गीता उपदेश | Geeta Updesh | Part 1
[संगीत]
लुट हमारी संस्कृति हमारे संस्कार
मैं सदा रहे हो
कि भारत के महान ग्रंथों और काव्यों का
संप
को सब्सक्राइब करें तिलक कई तरह की ढिलाई
आपके घर ऑफिस के लिए रिलाई इट्स इंडिया
प्राइस यह पार्थ आत्मा को ना कोई शस्त्र
काट सकता है न उसे अग्नि जला सकते हैं
इसको जल नहीं चला सकता ना इसे बाय ही सूखा
सकती है
एक नए नम छिदंति शास्त्राणि नैनम दहति
पावक न चैनं क्लेदयंत्यापो न शोषयति मारुत
तहुं है वह है सख्त कि को शास्त्री था बट
नहिं आवै हो यह चुनरी यह सब समझ कर
तुम्हें ना किसी के मरने का शोक मनाना
चाहिए और ना किसी के मरने की खुशी का
प्रदर्शन करना चाहिए
यह देखिए शब्द मैं कौरवों की सेना का
अवलोकन करना चाहता हूं विरासत दोनों
सेनाओं के मध्य में ले चले रे
कि तुम देखना चाहते हो तो दुर्योधन को
विजई बनाने के लिए कौन-कौन युद्ध सम्मिलित
हुए हैं और तहें किस-किस से युद्ध करना
होगा और के शव व्हाय यही देखना चाहता हूं
कि चलो मेरा लत दोनों सेनाओं के मध्य में
ले चलो ए
कर दो
कि यह रन तुम्हारी इच्छा के अनुसार मैं
तुम्हारा यह रख दोनों सेनाओं के मध्य में
ले आया हूं मैं
कि पश्चिम
कि शत्रु की सेना की ओर देखो
कि सीमा के अगर में खड़े हैं पितामह भैश
पांडवों के और तुम्हारे सबसे बड़े शत्रु
भ्रमण
है और हमारे सबसे बड़े शत्रु हैं
अपने दूसरे महत्त्व को देख लो अच्छा
वृद्धों तोहरे गुरुदेव
हुआ है
थे और उनकी बाईं ओर युवराज दुर्योधन ठे
कैन ते यह तो पांडवो को विजय भी बनाना है
मैं तुम्हें इन सब कट करना होगा आ
को व्हाट्सएप पर
[प्रशंसा]
अजय को
कर दो
में मौजूद पिक्चर लव लव यू
कि अर्जुन अर्जुन अर्जुन अ
कर दो
कि लुट
[संगीत]
लुट
[संगीत]
कर दो
[संगीत]
क्या हुआ है
थे इंडिविजुअल अपने उत्तर
एक व्हाट्सएप संदेश भेजें
लुट
एक संदेश भेजें
क्वेश्चन नहीं मैं किसी के खून चक्र हाथ
नहीं बन सकता विद्या आत्म तो उस दृश्य की
कल्पना से ही कांप उठती है इसमें मैं अपने
ही सगे संबंधी को खून कैसे बना सकता हूं
कैसे पहुंच सकता हूं गुरुदेव दीक्षित के
लिए पिता भगवान के समान होता है तो फिर
मैं उसका अनादर कैसे कर सकता हूं
कि जिस गुरुदेव ने उसे ढूंढ विद्यार्थी
तीर चलाना सिखाया है
हाउ टो विड्रॉ विद्या का दुरुपयोग करते
हुए उसे यदि शरीर पर तीरों की वर्षा गुरु
उन्हीं के सीने को छलनी करो तो इतना हो
जाए गिरा हुआ मनुष्य में ही इतना ऊंचा
खेड़ा वंश घिरे हुए हैं
लुटा मत दो आदरणीय ही नहीं पूछनी है पिछले
पूजनीय कि जिन क्या केवल नजर नहीं उठा
सकता हूं उनके विरुद्ध हथियार कैसे उठा
सकता हूं
श्री कृष्णा जब मेरे पैरों में चलना भी
नहीं सीखा था तब पितामह ने मुझे मेरा हाथ
थाम कर जीवन पथ पर एक-एक कदम चलना सिखाया
था जिसमें विटामिन के सीने से मेरे लिए
प्रेम से की गंगा और जमुना सदा भुट्टे ही
है उस पर टावर के सीने में तलवार वह का
खून की नदियां कैसे बाहर सकता हूं मैं कोई
डेट नहीं है जो मैं मेरे अपनों के ही रक्त
स्राव करूं पिछड़ों पर नहीं हो सकता तो आप
ही नहीं वह अर्चन पा पा
अच्छा लगता है उर्वशी कि शराब का प्रभाव
कम पर अफीम शुक्र है
कि तुम अभी नपुंसक किफायती बोल रहे हो आप
तुम युद्ध भूमि के बीच खड़े होकर जो भाषा
