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#1237 Ekantik Vartalaap & Darshan/16-04-2026/ Shri Hit Premanand Govind Sharan Ji Maharaj

29:25EnglishTranscribed Jul 21, 2026
0:16

राधा

0:20

राधा

0:24

राधा

0:26

[चीखने की आवाज़]

0:27

राधा [गाना गाने की आवाज़]

0:42

राधा

0:44

[चीखने की आवाज़]

0:45

राधा

0:48

राधा

0:50

[चीखने की आवाज़]

0:51

राधा

1:00

राधा

1:03

राधा

1:06

राधा

1:09

राधा

1:12

राधा

1:15

राधा

1:17

[चीखने की आवाज़]

1:18

राधा

1:21

राधा

1:24

राधा

1:30

राधा

1:33

राधा

1:36

राधा

1:38

[चीखने की आवाज़]

1:39

राधा

1:42

राधा

1:45

राधा

1:47

[गाना गाने की आवाज़]

1:48

राधा

1:51

राधा

1:53

हाय राधा राधा

1:57

राधा

2:00

राधा

2:01

[चीखने की आवाज़]

2:02

राधा

2:11

राधा

2:14

राधा [गाना गाने की आवाज़]

2:15

श्री राधा

2:17

वल्लभ लाल की समस्त संत हरि भक्तन की श्री

2:24

वृंदावन धाम की सतगुरुदेव भगवान की

2:30

जय हो।

2:32

रुद्रपाल सिंह जी राधे-राधे महाराज जी

2:35

महाराज जी भगवान के दिव्य पार्षदों व

2:37

सिद्ध महापुरुषों में भी कभी-कभी ऐसी

2:40

लीलाएं देखी जाती हैं काम क्रोध रूपी छट

2:42

विकारों का प्रादुर्भाव देखा जाता है जैसे

2:44

कि सनस सनंदन तथा देव ऋषि नारद जी जो

2:46

भगवान की लीला का आधार होते हैं तो मेरा

2:48

महाराज जी प्रश्न आया कि जब जीव भगवत

2:51

प्राप्ति कर लेता है तो वो भगवत स्वरूप हो

2:53

जाता है तो पांच भौतिक शरीर में तो

2:55

स्वाभाविक है परंतु जब वो दिव्य शरीरों

2:57

में भी ऐसा भाव आता है तो महाराज जी हमें

2:59

क्या समझना चाहिए साधकों जब हम तुम एक ही

3:02

बराबर के हो गए और संसार को अब कोई नाटक

3:06

दिखाना है हमें

3:08

तो हम तुम वैसे ही स्वांग करेंगे ना अगर

3:11

चतुर खिलाड़ी हैं तो सनक सनंदन सनातन सनत

3:15

कुमार भगवान के अवतार हैं। आप 24 अवतारों

3:19

में आप देखिए ये प्रथम सर्ग प्रथम भगवान

3:23

का अवतार है। सनक सनंदन सनातन सनत कुमार

3:27

इनमें क्रोध नहीं है।

3:30

इनमें भगवान की लीला की उत्पत्ति छुपी हुई

3:34

है। अब भगवान लीला करना चाहते हैं जगत में

3:38

आकर राम रूप से।

3:40

अब उस लीला का विरोधी भी कोई होना चाहिए

3:44

जिससे रंग बढ़े लीला में।

3:47

तो रावण रूपी विरोधी चाहिए। तो रावण रूपी

3:50

विरोधी कैसे बने? तो सनक सनंदन ने साप दे

3:54

दिया जय विजय को क्योंकि निजी पार्षद ही

3:57

भगवान का विरोध सह सकते हैं। दूसरा तो सह

4:00

नहीं सकता। जो ऐसे भगवान वैसे भगवान के

4:04

पार्षद तो लीला करने के लिए जय विजय बन गए

4:08

रावण कुंभकरण और सरकार का अवतार होता है

4:11

राम के रूप में और विविध प्रकार की पावन

4:14

लीलाओं की गाथा जो जगत का मंगल करने वाली

4:17

है।

4:19

नारद आदि महापुरुष सनका आदि महापुरुषों

4:24

में ना काम है ना क्रोध है ना लोभ है ना

4:26

मोह है ना मद है ना मत्सर है वो लीला के

4:30

लिए सूत्र है इसलिए उनका मिलान अपने कर्म

4:35

बंधन से युक्त शरीरों से नहीं किया जा

4:37

सकता वो दिव्य महापुरुष थोड़ी देर के लिए

4:41

क्रोध का अभिनय करते हैं क्योंकि उनको

4:44

लीला प्रकट करनी है। वह दिव्य महापुरुष

4:47

थोड़ी देर के लिए काम का अभिनय करते हैं

4:50

ना कि उनमें कामना है। इसलिए जो सिद्ध

4:54

महापुरुष भगवान को प्राप्त हो गए हैं। हम

4:58

इसीलिए उनको समझ नहीं पाते क्योंकि उनकी

5:01

बाह्य चेष्टा जनसाधारण जैसी रहती है। ऐसे

5:04

ही भगवान की दिव्य लीलाओं में जो दिव्य

5:07

महापुरुष हैं वो सब निर्विकार हैं। केवल

5:10

भगवान की प्रेरणा से थोड़ी देर के लिए वो

5:14

विकार का अनुभव करते हुए स्वांग कर रहे

5:17

हैं। कि हां भाई संकाद क्रोध से युक्त हो

5:21

गए। जो निरंतर ब्रह्मानंद में मग्न है

5:23

वहां क्रोध कहां जो अद्वैत निष्ठा ब्रह्म

5:27

को प्राप्त हो गए हैं तो द्वैत के बिना

5:29

क्रोध कहां आ सकता है? तो यह बातें समझती

5:33

है।

5:35

पुष्कर सिंह जी कानपुर से राधे-राधे

5:38

महाराज जी महाराज जी आपके वचनों को सुनकर

5:40

भक्ति मार्ग पर चलने का प्रयास कर रहा

5:42

हूं। आपके श्री मुख से सुना है कि एक ऐसी

5:44

अवस्था आती है जिसे प्राप्त करने के बाद

5:46

फिर कुछ पाने की इच्छा नहीं रह जाती। कुछ

5:49

जानना बाकी नहीं रह जाता। महाराज जी साधक

5:51

ऐसा क्या प्राप्त कर लेता है कि उसके भीतर

5:53

फिर कुछ भी पाने की जानने की इच्छा शेष

5:56

नहीं रह जाती। उस अवस्था को कैसे प्राप्त

5:59

कर सकते हैं?

