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LIVE DAY 3|| श्री शिवपुराण कथा || श्री राजेंद्रदास जी महाराज || नांदेड़ ||#jadkhorgaudham

4:02:00EnglishTranscribed Jul 21, 2026
0:00

मेरे मन में

0:05

ऐसी आवे

0:09

मेरे मन

0:12

में

0:14

ऐसी

0:17

[संगीत]

0:18

आवे मरू

0:21

[संगीत]

0:27

जहर मरू

0:30

जहर

0:36

विशखा छाड़ी

0:39

गए

0:41

विश्वास

0:43

बात

0:45

करे छाड़ी

0:48

गए

0:52

विश्वास

0:53

करे नेह के

0:57

नाम चला

0:58

[प्रशंसा]

1:01

श्री राधे श्री राधे

1:05

[प्रशंसा]

1:08

नित

1:11

हो

1:17

गए जी

1:19

हरि गीत गए

1:23

[संगीत]

1:28

मीरा के

1:31

प्रभु कब

1:35

मिलोगे मीरा के

1:39

प्रभु कब

1:44

मिलोगे रहे

1:48

[प्रशंसा]

1:50

मधु पूज्य गुरुदेव आगमन रहे

1:55

मधु व्यासपीठा

1:57

है हो जी

2:00

हरि

2:02

गए

2:05

लगा हो जी

2:07

हरि हित

2:10

गए

2:13

लगा हो जी

2:15

हरि हित गए ने लगा

2:21

[संगीत]

2:21

[प्रशंसा]

2:24

ओम मंगलम भगवान विष्णु

2:27

मंगलमध मंगलम पुंडरीक्ष मंगलाय तनो हरि

2:33

ओम नमः शंभवाय मयो भवाय च नम शंकराय चराय

2:38

च नम शिवाय शिवराय च श्री शिव पुराण

2:43

पुरुषोत्तमाय

2:44

[संगीत]

2:45

नमः समर्पयामि श्री शिव शक्तिभ्याम नमः

2:50

उमा महेश्वराभ्याम

2:53

नमः असतम

2:56

जलम सिंधु पात्रे सुरतर शाखा लेखनी पत्र

3:01

मुरवी लिख

3:04

यही शारदा

3:06

सर्वकालम

3:09

तदना मी पारम नया सर कर श्री सदा शिवाय

3:14

नमः श्री महामृत्युंजय नमः श्री

3:18

बाबुलनाथाय

3:22

नमः रामाय रामभद्राय

3:26

रामचय वेद

3:29

रघुनाथा नाथाय सीताया पतए नमः श्री

3:35

सीतारामाभ्याम नमः श्री लक्ष्मी

3:38

नारायणभ्याम नमः व्यासय विष्णु रूपाय

3:43

व्यास रूपाय विष्णवे नमो व ब्रह्म निधए

3:49

वासाय नमो नमः नमस्ते भगवनभ्यास

3:55

सर्व शास्तिक कोविदा ब्रह्म विष्णु महेश

4:00

नाम मूर्ति

4:03

सत्यवती श्रीमन नारायण नमः श्री यज्ञ

4:08

नारायण

4:10

नमः गुरुवर तक्त राज धन बनम पद्म प्याम

4:17

प्रिया पास

4:20

साक्षमाभ्यामत पथ जो यो हर्रा

4:25

जाभ्या वो सुर प्या प्रिय विरष

4:31

रोपित विजभो

4:34

त्रस्ताब सेतु

4:36

खलदना

4:40

कौशलेंद्रो अतुलित बलधाम हेम

4:45

शलादेहम धनुजवन कृष्णानम ज्ञान नाम

4:49

अग्रग्यम सकल गुण निधानम

4:55

वानराधीशम रघुपति प्रिय भक्तम वात

5:00

जातम नमाम श्री राम भक्ताय नमः श्री अंजनी

5:04

नंदनाय नमः श्री जानकी वल्लभाय नमः श्रीमन

5:09

नारायणाय नमः श्री लक्ष्मी नारायणाय नमः

5:15

कृपया

5:18

कृपया विनम्र विनंती है आप बड़े

5:31

प्रपाल

5:34

भवापोत्तम वंदे महापुरुष ते

5:39

चरणारविंदम वंदे महापुरुष ते

5:44

चरणारविंदम रत्नेश्वरी नमः ज्वाला मालिन

5:48

नमः

5:51

चला

5:52

चला कृपया विनती है अपन व्यास खाली कराव

5:55

आरती

5:57

ओम

5:59

प्रजनन सर्व आत्मस

6:02

प्रजास भयस अग्नि प्रजा बहुम

6:07

करतो असत

6:10

ओम चंद्रमा मन

6:17

सूरज श्व

6:20

शांति राहा शांति रोगया शांति वनस्पतया

6:24

शांति देवा शांति ब्रह्म शांति सर्वगम

6:28

शांति शांति रे शांति श्यामा शांति रेधि

6:33

ओम जगने जगज देवा धर्म

6:39

प्रथना महिमान सत्र पूर्ववे साध्या

6:45

शवा नाना सुगंध पुष्पण यथा कालो भवा

6:50

[संगीत]