बोल रहे हो तो किसी युद्ध के भाषा नहीं आज
मैं अपना कहते-कहते तुम्हारे जुआ थकी नहीं
जिनके लिए तुम्हारे मन में प्रेम इसमें और
नाटक की गंगा बह रही है याद रखो यह लोग है
तो 13 वर्षों पहले दूत सभा में तुम्हारी
पत्नी द्रौपदी के निरस्त होने का तमाशा
चुपचाप देखते रहे थे किसी ने तिब्बत तक भी
नहीं लाई थी ना
हैं इनमें से किसी एक देवी उसकी रक्षा के
लिए उस समय हाथ नहीं उठाए थे अ
है और वही हाथ आज तुम्हारी हत्या के लिए
उठे हुए हैं सत्य हाथों में तुम्हारे और
पांडवों के बाद के लिए आज 73 बारिश तड़प
रही है कि तुम्हारे अपने हैं जिनके लिए तो
प्रेम और आदर की भाषा बोल रहे हो
अयन तुम इस समय कोई लग्न मंडप पर नहीं हो
बल्कि युद्ध भूमि पर खड़े हो
में मौजूद है तुम अपना समझ रहे हो वह इस
युद्ध भूमि में तुम्हारा स्वागत और आदर
सत्कार करने नहीं आए हैं
कि उस शख्स अब तुम्हारा और तुम्हारे
भाइयों का नाम अपने स्तर पर लेकर आए हैं
के पिछोर इनकी आंखों में तुम पांडु की
मृत्यु दंड नीति देखे तृष्णा तड़प रही है
अ
अपनी तरफ कि क्या इस
एक केबल तुम पांडवों के वक्त से ही मुझे
कि देखूंगी टेबल
कर दो
अपने तो यह विषैले बाण किस-किस को अपना
निशाना बनाने के लिए उत्सुक हैं
एक तुम्हारे अपने हैं तो फिर यह तुम्हारे
कौन है
कि पढ़ाई हैं शत्रु हैं अ
एक अजनबी तुम कौन हूं कि निर्दई शस्त्रों
के हवाले कर देना चाहते हो तो फिर यह
तुम्हारे अपने जो तुम्हारे जीवन और मृत्यु
मैं तुम्हारे साथ हैं
मैं तो तुम्हारे कंधे से कंधा मिलाकर
तुम्हारे हित के लिए युद्ध करने आए हैं
कि उन्हें ज़ूम इस समय यह सब तुम्हारी
गांड के प्रकार सुनने के लिए उत्सुक है हे
पार्थ
और इस युद्ध भूमि कीमत रेखा पर खड़े होकर
मैं तुम्हारी दृष्टि पल
मैं यह कपड़ा बढ़ गया है
कि आदित्य तुम देख रहे हो
है कि यह तुम्हारे अपने
है परंतु यह अर्धशतक तुम्हें नहीं दिखाई
दे रहा है
मैं तुझे कौन हो जो तुम्हारे अपने हैं वह
इस युद्ध भूमि में तुम्हें अपने गले लगाने
नहीं आए हैं
[संगीत]
है बल्कि तुम्हारे खून से होली खेलने आए
हैं यह सब जुड़े तुम अपना कह रहे हो
कि यह कौन हो एक बात निश्चित रूप से जानते
हैं कि जब उन्हें इस युद्ध में विजय
प्राप्त करनी है तो महापराक्रमी को अपने
रास्ते से हटाना होगा जिसका नाम अर्जुन है
पार्थ तुम इन्हें अपना समझते हो इसलिए
तुम्हें मौत के घाट नहीं उठाना चाहते हैं
है परंतु यदि तुम्हें मौत के घाट नहीं
करोगे तो यह अवश्य ही तुम सब को मौत के
घाट उतार देंगे अब
सूजन
कि यदि वह मुझे मारना चाहते हैं
कि तुम आर्थिक मुझे इसकी कोई चिंता नहीं
पर तो मैं अपनों को ही मांस कर पाप कैसे
कर सकता हूं मैं
कि यदि वह हो लोग से निश्चित होकर अपने ही
कठिन नष्ट होने वाले 200 और पप्पू को नहीं
देख सकते तो क्या हुआ पर तो हम तो इस
युद्ध के फल स्वरूप होने वाले विनाश और
विनाश से उत्पन्न दोषों को देख सकते हैं
उस विचार कर सकते हैं देखिए शव तुम तो
जानते हो कि कुलधर्म नष्ट होने से सनातन
कुल धर्म का नाश हो जाता है और धन के नष्ट
हो जाने से संपूर्ण कुल में पाप उसी
प्रकार फैल जाता है
है जैसे कोई प्राणघातक रोग मनुष्य के शरीर
में फैल जाता है
कि उस फैले हुए पांच के कारण स्कूल कि
स्त्रियां दूषित हो जाती है
