#1237 Ekantik Vartalaap & Darshan/16-04-2026/ Shri Hit Premanand Govind Sharan Ji Maharaj
राधा
राधा
राधा
[चीखने की आवाज़]
राधा [गाना गाने की आवाज़]
राधा
[चीखने की आवाज़]
राधा
राधा
[चीखने की आवाज़]
राधा
राधा
राधा
राधा
राधा
राधा
राधा
[चीखने की आवाज़]
राधा
राधा
राधा
राधा
राधा
राधा
[चीखने की आवाज़]
राधा
राधा
राधा
[गाना गाने की आवाज़]
राधा
राधा
हाय राधा राधा
राधा
राधा
[चीखने की आवाज़]
राधा
राधा
राधा [गाना गाने की आवाज़]
श्री राधा
वल्लभ लाल की समस्त संत हरि भक्तन की श्री
वृंदावन धाम की सतगुरुदेव भगवान की
जय हो।
रुद्रपाल सिंह जी राधे-राधे महाराज जी
महाराज जी भगवान के दिव्य पार्षदों व
सिद्ध महापुरुषों में भी कभी-कभी ऐसी
लीलाएं देखी जाती हैं काम क्रोध रूपी छट
विकारों का प्रादुर्भाव देखा जाता है जैसे
कि सनस सनंदन तथा देव ऋषि नारद जी जो
भगवान की लीला का आधार होते हैं तो मेरा
महाराज जी प्रश्न आया कि जब जीव भगवत
प्राप्ति कर लेता है तो वो भगवत स्वरूप हो
जाता है तो पांच भौतिक शरीर में तो
स्वाभाविक है परंतु जब वो दिव्य शरीरों
में भी ऐसा भाव आता है तो महाराज जी हमें
क्या समझना चाहिए साधकों जब हम तुम एक ही
बराबर के हो गए और संसार को अब कोई नाटक
दिखाना है हमें
तो हम तुम वैसे ही स्वांग करेंगे ना अगर
चतुर खिलाड़ी हैं तो सनक सनंदन सनातन सनत
कुमार भगवान के अवतार हैं। आप 24 अवतारों
में आप देखिए ये प्रथम सर्ग प्रथम भगवान
का अवतार है। सनक सनंदन सनातन सनत कुमार
इनमें क्रोध नहीं है।
इनमें भगवान की लीला की उत्पत्ति छुपी हुई
है। अब भगवान लीला करना चाहते हैं जगत में
आकर राम रूप से।
अब उस लीला का विरोधी भी कोई होना चाहिए
जिससे रंग बढ़े लीला में।
तो रावण रूपी विरोधी चाहिए। तो रावण रूपी
विरोधी कैसे बने? तो सनक सनंदन ने साप दे
दिया जय विजय को क्योंकि निजी पार्षद ही
भगवान का विरोध सह सकते हैं। दूसरा तो सह
नहीं सकता। जो ऐसे भगवान वैसे भगवान के
पार्षद तो लीला करने के लिए जय विजय बन गए
रावण कुंभकरण और सरकार का अवतार होता है
राम के रूप में और विविध प्रकार की पावन
लीलाओं की गाथा जो जगत का मंगल करने वाली
है।
नारद आदि महापुरुष सनका आदि महापुरुषों
में ना काम है ना क्रोध है ना लोभ है ना
मोह है ना मद है ना मत्सर है वो लीला के
लिए सूत्र है इसलिए उनका मिलान अपने कर्म
बंधन से युक्त शरीरों से नहीं किया जा
सकता वो दिव्य महापुरुष थोड़ी देर के लिए
क्रोध का अभिनय करते हैं क्योंकि उनको
लीला प्रकट करनी है। वह दिव्य महापुरुष
थोड़ी देर के लिए काम का अभिनय करते हैं
ना कि उनमें कामना है। इसलिए जो सिद्ध
महापुरुष भगवान को प्राप्त हो गए हैं। हम