6:52

पुष्पांजलयात गड़ शिव शंकर गड़

6:58

परमेश्वर बोलिए श्री वृंदावन बिहारी लाल

7:02

की जय श्री राधा गोविंद भगवान की जय श्री

7:08

शिव पुराण कथा महोत्सव की जय श्री

7:12

विट्ठलेश्वर महादेव की जय श्री दत्तात्रेय

7:17

भगवान की जय श्री अनुसू

7:20

माता की जय श्री मलुक बिहारणी बिहारी जी

7:25

महाराज की जय श्री खाशक बिहारणी बिहारी जी

7:29

महाराज की जय यज्ञेश्वरी जगत जननी श्री गौ

7:34

माता की जय पूज्य पूज्य सदगुरुदेव श्री

7:40

भक्तमाली जी महाराज की जय पूज्य सदगुरुदेव

7:44

श्री पहाड़ी बाबा जी महाराज की जय पूज्य

7:48

सदगुरुदेव श्रीमद् जगत गुरु श्री श्री

7:50

मलुक पीठाधीश्वर जी महाराज की जय श्री

7:55

मलूक पीठ की जय श्री रेवासा धाम की जय सभी

8:02

भक्तों से मेरा विनम्र निवेदन है कि बड़े

8:06

भाव और श्रद्धा के साथ दोनों हाथ उठाकर के

8:10

तीन बार बोलेंगे महादेव

8:14

महादेव महादेव

8:17

महादेव महादेव

8:21

नमः पार्वती पतय हर हर

8:27

महादेव जय जय श्री राधे श्याम जय जय श्री

8:34

सीताराम पूज्य गुरुदेव के चरणों में इस

8:38

दास का कोटि कोटि

8:41

प्रणाम आपकी जीवनी के बारे में हम कितना

8:45

ही बता सकते

8:46

हैं नहीं स्वा स्वात्म

8:49

रामम विषय मृग

8:51

तृष्णा

8:54

भ्रमयति आपकी वाणी के द्वारा

8:58

यहां अमृत वर्षा हो रही

9:01

है। दो दिन के

9:04

बाद समाज का आंतरिक परिवर्तन होने जा रहा

9:09

है। अनंत जन्म जन्मांतर की पुण्य से हमें

9:13

श्री गुरु बाल योगी वेंकट स्वामी महाराज

9:16

मिल गए।

9:18

और उनके दर्शन का लाभ आप साक्षात शिव

9:20

स्वरूप आज हमें प्राप्त हुए

9:23

हैं। इस कथा

9:28

में नंदी्राम नांदेड़ स्थित गुरु गोविंद

9:33

साहिब दरबार

9:35

से महानुभाव यहां पधारे हुए हैं।

9:43

हम आपसे विनती करते

9:48

हैं सचखंड गुरुद्वारा बोर्ड द्वारा संत

9:53

सिंह और ज्ञानी सिंह महाराज जी ज्ञानी

9:56

तनवीर सिंह महाराज जी दर्शन सिंह महाराज

10:00

जी यहां आए

10:02

हैं। पूज्य गुरुदेव का दर्शन के अभिलाषी

10:07

है। आपसे विनती

10:10

है आप ग्रंथ का और पूज्य गुरुदेव का

10:14

स्वागत करिए

10:16

ताली

10:19

बाजवा इनका होगा इनका

10:23

होगा और बाद में श्री गुरु जी के

10:27

मुखारविंद

10:28

से शिव कथा आरंभ होगी बड़ी विनम्र भाव से

10:32

इस यह दास आपसे विनती करती है

10:36

आप यह समाज को आशीर्वचन दीजिए।

10:55

नित्यम महेश रजत निगम चारु

11:01

चंद्राम रत्ना

11:08

कल्पोम प्रसम

11:15

पद्मा व्या

11:17

[संगीत]

11:19

विश्व

11:21

विश्वमिक

11:25

पंच

11:26

ब्रह्मानंदम परम सुखदम केवल ज्ञान

11:33

[संगीत]

11:37

मूर्तिमक्षा लक्ष एक नित्य विमल वचन

11:43

सर्वदे साक्षी

11:45

[संगीत]

11:47

भावम त्रिगुणम श्री सगुरु तम नम श्री

11:53

सदगुरु

11:55

तम

11:57

सगुरु नम

12:00

पार्वती हर हर महादेव

12:05

श्री महाराज जी राजेंद्र महाराज जी को

12:07

हमारा नमन और कथा मंच पर विराजित सभी

12:12

संतों को यथा योग हमारा नमन साधुवाद और आप

12:16

सभी जितने प्रेमी बैठे हैं सबको भगवान

12:20

गुरुवाज की दया से दादा जी धनी वालों की

12:22

कृपा से आप सब और भगवान भोलेनाथ की जो कथा

12:26

सुन रहे

12:28

हैं कल भी हम कथा में बैठे हुए प्रसंग

12:31

हमें वही याद आ रहा था कि हमारे धनी वाले

12:35

दादा जी बड़े दादा जी श्री केशवानंद जी

12:37

महाराज ने गौरी शंकर महाराज

12:41

को शिव रूप में दर्शन दिए।

12:44

और यहां पर शिव पुराण की कथा हो रही

12:47

है। गौरी शंकर

12:49

[संगीत]