6:01

यह

6:03

रहस्य है अगर समझ में आ जाए आपकी

6:07

आत्मा

6:09

पूर्ण तृप्त है।

6:12

आत्मा में कभी अभाव नहीं होता।

6:17

आत्मा पूर्ण काम है।

6:20

आत्मा आनंद स्वरूप है।

6:24

आत्मा प्रेम स्वरूप है। आत्मा चिदानंदमय

6:29

है। और वह मैं हूं।

6:34

शरीर

6:36

अपूर्ण है,

6:38

अतृप्त है,

6:42

सकाम है,

6:44

नाशवान है, दुखमय है, परिवर्तनशील है,

6:50

व्याधियों से युक्त है। तो जब हम शरीर में

6:55

मैं बुद्धि कर लेते हैं

6:58

तो हमारे कामनाएं प्रकट हो जाती है। हमारी

7:01

चिंताएं प्रकट हो जाती है। हमारे दुख

7:04

प्रकट हो जाता है। विशेष विशेष प्रकार की

7:09

वासनाएं प्रकट हो जाती है।

7:13

वही मैं अज्ञान के द्वारा निवृत्त होकर जो

7:18

आत्म स्वरूप में स्थित हो जाता है तो वही

7:21

आत्मा हमारी भगवान है।

7:24

चाहे भगवान में स्थित हो जाए या आत्म

7:27

स्वरूप में स्थित हो जाए। तो जहां भगवान

7:30

में स्थित हुआ तो पूर्ण काम परमानंदमय

7:36

अखंड शांति ये सब उसको प्राप्त हो जाती

7:39

है। अब उसे कुछ जानना बाकी नहीं रहता कुछ

7:43

पाना बाकी नहीं रहता। कोई चाह नहीं रहती

7:48

कोई सोच नहीं रहती। एक परमानंदमय स्थिति

7:52

गाढ़ आनंद

7:55

जैसे

7:57

सुशुप्त में कोई कामना कोई स्फुरना कोई

8:01

वासना कुछ नहीं रहती लेकिन वो घोर तमोगुणी

8:05

है। ऐसे जागृत में त्रिगुणातीत अवस्था

8:10

अपने आत्म स्वरूप को प्राप्त होकर ज्ञानी

8:13

महात्मा पूर्ण निष्काम हो जाता है।

8:16

न स्वात्मारामम विषय मृग तृष्णाम भ्रमयति

8:21

आत्माराम पुरुष कभी विषय रूपी मृग तृष्णा

8:25

में भ्रमित नहीं होता ऐसे ही जो भगवान की

8:31

भक्ति में ऊंचाई पर पहुंचता है। शरीर शरीर

8:36

संबंधी भोग शरीर संबंधी रिश्ते नातेदार

8:40

इनसे ऊंचे उठ जाता है और भगवान में उसकी

8:44

रति हो जाती है। तो उसकी ऐसी स्थिति हो

8:48

जाती है। कोई कामना नहीं, कोई चाह नहीं,

8:52

कोई अहंकार नहीं, कोई ममता नहीं। बड़ा

8:56

सुंदर दिव्य स्वरूप होता है तो जाह न चाह

9:00

कबहु कछु तुम सन सहज सनेह बसहु निरंतर

9:04

तासुर सु रा निजगे जिसकी चाह मिट गई भगवान

9:10

से सहज प्रेम हो गया तो स्वयं परमानंदम

9:13

में भगवान उसके हृदय में प्रकट हो जाते

9:16

हैं। है सबके हृदय में पर त्रिगुण माया का

9:19

पर्दा लगाकर भगवान है और भक्ति के हृदय

9:23

में प्रकाशित हो जाते हैं। जहां भय प्रकट

9:26

कृपाला दीन दयाला तो हृदय आनंद से भरकर

9:29

कभी नाचता है कभी हंसता है कभी गाता है

9:32

कभी समाधस्त रहता है न लाज तीन लोकन की न

9:36

वेद को कहो करे न शंख भूत प्रेत की न देव

9:40

जच्छते डरे सुने न कान और की दसे न और

9:44

इच्छना ऐसी स्थिति हो जाती है