इसीलिए उनको समझ नहीं पाते क्योंकि उनकी
बाह्य चेष्टा जनसाधारण जैसी रहती है। ऐसे
ही भगवान की दिव्य लीलाओं में जो दिव्य
महापुरुष हैं वो सब निर्विकार हैं। केवल
भगवान की प्रेरणा से थोड़ी देर के लिए वो
विकार का अनुभव करते हुए स्वांग कर रहे
हैं। कि हां भाई संकाद क्रोध से युक्त हो
गए। जो निरंतर ब्रह्मानंद में मग्न है
वहां क्रोध कहां जो अद्वैत निष्ठा ब्रह्म
को प्राप्त हो गए हैं तो द्वैत के बिना
क्रोध कहां आ सकता है? तो यह बातें समझती
है।
पुष्कर सिंह जी कानपुर से राधे-राधे
महाराज जी महाराज जी आपके वचनों को सुनकर
भक्ति मार्ग पर चलने का प्रयास कर रहा
हूं। आपके श्री मुख से सुना है कि एक ऐसी
अवस्था आती है जिसे प्राप्त करने के बाद
फिर कुछ पाने की इच्छा नहीं रह जाती। कुछ
जानना बाकी नहीं रह जाता। महाराज जी साधक
ऐसा क्या प्राप्त कर लेता है कि उसके भीतर
फिर कुछ भी पाने की जानने की इच्छा शेष
नहीं रह जाती। उस अवस्था को कैसे प्राप्त
कर सकते हैं?
यह
रहस्य है अगर समझ में आ जाए आपकी
आत्मा
पूर्ण तृप्त है।
आत्मा में कभी अभाव नहीं होता।
आत्मा पूर्ण काम है।
आत्मा आनंद स्वरूप है।
आत्मा प्रेम स्वरूप है। आत्मा चिदानंदमय
है। और वह मैं हूं।
शरीर
अपूर्ण है,
अतृप्त है,
सकाम है,
नाशवान है, दुखमय है, परिवर्तनशील है,
व्याधियों से युक्त है। तो जब हम शरीर में
मैं बुद्धि कर लेते हैं
तो हमारे कामनाएं प्रकट हो जाती है। हमारी
चिंताएं प्रकट हो जाती है। हमारे दुख
प्रकट हो जाता है। विशेष विशेष प्रकार की
वासनाएं प्रकट हो जाती है।
वही मैं अज्ञान के द्वारा निवृत्त होकर जो
आत्म स्वरूप में स्थित हो जाता है तो वही
आत्मा हमारी भगवान है।
चाहे भगवान में स्थित हो जाए या आत्म
स्वरूप में स्थित हो जाए। तो जहां भगवान
में स्थित हुआ तो पूर्ण काम परमानंदमय
अखंड शांति ये सब उसको प्राप्त हो जाती
है। अब उसे कुछ जानना बाकी नहीं रहता कुछ
पाना बाकी नहीं रहता। कोई चाह नहीं रहती
कोई सोच नहीं रहती। एक परमानंदमय स्थिति
गाढ़ आनंद
जैसे
सुशुप्त में कोई कामना कोई स्फुरना कोई
वासना कुछ नहीं रहती लेकिन वो घोर तमोगुणी
है। ऐसे जागृत में त्रिगुणातीत अवस्था
अपने आत्म स्वरूप को प्राप्त होकर ज्ञानी
महात्मा पूर्ण निष्काम हो जाता है।
न स्वात्मारामम विषय मृग तृष्णाम भ्रमयति
आत्माराम पुरुष कभी विषय रूपी मृग तृष्णा
में भ्रमित नहीं होता ऐसे ही जो भगवान की
भक्ति में ऊंचाई पर पहुंचता है। शरीर शरीर
संबंधी भोग शरीर संबंधी रिश्ते नातेदार
इनसे ऊंचे उठ जाता है और भगवान में उसकी
रति हो जाती है। तो उसकी ऐसी स्थिति हो
जाती है। कोई कामना नहीं, कोई चाह नहीं,
कोई अहंकार नहीं, कोई ममता नहीं। बड़ा
सुंदर दिव्य स्वरूप होता है तो जाह न चाह