12:51

महाराज उत्तर भारत के थे। काबुल कंधार के

12:55

रहने वाले और संत बने थे। उनके मन में

12:57

शुरू से यही भाव था कि जब

13:02

भी मुझे भगवान भोलेनाथ का साक्षात्कार हो,

13:06

भौतिक रूप में भोलेनाथ के दर्शन हो।

13:08

इसीलिए वह संत बने

13:11

थे। उसी

13:13

परंपरा में वह उज्जैन पधारे और वहां पर

13:17

उन्होंने दत्त अखाड़े में

13:20

अपना सन्यास धारण किया। उसके

13:25

बाद उनको मन में ऐसी आवाज आई बद्रीनाथ

13:29

दर्शन के वहां के नर्मदा के अंकर सभी शंकर

13:33

काफी जगह वो गए लेकिन उनको भोलेनाथ का

13:36

साक्षात्कार जब नहीं हुआ तो नर्मदा जी की

13:39

परिक्रमा के लिए निकले। रमदास जी की

13:41

परिक्रमा भी लगाते लगाते 12 परिक्रमा जब

13:44

उनकी हो गई नमदास जी की परिक्रमा आप सब

13:46

जानते ही हैं तीन साल तीन महीने 13 दिन

13:48

में होती है तो जब नमदास जी की परिक्रमा

13:52

12 परिक्रमा होने के बाद भी जब उनका मनोरथ

13:54

पूरा नहीं हुआ मतलब भोलेनाथ के दर्शन नहीं

13:57

हुए तो उन्होंने यह सोचा कि अब अपना शरीर

13:59

पूरा कर देना चाहिए रोज सुबह 4:00 बजे

14:03

उठकर नवदा जी के स्नान करके वापस अपनी

14:05

जमात में आके अपना संध्या पूजन करके फिर

14:09

आगे जमात रात को चलाते थे। उस दिन वह रात

14:12

को 3:00 बजे जल्दी चले गए और अपना मनोरथ

14:15

किसी को नहीं बोला। लेकिन उनके मन में यही

14:17

था कि आज हम स्नान करने जाएंगे और वहीं

14:20

अपना शरीर जो है डूब के पूरा कर देंगे। जब

14:23

नबदा जी किनारे गए और किनारे जाकर नदा जी

14:27

में चल रहे थे तो चलते चलते पानी बढ़ता

14:31

गया लेकिन उनको कोई उनके ऊपर पानी नहीं

14:33

आया।

14:35

फिर उन्होंने कहा कि भाई रामदा जी में

14:38

बैठने लगे कि बैठ के डूब जाओ तो एकदम एक

14:41

छोटी सी कन्या तीन साल तीन चार साल की

14:44

कन्या ने उनके एकदम उनकी उंगली खींची और

14:46

उंगली खींच के उसने बोला क्यों

14:50

डूब के मरना चाहता है आत्महत्या करना

14:53

चाहता है तो उसने कहा उन्होंने कहा कि

14:57

इसको कैसे पता मैं तो किसी को बताया नहीं

15:00

कि मुझे हृदय में डूब के अपना शरीर पूरा

15:03

करना

15:05

तो बोले तुम

15:06

कौन? तो कन्या बोली मैं नर्मदा हूं। मुझे

15:10

सब पता है तू डूब के मरना चाहता

15:16

है। फिर उन्होंने कहा कि तुम कौन? तो बोले

15:19

मैं नर्मदा माई हूं। तो बोले मैं नहीं

15:21

मानता। ऐसा कह के उन्होंने हाथ छुड़ाया।

15:23

छुड़ा के फिर आगे बढ़ने लगे। तो फिर उसके

15:26

बाद माई ने उनको पूरा हाथ पूरे हाथ से

15:29

उनको जोर से पूरे बड़े हाथ से उनको जैसे

15:32

ही पकड़ा तो माई का पूरा रूप बंद नहीं

15:36

करना। तो उन्होंने कहा कौन है? बोले मैं

15:38

नर्मदा हूं। तो बोले पूरे रूप में दर्शन

15:41

दिखाओ जब हम मानेंगे। तो नर्मदा माई ने

15:44

पूरा अपना चतुर्भुज रूप में उनको दर्शन

15:46

दिए। माई को प्रणाम किया और प्रणाम करके

15:51

माई ने बोला कि देखो तुम्हारी जमात में

15:53

बहुत दिन से तुम्हारी जो परिक्रमा हो रही

15:56

है उसी के अंदर जमात के

15:58

अंदर प्रसन्न होकर भोलेनाथ स्वयं जो हैं

16:01

तुम्हारे भंडार में जो केशव नाम के हैं

16:04

किशोरा अवस्था के वो बर्तन मांगते हैं

16:07

भंडार बनाते हैं। वही भोलेनाथ हैं। उनको

16:11

एकदम आश्चर्य हुआ कि भाई भंडार बनाने वाला

16:14

कैसे भोलेनाथ हो सकते हैं। यह उनके मन में

16:17

तर्क वितर्क हुआ तो माई ने कहा जाकर देख

16:21

ले तो बोले नहीं हुआ तो बोले मुझे याद

16:24

करना मैं आ जाऊंगी अब वापस आए अब मरने का

16:28

तो सब छोड़ा वापस अपने डेरे में जब जमात

16:30

में आए आने के बाद उन्होंने जब

16:33

देखा तो केशव जी जो है बर्तन एक बड़ा

16:37

तपेला था सुबह ही भंडार के लिए हलवा बनाने

16:42

के लिए तपेला मांझ रहे थे तो उनके आते-आते

16:45

मन में यही आया कि भाई वो चमत्कारी तो हो

