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गीता उपदेश | Geeta Updesh | Part 1

44:47EnglishBy TilakTranscribed Jul 13, 2026
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0:00

[संगीत]

0:00

लुट हमारी संस्कृति हमारे संस्कार

0:05

मैं सदा रहे हो

0:08

कि भारत के महान ग्रंथों और काव्यों का

0:10

संप

0:11

को सब्सक्राइब करें तिलक कई तरह की ढिलाई

0:17

आपके घर ऑफिस के लिए रिलाई इट्स इंडिया

0:20

प्राइस यह पार्थ आत्मा को ना कोई शस्त्र

0:24

काट सकता है न उसे अग्नि जला सकते हैं

0:28

इसको जल नहीं चला सकता ना इसे बाय ही सूखा

0:32

सकती है

0:34

एक नए नम छिदंति शास्त्राणि नैनम दहति

0:38

पावक न चैनं क्लेदयंत्यापो न शोषयति मारुत

0:43

तहुं है वह है सख्त कि को शास्त्री था बट

0:52

नहिं आवै हो यह चुनरी यह सब समझ कर

0:59

तुम्हें ना किसी के मरने का शोक मनाना

1:02

चाहिए और ना किसी के मरने की खुशी का

1:05

प्रदर्शन करना चाहिए

1:09

यह देखिए शब्द मैं कौरवों की सेना का

1:12

अवलोकन करना चाहता हूं विरासत दोनों

1:15

सेनाओं के मध्य में ले चले रे

1:17

कि तुम देखना चाहते हो तो दुर्योधन को

1:20

विजई बनाने के लिए कौन-कौन युद्ध सम्मिलित

1:23

हुए हैं और तहें किस-किस से युद्ध करना

1:26

होगा और के शव व्हाय यही देखना चाहता हूं

1:34

कि चलो मेरा लत दोनों सेनाओं के मध्य में

1:37

ले चलो ए

1:44

कर दो

1:46

कि यह रन तुम्हारी इच्छा के अनुसार मैं

1:50

तुम्हारा यह रख दोनों सेनाओं के मध्य में

1:53

ले आया हूं मैं

1:56

कि पश्चिम

1:57

कि शत्रु की सेना की ओर देखो

2:00

कि सीमा के अगर में खड़े हैं पितामह भैश

2:05

पांडवों के और तुम्हारे सबसे बड़े शत्रु

2:10

भ्रमण

2:12

है और हमारे सबसे बड़े शत्रु हैं

2:15

अपने दूसरे महत्त्व को देख लो अच्छा

2:19

वृद्धों तोहरे गुरुदेव

2:23

हुआ है

2:25

थे और उनकी बाईं ओर युवराज दुर्योधन ठे

2:31

कैन ते यह तो पांडवो को विजय भी बनाना है

2:35

मैं तुम्हें इन सब कट करना होगा आ

2:39

को व्हाट्सएप पर

2:45

[प्रशंसा]

2:52

अजय को

2:58

कर दो

3:04

में मौजूद पिक्चर लव लव यू

3:16

कि अर्जुन अर्जुन अर्जुन अ

3:26

कर दो

3:27

कि लुट

3:36

[संगीत]

3:41

लुट

3:50

[संगीत]

3:52

कर दो

3:58

[संगीत]