कबहु कछु तुम सन सहज सनेह बसहु निरंतर
तासुर सु रा निजगे जिसकी चाह मिट गई भगवान
से सहज प्रेम हो गया तो स्वयं परमानंदम
में भगवान उसके हृदय में प्रकट हो जाते
हैं। है सबके हृदय में पर त्रिगुण माया का
पर्दा लगाकर भगवान है और भक्ति के हृदय
में प्रकाशित हो जाते हैं। जहां भय प्रकट
कृपाला दीन दयाला तो हृदय आनंद से भरकर
कभी नाचता है कभी हंसता है कभी गाता है
कभी समाधस्त रहता है न लाज तीन लोकन की न
वेद को कहो करे न शंख भूत प्रेत की न देव
जच्छते डरे सुने न कान और की दसे न और
इच्छना ऐसी स्थिति हो जाती है
इसलिए
देह भाव त्यागने की आवश्यकता है साधना
करके और जब देह भाव त्याग हो जाता है,
साध्य में स्थित हो जाता है तो फिर कोई ना
करने की चाह रहती है ना पाने की चाह रहती
है। जी लवीना जी इंदौर से राधे राधे
महाराज जी महाराज जी मैं एक प्रारंभिक
साधक हूं। साधना शुरू करने के बाद से कंचन
और कीर्ति खूब मिल रही है। वो चाही अनचाही
मनोकामना भी पूर्ण हो रही है। डर लग रहा
है कि सांसारिकता में उलझ ना जाऊं। अपनी
साधना को और परिपक्व हां यह बात जरूर
सावधानी रखनी चाहिए कि जब अनुकूलता मिले
तो डर जाना चाहिए।
कहीं मैं अनुकूलता में फंस ना जाऊं। यह
भजन का फल नहीं है। यह तुम्हारे पूर्व के
पुण्य हैं।
अभी जो तत्काल कामना पूर्ण हो रही है। जो
आपको चाहिए
कंचन कीर्ति आदि वह प्राप्त हो रहा है। तो
ये भजन का फल नहीं है। अब यह भजन का फल
आगे मिलेगा। यह आपके पुण्य का फल है। नहीं
तो एक से एक बड़े भजनानंदी है। पूरा जीवन
दुख में जा रहा है। तो क्या मतलब है? तुम
प्रारंभिक साधक हो। तुम्हारे लिए इतनी
छूट। जो चाहो वो मिल जाए, कीर्ति मिल जाए,
सब सुख मिल जाए और जो रात दिन भजन में लगे
उनको दुख इसका क्या मतलब है? भगवान क्या
उनसे नाराज है क्या? नहीं। उनके पाप नष्ट
हो रहे हैं। तुम्हारे पुण्य नष्ट हो रहे
हैं।
वो निष्पाप होकर भगवान की तरफ बढ़ रहे
हैं। तुम पुण्यों का भोग करके माया की तरफ
बढ़ रहे हो। अगर आए हुए पुण्य के संयोग से
संपत्ति सुख आदि को हम परोपकार में लगा
देते हैं। स्वयं भोग नहीं करते। परिवार की
सेवा में लगा देते हैं और खूब नाम जप करते
हैं। उससे प्रभावित नहीं होते तो कुछ नहीं
बिगाड़ पाएगी। हमारी भगवत प्राप्ति हो
जाएगी। अगर उसी को स्वयं भोगता मानकर
भोगने लगे भगवान का विस्मरण हो गया तो फिर
उसका प्रभाव आपको प्रभावित कर लिया। आप
अपने मार्ग से भ्रष्ट हो गए। इसलिए
सावधानी रखनी है। विजय श्री जी बीकानेर से
महाराज अष्टावक्र जी कहते हैं कि तू एक
क्षण में ज्ञान को प्राप्त कर सकता है। वो
किस ज्ञान की बात करते हैं जिसको पाने में
क्षण भी नहीं लगता? देखो