9:48

इसलिए

9:49

देह भाव त्यागने की आवश्यकता है साधना

9:53

करके और जब देह भाव त्याग हो जाता है,

9:56

साध्य में स्थित हो जाता है तो फिर कोई ना

9:58

करने की चाह रहती है ना पाने की चाह रहती

10:02

है। जी लवीना जी इंदौर से राधे राधे

10:06

महाराज जी महाराज जी मैं एक प्रारंभिक

10:08

साधक हूं। साधना शुरू करने के बाद से कंचन

10:11

और कीर्ति खूब मिल रही है। वो चाही अनचाही

10:13

मनोकामना भी पूर्ण हो रही है। डर लग रहा

10:15

है कि सांसारिकता में उलझ ना जाऊं। अपनी

10:18

साधना को और परिपक्व हां यह बात जरूर

10:22

सावधानी रखनी चाहिए कि जब अनुकूलता मिले

10:25

तो डर जाना चाहिए।

10:28

कहीं मैं अनुकूलता में फंस ना जाऊं। यह

10:32

भजन का फल नहीं है। यह तुम्हारे पूर्व के

10:36

पुण्य हैं।

10:38

अभी जो तत्काल कामना पूर्ण हो रही है। जो

10:43

आपको चाहिए

10:46

कंचन कीर्ति आदि वह प्राप्त हो रहा है। तो

10:50

ये भजन का फल नहीं है। अब यह भजन का फल

10:53

आगे मिलेगा। यह आपके पुण्य का फल है। नहीं

10:58

तो एक से एक बड़े भजनानंदी है। पूरा जीवन

11:02

दुख में जा रहा है। तो क्या मतलब है? तुम

11:07

प्रारंभिक साधक हो। तुम्हारे लिए इतनी

11:09

छूट। जो चाहो वो मिल जाए, कीर्ति मिल जाए,

11:13

सब सुख मिल जाए और जो रात दिन भजन में लगे

11:16

उनको दुख इसका क्या मतलब है? भगवान क्या

11:19

उनसे नाराज है क्या? नहीं। उनके पाप नष्ट

11:23

हो रहे हैं। तुम्हारे पुण्य नष्ट हो रहे

11:24

हैं।

11:26

वो निष्पाप होकर भगवान की तरफ बढ़ रहे

11:28

हैं। तुम पुण्यों का भोग करके माया की तरफ

11:30

बढ़ रहे हो। अगर आए हुए पुण्य के संयोग से

11:35

संपत्ति सुख आदि को हम परोपकार में लगा

11:38

देते हैं। स्वयं भोग नहीं करते। परिवार की

11:42

सेवा में लगा देते हैं और खूब नाम जप करते

11:45

हैं। उससे प्रभावित नहीं होते तो कुछ नहीं

11:48

बिगाड़ पाएगी। हमारी भगवत प्राप्ति हो

11:51

जाएगी। अगर उसी को स्वयं भोगता मानकर

11:54

भोगने लगे भगवान का विस्मरण हो गया तो फिर

11:58

उसका प्रभाव आपको प्रभावित कर लिया। आप

12:01

अपने मार्ग से भ्रष्ट हो गए। इसलिए

12:04

सावधानी रखनी है। विजय श्री जी बीकानेर से

12:09

महाराज अष्टावक्र जी कहते हैं कि तू एक

12:12

क्षण में ज्ञान को प्राप्त कर सकता है। वो

12:14

किस ज्ञान की बात करते हैं जिसको पाने में

12:16

क्षण भी नहीं लगता? देखो

12:22

महापुरुषों की बातें सहज में समझ में नहीं

12:25

आती।

12:27

हजारों जन्म की साधना के बाद

12:32

मुमुक्षता प्रकट होती है। भगवान

12:34

शंकराचार्य जी ने कहा विवेक चूड़ामणि में

12:37

देख लो हजारों जन्मों के सुकृत और साधना

12:42