4:04

क्या हुआ है

4:16

थे इंडिविजुअल अपने उत्तर

4:28

एक व्हाट्सएप संदेश भेजें

4:32

लुट

4:40

एक संदेश भेजें

4:46

क्वेश्चन नहीं मैं किसी के खून चक्र हाथ

4:49

नहीं बन सकता विद्या आत्म तो उस दृश्य की

4:52

कल्पना से ही कांप उठती है इसमें मैं अपने

4:56

ही सगे संबंधी को खून कैसे बना सकता हूं

4:58

कैसे पहुंच सकता हूं गुरुदेव दीक्षित के

5:01

लिए पिता भगवान के समान होता है तो फिर

5:04

मैं उसका अनादर कैसे कर सकता हूं

5:08

कि जिस गुरुदेव ने उसे ढूंढ विद्यार्थी

5:10

तीर चलाना सिखाया है

5:13

हाउ टो विड्रॉ विद्या का दुरुपयोग करते

5:15

हुए उसे यदि शरीर पर तीरों की वर्षा गुरु

5:20

उन्हीं के सीने को छलनी करो तो इतना हो

5:24

जाए गिरा हुआ मनुष्य में ही इतना ऊंचा

5:26

खेड़ा वंश घिरे हुए हैं

5:30

लुटा मत दो आदरणीय ही नहीं पूछनी है पिछले

5:35

पूजनीय कि जिन क्या केवल नजर नहीं उठा

5:38

सकता हूं उनके विरुद्ध हथियार कैसे उठा

5:40

सकता हूं

5:42

श्री कृष्णा जब मेरे पैरों में चलना भी

5:46

नहीं सीखा था तब पितामह ने मुझे मेरा हाथ

5:50

थाम कर जीवन पथ पर एक-एक कदम चलना सिखाया

5:53

था जिसमें विटामिन के सीने से मेरे लिए

5:58

प्रेम से की गंगा और जमुना सदा भुट्टे ही

6:01

है उस पर टावर के सीने में तलवार वह का

6:04

खून की नदियां कैसे बाहर सकता हूं मैं कोई

6:08

डेट नहीं है जो मैं मेरे अपनों के ही रक्त

6:10

स्राव करूं पिछड़ों पर नहीं हो सकता तो आप

6:15

ही नहीं वह अर्चन पा पा

6:17

अच्छा लगता है उर्वशी कि शराब का प्रभाव

6:20

कम पर अफीम शुक्र है

6:23

कि तुम अभी नपुंसक किफायती बोल रहे हो आप

6:28

तुम युद्ध भूमि के बीच खड़े होकर जो भाषा

6:32

बोल रहे हो तो किसी युद्ध के भाषा नहीं आज

6:38

मैं अपना कहते-कहते तुम्हारे जुआ थकी नहीं

6:43

जिनके लिए तुम्हारे मन में प्रेम इसमें और

6:47

नाटक की गंगा बह रही है याद रखो यह लोग है

6:52

तो 13 वर्षों पहले दूत सभा में तुम्हारी

6:56

पत्नी द्रौपदी के निरस्त होने का तमाशा

6:59

चुपचाप देखते रहे थे किसी ने तिब्बत तक भी

7:02

नहीं लाई थी ना

7:04

हैं इनमें से किसी एक देवी उसकी रक्षा के

7:07

लिए उस समय हाथ नहीं उठाए थे अ

7:11

है और वही हाथ आज तुम्हारी हत्या के लिए

7:14

उठे हुए हैं सत्य हाथों में तुम्हारे और

7:18

पांडवों के बाद के लिए आज 73 बारिश तड़प

7:22

रही है कि तुम्हारे अपने हैं जिनके लिए तो

7:33

प्रेम और आदर की भाषा बोल रहे हो

7:37

अयन तुम इस समय कोई लग्न मंडप पर नहीं हो

7:42

बल्कि युद्ध भूमि पर खड़े हो

7:47

में मौजूद है तुम अपना समझ रहे हो वह इस

7:51

युद्ध भूमि में तुम्हारा स्वागत और आदर

7:54

सत्कार करने नहीं आए हैं

7:56

कि उस शख्स अब तुम्हारा और तुम्हारे

7:59

भाइयों का नाम अपने स्तर पर लेकर आए हैं

8:04

के पिछोर इनकी आंखों में तुम पांडु की

8:08

मृत्यु दंड नीति देखे तृष्णा तड़प रही है

8:12

8:14

अपनी तरफ कि क्या इस

8:18

एक केबल तुम पांडवों के वक्त से ही मुझे

8:21

कि देखूंगी टेबल

8:28

कर दो

8:32

अपने तो यह विषैले बाण किस-किस को अपना

8:35

निशाना बनाने के लिए उत्सुक हैं

8:39

एक तुम्हारे अपने हैं तो फिर यह तुम्हारे

8:42

कौन है

8:43

कि पढ़ाई हैं शत्रु हैं अ

8:49

एक अजनबी तुम कौन हूं कि निर्दई शस्त्रों

8:52

के हवाले कर देना चाहते हो तो फिर यह

8:56

तुम्हारे अपने जो तुम्हारे जीवन और मृत्यु

9:00

मैं तुम्हारे साथ हैं

9:02

मैं तो तुम्हारे कंधे से कंधा मिलाकर

9:04

तुम्हारे हित के लिए युद्ध करने आए हैं

9:09

कि उन्हें ज़ूम इस समय यह सब तुम्हारी

9:13

गांड के प्रकार सुनने के लिए उत्सुक है हे

9:16

पार्थ

9:18

और इस युद्ध भूमि कीमत रेखा पर खड़े होकर

9:22

मैं तुम्हारी दृष्टि पल

9:24

मैं यह कपड़ा बढ़ गया है

9:27

कि आदित्य तुम देख रहे हो

9:30

है कि यह तुम्हारे अपने

9:33

है परंतु यह अर्धशतक तुम्हें नहीं दिखाई

9:35

दे रहा है

9:38

मैं तुझे कौन हो जो तुम्हारे अपने हैं वह

9:41

इस युद्ध भूमि में तुम्हें अपने गले लगाने

9:44

नहीं आए हैं

9:45

[संगीत]