महापुरुषों की बातें सहज में समझ में नहीं
आती।
हजारों जन्म की साधना के बाद
मुमुक्षता प्रकट होती है। भगवान
शंकराचार्य जी ने कहा विवेक चूड़ामणि में
देख लो हजारों जन्मों के सुकृत और साधना
जब एकत्रित होते हैं तब जीव के मन में आता
है कि मैं संसार से मुक्त हो जाऊं और वो
मुमुक्षु उसे कहते हैं जो मोक्ष प्राप्ति
के लिए व्याकुल हो जाए।
यह जो अष्टावक जी जनक जी से बात कर रहे
हैं तो जनक जी जानते हो कितने बड़े
महात्मा है कितने बड़े ज्ञानी हैं।
अष्टावक्त जी कह रहे हैं घोड़े की रकाब पर
पैर रखकर उसके पीठ में बैठने में जितना
समय लगता है उतने में तुम्हें मैं ब्रह्म
बोध प्रदान कर दूंगा। किसको? जनक जी को।
हमें नहीं हमें तो रगड़ करनी पड़ेगी। ऐसे
ब्रह्म बोध थोड़ी हो जाता है। तैयार भूमि
जनक जी महाराज की विदेह राज है। तो बस जरा
सा संकेत किया स्वयं के अनुभव का तो एक
सेकंड में स्वयं में स्थित हो गया। स्वयं
स्वयं में स्थित होने में क्या टाइम लगता
है? अब वो परम पवित्र हैं। हम अपवित्र है
इसलिए हमारा देहाभिमान आड़ आड़े आ रहा है।
वो दीवाल की तरह मैं और देह के बीच में
है। वो दीवाल गिरे अहंकार की तब तो बात
बने साधना से। मैं पुरुष हूं, मैं स्त्री
हूं, मैं विद्वान हूं, मैं धनवान हूं, मैं
कुलवान हूं, मैं अम मैं यह जो मैं की
दीवार लग गई है, प्रकृति जनित इसे हटानी
पड़ेगी। परमात्मा जनित जो मैं है वो शुद्ध
ब्रह्म है। अहम ब्रह्मास्म
और जो अहम है वो मलिन मायाकृत है। यही बीच
में मे है। मे मिट जाए। सच्चिदानंद सुख का
अनुभव हो जाए। कोई भी साधक हो सबको भगवत
प्राप्ति का बढ़िया अवसर मिला है। मनुष्य
शरीर मिला है। हमें लगता है यार भगवत
प्राप्ति ना सही तो नाम जप तो कर ही लो।
ऐसा नाम जप कर लो कि अगला जन्म फिर मनुष्य
का मिले फिर भजन हो। यह जो सेकंड और क्षण
की बात है ब्रह्म ज्ञान की तैयार भूमिका
की बात है बिल्कुल तैयार है बस केवल आग
लगाने की जरूरत है बिल्कुल पेट्रोल की तरह
तैयार हो चुके बस ज्ञान अग्नि केवल फेंकनी
है कि ज्वाला जल उठी ज्ञान की वो है जनक
जी महाराज और उपदेशता है अावक की जी वैसी
भूमिका सबकी थोड़ी तैयार है इसलिए खूब नाम
जप करो नाम जप से परम मंगल हो जाएगा
ब्रह्म बोध भी हो जाएगा प्रेम भी हो जाएगा
मोक्ष भी मिल जाएगा। जो चाहोगे सब नाम से
प्राप्त हो जाएगा।
ओम प्रकाश गर्ग जी मध्य प्रदेश से
राधे-राधे महाराज जी महाराज जी जीवन के इस
अंतिम पड़ाव में जब शरीर शिथिल हो रहा है
तब भी मन दूसरों के प्रति ईर्ष्या और
क्रोध के विकार शांत नहीं कर पा रहा।
हां क्योंकि अभ्यास नहीं किया ना पहले से
अध्यात्म का अभ्यास ना होने के कारण शरीर
बुढ़ा गया। मन बुद्धि थोड़ी बुढ़ा गए।