16:48

सकते हैं क्योंकि अकेले 100 डे0 संतों का

16:52

भोजन बना देते हैं। हलवा बना देते हैं। एक

16:55

बार

16:56

जल घी कम हो गया था तो घी कम होने से

16:59

उन्होंने नमदास जी का जल मंगा के उसमें

17:02

पूरी बनाकर सबको खिला दी थी। वो प्रसंग भी

17:05

उनको याद आया। उन्होंने कहा ठीक है भाई ये

17:06

सब बातें चमत्कारी हो सकते हैं। लेकिन

17:09

भगवान शिव कैसे हो सकते हैं? यह बात उनके

17:11

मन में विश्वास नहीं हो रहा था। तो जैसे

17:15

ही और वह पास में गए तो तपेला माजते

17:18

उन्हें छोड़ के ऐसे देखा जब ऐसे देखा तो

17:22

उनका मुंह जो है वह भोलेनाथ वाला दर्शन

17:24

हुए उनको शिव जी के दर्शन हुए और बाकी

17:26

शरीर वैसे ही लगा फिर उन्होंने अपनी आंख

17:29

को मसला कि मैं भाई कोई भ्रमित हो रहा हूं

17:32

सपना देख रहा हूं क्या बात है गौरी शंकर

17:34

महाराज ने फिर जब ध्यान से अपनी आंख को

17:37

मला

17:38

देखा फिर उनको इतनी देर में जो केशव जी थे

17:43

दादा जी धोनी वाले वो जो बाल बाल रूप में

17:46

किशोरा अवस्था में थे वह पद्मासन पे बैठ

17:50

गए। फिर पद्मासन पर बैठ के इतने में

17:51

नर्दाई आ गए। बोले अच्छा अब भी विश्वास

17:54

नहीं हो रहा है। छू के देख ले। फिर

17:57

उन्होंने उनको साष्टांग प्रणाम किया। चरण

18:00

छुए। उनको पूरा साक्षात्कार हुआ। उनसे

18:03

भोलेनाथ से उनकी बात हुई। पूरा उनको भगवान

18:07

भोलेनाथ ने शिव रूप में पूरा दर्शन देके।

18:10

फिर उसके बाद गौरी शंकर महाराज को जैसे ही

18:13

दर्शन हुए

18:15

फिर माई अलोपित हो गई, अदृश्य हो गई और

18:18

गौरी शंकर महाराज ने अच्छी तरह भगवान

18:21

भोलेनाथ के दर्शन किए और फिर उन्होंने यही

18:25

कहा भोलेनाथ ने दादा जी महाराज ने बोले

18:28

अच्छा अब तुमने हमें पहचान लिया है। हमने

18:31

तुम्हें पहचान लिया। अब तुम्हारा मनोरथ हो

18:35

गया। तुम अपनी जमात ले जाओ और यह बात जो

18:38

है कुछ 100 मील दूर जाकर आगे सबको बताना।

18:42

और हम तो जा रहे हैं। ऐसा कह के और जंगल

18:46

में दौड़ गए। जंगल में दौड़ने के बाद साईं

18:50

खेड़ा के पास की बात है। फिर कुछ टाइम बाद

18:52

साईं खेड़ा में ही दास जी महाराज प्रकट

18:54

हुए और वही बच्चों को डंडा मारना किसी को

18:59

का पत्थर

19:00

मारना और उसी से उनका जल कल्याण होता था।

19:05

तो भगवान भोलेनाथ ने इसी तरह से उनको

19:08

दर्शन देकर और बाद में दादा जी ने और

19:10

भक्तों का भी सबका किसी को डंडा मार के

19:13

कल्याण कर दे जिनका काम हो बोले हमारा यह

19:16

काम हो जाएगा डंडा मार देते उसका हो जाता

19:18

और कोई कोई आते डंडा खाने के लिए तो दादा

19:21

जी उनसे बोलते थे हमारा डंडा फालतू नहीं

19:23

है जी अपनी इच्छा हो तो मारते नहीं तो

19:27

नहीं मारते तो ऐसे धनि वाले दादा जी

19:30

महाराज जो हैं केशवानंद जी महाराज जी फिर

19:32

शिव रूप में ही उन्होंने औरों को भी कई को

19:35

दर्शन दिए और हम सब लोग जो हैं गुरु

19:38

महाराज की दया से धनी लाल दाया जी बड़े

19:40

दाया जी महाराज को शिव रूप में आराधते हैं

19:43

और उन्हीं की यहां पर शिव पुराण की कथा हो

19:46

रही यह प्रसंग हमें याद आया और आप में से

19:49

बहुत लोग यहां से इस एरिया से सब पैदल

19:52

निशान गुरु पूर्णिमा पे तो आप सभी भाइयों

19:55

जो हैं और जितने आप कथा सुन रहे हैं

20:00

सभी को महाराज जी जो कथा सुना रहे हैं कथा

20:04

का प्रसंग जो भी है लेकिन आपके मन में

20:07

भगवान के लिए भोलेनाथ के लिए खूब श्रद्धा

20:10

और विश्वास बढ़े और भगवान दया करें कि

20:14

आपके मन में भक्ति जो है वो उच्च रूप से

20:17

स्थाई हो यही हमारी इच्छा है और भगवान

20:21

गुरु महाराज दादा धन वालों की कृपा है बोल

20:24

री बेलिया हिमत वाणी हर हर हर

20:32

महादेव बोलो री बेलिया

20:35

हिमत हर हर हर

20:41

महादेव बोलो रे बेलिया हिमत हर हर हर हर