जब एकत्रित होते हैं तब जीव के मन में आता

12:46

है कि मैं संसार से मुक्त हो जाऊं और वो

12:49

मुमुक्षु उसे कहते हैं जो मोक्ष प्राप्ति

12:51

के लिए व्याकुल हो जाए।

12:55

यह जो अष्टावक जी जनक जी से बात कर रहे

12:58

हैं तो जनक जी जानते हो कितने बड़े

13:00

महात्मा है कितने बड़े ज्ञानी हैं।

13:04

अष्टावक्त जी कह रहे हैं घोड़े की रकाब पर

13:07

पैर रखकर उसके पीठ में बैठने में जितना

13:09

समय लगता है उतने में तुम्हें मैं ब्रह्म

13:11

बोध प्रदान कर दूंगा। किसको? जनक जी को।

13:16

हमें नहीं हमें तो रगड़ करनी पड़ेगी। ऐसे

13:19

ब्रह्म बोध थोड़ी हो जाता है। तैयार भूमि

13:22

जनक जी महाराज की विदेह राज है। तो बस जरा

13:26

सा संकेत किया स्वयं के अनुभव का तो एक

13:29

सेकंड में स्वयं में स्थित हो गया। स्वयं

13:31

स्वयं में स्थित होने में क्या टाइम लगता

13:33

है? अब वो परम पवित्र हैं। हम अपवित्र है

13:36

इसलिए हमारा देहाभिमान आड़ आड़े आ रहा है।

13:40

वो दीवाल की तरह मैं और देह के बीच में

13:44

है। वो दीवाल गिरे अहंकार की तब तो बात

13:47

बने साधना से। मैं पुरुष हूं, मैं स्त्री

13:50

हूं, मैं विद्वान हूं, मैं धनवान हूं, मैं

13:52

कुलवान हूं, मैं अम मैं यह जो मैं की

13:55

दीवार लग गई है, प्रकृति जनित इसे हटानी

13:59

पड़ेगी। परमात्मा जनित जो मैं है वो शुद्ध

14:02

ब्रह्म है। अहम ब्रह्मास्म

14:05

और जो अहम है वो मलिन मायाकृत है। यही बीच

14:09

में मे है। मे मिट जाए। सच्चिदानंद सुख का

14:13

अनुभव हो जाए। कोई भी साधक हो सबको भगवत

14:16

प्राप्ति का बढ़िया अवसर मिला है। मनुष्य

14:19

शरीर मिला है। हमें लगता है यार भगवत

14:21

प्राप्ति ना सही तो नाम जप तो कर ही लो।

14:25

ऐसा नाम जप कर लो कि अगला जन्म फिर मनुष्य

14:28

का मिले फिर भजन हो। यह जो सेकंड और क्षण

14:31

की बात है ब्रह्म ज्ञान की तैयार भूमिका

14:34

की बात है बिल्कुल तैयार है बस केवल आग

14:38

लगाने की जरूरत है बिल्कुल पेट्रोल की तरह

14:40

तैयार हो चुके बस ज्ञान अग्नि केवल फेंकनी

14:43

है कि ज्वाला जल उठी ज्ञान की वो है जनक

14:46

जी महाराज और उपदेशता है अावक की जी वैसी

14:50

भूमिका सबकी थोड़ी तैयार है इसलिए खूब नाम

14:54

जप करो नाम जप से परम मंगल हो जाएगा

14:56

ब्रह्म बोध भी हो जाएगा प्रेम भी हो जाएगा

14:59

मोक्ष भी मिल जाएगा। जो चाहोगे सब नाम से

15:02

प्राप्त हो जाएगा।

15:04

ओम प्रकाश गर्ग जी मध्य प्रदेश से

15:07

राधे-राधे महाराज जी महाराज जी जीवन के इस

15:10

अंतिम पड़ाव में जब शरीर शिथिल हो रहा है

15:12

तब भी मन दूसरों के प्रति ईर्ष्या और

15:14

क्रोध के विकार शांत नहीं कर पा रहा।

15:16