9:46

है बल्कि तुम्हारे खून से होली खेलने आए

9:49

हैं यह सब जुड़े तुम अपना कह रहे हो

9:54

कि यह कौन हो एक बात निश्चित रूप से जानते

9:57

हैं कि जब उन्हें इस युद्ध में विजय

10:00

प्राप्त करनी है तो महापराक्रमी को अपने

10:04

रास्ते से हटाना होगा जिसका नाम अर्जुन है

10:07

पार्थ तुम इन्हें अपना समझते हो इसलिए

10:12

तुम्हें मौत के घाट नहीं उठाना चाहते हैं

10:16

है परंतु यदि तुम्हें मौत के घाट नहीं

10:18

करोगे तो यह अवश्य ही तुम सब को मौत के

10:22

घाट उतार देंगे अब

10:25

सूजन

10:26

कि यदि वह मुझे मारना चाहते हैं

10:29

कि तुम आर्थिक मुझे इसकी कोई चिंता नहीं

10:33

पर तो मैं अपनों को ही मांस कर पाप कैसे

10:36

कर सकता हूं मैं

10:39

कि यदि वह हो लोग से निश्चित होकर अपने ही

10:43

कठिन नष्ट होने वाले 200 और पप्पू को नहीं

10:46

देख सकते तो क्या हुआ पर तो हम तो इस

10:52

युद्ध के फल स्वरूप होने वाले विनाश और

10:55

विनाश से उत्पन्न दोषों को देख सकते हैं

10:57

उस विचार कर सकते हैं देखिए शव तुम तो

11:02

जानते हो कि कुलधर्म नष्ट होने से सनातन

11:06

कुल धर्म का नाश हो जाता है और धन के नष्ट

11:09

हो जाने से संपूर्ण कुल में पाप उसी

11:12

प्रकार फैल जाता है

11:15

है जैसे कोई प्राणघातक रोग मनुष्य के शरीर

11:17

में फैल जाता है

11:19

कि उस फैले हुए पांच के कारण स्कूल कि

11:23

स्त्रियां दूषित हो जाती है

11:27

थे और स्त्रियों के दूषित हो जाने से

11:29

वर्णसंकर संतान उत्पन्न होती हैं

11:32

है और वर्णसंकर के पास के कारण संकुल का

11:35

गुण पुलिस अधिकारी बन जाता है इतना ही

11:40

नहीं उनके पितरों को भी अ जो गति प्राप्त

11:43

होती है गोल अक्षय प्राइस यंति उड़द धर्मा

11:47

सनातन दादर में 10 टेस्ट व मुक्तिपथ सनम

11:50

अधर्व अभी भगत युद्ध अधर्माभिभवात्कृष्ण

11:54

प्रदुष्यंति कुलस्त्री अत इस त्रिशूल

11:59

दृष्टा सू वाष्र्णेय जयते वर्णसंकर इस

12:06

अध्ययन की अवधि में युद्ध करो

12:09

है कि कैसे हो सकता है

12:12

को बिल्कुल घाटी होने का पाप स्वयं अपने

12:15

हाथों

12:16

मैं अपनी मां स्कर्ट कैसे लिखूं मैं

12:19

थे फिफ्थ नहीं करूं कब

12:22

का म्यूजिक भी नहीं करूंगा अब

12:25

कि इससे तो अच्छा है कि मैं कमंडल लेकर

12:30

घर-घर भिक्षा मांगता फिर बार जब कितनी

12:34

सुंदर विचार हैं

12:36

कि मुझे दूध नहीं करूंगा मैं भिक्षा मांग

12:40

लूंगा मैं

12:41

कि हे अर्जुन

12:43

कि यह बात कोई वीर नहीं केवल एक दायर कर

12:47

सकता है कि तुम अपनी कार तक प्रदर्शन करने

12:51

के लिए इस युद्ध भूमि पर आए थे

12:55

है इसीलिए तुमने भगवान शिव से

12:58

पाशुपतास्त्र घर किया था जब वर्षों घोर

13:03

तपस्या करके अपने पिता श्री देवराज इंद्र

13:07

से तुमने दिव्यास इसलिए प्राप्त किए थे

13:10

क्या तुम्हें अपनी माता कुंती का अंतिम

13:14

संदेश याद नहीं

13:16

है कि जब भी मेरे चमक आओ तो विजय भवन कराओ

13:20

और अपने माथे पर कौरवों के रक्त से विजय

13:25

तिलक लगाकर आओ ही अर्जुन याद रखो अपनी

13:31

माता के इस वचन को निभाने की जिम्मेदारी

13:34

तुम पढ़ें

13:36

है इसलिए

13:38

को अपने हृदय की तुच्छ दुर्बलता को

13:41

त्यागकर क्षत्रियों की भांति युद्ध करो कि

13:46

क्षत्रियों का धर्म है युद्ध करना हे

13:49

मधुसूदन मैं भी जानता हूं कि मैं क्षत्रिय

13:53

युद्ध करना मेरा धर्म है 35 युद्धभूमि में

13:58

युद्ध अभिलाषी इस वजन सबूत को देखकर बिना

14:02

शरीर ढीला पड़ रहा है ब्रिज आत्मा कहां पर

14:06

है यह गला सूख रहा है है

14:11

है तो उस पर विरोधी विचारों किया खबर से

14:14

मेरी मति भ्रमित हो गई है

14:17

कि इस कविता के कारण मुझे मेरा मार्ग

14:20

स्पष्ट दिखाई नहीं दे रहा था

14:23

ए क्वेश्चन

14:25

कि तुम मेरे गुरु हो भगवान शिव भक्त मैं

14:29

तुम्हारी शरण में आया हूं अब तक मेरा

14:33

मार्गदर्शन करो

14:35

कि जिला स्तर पर दिखाओ

14:37

यहां पहुंचता है उसके अधीक्षक ए

14:42

कर दो

14:46

खैरणा अश्रुपूरित नयनों की आंख यह कुंअर

14:54

विचलित यजुष न तमगा धोकर पास को डुबो ने

15:07

भगवान भोले शिव भगवान को

15:18

मैं अशोक चव्हाण व सोच तुम

15:21

प्रज्ञावादांश्च भाषसे ददा सून घटा सूच ना