मन बुद्धि तो नवीन ही रहते। शरीर बुढ़ा गया
है। मन बुद्धि तो वही है। यह कभी थकित
नहीं होते। कभी पुराने नहीं होते। ये नवम
नवम भोग नवम नवम राग द्वेष ईर्ष्या ये
पैदा करते रहते हैं। इसी के रोकने के लिए
भगवान का भजन है। यदि भगवान का नाम जप करो
तो सब ठीक हो जाएगा।
जासु नाम भव भषज हरण घोर त्रिशूल
दैहिक दैविक भौतिक तापों का नाश और संसार
के आवागमन चक्र से मुक्ति ये सब भगवान के
नाम से मिल जाएगी। इसलिए नाम जप करो अधिक
से अधिक राग द्वेष के चक्कर में मत पड़ो।
चलना है यहां से। मरना है। एक काल का कसाई
वाला है मृत्यु लोक।
सबको मरना है।
कोई आज, कोई कल, कोई परसों पर मरना प्यारे
सबको है। कुछ ऐसा कर लो जो यहां से ले
जाओ।
ये बैंक बैलेंस,
ये बड़े-बड़े पद,
बड़ा-बड़ा परिवार,
मित्र समुदाय
यह तुम्हारे साथ जाने वाला नहीं। तुम्हारा
शरीर भी आग में जला दिया जाएगा। या मिट्टी
में गाड़ दिया जाएगा। केवल तुम्हारे किए
हुए पाप और पुण्य कर्म तुम्हारे साथ
जाएंगे। इसलिए भगवान का नाम जप कर लो। जो
पाप और पुण्य दोनों से उठाकर तुम्हें
परमानंद की प्राप्ति कराए। नाम जप के बिना
कुछ नहीं होने वाला। हमारी बात बिल्कुल
पकड़ लो। इसलिए जिसको जो गुरुदेव ने नाम
दिया है राम कृष्ण हरि वाहेगुरु जो भी नाम
दिया है खूब नाम जप करो। नाम जप से ही
मंगल होने वाला है। बिना नाम जप के नहीं।
वसुंधरा गॉड जी राधे-राधे महाराज जी
महाराज जी आपके चरणों में कोटि-कोटि
प्रणाम। महाराज जी मुझसे संतों के प्रति
और आपके प्रति मन वचन से कोई अपराध बन गया
है। शायद जिसके फल स्वरूप भजन में बहुत
आलस प्रमाद आ गया है। श्री जी के लिए रोना
जो पहले आता था वो भी गायब सा हो गया।
महाराज जी आप कोई दंड दें या कोई
प्रायश्चित बता दीजिए। रोज सुबह प्रातः
उठकर के वृंदावन को प्रणाम करके जो हम
बोलते हैं वह बोला करो। हे वृंदावन धाम
हमारे जाने-अजाने में व्यक्त महापुरुषों
सहित यदि कोई अपराध आपका बन गया हो तो आप
हमें क्षमा करें। हर वृंदावन वासी को रोज
वृंदावन धाम से प्रार्थना करनी चाहिए कि
रोज प्रार्थना करें कि जाने अनजाने में
यदि कोई अपराध बन गया हो व्यक्त अव्यक्त
महापुरुषों [गला साफ़ करने की आवाज़]
का अपराध बन गया हो तो हे धाम कृपा करके
मुझे क्षमा कर दो तो जो अपराध होंगे वो सब
भस्म हो जाएंगे और बुद्धि शुद्ध हो जाएगी
अपराध बनेंगे ही नहीं ऐसा करो
संस्कृति जी
राधे-राधे महाराज जी महाराज जी बाहर की
दुनिया का संघर्ष और अंदर की दुनिया का
संघर्ष दोनों में बैलेंस कैसे करें अगर
बाहर हम किसी से प्रेम करते हैं तो हम ये
आकांक्षा रखते हैं कि वैसा ही प्रेम मिले
बट नहीं मिलता तो फिर महाराज जी अंदर से