हां क्योंकि अभ्यास नहीं किया ना पहले से

15:19

अध्यात्म का अभ्यास ना होने के कारण शरीर

15:22

बुढ़ा गया। मन बुद्धि थोड़ी बुढ़ा गए।

15:26

मन बुद्धि तो नवीन ही रहते। शरीर बुढ़ा गया

15:29

है। मन बुद्धि तो वही है। यह कभी थकित

15:33

नहीं होते। कभी पुराने नहीं होते। ये नवम

15:36

नवम भोग नवम नवम राग द्वेष ईर्ष्या ये

15:39

पैदा करते रहते हैं। इसी के रोकने के लिए

15:43

भगवान का भजन है। यदि भगवान का नाम जप करो

15:47

तो सब ठीक हो जाएगा।

15:50

जासु नाम भव भषज हरण घोर त्रिशूल

15:55

दैहिक दैविक भौतिक तापों का नाश और संसार

16:00

के आवागमन चक्र से मुक्ति ये सब भगवान के

16:04

नाम से मिल जाएगी। इसलिए नाम जप करो अधिक

16:07

से अधिक राग द्वेष के चक्कर में मत पड़ो।

16:10

चलना है यहां से। मरना है। एक काल का कसाई

16:15

वाला है मृत्यु लोक।

16:18

सबको मरना है।

16:21

कोई आज, कोई कल, कोई परसों पर मरना प्यारे

16:24

सबको है। कुछ ऐसा कर लो जो यहां से ले

16:28

जाओ।

16:30

ये बैंक बैलेंस,

16:32

ये बड़े-बड़े पद,

16:35

बड़ा-बड़ा परिवार,

16:38

मित्र समुदाय

16:40

यह तुम्हारे साथ जाने वाला नहीं। तुम्हारा

16:43

शरीर भी आग में जला दिया जाएगा। या मिट्टी

16:47

में गाड़ दिया जाएगा। केवल तुम्हारे किए

16:50

हुए पाप और पुण्य कर्म तुम्हारे साथ

16:53

जाएंगे। इसलिए भगवान का नाम जप कर लो। जो

16:57

पाप और पुण्य दोनों से उठाकर तुम्हें

17:00

परमानंद की प्राप्ति कराए। नाम जप के बिना

17:03

कुछ नहीं होने वाला। हमारी बात बिल्कुल

17:07

पकड़ लो। इसलिए जिसको जो गुरुदेव ने नाम

17:10

दिया है राम कृष्ण हरि वाहेगुरु जो भी नाम

17:14

दिया है खूब नाम जप करो। नाम जप से ही

17:17

मंगल होने वाला है। बिना नाम जप के नहीं।

17:22

वसुंधरा गॉड जी राधे-राधे महाराज जी

17:26

महाराज जी आपके चरणों में कोटि-कोटि

17:27

प्रणाम। महाराज जी मुझसे संतों के प्रति

17:31

और आपके प्रति मन वचन से कोई अपराध बन गया

17:34

है। शायद जिसके फल स्वरूप भजन में बहुत

17:36

आलस प्रमाद आ गया है। श्री जी के लिए रोना

17:38

जो पहले आता था वो भी गायब सा हो गया।

17:40

महाराज जी आप कोई दंड दें या कोई

17:42

प्रायश्चित बता दीजिए। रोज सुबह प्रातः

17:45

उठकर के वृंदावन को प्रणाम करके जो हम

17:48

बोलते हैं वह बोला करो। हे वृंदावन धाम

17:52

हमारे जाने-अजाने में व्यक्त महापुरुषों

17:56

सहित यदि कोई अपराध आपका बन गया हो तो आप

18:00

हमें क्षमा करें। हर वृंदावन वासी को रोज

18:04

वृंदावन धाम से प्रार्थना करनी चाहिए कि

18:07

रोज प्रार्थना करें कि जाने अनजाने में

18:10

यदि कोई अपराध बन गया हो व्यक्त अव्यक्त

18:13

महापुरुषों [गला साफ़ करने की आवाज़]