15:27

अनुसूचित जाति पंडिता

15:30

हो चुके जो भाग्य नहीं उन में कोई इनके

15:35

शोक मे तुम अकुलाए पंडित तो जैसे बोले बचन

15:44

और सच्चे ज्ञान से अख़ चुरा के खंभों में

15:50

तारों की ज्योति काल जलाएं कर बुझा है

15:56

यानी विचलित होते नहीं कोई जग में रहे या

16:01

जड़ से जाए यानी विचलित उद्देश नहीं कोई

16:07

जग में रहे या जग से बजा दो

16:12

हैं जूही रेडियो चलें प्रभुं अर्धकुंभ को

16:19

ज्ञान करो पेज पर हो गया केंद्रित सबका

16:29

ध्यान

16:30

कि दोनों केंद्रित सभका बधाइयां ब्रह्म

16:40

जाएंगे इन नारद चॉप कि वनों में पोथू हलो

16:47

जहां चारों दिशाएं सचेत हुई धरती पर ध्यान

16:56

सभी का लगा नीता के महागुन अध्यन को शिव

17:06

ने जानता समाधि राजघाट फिकर जून के

17:14

निमित्त मिले का यह नाम ऋषभ को भी नुकसान

17:19

आइके अर्जुन के निमित्त मिलेगा क्या नाम

17:24

ऋषभ तो बिन मांगे वार्ड 17 में

17:30

ज्ञान की बड़ी-बड़ी बातें करते हो अब

17:34

दूसरी सांस में अपने कोशिश बांधकर मुझसे

17:38

ज्ञान और मार्गदर्शन किया सभी करते हो यह

17:42

पार्थ तुम्हारा ज्ञान अधूरा है और अधूरा

17:46

ज्ञान दोधारी तलवार की भांति होता है जो

17:50

अधूरे ज्ञान देने वाले और लेने वाले दोनों

17:53

को काटती है इसलिए सबसे पहले तुम्हें इस

17:58

घातक तलवार को छोड़ना होगा ना कि फिर घंटी

18:01

इसको

18:03

है परंतु तुम तो उल्टा ही काम कर रहे हो

18:06

तुम्हारे हाथ पर अधूरे ज्ञान की तलवार है

18:10

है और तुमने अपने गांधी देव म्यूजिक छोड़

18:13

दिया है

18:14

हैंड्स फ्री के शव मैं क्या करूं

18:18

कि मेरा मन और मस्तिष्क उस धर्म कांटे की

18:21

भांति डोल रहा है

18:25

ऑफिस के दोनों पलड़ों में बराबर-बराबर

18:26

मात्रा में ज्ञान और ज्ञान दोनों रखा हुआ

18:30

था उसी चौराहे पर खड़ा हुआ था मैं उसकी

18:34

शरण में आया हो कुछ नहीं घरों की बहुत ही

18:38

रास्ता दिखाओ

18:40

कि वास्तव रास्ता दिखाओ हे अर्जुन तुम इस

18:46

समय ना केवल इस युद्ध भूमि के मध्य रेखा

18:48

पर खड़े हो बल्कि तुम्हारे बुद्धि भी जीवन

18:52

और मृत्यु के मध्य रेखा पर अटकी हुई है

18:55

इसलिए तुम अपने कर्तव्य और अपने धन से भाग

18:58

रहे हो

19:00

हैं परंतु अपने करते हुए इसे यू मोड़ने से

19:04

है या इस युद्ध से विचलित होने से विधि का

19:08

विधान नहीं बदलेगा क्योंकि विधाता करनी है

19:11

अटल और अचूक है तुम क्या समझते हो

19:15

तुम्हारे नहीं मारने से यह सब नहीं मरेंगे

19:20

नहीं हर जुर्म नहीं तुम इन्हें नहीं

19:24

मारोगे तब भी यह मरेंगे क्योंकि उनके

19:27

प्रारब्ध में इनकी मृत्यु का समय 3 अशरण

19:31

तो पहले से ही निश्चित कर दिया है इसी

19:35

विधान के अनुसार मैं तुम्हें पहले ही मर

19:38

चुका हूं तुम तो केवल माध्यम मात्र हो

19:41

तुम्हारे माध्यम से मैं इन सब का वध करना

19:44

चाहता हूं तो विजय अपना कर्तव्य सब्जियों

19:49

या प्रारभ तुम्हें इन सब का स्वागत करता

19:53

है

19:55

कि मैं क्या करूं मैं क्या करूं मधुसूदन

19:58

अपने मन को कैसे मारूं अपनी भावनाओं को

20:02

अपने ही पैरों तले कैसे रोड आलू तथा

20:06

मधुसूदन मैं क्या करूं हे पार्थ धन के

20:11

रास्ते से हटाने वाले भावनाओं का त्याग

20:14

करो

20:15

कि भावनाओं के समुद्र में ढालने के बदले

20:18

टाइम सीखो

20:20

मैं तुमको कीर्तिमान पुष्य अपनी निर्बलता

20:24

कल्याण प्रदर्शन करके तो अभी कीर्ति को

20:27

नष्ट मत करो तो

20:31

कि एक वीर पुरुष के लिए उसके कीर्ति कर

20:34

नष्ट होना उसकी मृत्यु के समान है इसलिए

20:38

युद्ध करो पाठ युद्ध और अपने की वृद्धि

20:42

अपनी कर्त्तव्य और अपने धर्म की रक्षा को

20:45

दो

20:47

कि आखिर टीम चापि भूतानि कथित चिंतित

20:51

व्यायाम संभावित सच्चा खीर थी महाराणा

20:56

अतिविचित्र इस धर्म युद्ध में यदि

21:00

तुम्हारे भी गए तो तुम्हें वीरगति प्राप्त

21:03

होगी तो मरकर भी अमर कहलाओगे इसलिए युद्ध

21:07

करो हम तो वह अपराध सी स्वर्गं जित्वा वा

21:14

भोक्ष्यसे महीम तस्मादुत्तिष्ठ कौंतेय

21:18

युद्धाय कृतनिश्चय पे वासुदेव तुम तो

21:23

जानते हो कि मुझे अपनी मृत्यु की चिंता

21:26

तिल भर भी नहीं है

21:28

लुट

21:30

[संगीत]