दुखी हो जाते हैं। ऐसे में अपने आप को
कैसे देखो बाहर तो
जितना जगत है उसको कहा गया विषम
कभी सम तो हो नहीं सकता संसार
जीत विषम संसार संसार विषम है और भगवान ने
इस संसार को लिखा है दुखालयम अशाश्वतम
दुख देने वाला और नाशवान फिर आप इसमें सुख
कैसे पा सकते हैं। फिर आप इसमें प्रेम
कैसे पा सकते हैं? जब तक सब में भगवान को
नहीं देखोगे तब तक दुख मिलेगा, परिवर्तन
मिलेगा, विषमता मिलेगी। अंदर से हमारे
पश्चाताप, शोक, चिंता, भय ये मिलेंगे। अगर
इसी संसार के व्यवहार में हम जिस व्यक्ति
से प्यार कर रहे हैं उसमें हम झांक के
देखें कि मेरे भगवान बैठे हुए हैं और उन
भगवान से प्यार करें तो हमें कभी भी दुख
नहीं हो सकता क्योंकि उसकी हर चेष्टा मुझे
अच्छी लगेगी। वो गाली भी देगा, प्रतिकूलता
भी करेगा तो अच्छा लगेगा। मेरे भगवान है
ना इस रूप में मेरे भगवान है। जब तक भगवत
भाव नहीं रखोगे तो संसार दुखमय है। संसार
विषम है। संसार में द्वंद है। कभी लाभ,
कभी हान, कभी सुख, कभी दुख, कभी मान, कभी
अपमान, कभी जय, कभी पराजय यह सब बना
रहेगा। इसलिए सर्वतो भावेन भगवान की शरण
में होकर भगवान का नाम जप करते हुए सब में
भगवत भावना की जाए तो अंदर और बाहर दोनों
जगह का बैलेंस बन जाएगा। अगर भजन नहीं है
भगवत शरणागति नहीं है तो ना बाहर का
बैलेंस बनेगा ना भीतर का बैलेंस बनेगा।
बेमतलब में नेगेटिव विचार सोच कर जलते
रहोगे। अशांत रहोगे क्योंकि अंदर विवेक
नहीं जागृत हुआ। बाहर बेमतलब की कल्पना
करके किसी से अनुकूल, किसी से प्रतिकूल,
किसी से राग, किसी से द्वेष, हमारा जीवन
व्यर्थ चला जाएगा।
तो यदि हम बाहर भीतर दोनों जगह मंगल चाहते
हैं तो गोस्वामी तुलसीदास जी कह रहे हैं
राम नाम मणि दीप धरी जी दे हरी द्वार
तुलसी भीतर बाहु
जो चाहस उजियार बोले भगवान के नाम रूपी
मणि को जीभ रूपी द्वार पे रख लो तो भीतर
भी बैलेंस बन जाएगा और बाहर भी आनंद
रहेगा।
बाहर भी आनंद विवेक अंदर जागृत हो गया ना
तो हर बात दुख वाली काट कर आनंद प्रदान
करेगा। राम नाम मणि दीप धरी जीह दे हरी
द्वार
यदि वर्तते नाम्यम
नाम जीह जप जागे जोगी आ
इस संसार की मोह निद्रा से योगी जाग जाता
है नाम जप करके
अगर जीव से नाम जप करोगे तो कंठ में जाएगा
कंठ से हृदय में जाएगा और जब हृदय से नाम
चलेगा तो भगवान और साक्षात्कार हो जाएगा।
इसलिए भीतर और बाहर के बैलेंस को बनाने के
लिए भगवान की शरण में होकर भगवान का नाम
जप करो।
नव्या झा जी राधे-राधे महाराज जी महाराज
जी मेरी आयु 16 साल की है। महाराज जी इस
आयु में स्कूल में बहुत सी नई-नई संगतियां
मिलती हैं। बुरी भी हैं, अच्छी भी हैं। बट
महाराज जी दूसरों का संगति का असर मेरे पे
ना पड़े ऐसा मैं क्या करूं महाराज जी?