थे और स्त्रियों के दूषित हो जाने से
वर्णसंकर संतान उत्पन्न होती हैं
है और वर्णसंकर के पास के कारण संकुल का
गुण पुलिस अधिकारी बन जाता है इतना ही
नहीं उनके पितरों को भी अ जो गति प्राप्त
होती है गोल अक्षय प्राइस यंति उड़द धर्मा
सनातन दादर में 10 टेस्ट व मुक्तिपथ सनम
अधर्व अभी भगत युद्ध अधर्माभिभवात्कृष्ण
प्रदुष्यंति कुलस्त्री अत इस त्रिशूल
दृष्टा सू वाष्र्णेय जयते वर्णसंकर इस
अध्ययन की अवधि में युद्ध करो
है कि कैसे हो सकता है
को बिल्कुल घाटी होने का पाप स्वयं अपने
हाथों
मैं अपनी मां स्कर्ट कैसे लिखूं मैं
थे फिफ्थ नहीं करूं कब
का म्यूजिक भी नहीं करूंगा अब
कि इससे तो अच्छा है कि मैं कमंडल लेकर
घर-घर भिक्षा मांगता फिर बार जब कितनी
सुंदर विचार हैं
कि मुझे दूध नहीं करूंगा मैं भिक्षा मांग
लूंगा मैं
कि हे अर्जुन
कि यह बात कोई वीर नहीं केवल एक दायर कर
सकता है कि तुम अपनी कार तक प्रदर्शन करने
के लिए इस युद्ध भूमि पर आए थे
है इसीलिए तुमने भगवान शिव से
पाशुपतास्त्र घर किया था जब वर्षों घोर
तपस्या करके अपने पिता श्री देवराज इंद्र
से तुमने दिव्यास इसलिए प्राप्त किए थे
क्या तुम्हें अपनी माता कुंती का अंतिम
संदेश याद नहीं
है कि जब भी मेरे चमक आओ तो विजय भवन कराओ
और अपने माथे पर कौरवों के रक्त से विजय
तिलक लगाकर आओ ही अर्जुन याद रखो अपनी
माता के इस वचन को निभाने की जिम्मेदारी
तुम पढ़ें
है इसलिए
को अपने हृदय की तुच्छ दुर्बलता को
त्यागकर क्षत्रियों की भांति युद्ध करो कि
क्षत्रियों का धर्म है युद्ध करना हे
मधुसूदन मैं भी जानता हूं कि मैं क्षत्रिय
युद्ध करना मेरा धर्म है 35 युद्धभूमि में
युद्ध अभिलाषी इस वजन सबूत को देखकर बिना
शरीर ढीला पड़ रहा है ब्रिज आत्मा कहां पर
है यह गला सूख रहा है है
है तो उस पर विरोधी विचारों किया खबर से
मेरी मति भ्रमित हो गई है
कि इस कविता के कारण मुझे मेरा मार्ग
स्पष्ट दिखाई नहीं दे रहा था
ए क्वेश्चन
कि तुम मेरे गुरु हो भगवान शिव भक्त मैं
तुम्हारी शरण में आया हूं अब तक मेरा
मार्गदर्शन करो
कि जिला स्तर पर दिखाओ
यहां पहुंचता है उसके अधीक्षक ए
कर दो
खैरणा अश्रुपूरित नयनों की आंख यह कुंअर
विचलित यजुष न तमगा धोकर पास को डुबो ने
भगवान भोले शिव भगवान को
मैं अशोक चव्हाण व सोच तुम
प्रज्ञावादांश्च भाषसे ददा सून घटा सूच ना
अनुसूचित जाति पंडिता
हो चुके जो भाग्य नहीं उन में कोई इनके
शोक मे तुम अकुलाए पंडित तो जैसे बोले बचन
और सच्चे ज्ञान से अख़ चुरा के खंभों में
तारों की ज्योति काल जलाएं कर बुझा है
यानी विचलित होते नहीं कोई जग में रहे या
जड़ से जाए यानी विचलित उद्देश नहीं कोई
जग में रहे या जग से बजा दो
हैं जूही रेडियो चलें प्रभुं अर्धकुंभ को
ज्ञान करो पेज पर हो गया केंद्रित सबका
ध्यान
कि दोनों केंद्रित सभका बधाइयां ब्रह्म
जाएंगे इन नारद चॉप कि वनों में पोथू हलो
जहां चारों दिशाएं सचेत हुई धरती पर ध्यान
सभी का लगा नीता के महागुन अध्यन को शिव
ने जानता समाधि राजघाट फिकर जून के
निमित्त मिले का यह नाम ऋषभ को भी नुकसान
आइके अर्जुन के निमित्त मिलेगा क्या नाम
ऋषभ तो बिन मांगे वार्ड 17 में
ज्ञान की बड़ी-बड़ी बातें करते हो अब
दूसरी सांस में अपने कोशिश बांधकर मुझसे