20:50

महादेव जय श्री दादा जी की जय

20:56

जय श्री राधा जी की जय श्री जय श्री राधा

21:00

जी की जय श्री पूज्य गुरुदेव के चरणों में

21:03

कोटि कोटि प्रणाम इस दिव्य समारोह

21:07

में हमारे वेंकट स्वामी महाराज जी का जो

21:11

प्रमुख अंग है वह है गुरु निष्ठा

21:15

और वह गुरु

21:17

निष्ठा ब्रह्मांड के सारे तत्वों को यहां

21:20

पर खींच कर ला रही है। यह हमारा परम

21:23

सौभाग्य है। नक्षत्र तारा मंडल सब प्रसन्न

21:26

है। इस उचित समय

21:30

पर गुरु गोविंद सिंह दरबार से नांदेड़ से

21:35

ज्ञानी तनवीर सिंह जी इनका आगमन हुआ

21:40

है। उनका आशीर्वचन

21:44

वह हमें दे रहे हैं। आपसे विनती है। आप

21:49

हमें आशीर्वचन देने का प्रयास

21:57

करें। श्री वाहेगुरु साहिब जी।

22:04

आदि गुरु नमः।

22:09

जुगाद गुरु

22:13

नम

22:15

सतगुरु

22:19

नमः श्री गुरु

22:22

देव

22:27

नमः

22:29

आज इस पावन पवित्र अवसर पर

22:34

उपस्थित सभी साधु महात्मा

22:38

त्माग संत

22:41

भगत और यहां के क्षेत्र के इस नगर के इस

22:48

इलाके

22:49

की अगर हमारी भाषा में कहा जाए तो साध

22:53

संगत जो साध

22:56

संगत बहुत

22:58

ही

23:00

दूर दुर्गम इलाकों से यहां पर आज इस

23:04

सत्संगत का लाभ लेने के लिए पहुंची है और

23:10

ऐसे महानुभाव ऐसे संत साधु जन जिनके आप

23:14

दर्शन कर रहे

23:15

हो यह बहुत ही

23:19

भागों वाली निशानी है। बहुत बड़ी बात

23:23

है।

23:25

अगर श्री गुरु ग्रंथ साहिब महाराज जी

23:29

के वचन जो

23:32

है वह हम अपना सके सुन सके

23:36

तो उसमें सदगुरु जी ने श्री गुरु नानक देव

23:41

साहिब महाराज जी ने दसों गुरुओं ने

23:45

सत्संगत की महिमा नाम की महिमा और साधु

23:49

संतों की महिमा का जिक्र किया

23:53

है। सच्चे पाशाह जी कहते

23:56

हैं अगर कोई

24:00

नगर जहां पर कभी सत्संगत नहीं

24:03

होती जहां पर कभी नाम नहीं जप्या जाता वो

24:08

नगर नगर नहीं होते वो क्षेत्र नहीं होते

24:12

वो उजाड़ होते हैं जिथे नाम जपिए प्रभु

24:18

प्यारे से अस्थन सोई न

24:21

चुबारे जिथे नाम ना जपिए मेरे

24:24

गोविंदा से नगर उजाड़े जियो।

24:29

आज गुरु साहब जी की बड़ी कृपा हुई है। इस

24:33

नांदेड़ की पावन पवित्र भूमि

24:36

में आज ऐसा सौभाग्य हमारे सब नांदेड़

24:40

वासियों को सारे इलाके के लोगों को

24:42

प्राप्त हुआ है कि आज ऐसे

24:45

महानुभाव जो केवल केवल परमेश्वर के नाम और

24:50

भक्ति और संकीर्तन और साधुओं की महिमा

24:54

द्वारा इस देश को

24:58

यहां के लोगों को हमें सबको शुभ मार्ग

25:01

प्रदान करने के लिए आए

25:03

है।

25:05

इसलिए हमें भी

25:08

यहां इस कथा के दौरान शिव पुराण के महाकथा

25:11

के

25:13

दौरान हमें जो

25:15

पूज्य सत्कार

25:18

योग द्वार जो हमारे यहां पर मौजूद है कथा

25:22

करने के लिए मुख्य

25:24

प्रवक्ता अग्र पीठाधीश्वर मलुक

25:27

पीठाधीश्वर संत श्री राजेंद्र दास जी और

25:31

जिनके द्वारा यह कार्यक्रम जो करवा करवाया

25:34

जा रहा है। हमारे इस क्षेत्र के बहुत ही

25:38

प्यारे बहुत ही निम्रता जिनके अंदर

25:40

निम्रता है। गुरुणी में संतों की व्याख्या

25:43

की गई है। जिन्ना सास गिरास ना विसरे हर

25:47

नामा मन मंत तन से से नानका पूर्ण सोई

25:52

संत। कहते संत कौन

25:55

है? संत वो है जो आप जपे अवरह नाम जपावे।

26:01

जो खुद भी परमेश्वर की भक्ति करता है और

26:04

दूसरों को भी परमेश्वर की भक्ति में

26:06

जोड़ता है उसे संत कहा गया।

26:12

आज गौ

26:14

वत्स परम

26:16

पूज्य वेंकट स्वामी जी महाराज बाल

26:20

योगी जिन्होंने यह इतना बड़ा कार्यक्रम

26:23

इतना बड़ा यह कथा

26:25

का जिन्होंने यहां पर यह हमारे सामने यह

26:30

दृश्य खड़ा किया है। वह बहुत ही भाग्यशाली

26:35

है और उन्हें बहुत-बहुत बधाइयां है।

26:38

जिन्होंने इस क्षेत्र के कल्याण के लिए कल