बिना ज्ञान के ऐसा नहीं हो सकता बच्चा जित
संग दोषा तो अध्यात्म नित्या
जो नित्य आत्म स्वरूप के ज्ञान में स्थित
रहता है उसको किसी भी संग दोष का प्रभाव
नहीं पड़ता नहीं तो
संग का प्रभाव पड़ जाएगा
एक बार काटेंगे दो बार काटेंगे तीसरी बार
वो बात हमारे अंदर बैठ ही जाएगी
वो बात काटने के लिए सतत ज्ञान रूपी तलवार
चाहिए जिससे कुसंग का हमारे ऊपर प्रभाव ना
पड़े। को कुसंगति पाए न साई रहा न नीच मते
चतुराई चाहे जितना बड़ा चतुर हो यदि उसे
कुसंग मिला तो वो धीरे-धीरे पतित हो ही
जाएगा। यदि उसे ज्ञान नहीं है तो और ज्ञान
है
तो जो रहीम उत्तम प्रकृति का कर सकत कुसंग
चंदन विष व्यापत नहीं लपटे रहत भुजंग अगर
हमारा उत्तम स्वभाव भागवतिक हो गया है तो
बुरे लोगों पर भी हमारा अच्छा प्रभाव
पड़ेगा उनका बुरा प्रभाव हमारे ऊपर नहीं
पड़ेगा और जब तक भागवतिक सामर्थ्य नहीं है
तो बुरा प्रभाव बहुत जल्दी पड़ जाता है।
इसलिए बच्चा नाम जप करो राधा राधा राधा
राधा राधा और सत्संग सुनो दो बातें करो तो
तुम्हें अध्यात्म ज्ञान हो जाएगा जिससे
जित संग दोष किसी भी दोष का प्रभाव आपके
ऊपर नहीं पड़ेगा। सोनिया जी कुरुक्षेत्र
से राधे-राधे महाराज जी महाराज जी 2 साल
पहले मैं गहन डिप्रेशन में चली गई थी। फिर
एक दिन मैंने आपको YouTube के माध्यम से
देखा और आपकी बातें फॉलो करना शुरू किया
और धीरे-धीरे मैं महाराज जी अभी ठीक हो गई
हूं। मेरे डॉक्टर और दवाई दोनों का काम
आपने किया। मेरे लिए आप भगवान बन के आए
महाराज जी मेरे को एक नया जीवन दिया इसलिए
आपका धन्यवाद करना चाहते थे।
धन्यवाद तो आपका है जो आपने हमारी बात को
सुनकर के उस पर चलने का प्रयास किया और आप
लाभ को प्राप्त हुई तो हमारा जीवन धन्य हो
गया। यदि हमारी बातें सुनकर आप लोगों को
लाभ ना मिले, आपको आनंद ना मिले, आपकी
गंदी बातें ना छूटे तो हमारा बोलना बकवास
ही तो रहा, व्यर्थ ही तो रहा। तो आपने
हमारी बात को सुनकर, हमारी बात को मानकर
अपने को भी धन्य किया और हमको भी धन्य
किया। संत समागम का फल यही है कि आपकी
मानसिकता सुधर जाए। आपकी गंदे आचरण छूट
जाए। आप चिंता भय शोक से मुक्त होकर आनंद
को प्राप्त हो। यही संत समागम का फल है।
ज्ञानेश्वर जी महाराष्ट्र से राधे-राधे
महाराज जी महाराज जी भजन कहां-कहां साधक
का खर्च होता है और साधक भजन बचाने के लिए
क्या सावधानी रखें?