ज्ञान और मार्गदर्शन किया सभी करते हो यह
पार्थ तुम्हारा ज्ञान अधूरा है और अधूरा
ज्ञान दोधारी तलवार की भांति होता है जो
अधूरे ज्ञान देने वाले और लेने वाले दोनों
को काटती है इसलिए सबसे पहले तुम्हें इस
घातक तलवार को छोड़ना होगा ना कि फिर घंटी
इसको
है परंतु तुम तो उल्टा ही काम कर रहे हो
तुम्हारे हाथ पर अधूरे ज्ञान की तलवार है
है और तुमने अपने गांधी देव म्यूजिक छोड़
दिया है
हैंड्स फ्री के शव मैं क्या करूं
कि मेरा मन और मस्तिष्क उस धर्म कांटे की
भांति डोल रहा है
ऑफिस के दोनों पलड़ों में बराबर-बराबर
मात्रा में ज्ञान और ज्ञान दोनों रखा हुआ
था उसी चौराहे पर खड़ा हुआ था मैं उसकी
शरण में आया हो कुछ नहीं घरों की बहुत ही
रास्ता दिखाओ
कि वास्तव रास्ता दिखाओ हे अर्जुन तुम इस
समय ना केवल इस युद्ध भूमि के मध्य रेखा
पर खड़े हो बल्कि तुम्हारे बुद्धि भी जीवन
और मृत्यु के मध्य रेखा पर अटकी हुई है
इसलिए तुम अपने कर्तव्य और अपने धन से भाग
रहे हो
हैं परंतु अपने करते हुए इसे यू मोड़ने से
है या इस युद्ध से विचलित होने से विधि का
विधान नहीं बदलेगा क्योंकि विधाता करनी है
अटल और अचूक है तुम क्या समझते हो
तुम्हारे नहीं मारने से यह सब नहीं मरेंगे
नहीं हर जुर्म नहीं तुम इन्हें नहीं
मारोगे तब भी यह मरेंगे क्योंकि उनके
प्रारब्ध में इनकी मृत्यु का समय 3 अशरण
तो पहले से ही निश्चित कर दिया है इसी
विधान के अनुसार मैं तुम्हें पहले ही मर
चुका हूं तुम तो केवल माध्यम मात्र हो
तुम्हारे माध्यम से मैं इन सब का वध करना
चाहता हूं तो विजय अपना कर्तव्य सब्जियों
या प्रारभ तुम्हें इन सब का स्वागत करता
है
कि मैं क्या करूं मैं क्या करूं मधुसूदन
अपने मन को कैसे मारूं अपनी भावनाओं को
अपने ही पैरों तले कैसे रोड आलू तथा
मधुसूदन मैं क्या करूं हे पार्थ धन के
रास्ते से हटाने वाले भावनाओं का त्याग
करो
कि भावनाओं के समुद्र में ढालने के बदले
टाइम सीखो
मैं तुमको कीर्तिमान पुष्य अपनी निर्बलता
कल्याण प्रदर्शन करके तो अभी कीर्ति को
नष्ट मत करो तो
कि एक वीर पुरुष के लिए उसके कीर्ति कर
नष्ट होना उसकी मृत्यु के समान है इसलिए
युद्ध करो पाठ युद्ध और अपने की वृद्धि
अपनी कर्त्तव्य और अपने धर्म की रक्षा को
दो
कि आखिर टीम चापि भूतानि कथित चिंतित
व्यायाम संभावित सच्चा खीर थी महाराणा
अतिविचित्र इस धर्म युद्ध में यदि
तुम्हारे भी गए तो तुम्हें वीरगति प्राप्त
होगी तो मरकर भी अमर कहलाओगे इसलिए युद्ध
करो हम तो वह अपराध सी स्वर्गं जित्वा वा
भोक्ष्यसे महीम तस्मादुत्तिष्ठ कौंतेय
युद्धाय कृतनिश्चय पे वासुदेव तुम तो
जानते हो कि मुझे अपनी मृत्यु की चिंता
तिल भर भी नहीं है
लुट
[संगीत]
कि भीड़ जुटनी मैं जानता हूं तुम इस धर्म
युद्ध में अपने प्राणों की आहूति देने से
जरा भी नहीं घबराते तुम्हारे हृदय की
दुर्बलता केवल अपने संबंधों के आधार में
है जो धर्म के क्षेत्र में अर्थ हीन है
मैं तुम्हें अपने संबंधों की मृत्यु की
चिंता है परंतु तुम्हारा यह विचार
तुम्हारे अध्ययन का खुला प्रतीक है तो ठीक
कह रहे हो के शव इस समय मेरी बुद्धि
अज्ञान के अंधकार में डूबी जा रही है धर्म
क्या है और अधर्म क्या है जिसका ज्ञान
नहीं रहा