26:42

राजेंद्र दास महाराज जी कह रहे थे कि उनकी

26:44

इच्छा है कि इस क्षेत्र के जितने भी जीव

26:48

है जो हमारे सदृश्य है या जो हमारे सदृश्य

26:53

नहीं है उन सबका कल्याण हो उन सब की

26:57

मुक्ति हो इसे कहते हैं

27:00

साधु सतगुरु पाशाह जी ने

27:03

कहा संसार में आकर के जो परोपकार करते हैं

27:07

वही असल साधु है। वही असल संत है। आया सफल

27:12

ताहू को गनिए जास रसन हर हर जस बनिए आए

27:16

बसे साधु के संगे आज देखो हमारा भी जन्म

27:20

सफल है कि साधु का संग मिल गया आए बसे

27:23

साधु के संगे हर हर नाम धव रंगे और हृदय

27:28

में हम यहां बैठ के नाम जप रहे आवत सो जन

27:32

नाम में है राता संसार में आकर के जिसकी

27:35

नाम से भक्ति से प्रीति हो गई आवत सो जन

27:39

नाम है राता जाको दया मया नया विधाता जिन

27:42

पर विधाता परमेश्वर की कृपा है उनको यह

27:45

साधु संग और नाम प्राप्त होता है। फिर आगे

27:48

पाशाह जी कहते हैं एक आवन फिर जोन ना आया

27:53

नानक हर के दर्श समाया जो यहां पर संसार

27:57

में आकर के साधु का संग भक्ति सत्संग कर

28:01

लेता है फिर उसे जन्म मरण के गे में नहीं

28:04

आना पड़ता। इसलिए सबसे बड़ा जो परोपकार है

28:08

सतगुरु श्री गुरु गोविंद सिंह साहिब

28:10

महाराज उनकी पावन पवित्र नांदेड़ जो है वो

28:15

सतयुगी तपोस्थान की भूमि है महाराज जी

28:18

गुरु गोविंद सिंह साहिब महाराज जी ने यहां

28:20

पे सतयुग में दुष्ट दमन के रूप में बहुत

28:25

भारी तपस्या की और जब महाराज कलयुग के समय

28:29

में गुरु गोविंद सिंह साहब के अवतार में

28:31

यहां आए तो सिखों ने पूछा आपका यहां आने

28:34

का कारण क्या है तो महाराज ने गोदावरी के

28:38

तट

28:38

पर अपने कमान और हाथ में तीर लेकर के धनुष

28:44

लेकर के तीर चलाया और कहा जहां पर जाकर के

28:48

तीर लगेगा वो हमारे सतयुग का तपोस्थान

28:52

होवेगा तो जब महाराज जी ने गोदावरी के तट

28:56

पर से तीर चलाया वह तीर जहां पर जाके लगा

29:00

वह कहीं जो है मलेशों का स्थान था

29:05

तो उन्होंने कहा यह तो हमारा स्थान है। हम

29:07

कैसे मान ले कि आपका स्थान है। तो महाराज

29:11

जी ने कहा जब आप यहां पर जमीन जो है जब इस

29:15

धरती में आप खोदोगे तो आपको हमारे तप के

29:19

चिन्ह प्रकट हुए वह नजर आएंगे। तो जब जमीन

29:23

को वहां पर साध संगत जी खोदा गया तो वहां

29:26

पर तप के चिन्ह गुरु गोविंद सिंह जी के

29:28

प्रकट हो गए। मृगशाला कमंडल आसन और महाराज

29:33

जी ने उसी स्थान को जो है इस हजूर साहिब

29:37

नांदड़ के नाम से निवाज करके अब चल नगर

29:40

गोविंद गुरु का नाम जपत सुख पाया राम

29:44

महाराज जी ने कहा यहां जो नाम जपता है उसे

29:48

बहुत ज्यादा फल मिलता है। कारण ही हमारी

29:50

तपोभूमि है। यहां पर एक बार नाम जप्या गया

29:54

वह 100 गुना वध फल देता है और एक पाप

29:57

कमाया गया वह भी 100 गुना फल देता है। तो

30:01

इसलिए यह सिखों के लिए तो बहुत ही पावन

30:03

पवित्र धरती है। जहां पर दसवें गुरु

30:06

गोविंद सिंह साहिब जी ने श्री गुरु ग्रंथ

30:08

साहिब महाराज जी को गुरुता गद्दी भी इसी

30:11

स्थान पर प्रदान की। और जो महाराज जी का

30:14

आदि स्थान था। वहां पर ही सच्चे बादशाह

30:17

महाराज जी अंत में विलीन हो गए। और महाराज

30:20

जी सदे बैकुंठ गए। इसी स्थान से सच्चे

30:23

पाशाह महाराज जी सदे बैकुंठ सदे सचखंड जा

30:27

विराजे। जब दूसरे दिन अंगीठा खोल्या गया

30:31

तो वहां पर कोई चिन्ह कोई अस्त्र कोई फूल

30:33

नहीं वहां पर मिले। केवल केवल एक शस्त्र

30:36

प्राप्त होया। जिस शस्त्र के आज भी वहां

30:39

पर दर्शन करवाए जाते हैं। सो ऐसी यह पावन

30:42

पवित्र भूमि है। और यहां पर आज दूर दराडो

30:46

से जो साधु संत, कोई चित्रकूट, कोई

30:49

वृंदावन, कोई बद्रीनाथ, कोई बद्री विशाल

30:53

और महाराज जी प्रयागराज में भी दर्शन हुए

30:56