देखो यदि भगवान की शरण में साधक है हृदय
से और हर कर्म भगवत अर्पण करता है।
कृष्णपणमस्तु
तो उसका फिर सरकारी खजाने से काम चलता है।
उसका भजन नहीं कटता।
जो साधक अहम पूर्ण साधना से साधना करता
है।
भगवान की कृपा और भगवान की चरणों की हृदय
से शरणागति स्वीकृत पूर्ण नहीं हुई है। तो
प्रणाम से भजन नष्ट होता है। जब लोग
प्रणाम करते हैं तो जो हमें प्रणाम करते
हैं उससे हमारा भजन प्रणाम करने वालों के
पास जाएगा। जो हमें कपड़ा देते हैं, हमारा
भजन उनके पास जाएगा। जो हमें भोजन देते
हैं, हमारा भजन उनके पास जाएगा। हम जो
रुपया लेते हैं, जितना लेते हैं, उसके
परिणाम स्वरूप हमारा भजन भगवान से हटकर
संसार के उन पुरुषों के पास जाएगा
जिन्होंने हमें रुपया दिया, भोजन दिया,
कपड़ा दिया, प्रणाम किया, आदर सत्कार
किया। इन सब में भजन जाता है।
तभी भगवत प्राप्ति जिनको करनी होती है
समाज से बच के रोटी मांग के खा के फटे
पुराने कपड़े पहनकर अपने भजन को बचाते हैं
और बचा करके उसे पचाते हैं और पचाकर भगवान
को प्राप्त हो जाते हैं। और जो साधक
शरणागत होता है, वो यह नहीं देखता कि ये
व्यक्ति दे रहा है। वह देखता है मेरे
भगवान इस रूप में आकर मुझे दे रहे हैं।
उसका भजन नष्ट नहीं होगा।
ध्यान देने योग्य
मेरे भगवान ही ने कहा है अनन्य चिंतयंतो
माम ए जना परपासते
तेशा नित्याभुक्त नाम योगक्षेम वाम्यम
जो मेरा अनन्य चिंतन करते हैं ऐसे जनों के
योगक्षेम का वाहन मैं स्वयं करता हूं। यह
बात ध्यान रखना
जो निरंतर भगवान की शरण में रहकर भगवान का
चिंतन करता है उसे चाहे रुपया दो पैसा दो
भेंट कुछ भी जो प्रणाम नमस्कार सब आपको तो
मिलेगा उसका लाभ लेकिन उस संत का कुछ भी
नहीं जाने वाला
क्योंकि वहां योगक्षम भाव में भगवान के
वचन है और जब अहम ग्रह उपासना होती है अहम
युक्त होती है तो फिर उसका वजन क्षीण होता
है। जो लोगे तो प्रकृति का एक बूंद पानी
भी फ्री नहीं। इसका भी टैक्स है। एक बूंद
पानी भी प्रकृति का फ्री नहीं। इसलिए
प्रकृति का उतना ही प्रयोग करो जितनी
तुम्हें आवश्यकता हो। तुम्हारे पुण्य नष्ट
हो रहे हैं। हम मान लो खुली है पानी
की तो व्यर्थ में खुली मत रखो। वो किसी के
काम आएगी। अगर व्यर्थ में आप पानी ले रहे
हो तो टैक्स लग रहा है। आपका भजन कट रहा
है। आपके पुण्य नष्ट हो रहे हैं। व्यर्थ
में लाइट मत जलाओ। अगर काम चल रहा है बिना
लाइट के तो मत जलाओ। प्रकृति की वस्तु का
जितना उपभोग करोगे कोई भी हो उतने
तुम्हारे पुण्य नष्ट होंगे। ये हमारा
सरकारी कानून है। जितना प्रकृति का भोग
करोगे उतने पुण्य नष्ट होंगे। और फिर पाप
आएगा तो वही प्रकृति दंड देने वाली बन
जाती है। वही फिर हमें महा दुख देती है।
तो भजन करने वालों को जहां अहम ग्रह
उपासना मैं भजन करता हूं वहां इन बातों से
बचना चाहिए और जो भगवान की शरण में है वो
तो जोई जोई प्यारो करे सोई मोहि भावे
महलों में रखो चाहे झोपड़ी में वास दो
जैसी तुम्हारी मर्जी हो हे नाथ मैं आपकी
शरण में हूं तो उनका भजन नहीं करता उनका
भजन सीधा भगवान को प्राप्त कराता है श्री
राधा वल्लभ लाल की
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