का मैक्रम के कैसे दोराहे पर खड़ा हूं
जहां से पता नहीं चल रहा था कि धर्म का
मार्ग कौन सा है और अधर्म का मालिक कौन सा
कि मुझे अज्ञान के अंधकार से निकलने का
रास्ता दिखाओ के शव रास्ता दिखाओ नहीं
पार्थ दत्त वे इसी अज्ञान के अंधकार से
निकालना चाहता हूं इस अंधेरे में अंधों की
भांति हाथ-पैर मारने के बदले अपनी
दूरदृष्टि को एक दिशा दो और देखो इस
सृष्टि की ओर इस सृष्टि में जो जन्म लेता
है उन निश्चित रूप से मृत्यु के अधीन हो
जाता है इसका अर्थ यह है कि इस मृत्युलोक
का हर प्राणी चाहे वह मनुष्य हो पशु हो
पक्षी हो यह पेड़ पौधा हो हर सांस लेने
वाला प्राणी अपने जन्म के साथ अपने मृत्यु
को भी लेकर आता है हर प्राणी को एक न एक
दिन निश्चित समय पर मरना अर्थात अपना शरीर
त्यागना ही पड़ता है अ
है इसलिए तुम उनके मरने की चिंता छोड़कर
अपना कर्तव्य समझकर युद्ध करो जातस्त हि
ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च
तस्मादपरिहार्येथे न त्वं सोच तुम रस्सी
ठे कृष्ण क्योंकि प्रभु मत में लिखा है
यदि पितामह की मृत्यु का समय आ गया है तो
वह अवश्य जाएंगे पर तो मैं अपने हाथों से
उन्हें क्यों मानूं हूं तो स्वयं अपने
हाथों से अपने भीष्म पितामह को निभाना
चाहते हो यही सत्य है मत हो
कि मैं पर भीष्म पितामह को अपने हाथों से
नहीं मार सकता तो ठीक है वह मारो परंतु
पहले मुझे यह तो बताओ कि कौन है तू मेरे
भीष्म पितामह हो
तुम्हारे भीष्म पितामह को
यह क्यों पूछ रहे हो तुम दिखाई नहीं देते
क्यों गुस्सा नहीं तो है खड़े विष्णु
तांबा वह जो व्रत के ऊपर करना है हां वही
तो
कि प्रभु झटके ऊपर घर दिखाई दे रहा है
पार्थ उद्योग भीष्म पितामह पर शरीर है
तो मैं पूछता हूं असली भीष्म पितामह कौन
है कहां है कृष्णा तुम्हारी बात मेरी समझ
में नहीं आ रही है मुझे दिख रहा है और
भीष्म पितामह नहीं है केवल शरीर है
इस स्थल की भीष्म पितामह को यौन है अवश्य
मैं तुम्हें समझा रहा हूं मैं तेरे को
ध्यान से से
शो मोर
मैं देखूं शरीर में जो प्रकाश है जिसे
आत्म कहते हैं मैं तुम्हें थे भिक्षु
प्रदान करता है
महंगी भी चक्षुओं से देखो साथियों को
है कि शरीर के अंदर आत्मा है जो प्रकाश है
वहीं यस्मिन भीष्म पितामाह दिखाई दे रही
हूं कि आप पा हां केशव बहुत अच्छा अब देखो
यदि मैं अपने सुदर्शन चक्र से भीष्म
पितामह का शरीर काट दो तो केवल उनका शरीर
मरेगा परंतु उनकी आत्मा का प्रकाश नहीं
पूछेगा देखो मैं तुम्हारे दिव्य चक्षुओं
को यह दृश्य सजीव करके दिखाता हूं
लुट
ब्लुटूथ
कर दो
लुट
यह देखिए आज हम मेरी सुदर्शन से केवल कुछ
शरीर का नाश हुआ है
कि उसकी आत्मा का दिया अब भी उसी प्रकार
चल रहा है कौन से उस परम सत्य को अच्छी
तरह समझ लो
है कि विश्व में केवल शरीर नाशवान है
किंतु आत्मा अविनाशी है शरीर के मरने पर
आत्मा नहीं मरती थी
कि आत्मा न कभी जन्म लेती है और मैं कभी
मरती है वह जन्म नृत्य सनातन और पुरातन है
जो शरीर को मारने पर भी नहीं मानी जाती है
क्यों न हम ये जूते हन्यमाने शरीरे जो शव
तुम्हारी बातें मेरी बुद्धि को भ्रम में
डाल रही है
हां तुम तो बातें एक साथ कह रहे हो तो
परस्पर विरोधी है तुम कहते हो कि शरीर मर
जाता है परंतु शरीर का एक हिस्सा जिसे