21:32

कि भीड़ जुटनी मैं जानता हूं तुम इस धर्म

21:36

युद्ध में अपने प्राणों की आहूति देने से

21:39

जरा भी नहीं घबराते तुम्हारे हृदय की

21:42

दुर्बलता केवल अपने संबंधों के आधार में

21:45

है जो धर्म के क्षेत्र में अर्थ हीन है

21:51

मैं तुम्हें अपने संबंधों की मृत्यु की

21:54

चिंता है परंतु तुम्हारा यह विचार

21:57

तुम्हारे अध्ययन का खुला प्रतीक है तो ठीक

22:01

कह रहे हो के शव इस समय मेरी बुद्धि

22:04

अज्ञान के अंधकार में डूबी जा रही है धर्म

22:07

क्या है और अधर्म क्या है जिसका ज्ञान

22:10

नहीं रहा

22:12

का मैक्रम के कैसे दोराहे पर खड़ा हूं

22:14

जहां से पता नहीं चल रहा था कि धर्म का

22:17

मार्ग कौन सा है और अधर्म का मालिक कौन सा

22:21

कि मुझे अज्ञान के अंधकार से निकलने का

22:24

रास्ता दिखाओ के शव रास्ता दिखाओ नहीं

22:28

पार्थ दत्त वे इसी अज्ञान के अंधकार से

22:32

निकालना चाहता हूं इस अंधेरे में अंधों की

22:36

भांति हाथ-पैर मारने के बदले अपनी

22:39

दूरदृष्टि को एक दिशा दो और देखो इस

22:44

सृष्टि की ओर इस सृष्टि में जो जन्म लेता

22:49

है उन निश्चित रूप से मृत्यु के अधीन हो

22:53

जाता है इसका अर्थ यह है कि इस मृत्युलोक

22:57

का हर प्राणी चाहे वह मनुष्य हो पशु हो

23:01

पक्षी हो यह पेड़ पौधा हो हर सांस लेने

23:06

वाला प्राणी अपने जन्म के साथ अपने मृत्यु

23:09

को भी लेकर आता है हर प्राणी को एक न एक

23:13

दिन निश्चित समय पर मरना अर्थात अपना शरीर

23:18

त्यागना ही पड़ता है अ

23:21

है इसलिए तुम उनके मरने की चिंता छोड़कर

23:24

अपना कर्तव्य समझकर युद्ध करो जातस्त हि

23:30

ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च

23:34

तस्मादपरिहार्येथे न त्वं सोच तुम रस्सी

23:39

ठे कृष्ण क्योंकि प्रभु मत में लिखा है

23:43

यदि पितामह की मृत्यु का समय आ गया है तो

23:46

वह अवश्य जाएंगे पर तो मैं अपने हाथों से

23:49

उन्हें क्यों मानूं हूं तो स्वयं अपने

23:53

हाथों से अपने भीष्म पितामह को निभाना

23:55

चाहते हो यही सत्य है मत हो

23:58

कि मैं पर भीष्म पितामह को अपने हाथों से

24:01

नहीं मार सकता तो ठीक है वह मारो परंतु

24:05

पहले मुझे यह तो बताओ कि कौन है तू मेरे

24:08

भीष्म पितामह हो

24:12

तुम्हारे भीष्म पितामह को

24:15

यह क्यों पूछ रहे हो तुम दिखाई नहीं देते

24:17

क्यों गुस्सा नहीं तो है खड़े विष्णु

24:20

तांबा वह जो व्रत के ऊपर करना है हां वही

24:24

तो

24:27

कि प्रभु झटके ऊपर घर दिखाई दे रहा है

24:29

पार्थ उद्योग भीष्म पितामह पर शरीर है

24:34

तो मैं पूछता हूं असली भीष्म पितामह कौन

24:36

है कहां है कृष्णा तुम्हारी बात मेरी समझ

24:41

में नहीं आ रही है मुझे दिख रहा है और

24:45

भीष्म पितामह नहीं है केवल शरीर है

24:49

इस स्थल की भीष्म पितामह को यौन है अवश्य

24:52

मैं तुम्हें समझा रहा हूं मैं तेरे को

24:56

ध्यान से से

24:58

शो मोर

24:59

मैं देखूं शरीर में जो प्रकाश है जिसे

25:03

आत्म कहते हैं मैं तुम्हें थे भिक्षु

25:06

प्रदान करता है

25:11

महंगी भी चक्षुओं से देखो साथियों को

25:18

है कि शरीर के अंदर आत्मा है जो प्रकाश है

25:24

वहीं यस्मिन भीष्म पितामाह दिखाई दे रही

25:28

हूं कि आप पा हां केशव बहुत अच्छा अब देखो

25:33

यदि मैं अपने सुदर्शन चक्र से भीष्म

25:36

पितामह का शरीर काट दो तो केवल उनका शरीर

25:40

मरेगा परंतु उनकी आत्मा का प्रकाश नहीं

25:44

पूछेगा देखो मैं तुम्हारे दिव्य चक्षुओं

25:48

को यह दृश्य सजीव करके दिखाता हूं

25:53

लुट

25:54

ब्लुटूथ

25:56

कर दो

26:01

लुट

26:05

यह देखिए आज हम मेरी सुदर्शन से केवल कुछ

26:09

शरीर का नाश हुआ है

26:11

कि उसकी आत्मा का दिया अब भी उसी प्रकार

26:14

चल रहा है कौन से उस परम सत्य को अच्छी

26:19