थे। यहां पर भी दूसरे बार सुग समा प्राप्त

30:58

होया। महाराज जी भी यहां पर पहुंचे हैं।

31:01

सो हमारे सबके लिए बहुत ही खुशी की बात

31:03

है। श्रीमान जठेदार संत बाबा कुलवंत सिंह

31:06

जी जो यहां के मुख्य जठेदार है उनके हम

31:10

सेवादार हैं। उनकी सेवा के वजह से

31:13

महापुरुष जो इतनी दूर आ नहीं सकते पर

31:16

उन्होंने वेंकट स्वामी जी बाल योगी जी और

31:18

पूज्य राजेंद्र दास जी महाराज जी को बहुत

31:20

साधुवाद और बहुत उनका सत्कार जो है भेजा

31:23

है। इसके लिए हम उनके तहे दिल से धन्यवादी

31:26

है। सतगुरु सच्चे पाशाह महाराज जी कृपा

31:29

करें हमारे सों के मन में नाम का रंग साध

31:32

का संग बना रहे इतनी सेवा आप प्रवाण करना

31:36

छोटा सा बालक हूं बोलते समय कोई भूलचक हो

31:40

जाए तो आप सब ने क्षमा करना यहां पर अपने

31:43

बच्चों को विराम देता हुए वाहे गुरु जी का

31:46

खासा वाहे गुरु जी की फते

31:52

धन्यवाद गुरुदेव नाम साधना के बारे में

31:56

थोड़ा सा परिचय बाल योगी वट स्वामी महाराज

31:58

जी का देता हूं। पूज्य गुरुदेव हमारे इस

32:03

पंचक्रोशी में जो 25 खेड़ा गांव है उस

32:06

गांव में श्रावण मास में एक महीना भर सभी

32:11

लोगों से अपने अपने मंदिर में नाम स्मरण

32:13

करवा लेते हैं और हर तीन साल बाद आने वाले

32:17

अधिक मास में 25ों गांव में रात दिन नाम

32:20

स्मरण चलता रहता है। सेवा आरंभ

32:31

हरि

32:32

[संगीत]

32:38

ओम

32:40

तत्सत

32:44

[संगीत]

32:46

श्रीमते

32:47

[संगीत]

32:51

रामचंद्राय नमः

32:53

[संगीत]

32:59

ओम

33:02

नमः परम

33:04

हंसा

33:07

स्वादित चरण कमल चिन

33:11

[संगीत]

33:15

मकरंदाय भक्त जन मानस निवासाय

33:20

[संगीत]

33:23

श्री

33:31

रामचंद्राय बागीशा

33:33

[संगीत]

33:37

यस

33:39

[संगीत]

33:42

बदने

33:45

लक्ष्मी यस चवक्षसी

33:50

[संगीत]

33:55

यस्यास्ते

33:57

हृदय

33:58

समित तम

34:05

नम विश्व सर्ग

34:11

विसर्ग नव लक्षण

34:14

[संगीत]

34:16

लक्षितम श्री कृष्णा

34:19

[संगीत]

34:21

कृष्णाम

34:23

परमधाम

34:25

[संगीत]

34:30

जगत प्रहलाद नारद पराशर

34:35

[संगीत]

34:38

पुंडरीक

34:40

[संगीत]

34:42

व्यासम्बी सुख सौक भीष्म दालभान

34:50

[संगीत]

34:53

रुकमादार वशिष्ठ

35:00

विभीषणादी

35:04

पुण्यमान परम

35:06

भागवता

35:10

[संगीत]

35:11

नमः

35:13

वांछा कल्प तरुभ्यस्त

35:17

[प्रशंसा]

35:20

कृपा

35:22

[संगीत]

35:26

सिंधुभ्यवच पत नाम

35:32

पावने

35:35

वैष्णवे नमो

35:39

नम श्री

35:43

सीतानाथ

35:46

[संगीत]

35:48

समारंभा श्री

35:52

रामंदा

35:53

[संगीत]

35:55

मध्यमा भक्त भक्ति भगवंत

36:00

गुरु चतुर नाम बुवे

36:05

एक इनके पद वंदन किए नाश विघ्न हरे

36:13

बंदो गुरु पद

36:17

कंज कृपा सिंधु नर रूप

36:23

हरि

36:25

महाम

36:26

कुंज जासु वचन

36:32

रवि कुंज इंदु

36:36

समदे उम रमण करुणायन

36:43

जाह दीन

36:46

परने करो

36:49

कृपा मर

36:55

श्री राम जय

36:58

राम जय जय

37:02

राम श्री राम जय

37:06

राम जय जय राम

37:12

श्री राम जय

37:15

राम जय जय राम

37:20

श्री राम जय

37:23

राम जय जय राम

37:29

श्री राम जय

37:32

राम जय जय राम

37:37

श्री राम राम जय

37:41

राम जय जय

37:45

राम श्री राम जय

37:49

राम जय जय राम

37:54

श्री

37:56

राम जय

37:58

राम जय जय राम

38:03

श्री राम जय राम

38:08

जय जय

38:11

राम श्री राम जय राम जय जय

38:18

[संगीत]

38:20

राम

38:22

सीताराम

38:24

जय

38:28

सीताराम

38:30

सीताराम

38:32

जय सीताराम

38:39

सीताराम

38:41

जय

38:45

सीताराम

38:47

सीताराम

38:49

जय

38:54

सीताराम राधे श्याम

38:58

जय राधे

39:02

श्याम राधे श्याम

39:06

राधे राधे

39:11

श्याम जय

39:14

रघुनंदन

39:16

जय

39:17

[संगीत]