आत्मा कहते हैं वह नहीं बनता नहीं अर्जुन
मैंने आत्मा को शरीर का एक हिस्सा इन कहा
मैंने कहा है कि आत्मा और शरीर दो अलग अलग
चीजें हैं
है जिसे तुम और तुम्हारा कवच तो अलग चीज
हैं तुम्हारे कवच के दो टुकड़े हो जाएंगे
तो इसका यह अर्थ नहीं होता कि अर्जुन के
दो टुकड़े हो गए जिस प्रकार तुम और
तुम्हारा कवच दो अलग-अलग वस्तुओं हैं
कि यह तुम और तुम्हारा यह व्रत दो अलग-अलग
वस्तुओं हैं उसी प्रकार मनुष्य का शरीर और
उसकी आत्मा दो अलग-अलग वस्तुओं हैं यह समझ
लो कि जिस रथ में अर्जुन बैठा है वह व्रत
अर्जुन में है अर्जुन तो वह है जो रथ में
बैठा हुआ रखी है जो ठीक है बाधाओं के
अर्जुन रथ नहीं है अर्जुन मैं हूं चोट में
बैठा हुआ है
और मेरठ के टूटने का शोक नहीं होगा परंतु
और उनके मरने का तो शो को ही अर्जुन
तुम्हारी बातें सुनकर मुझे तुम्हारी
बुद्धि पर हंसी आ रही है
मैं अपनी तरफ से तुम बड़े पंडितों और
ज्ञानियों जैसी ऊंची-ऊंची बातें कर रहे हो
तुम तुम यह पता नहीं कि जो सचमुच ज्ञानी
होते हैं वह ना उनका शो करते हैं जो मर गए
हैं और उनका शो करते हैं जो अभी नहीं मरे
हैं क्योंकि वह जानते हैं कि जो मर गया है
और फिर जन्म लेगा और जो अभी जीवित है वह
अवश्य मिल जाएगा मरने वाला फिर जन्म लेगा
क्योंकि केवल शरीर का नाश होता है शरीर के
अंदर जो आत्मा है वह कभी नहीं मरता है
में ही पार्थ इस संसार में दो ही वस्तुएं
हैं-एक शरीर और दूसरा शरीर में रहने वाला
शरी जो शरीर में रहने वाला आत्मरूप शरीर
ही है वह कभी मरता नहीं और जो शरीर है उस
सदा रहता नहीं
कि आत्मा एक शरीर छोड़ता है और दूसरा शरीर
धारण कर लेता है बिल्कुल वैसे ही जैसे
मनुष्य पुराने कपड़े उतारकर नए कपड़े धारण
कर लेता है
कि वह सांसद मीणा ने यथा विहाय नवानि
गृह्णाति नरोपराणि तथा शरीराणि विहाय
जीर्णा व अन्य त्यौहार दी डा
को शेयर महाकुंभ का यह बेडेड हैं का
त्योहार गैस पुराने वास्त्र युक्त पान उन
जैसा फाल जीवात्मा का नूतन चुने न एड
परिधान के धार लेनी जैसा मेज़ चोला वस्त्र
विजय झा लें है कहते रिचार्ज ऐसा जो लेंगे
इष्ट परिवर्तन
उम्र और क्या है सीई रज में हार मिली है
जैसा वह प्रभाव्ा पास केवल इतना समझ लो कि
दरवाजा जिसके अंदर जाते हुए आप पुराना
शरीर छोड़ देती है वास्तव में मृत्यु और
जन्म के दरवाजे जो एक-दूसरे के आमने-सामने
है प्राणी जब नृत्य के दरवाजे पर पहुंचता
है तो उस शरीर की मृत्यु हो जाती है
हैं कि आत्मा का प्रकाश पुष्ट शरीर को
छोड़कर आगे चला जाता है
[संगीत]
रॉबिन को प्रकाश ने यह जन्नत के दरवाजे
में प्रवेश करता है
है जहां जीवात्मा को फिर से एक नया शरीर
प्राप्त हो जाता है और वहां से उसके नए
जन्म की नई यात्रा शुरू हो जाती है
[संगीत]
कि हे पार्थ आत्मा नित्य है इसलिए वह नहीं
बदलती परंतु शरीर नाशवान है इसलिए एक ही
आत्मा के कई शरीर बदलते हैं इसलिए हर नए
जन्म में वह नए-नए शरीर धारण करता रहता है
हर नए जन्म मैं आत्मा नए-नए शरीर तो बदलता
ही है बल्कि हर एक जन्म में भी उसे जो
शरीर मिलता है वह एक शरीर भी उसी जन्म में
बदलता रहता है यह बात मेरी समझ में नहीं
आई के शब्द क्योंकि एक जन्म में तो प्राणी
को एक ही फल मिलता है नहीं एक नहीं अनेक
शरीर मिलते हैं एक ही जन्म में वह भी नहीं