18:14

का अपराध बन गया हो तो हे धाम कृपा करके

18:17

मुझे क्षमा कर दो तो जो अपराध होंगे वो सब

18:20

भस्म हो जाएंगे और बुद्धि शुद्ध हो जाएगी

18:23

अपराध बनेंगे ही नहीं ऐसा करो

18:26

संस्कृति जी

18:28

राधे-राधे महाराज जी महाराज जी बाहर की

18:31

दुनिया का संघर्ष और अंदर की दुनिया का

18:33

संघर्ष दोनों में बैलेंस कैसे करें अगर

18:35

बाहर हम किसी से प्रेम करते हैं तो हम ये

18:38

आकांक्षा रखते हैं कि वैसा ही प्रेम मिले

18:40

बट नहीं मिलता तो फिर महाराज जी अंदर से

18:42

दुखी हो जाते हैं। ऐसे में अपने आप को

18:44

कैसे देखो बाहर तो

18:49

जितना जगत है उसको कहा गया विषम

18:54

कभी सम तो हो नहीं सकता संसार

18:57

जीत विषम संसार संसार विषम है और भगवान ने

19:03

इस संसार को लिखा है दुखालयम अशाश्वतम

19:08

दुख देने वाला और नाशवान फिर आप इसमें सुख

19:12

कैसे पा सकते हैं। फिर आप इसमें प्रेम

19:16

कैसे पा सकते हैं? जब तक सब में भगवान को

19:20

नहीं देखोगे तब तक दुख मिलेगा, परिवर्तन

19:24

मिलेगा, विषमता मिलेगी। अंदर से हमारे

19:28

पश्चाताप, शोक, चिंता, भय ये मिलेंगे। अगर

19:32

इसी संसार के व्यवहार में हम जिस व्यक्ति

19:36

से प्यार कर रहे हैं उसमें हम झांक के

19:39

देखें कि मेरे भगवान बैठे हुए हैं और उन

19:42

भगवान से प्यार करें तो हमें कभी भी दुख

19:45

नहीं हो सकता क्योंकि उसकी हर चेष्टा मुझे

19:49

अच्छी लगेगी। वो गाली भी देगा, प्रतिकूलता

19:52

भी करेगा तो अच्छा लगेगा। मेरे भगवान है

19:55

ना इस रूप में मेरे भगवान है। जब तक भगवत

19:59

भाव नहीं रखोगे तो संसार दुखमय है। संसार

20:03

विषम है। संसार में द्वंद है। कभी लाभ,

20:07

कभी हान, कभी सुख, कभी दुख, कभी मान, कभी

20:10

अपमान, कभी जय, कभी पराजय यह सब बना

20:13

रहेगा। इसलिए सर्वतो भावेन भगवान की शरण

20:18

में होकर भगवान का नाम जप करते हुए सब में

20:21

भगवत भावना की जाए तो अंदर और बाहर दोनों

20:25

जगह का बैलेंस बन जाएगा। अगर भजन नहीं है

20:29

भगवत शरणागति नहीं है तो ना बाहर का

20:32

बैलेंस बनेगा ना भीतर का बैलेंस बनेगा।

20:35

बेमतलब में नेगेटिव विचार सोच कर जलते

20:38

रहोगे। अशांत रहोगे क्योंकि अंदर विवेक

20:41

नहीं जागृत हुआ। बाहर बेमतलब की कल्पना

20:44

करके किसी से अनुकूल, किसी से प्रतिकूल,

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किसी से राग, किसी से द्वेष, हमारा जीवन

20:50

व्यर्थ चला जाएगा।

20:52

तो यदि हम बाहर भीतर दोनों जगह मंगल चाहते

20:56

हैं तो गोस्वामी तुलसीदास जी कह रहे हैं

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राम नाम मणि दीप धरी जी दे हरी द्वार

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तुलसी भीतर बाहु

21:10

जो चाहस उजियार बोले भगवान के नाम रूपी

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मणि को जीभ रूपी द्वार पे रख लो तो भीतर

21:20

भी बैलेंस बन जाएगा और बाहर भी आनंद

21:23

रहेगा।

21:24

बाहर भी आनंद विवेक अंदर जागृत हो गया ना

21:28

तो हर बात दुख वाली काट कर आनंद प्रदान

21:31

करेगा। राम नाम मणि दीप धरी जीह दे हरी

21:37

द्वार

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यदि वर्तते नाम्यम

21:42

नाम जीह जप जागे जोगी आ

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इस संसार की मोह निद्रा से योगी जाग जाता

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है नाम जप करके

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अगर जीव से नाम जप करोगे तो कंठ में जाएगा

21:57

कंठ से हृदय में जाएगा और जब हृदय से नाम

22:00

चलेगा तो भगवान और साक्षात्कार हो जाएगा।

22:03

इसलिए भीतर और बाहर के बैलेंस को बनाने के

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लिए भगवान की शरण में होकर भगवान का नाम

22:11

जप करो।

22:13

नव्या झा जी राधे-राधे महाराज जी महाराज

22:16

जी मेरी आयु 16 साल की है। महाराज जी इस

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आयु में स्कूल में बहुत सी नई-नई संगतियां

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मिलती हैं। बुरी भी हैं, अच्छी भी हैं। बट

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महाराज जी दूसरों का संगति का असर मेरे पे

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ना पड़े ऐसा मैं क्या करूं महाराज जी?

