेंट डेटर। इसका मतलब क्या
होता है? एक ऐसा व्यक्ति जिसके खिलाफ
जिसके खिलाफ कोई डिग्री पास की गई है या
फिर जिसके खिलाफ कोई आर्डर वही वाली बात
जिसको एग्जीक्यूट किया जा सकता है वो पास
किया गया है। तो कहने का मतलब है
कोई पार्टी जो कि केस में हारी है या किसी
पॉइंट जो भी पॉइंट उसके खिलाफ डिसाइड हुआ
है
उसको हम बोलते हैं क्या? जजमेंट डेटर।
क्या जजमेंट डेटर डिग्री होल्डर कौन है
जिसके फेवर में डिग्री आई है जिसके फेवर
में आर्डर आया है जजमेंट डेटर कौन है
जिसके खिलाफ डिग्री आई है जिसके खिलाफ
ऑर्डर आया है डिग्री में तो कोई परेशानी
नहीं है ऑर्डर में बस एग्जीक्यूशन की बात
को याद रखना ठीक है तो अपोजिट वर्ड है
डिग्री होल्डर याद कर लो इन सारे शब्दों
को याद कर लेना आज क्योंकि ये शब्द
बार-बार बार-बार हमारे सामने आएंगे जिनको
को बड़ा महत्वपूर्ण होगा कि हमारे दिमाग
में हो। तो डिग्री होल्डर वर्सेस द जजमेंट
डेटर। चलो आज की क्लास को यहीं रोकते हैं।
थोड़ा सा पहला क्लास है। रिलैक्सिंग ही
रखते हैं इसको। कल हम अपने यही इसी पॉइंट
से लीगल रिप्रेजेंटेटिव की डेफिनेशन से
कंटिन्यू करेंगे। आप भी एक बार नजर मार
लेना। केस क्लास में आने से पहले लीगल
रिप्रेजेंटेटिव की डेफिनेशन देख लेना।
मेसने प्रॉफिट्स की डेफिनेशन देख लेना।
सेक्शन थ्री को एक बार रीड आउट कर लेना।
सेक्शन फोर को एक बार रीड आउट कर लेना।
फिर मैं आपको एक्सप्लेन कर दूं। ठीक है?
चलो जी बच्चे।
सर कैन आई से अवार्ड?
यस प्लीज।
सर लेट्स नॉट ट्राई टू रीड होल सीपीसी इन
वन क्लास।
हां हां मतलब सारे
एक ही क्लास में सर सीपीसी पढ़ने का कोशिश
नहीं करते हैं। नहीं जैसेजैसे डाउट्स आ
रहे थे सर उस हिसाब से लग रहा था। इसी के
लिए
नहीं नहीं नहीं इजी है। अरे तीन डेफिनेशन
पढ़ी है मात्र। इनफ हम लोगों ने आज स्लो
किया है। हमको इससे थोड़ा सा तो फास्ट
चलना पड़ेगा। ऐसे चलेंगे तो दो साल में
आई एम सेइंग दैट द डाउट्स वी वर गेटिंग
टुडे। राइट राइट बच्चे कहता है क्या है
मुझे आज आज कोई परेशानी नहीं हुई इन व्हाट
सेंस मैं ऐसा क्यों बोल रहा हूं क्योंकि
जो भी क्वेश्चन आए दे लेजिट क्वेश्चन जो
उनको टैकल करने में मजा आता है और उनप हां
मैं ये मानता हूं कि टाइम थोड़ा सा
कंज्यूम हो जाता है बट ठीक है कर लेंगे
अभी शुरू की क्लासेस है तो बच्चे थोड़ा सा
पूछ रहे हैं दैट इज फाइन बट मुझे इतना
भरोसा है कि ओवर टाइम जैसे जैसे हम चीजों
को समझते चलेंगे तो हमारी स्पीड भी पकड़
लेगा ठीक है
इसीलिए बोल रहा था ना एजेंडा पहले बता
देता तो आप मुझे भी स्टिक करते रहते सर
हां
अच्छा सीपीसी का ठीक है तो मैं अभी बता दे
रहा हूं आपको लीगल रिप्रेजेंटेटिव की
डेफिनेशन है मेसने प्रॉफिट की डेफिनेशन है
सेक्शन थ्री है सेक्शन फोर है सेक्शन फाइव
है सेक्शन सिक्स है इतना तो पक्का है 100%
है इतना तो उसके बाद देखते हैं अगर
पॉसिबिलिटी बनेगी देखो मजा आना शुरू करेगा
सीपीसी में मजा आना शुरू होगा आपको सेक्शन
न ऑनवर्ड सेक्शन न सेक्शन 10 फिर शुरू
शुरू होगा असली सीपीसी। अभी तो बस शुरुआत
है। तो मैं भी नहीं चाहूंगा कि ये जो
सेक्शंस अभी हम पढ़ेंगे इन पे ज्यादा टाइम
नहीं देना है। मैं आपको बोल रहा हूं आपके
एग्जाम में नहीं आएंगे। मतलब ये डेफिनेशंस
तो आएंगी। डेफिनेशंस बहुत इंपॉर्टेंट है।
बट सेक्शन तीन, सेक्शन चार, सेक्शन पांच,
सेक्शन छ देन नॉट्ट। कोई नहीं पूछता उनको।
कहानी शुरू होगी सेक्शन नौ, सेक्शन। वहां
मैं कह रहा हूं गारंटेड क्वेश्चन आएगा। तो
इस बात को भी आप लोग भी थोड़ा सा समझने की
कोशिश करो। हमें पढ़ना है, हमें समझनी है
और हमें हर जितने भी क्वेश्चन हो सकते हैं
पूछने हैं। बिल्कुल पूछने हैं। पर वही
हमें मेहनत को सही जगह पे फोकस करना है।
आप सेक्शन 10 में मेरे से 50 क्वेश्चन
पूछोगे तो वो वर्थ इट होगा क्योंकि वो
एग्जाम में आने वाला है। पर आप सेक्शन चार
में मैं ये नहीं कह रहा सेक्शन चार आसान
है। बेवकूफी भरा है। पर इंपॉर्टेंट नहीं
है। हम उसमें एक घंटा निकाल दे। गेन हमने
कुछ किया नहीं। टाइम हमारा वेस्ट हो गया।
एग्जाम में भी वो आना नहीं। तो ऐसा लगता
है कि हम हर हर तरीके से बीट आउट हो रहे
हैं। तो मैंने एक चीज तो मैंने डिसाइड की
है कि जब भी मैं सेक्शन को शुरुआत करूंगा
सबसे पहले आपको यही बताऊंगा कि वो सेक्शन
इंपॉर्टेंट है या नहीं। फिर उसके हिसाब से
हम लोग देखेंगे कि उसको कितना टाइम देना
है। ये वाला ठीक है। ये वाला तरीका सही है
ना?
यस सर।
सर
हां। सबसे पहलेोर्टेंस की बात को देखेंगे।
फिर उसी कॉन्टेक्स्ट से उसको देखना और उसी
हिसाब से उसको समय वेस्ट करेंगे। ठीक है?
यस सर। चलो फिर 7:00 बजे भी क्लास है।
बाय-ब रिलैक्स करो आधा घंटा।
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