समझा प्रभु मैं समझाता हूं याद करो अपना
बचपन उस समय अर्जुन का शरीर कैसा था
मैं तो एक बार लगता और आज वह शरीर कहां है
वह शरीर तो बदल गया इस शरीर में अर्थों
शर्म नहीं रहा आज सुबह एक युवक के शरीर
मिला है इसी प्रकार प्राणी को जन्म के समय
शिशु को शरीर मिलता है वहीं शिशु का शरीर
काल के प्रभाव से एक बालक के शरीर हो जाता
है
तो फिर किशोरावस्था में आता है
तो फिर जवान पुरुष के शरीर बनता है
तो फिर अधिक उम्र का बुरी तरह प्ले कर दो
और अंत में एक सूखे पत्ते की तरह जीवन के
वृक्ष से टूटकर क्वेश्चन है
कि इस प्रकार जो शरीर पल-पल छिन-छिन अपने
विनाश की ओर बढ़ रहा है
कि उस शरीर के मिथक अशोक गैधाने नहीं करते
इसमें रोग के लिए शास्त्र कहते हैं
कि कृष्णं वंदे जगतगुरु खोल की भांति
हमारे शरीर अपने प्रकृति के कारण जानते
हैं बच्चे बनते हैं जवान होते हैं फिर वही
जवानी मुरझाने लगती है जिसे बुढ़ापा कहते
हैं और उस वृद्धि शरीर को जब आत्मा छोड़
देती है तो शरीर की मृत्यु हो जाती है
परंतु को आत्म कहां चली जाती है
कि शरीर के बिना आत्मा कहां और कैसे वास
करती है पुराणों शरीर छोड़ने के बाद आत्मा
नया शरीर में वास करती है किसी शिशु के
शरीर में चेतनरूप होकर आ जाती है फिर वही
चक्कर शुरू हो जाता है फिर वही जन्मना
प्रिंट ना उठकर चलना फिर लड़खड़ाना और
किचन के साथ शरीर के कौतुक है इतनी बात
समझ लोगे जितना तुम्हें किसी के मरने का
शोक आया और मैं तुम्हें मृत्यु का भय होगा
ना
कि बचपन ओं वन वृद्धावस्था जीवात्मा की हो
जैसे तनमोय दें वैसे ही लेकर यूएस तय जन
प्रवेश करे वो नए जीवन में एग्जाम हम तुम
यह शरीर नहीं है हम तो शरीर के अंदर रहने
वाली आत्माएं हैं यह शरीर तो केवल हमारे
साथ हैं हम उसके स्वामी है
इस व्रत के टूटने से स्वामी नहीं टूट जाता
है उसी प्रकार शरीर के सुख और दुख आत्मा
को सुखी या दुखी नहीं करते क्योंकि हम
आत्मा है तो फिर यह सुख दुख का ह्रास अब
हमारी आत्मा को क्यों होता है यह सुख दुख
का आभास आत्मा को नहीं होता कि वह शरीर
होता है तो फिर आत्मा को क्या होता है
आत्मा को कुछ नहीं होता क्योंकि होना न
होना सुख-दुख सर्दी-गर्मी इस प्रकृति के
नियम है आत्म तो अविनाशी परमात्मा का अंश
है इसलिए आत्मा प्रकृति की सीमा से बाहर
है आत्मा अचिंत्य हैं मानवीय चेतना के
चिंतन के घेरे में नहीं आती हैं
मैं अर्जुन आत्मा पर प्रकृति और शिष्ट के
नियम लागू ही नहीं होते क्योंकि वह सृष्टि
और प्रकृति दोनों ही की पहुंच से बाहर है
जैसे एक चिंगारी ईएस अग्नि का ही अंश होती
है वैसे ही आत्मा परमात्मा का ही अंश होता
है इसलिए वह व्यक्ति अजन्मा सनातन और
सर्वव्यापी है स्थिर रहने वाला और अचल है
कि अक्षय दुआ एवं अदायों एवं अखिलेश
दोस्तों अशोक शब्द नित्य सवगत आधार अ चलो
एवं सनातन है
कि हे पार्थ आत्मा को ना कोई शस्त्र काट
सकता है ना उसे अग्नि जला सकती है इसको जल
नहीं चला सकता ना इसे बाय ही सूखा सकती है
एक नए नम छिंदंति शस्त्राणि नैनं दहति
पावक न जन्म के दिन तपो न शोषयति मारुत आ
आ
यह देखिए है महेश सख्त कि को सशस्त्र का
ख्याल धनियां पावै हो हो
कि पहले सुलभ इलाज जल नीति है को कोई कैसे
लगी या उधना में हो
कि आधुनिकता धीर व माता वतन है गंध को