22:30

बिना ज्ञान के ऐसा नहीं हो सकता बच्चा जित

22:34

संग दोषा तो अध्यात्म नित्या

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जो नित्य आत्म स्वरूप के ज्ञान में स्थित

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रहता है उसको किसी भी संग दोष का प्रभाव

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नहीं पड़ता नहीं तो

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संग का प्रभाव पड़ जाएगा

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एक बार काटेंगे दो बार काटेंगे तीसरी बार

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वो बात हमारे अंदर बैठ ही जाएगी

22:59

वो बात काटने के लिए सतत ज्ञान रूपी तलवार

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चाहिए जिससे कुसंग का हमारे ऊपर प्रभाव ना

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पड़े। को कुसंगति पाए न साई रहा न नीच मते

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चतुराई चाहे जितना बड़ा चतुर हो यदि उसे

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कुसंग मिला तो वो धीरे-धीरे पतित हो ही

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जाएगा। यदि उसे ज्ञान नहीं है तो और ज्ञान

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है

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तो जो रहीम उत्तम प्रकृति का कर सकत कुसंग

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चंदन विष व्यापत नहीं लपटे रहत भुजंग अगर

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हमारा उत्तम स्वभाव भागवतिक हो गया है तो

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बुरे लोगों पर भी हमारा अच्छा प्रभाव

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पड़ेगा उनका बुरा प्रभाव हमारे ऊपर नहीं

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पड़ेगा और जब तक भागवतिक सामर्थ्य नहीं है

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तो बुरा प्रभाव बहुत जल्दी पड़ जाता है।

23:52

इसलिए बच्चा नाम जप करो राधा राधा राधा

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राधा राधा और सत्संग सुनो दो बातें करो तो

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तुम्हें अध्यात्म ज्ञान हो जाएगा जिससे

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जित संग दोष किसी भी दोष का प्रभाव आपके

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ऊपर नहीं पड़ेगा। सोनिया जी कुरुक्षेत्र

24:10

से राधे-राधे महाराज जी महाराज जी 2 साल

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पहले मैं गहन डिप्रेशन में चली गई थी। फिर

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एक दिन मैंने आपको YouTube के माध्यम से

24:18

देखा और आपकी बातें फॉलो करना शुरू किया

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और धीरे-धीरे मैं महाराज जी अभी ठीक हो गई

24:23

हूं। मेरे डॉक्टर और दवाई दोनों का काम

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आपने किया। मेरे लिए आप भगवान बन के आए

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महाराज जी मेरे को एक नया जीवन दिया इसलिए

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आपका धन्यवाद करना चाहते थे।

24:31

धन्यवाद तो आपका है जो आपने हमारी बात को

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सुनकर के उस पर चलने का प्रयास किया और आप

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लाभ को प्राप्त हुई तो हमारा जीवन धन्य हो

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गया। यदि हमारी बातें सुनकर आप लोगों को

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लाभ ना मिले, आपको आनंद ना मिले, आपकी

24:49

गंदी बातें ना छूटे तो हमारा बोलना बकवास

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ही तो रहा, व्यर्थ ही तो रहा। तो आपने

24:55

हमारी बात को सुनकर, हमारी बात को मानकर

24:59

अपने को भी धन्य किया और हमको भी धन्य

25:02

किया। संत समागम का फल यही है कि आपकी

25:06

मानसिकता सुधर जाए। आपकी गंदे आचरण छूट

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जाए। आप चिंता भय शोक से मुक्त होकर आनंद

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को प्राप्त हो। यही संत समागम का फल है।

25:16

ज्ञानेश्वर जी महाराष्ट्र से राधे-राधे

25:19

महाराज जी महाराज जी भजन कहां-कहां साधक

25:22

का खर्च होता है और साधक भजन बचाने के लिए

25:24

क्या सावधानी रखें?