तरह समझ लो

26:20

है कि विश्व में केवल शरीर नाशवान है

26:24

किंतु आत्मा अविनाशी है शरीर के मरने पर

26:28

आत्मा नहीं मरती थी

26:30

कि आत्मा न कभी जन्म लेती है और मैं कभी

26:35

मरती है वह जन्म नृत्य सनातन और पुरातन है

26:41

जो शरीर को मारने पर भी नहीं मानी जाती है

26:45

क्यों न हम ये जूते हन्यमाने शरीरे जो शव

26:49

तुम्हारी बातें मेरी बुद्धि को भ्रम में

26:52

डाल रही है

26:53

हां तुम तो बातें एक साथ कह रहे हो तो

26:56

परस्पर विरोधी है तुम कहते हो कि शरीर मर

26:59

जाता है परंतु शरीर का एक हिस्सा जिसे

27:02

आत्मा कहते हैं वह नहीं बनता नहीं अर्जुन

27:06

मैंने आत्मा को शरीर का एक हिस्सा इन कहा

27:10

मैंने कहा है कि आत्मा और शरीर दो अलग अलग

27:15

चीजें हैं

27:17

है जिसे तुम और तुम्हारा कवच तो अलग चीज

27:20

हैं तुम्हारे कवच के दो टुकड़े हो जाएंगे

27:23

तो इसका यह अर्थ नहीं होता कि अर्जुन के

27:26

दो टुकड़े हो गए जिस प्रकार तुम और

27:29

तुम्हारा कवच दो अलग-अलग वस्तुओं हैं

27:32

कि यह तुम और तुम्हारा यह व्रत दो अलग-अलग

27:35

वस्तुओं हैं उसी प्रकार मनुष्य का शरीर और

27:38

उसकी आत्मा दो अलग-अलग वस्तुओं हैं यह समझ

27:42

लो कि जिस रथ में अर्जुन बैठा है वह व्रत

27:46

अर्जुन में है अर्जुन तो वह है जो रथ में

27:49

बैठा हुआ रखी है जो ठीक है बाधाओं के

27:53

अर्जुन रथ नहीं है अर्जुन मैं हूं चोट में

27:57

बैठा हुआ है

27:58

और मेरठ के टूटने का शोक नहीं होगा परंतु

28:01

और उनके मरने का तो शो को ही अर्जुन

28:06

तुम्हारी बातें सुनकर मुझे तुम्हारी

28:08

बुद्धि पर हंसी आ रही है

28:10

मैं अपनी तरफ से तुम बड़े पंडितों और

28:13

ज्ञानियों जैसी ऊंची-ऊंची बातें कर रहे हो

28:16

तुम तुम यह पता नहीं कि जो सचमुच ज्ञानी

28:20

होते हैं वह ना उनका शो करते हैं जो मर गए

28:24

हैं और उनका शो करते हैं जो अभी नहीं मरे

28:28

हैं क्योंकि वह जानते हैं कि जो मर गया है

28:31

और फिर जन्म लेगा और जो अभी जीवित है वह

28:35

अवश्य मिल जाएगा मरने वाला फिर जन्म लेगा

28:39

क्योंकि केवल शरीर का नाश होता है शरीर के

28:43

अंदर जो आत्मा है वह कभी नहीं मरता है

28:47

में ही पार्थ इस संसार में दो ही वस्तुएं

28:51

हैं-एक शरीर और दूसरा शरीर में रहने वाला

28:55

शरी जो शरीर में रहने वाला आत्मरूप शरीर

28:58

ही है वह कभी मरता नहीं और जो शरीर है उस

29:04

सदा रहता नहीं

29:06

कि आत्मा एक शरीर छोड़ता है और दूसरा शरीर

29:10

धारण कर लेता है बिल्कुल वैसे ही जैसे

29:13

मनुष्य पुराने कपड़े उतारकर नए कपड़े धारण

29:17

कर लेता है

29:18

कि वह सांसद मीणा ने यथा विहाय नवानि

29:22

गृह्णाति नरोपराणि तथा शरीराणि विहाय

29:26

जीर्णा व अन्य त्यौहार दी डा

29:33

को शेयर महाकुंभ का यह बेडेड हैं का

29:40

त्योहार गैस पुराने वास्त्र युक्त पान उन

29:48

जैसा फाल जीवात्मा का नूतन चुने न एड

30:04

परिधान के धार लेनी जैसा मेज़ चोला वस्त्र

30:17

विजय झा लें है कहते रिचार्ज ऐसा जो लेंगे

30:31

इष्ट परिवर्तन

30:33

उम्र और क्या है सीई रज में हार मिली है

30:41

जैसा वह प्रभाव्ा पास केवल इतना समझ लो कि

30:49

दरवाजा जिसके अंदर जाते हुए आप पुराना

30:53

शरीर छोड़ देती है वास्तव में मृत्यु और

30:56

जन्म के दरवाजे जो एक-दूसरे के आमने-सामने

30:59

है प्राणी जब नृत्य के दरवाजे पर पहुंचता

31:03

है तो उस शरीर की मृत्यु हो जाती है

31:08

हैं कि आत्मा का प्रकाश पुष्ट शरीर को

31:12

छोड़कर आगे चला जाता है

31:15

[संगीत]

31:18

रॉबिन को प्रकाश ने यह जन्नत के दरवाजे

31:22

में प्रवेश करता है

31:26

है जहां जीवात्मा को फिर से एक नया शरीर

31:30

प्राप्त हो जाता है और वहां से उसके नए

31:35

जन्म की नई यात्रा शुरू हो जाती है

31:38

[संगीत]