भक्त सुनें बनावे हो अमर कुमार रे कौन
अजहर को कैसे अगुंठी जरा वैद्य हूं आखिरी
रहेगी मारुति के मुल्क जिसका यह नीर
कि हे अर्जुन यह सब समझ कर तुम्हें ना
किसी के मरने का शोक मनाना चाहिए और ना
किसी के ना मरने की खुशी का प्रदर्शन करना
चाहिए केशव यह सब जानकर भी कि आत्मा नित्य
सुबह तनौरा जन्मा है तो स्वस्थ नहीं कर
सकते आग नहीं चला सकती कि प्राणी की आत्मा
को दुख शोक खुशी मान अपमान की पीड़ा और
आनंद का अहसास क्यों होता है पार्थ मैंने
पहले ही तुम्हें बताया कि सुख दुख का आभास
करना आत्मा का नहीं शरीर का काम है परंतु
केशव शरीर को तो कपड़ा तभी होगी तो सभी को
कोई चोट लग जाए यह सर्कुलर मनचाहे
कि कैसे श्री आदमी चल जाए उसे जो पीड़ा
होती है उसे शरीर की पीड़ा है
है परंतु मान हानि होने से दुख होता है
समान होने से जो आनंद आता है उसमें तो शनि
को कोई चोट नहीं पहुंचती वह मानहानि का
स्टॉक व कीर्ति की पीड़ा तो आत्म कोई होती
है ना सी नहीं अर्जुन एक हीर थी अब कीर्ति
मीणा मान अपमान यह लाभ-हानि यह जितने का
आनंद अथवा हाथ में की पीड़ा यह भी हाथों
को नहीं होती यह आत्मा का काम नहीं है यह
तो मन की शरारत है मन की शरारत इसका क्या
थक गए शब्द पार्थ प्राणी के शरीर का एक
अदृश्य अंग है मन जो दिखाई नहीं देता
परंतु वही सबसे शक्तिशाली हिस्सा है शरीर
का आ
है याद रखो कि मन शरीर का हिस्सा है उसका
आत्म से कोई संबंध नहीं आत्मा यह भी रथ
में बैठा हुआ रस का स्वामी है तो मन शरीर
रूपी रथ का सारथी है
कि यह मन ही इंद्रियों के घोड़ों को
इधर-उधर भटक जाता है कभी श्याम बनके आवेश
में यही चंचल मन मनुष्य को इस भ्रम में
डाल देता है कि वह सर्वशक्तिमान है उस सब
कुछ कर सकता है नूरजहां का राजा है जिसके
आगे हर कोई छुप जाने पर विवश है और जिसे
हर कोई प्राण करता है
कि जिस तरह दीपक की बाती को दीपक तने छुपा
अंधेरा दिखाई नहीं देता उसी तरह जवानी को
उसके पीछे छुपा बुढ़ापा और कमजोरी दिखाई
नहीं देती परंतु जब शरीर के दीपक में युवा
शक्ति का घी जल-जलकर समाप्त होने लगता है
और डिंपल तने छुपा देना पड़ने लगता है तो
मैं जो घबरा का चिला में लगता है मैं
बीमार हूं
कि यह भूमि कर्नाटक भी मन नहीं करता है
हेयर जूनून मनुष्य को मैं के घमंड की
मदिरा पिला कर मदहोश करने वाला पाखंडी
केवल मन है मन सेवर रॉबी नगोई पल पल रहात
सॉन्ग ही रॉ माया-ममता में बुझा रहे वह
पड़ जावे जुबान के पहले पेट एक दम बिना मन
रहा भिलाए हमने डाले तू इस मन का दानव बन
इस मन को अपना दास बना ले तू इस मन का
दानव बन इस मन को अपना दास बना ले वह
प्रभाव्ा बहती रहेगी
MP3 गण
मैं दो apk धरा मर चुके संघ अंजाण में
करता रहा अदनान जग सारा झाला
झाला स्वभाव फिल्मों के उद्देश भला के
इश्क मे
कि तुम हुआ था
कि इसमें
[संगीत]
सीईए
[संगीत]
अच्छी तरह रंगीन खोज भावनाओं नजर रेशेदार
भोज्य झाल मुनजीर विदेशों से सुनहरे हो
[संगीत]
कि इन इंग्लिश लुटिया थे जेताणा लुट गए
लुट तुम आधुनिक तथा हमारे मां धुंध तथा
हमारे हैं ना
कि वीरवार को हुआ था
मैं तुझ से तुझ संग री यह निर्भय नाम रा
[संगीत]
कि फील धो लें
[संगीत]
[संगीत]
कर दो
[प्रशंसा]
कर दो
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