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देखो यदि भगवान की शरण में साधक है हृदय

25:31

से और हर कर्म भगवत अर्पण करता है।

25:36

कृष्णपणमस्तु

25:40

तो उसका फिर सरकारी खजाने से काम चलता है।

25:43

उसका भजन नहीं कटता।

25:46

जो साधक अहम पूर्ण साधना से साधना करता

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है।

25:53

भगवान की कृपा और भगवान की चरणों की हृदय

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से शरणागति स्वीकृत पूर्ण नहीं हुई है। तो

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प्रणाम से भजन नष्ट होता है। जब लोग

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प्रणाम करते हैं तो जो हमें प्रणाम करते

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हैं उससे हमारा भजन प्रणाम करने वालों के

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पास जाएगा। जो हमें कपड़ा देते हैं, हमारा

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भजन उनके पास जाएगा। जो हमें भोजन देते

26:17

हैं, हमारा भजन उनके पास जाएगा। हम जो

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रुपया लेते हैं, जितना लेते हैं, उसके

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परिणाम स्वरूप हमारा भजन भगवान से हटकर

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संसार के उन पुरुषों के पास जाएगा

26:30

जिन्होंने हमें रुपया दिया, भोजन दिया,

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कपड़ा दिया, प्रणाम किया, आदर सत्कार

26:36

किया। इन सब में भजन जाता है।

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तभी भगवत प्राप्ति जिनको करनी होती है

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समाज से बच के रोटी मांग के खा के फटे

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पुराने कपड़े पहनकर अपने भजन को बचाते हैं

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और बचा करके उसे पचाते हैं और पचाकर भगवान

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को प्राप्त हो जाते हैं। और जो साधक

26:56

शरणागत होता है, वो यह नहीं देखता कि ये

27:00

व्यक्ति दे रहा है। वह देखता है मेरे

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भगवान इस रूप में आकर मुझे दे रहे हैं।

27:07

उसका भजन नष्ट नहीं होगा।

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ध्यान देने योग्य

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मेरे भगवान ही ने कहा है अनन्य चिंतयंतो

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माम ए जना परपासते

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तेशा नित्याभुक्त नाम योगक्षेम वाम्यम

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जो मेरा अनन्य चिंतन करते हैं ऐसे जनों के

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योगक्षेम का वाहन मैं स्वयं करता हूं। यह

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बात ध्यान रखना

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जो निरंतर भगवान की शरण में रहकर भगवान का

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चिंतन करता है उसे चाहे रुपया दो पैसा दो

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भेंट कुछ भी जो प्रणाम नमस्कार सब आपको तो

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मिलेगा उसका लाभ लेकिन उस संत का कुछ भी

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नहीं जाने वाला

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क्योंकि वहां योगक्षम भाव में भगवान के

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वचन है और जब अहम ग्रह उपासना होती है अहम

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युक्त होती है तो फिर उसका वजन क्षीण होता

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है। जो लोगे तो प्रकृति का एक बूंद पानी

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भी फ्री नहीं। इसका भी टैक्स है। एक बूंद

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पानी भी प्रकृति का फ्री नहीं। इसलिए

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प्रकृति का उतना ही प्रयोग करो जितनी

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तुम्हें आवश्यकता हो। तुम्हारे पुण्य नष्ट

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हो रहे हैं। हम मान लो खुली है पानी

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की तो व्यर्थ में खुली मत रखो। वो किसी के

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काम आएगी। अगर व्यर्थ में आप पानी ले रहे

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हो तो टैक्स लग रहा है। आपका भजन कट रहा

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है। आपके पुण्य नष्ट हो रहे हैं। व्यर्थ

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में लाइट मत जलाओ। अगर काम चल रहा है बिना

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लाइट के तो मत जलाओ। प्रकृति की वस्तु का

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जितना उपभोग करोगे कोई भी हो उतने

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तुम्हारे पुण्य नष्ट होंगे। ये हमारा

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सरकारी कानून है। जितना प्रकृति का भोग

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करोगे उतने पुण्य नष्ट होंगे। और फिर पाप

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आएगा तो वही प्रकृति दंड देने वाली बन

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जाती है। वही फिर हमें महा दुख देती है।

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तो भजन करने वालों को जहां अहम ग्रह

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उपासना मैं भजन करता हूं वहां इन बातों से

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बचना चाहिए और जो भगवान की शरण में है वो

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तो जोई जोई प्यारो करे सोई मोहि भावे

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महलों में रखो चाहे झोपड़ी में वास दो

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जैसी तुम्हारी मर्जी हो हे नाथ मैं आपकी

29:14

शरण में हूं तो उनका भजन नहीं करता उनका

29:16

भजन सीधा भगवान को प्राप्त कराता है श्री

29:19

राधा वल्लभ लाल की

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