31:40

कि हे पार्थ आत्मा नित्य है इसलिए वह नहीं

31:44

बदलती परंतु शरीर नाशवान है इसलिए एक ही

31:49

आत्मा के कई शरीर बदलते हैं इसलिए हर नए

31:53

जन्म में वह नए-नए शरीर धारण करता रहता है

31:57

हर नए जन्म मैं आत्मा नए-नए शरीर तो बदलता

32:01

ही है बल्कि हर एक जन्म में भी उसे जो

32:05

शरीर मिलता है वह एक शरीर भी उसी जन्म में

32:09

बदलता रहता है यह बात मेरी समझ में नहीं

32:11

आई के शब्द क्योंकि एक जन्म में तो प्राणी

32:14

को एक ही फल मिलता है नहीं एक नहीं अनेक

32:20

शरीर मिलते हैं एक ही जन्म में वह भी नहीं

32:23

समझा प्रभु मैं समझाता हूं याद करो अपना

32:27

बचपन उस समय अर्जुन का शरीर कैसा था

32:30

मैं तो एक बार लगता और आज वह शरीर कहां है

32:33

वह शरीर तो बदल गया इस शरीर में अर्थों

32:37

शर्म नहीं रहा आज सुबह एक युवक के शरीर

32:40

मिला है इसी प्रकार प्राणी को जन्म के समय

32:44

शिशु को शरीर मिलता है वहीं शिशु का शरीर

32:48

काल के प्रभाव से एक बालक के शरीर हो जाता

32:52

है

32:53

तो फिर किशोरावस्था में आता है

32:56

तो फिर जवान पुरुष के शरीर बनता है

33:00

तो फिर अधिक उम्र का बुरी तरह प्ले कर दो

33:05

और अंत में एक सूखे पत्ते की तरह जीवन के

33:09

वृक्ष से टूटकर क्वेश्चन है

33:12

कि इस प्रकार जो शरीर पल-पल छिन-छिन अपने

33:17

विनाश की ओर बढ़ रहा है

33:19

कि उस शरीर के मिथक अशोक गैधाने नहीं करते

33:23

इसमें रोग के लिए शास्त्र कहते हैं

33:26

कि कृष्णं वंदे जगतगुरु खोल की भांति

33:30

हमारे शरीर अपने प्रकृति के कारण जानते

33:33

हैं बच्चे बनते हैं जवान होते हैं फिर वही

33:38

जवानी मुरझाने लगती है जिसे बुढ़ापा कहते

33:41

हैं और उस वृद्धि शरीर को जब आत्मा छोड़

33:44

देती है तो शरीर की मृत्यु हो जाती है

33:48

परंतु को आत्म कहां चली जाती है

33:52

कि शरीर के बिना आत्मा कहां और कैसे वास

33:54

करती है पुराणों शरीर छोड़ने के बाद आत्मा

33:58

नया शरीर में वास करती है किसी शिशु के

34:01

शरीर में चेतनरूप होकर आ जाती है फिर वही

34:05

चक्कर शुरू हो जाता है फिर वही जन्मना

34:08

प्रिंट ना उठकर चलना फिर लड़खड़ाना और

34:12

किचन के साथ शरीर के कौतुक है इतनी बात

34:17

समझ लोगे जितना तुम्हें किसी के मरने का

34:20

शोक आया और मैं तुम्हें मृत्यु का भय होगा

34:23

ना

34:24

कि बचपन ओं वन वृद्धावस्था जीवात्मा की हो

34:36

जैसे तनमोय दें वैसे ही लेकर यूएस तय जन

34:47

प्रवेश करे वो नए जीवन में एग्जाम हम तुम

34:57

यह शरीर नहीं है हम तो शरीर के अंदर रहने

35:00

वाली आत्माएं हैं यह शरीर तो केवल हमारे

35:03

साथ हैं हम उसके स्वामी है

35:07

इस व्रत के टूटने से स्वामी नहीं टूट जाता

35:11

है उसी प्रकार शरीर के सुख और दुख आत्मा

35:16

को सुखी या दुखी नहीं करते क्योंकि हम

35:18

आत्मा है तो फिर यह सुख दुख का ह्रास अब

35:22

हमारी आत्मा को क्यों होता है यह सुख दुख

35:24

का आभास आत्मा को नहीं होता कि वह शरीर

35:28

होता है तो फिर आत्मा को क्या होता है

35:31

आत्मा को कुछ नहीं होता क्योंकि होना न

35:35

होना सुख-दुख सर्दी-गर्मी इस प्रकृति के

35:40

नियम है आत्म तो अविनाशी परमात्मा का अंश

35:44

है इसलिए आत्मा प्रकृति की सीमा से बाहर

35:47

है आत्मा अचिंत्य हैं मानवीय चेतना के

35:52

चिंतन के घेरे में नहीं आती हैं

35:55

मैं अर्जुन आत्मा पर प्रकृति और शिष्ट के

36:00

नियम लागू ही नहीं होते क्योंकि वह सृष्टि

36:03

और प्रकृति दोनों ही की पहुंच से बाहर है

36:07

जैसे एक चिंगारी ईएस अग्नि का ही अंश होती

36:10

है वैसे ही आत्मा परमात्मा का ही अंश होता

36:14

है इसलिए वह व्यक्ति अजन्मा सनातन और

36:19

सर्वव्यापी है स्थिर रहने वाला और अचल है

36:26

कि अक्षय दुआ एवं अदायों एवं अखिलेश

36:31

दोस्तों अशोक शब्द नित्य सवगत आधार अ चलो

36:37

एवं सनातन है

36:40

कि हे पार्थ आत्मा को ना कोई शस्त्र काट

36:45

सकता है ना उसे अग्नि जला सकती है इसको जल

36:49

नहीं चला सकता ना इसे बाय ही सूखा सकती है

36:54

एक नए नम छिंदंति शस्त्राणि नैनं दहति

36:58

पावक न जन्म के दिन तपो न शोषयति मारुत आ

37:04

37:11

यह देखिए है महेश सख्त कि को सशस्त्र का

37:20

ख्याल धनियां पावै हो हो

37:28

कि पहले सुलभ इलाज जल नीति है को कोई कैसे

37:37

लगी या उधना में हो

37:46

कि आधुनिकता धीर व माता वतन है गंध को

37:55

भक्त सुनें बनावे हो अमर कुमार रे कौन

38:05

अजहर को कैसे अगुंठी जरा वैद्य हूं आखिरी

38:16

रहेगी मारुति के मुल्क जिसका यह नीर

38:51

कि हे अर्जुन यह सब समझ कर तुम्हें ना

38:55

किसी के मरने का शोक मनाना चाहिए और ना

38:58

किसी के ना मरने की खुशी का प्रदर्शन करना

39:01

चाहिए केशव यह सब जानकर भी कि आत्मा नित्य

39:05

सुबह तनौरा जन्मा है तो स्वस्थ नहीं कर

39:09

सकते आग नहीं चला सकती कि प्राणी की आत्मा

39:13

को दुख शोक खुशी मान अपमान की पीड़ा और

39:19

आनंद का अहसास क्यों होता है पार्थ मैंने

39:23

पहले ही तुम्हें बताया कि सुख दुख का आभास

39:26

करना आत्मा का नहीं शरीर का काम है परंतु

39:31

केशव शरीर को तो कपड़ा तभी होगी तो सभी को

39:35

कोई चोट लग जाए यह सर्कुलर मनचाहे

39:38

कि कैसे श्री आदमी चल जाए उसे जो पीड़ा

39:41

होती है उसे शरीर की पीड़ा है

39:44

है परंतु मान हानि होने से दुख होता है

39:48

समान होने से जो आनंद आता है उसमें तो शनि

39:51

को कोई चोट नहीं पहुंचती वह मानहानि का

39:54

स्टॉक व कीर्ति की पीड़ा तो आत्म कोई होती

39:58

है ना सी नहीं अर्जुन एक हीर थी अब कीर्ति

40:03

मीणा मान अपमान यह लाभ-हानि यह जितने का

40:08

आनंद अथवा हाथ में की पीड़ा यह भी हाथों

40:12

को नहीं होती यह आत्मा का काम नहीं है यह

40:15

तो मन की शरारत है मन की शरारत इसका क्या

40:19

थक गए शब्द पार्थ प्राणी के शरीर का एक

40:23

अदृश्य अंग है मन जो दिखाई नहीं देता

40:26

परंतु वही सबसे शक्तिशाली हिस्सा है शरीर

40:30

का आ

40:31

है याद रखो कि मन शरीर का हिस्सा है उसका

40:35

आत्म से कोई संबंध नहीं आत्मा यह भी रथ

40:38

में बैठा हुआ रस का स्वामी है तो मन शरीर

40:42

रूपी रथ का सारथी है

40:44

कि यह मन ही इंद्रियों के घोड़ों को

40:46

इधर-उधर भटक जाता है कभी श्याम बनके आवेश

40:49

में यही चंचल मन मनुष्य को इस भ्रम में

40:52

डाल देता है कि वह सर्वशक्तिमान है उस सब

40:56

कुछ कर सकता है नूरजहां का राजा है जिसके

40:59

आगे हर कोई छुप जाने पर विवश है और जिसे

41:02

हर कोई प्राण करता है

41:06

कि जिस तरह दीपक की बाती को दीपक तने छुपा

41:09

अंधेरा दिखाई नहीं देता उसी तरह जवानी को

41:13

उसके पीछे छुपा बुढ़ापा और कमजोरी दिखाई

41:16

नहीं देती परंतु जब शरीर के दीपक में युवा

41:20

शक्ति का घी जल-जलकर समाप्त होने लगता है

41:23

और डिंपल तने छुपा देना पड़ने लगता है तो

41:27

मैं जो घबरा का चिला में लगता है मैं

41:29

बीमार हूं

41:31

कि यह भूमि कर्नाटक भी मन नहीं करता है

41:33

हेयर जूनून मनुष्य को मैं के घमंड की

41:37

मदिरा पिला कर मदहोश करने वाला पाखंडी

41:40

केवल मन है मन सेवर रॉबी नगोई पल पल रहात

41:50

सॉन्ग ही रॉ माया-ममता में बुझा रहे वह

41:56

पड़ जावे जुबान के पहले पेट एक दम बिना मन

42:03

रहा भिलाए हमने डाले तू इस मन का दानव बन

42:10

इस मन को अपना दास बना ले तू इस मन का

42:16

दानव बन इस मन को अपना दास बना ले वह

42:25

प्रभाव्ा बहती रहेगी

42:29

MP3 गण

42:34

मैं दो apk धरा मर चुके संघ अंजाण में

42:45

करता रहा अदनान जग सारा झाला

42:53

झाला स्वभाव फिल्मों के उद्देश भला के

42:59

इश्क मे

43:01

कि तुम हुआ था

43:07

कि इसमें

43:09

[संगीत]

43:11

सीईए

43:12

[संगीत]

43:13

अच्छी तरह रंगीन खोज भावनाओं नजर रेशेदार

43:22

भोज्य झाल मुनजीर विदेशों से सुनहरे हो

43:34

[संगीत]

43:37

कि इन इंग्लिश लुटिया थे जेताणा लुट गए

43:48

लुट तुम आधुनिक तथा हमारे मां धुंध तथा

43:58

हमारे हैं ना

44:02

कि वीरवार को हुआ था

44:13

मैं तुझ से तुझ संग री यह निर्भय नाम रा

44:22

[संगीत]

44:25

कि फील धो लें

44:27

[संगीत]

44:33

[संगीत]

44:38

कर दो

44:42

[प्रशंसा]

44:44

कर दो

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