39:19

सियाराम जय

39:22

रघुनंदन जय जय सियाराम

39:27

[प्रशंसा]

39:28

[संगीत]

39:29

जानकी

39:31

वल्लभ सीताराम

39:37

जानकी

39:39

वल्लभ

39:45

सीताराम कमला

39:47

[संगीत]

39:49

विमला मिथिला

39:53

धाम कमला

39:55

[प्रशंसा]

39:56

[संगीत]

39:57

विमला मिथिला

40:02

धाम अवध

40:06

सर

40:14

सीताराम

40:19

सीताराम जय जय

40:22

श्यामा

40:24

जय जय

40:27

श्यामा जय जय

40:31

श्यामा जय जय जय

40:36

श्याम जय जय श्री

40:42

वृंदावन

40:44

धा जय जय श्री

40:49

[प्रशंसा]

40:50

वृंदावन

40:53

धा जय गौ

40:57

माता जय गौ

41:01

माता जय जय गौ

41:05

माता, जय

41:10

गौ भक्त

41:13

वत्सल

41:15

प्रभु दीन

41:18

दयाल भक्त वत्सल

41:23

प्रभु दीन

41:25

[प्रशंसा]

41:27

दयाल

41:30

रक्षा करो

41:32

हे

41:36

गोपाल

41:38

रक्षा करो हे

41:44

गोपाल

41:47

घर

41:49

पले

41:52

गोपाल

41:55

घर

41:57

फले गोपाल

41:59

[प्रशंसा]

42:02

गाय सुखी

42:06

हो

42:09

नंदलाल गाय सुखी हो हे

42:18

नंदलाल जय गौ

42:22

माता जय गौ

42:27

माता जय गौ

42:31

गोपाल जय

42:35

गोपाल भक्त

42:38

वत्सल

42:39

प्रभु दीन

42:43

दयाल भक्त

42:46

व्सल

42:48

प्रभु दीन

42:51

दयाल

42:54

महादेव हर शंकर

42:58

[संगीत]

43:00

शंभू

43:03

महादेव हर

43:05

शंकर

43:06

[प्रशंसा]

43:08

शंभू

43:10

उमाकांत हर

43:16

त्रिपुर

43:19

उमाकांत हर

43:24

त्रिभुर मृत्युंजय

43:27

जय वृषभ ध्वज

43:30

[संगीत]

43:32

सूरनी

43:40

मृत्युंज

43:43

गंगाधर

43:44

ब्रज मदना

43:48

रे

43:51

गंगाधर ब्रज मदना

43:57

हर शिव

44:00

शंकर गौरी

44:04

शंकर हर शिव

44:08

शंकर गौरी

44:12

शं

44:13

वंदे

44:17

गंगाधर

44:20

मीम वंदे गंगा

44:25

[संगीत]

44:29

रुद्रम

44:32

पशुपति निशानम

44:37

रुद्रम

44:39

पशुपति

44:42

[संगीत]

44:43

निशानम कलय

44:47

काशी गुरुनाथम

44:50

[संगीत]

44:53

[प्रशंसा]

44:56

[संगीत]

44:58

श्री महादेव हर शंकर शंभू उमाकांत हर

45:06

त्रिपुर

45:07

[संगीत]

45:10

मृत्युंजय गंगाधर ब्रज

45:13

मदारी हर शिव शंकर

45:17

गौरी वंदे गंगाधर नीचे

45:22

रुद्र

45:26

पशुति

45:29

काशी

45:32

महादेव हर शंकर

45:37

शंभू

45:39

उमा हर

45:44

त्रिपुर

45:47

मृत्युंजय वृषभू

45:49

[संगीत]

45:55

गंगाधर

45:58

नंदना हर शिव शंकर

46:01

गौरीम वंदे गंगाधरम

46:06

रूदं

46:10

पशुपतिशारम

46:13

काशीम श्री राम जय

46:16

राम जय जय राम

46:20

श्री राम जय राम जय जय

46:26

राम श्री राम जय

46:30

राम जय जय

46:33

राम श्री राम जय राम जय जय राम

46:41

[प्रशंसा]

46:42

[संगीत]

46:44

श्री सीता रामचंद्र भगवान की जय जय श्री

46:49

राधा कृष्ण भगवान की जय श्री लक्ष्मी

46:53

नारायण भगवान की जय श्री गौरी शंकर भगवान

46:58

की जय श्री काशी विश्वनाथ भगवान की जय

47:04

श्री द्वादश ज्योतिर्लिंग भगवान की जय

47:08

श्री गोपीश्वर महादेव की जय श्री

47:12

कृष्णेश्वर महादेव की जय श्री नागेश्वर

47:17

महादेव की जय श्री त्रंबकेश्वर महादेव की

47:22

जय श्री भीम शंकर महादेव की जय श्री शिव

47:27

पुराण कथा महा महोत्सव की जय

47:32

श्री गुरु गोविंद सिंह देव जी महाराज की

47:37

जय

47:38

श्री नांदेड़ साहिब की जय श्री दत्त भगवान

47:44

की जय

47:46

श्री शिव पुराण कथा महा महोत्सव की जय

47:53

श्री जानकीनाथ भगवान की जय श्री चंद्र कला

47:59

अवतार परम रसिकाचार्य श्रीमद् स्वामी

48:02

अग्रदेवाचार्य भगवान की जय समस्त

48:06

रसिकाचार्य पूर्वाचार्य चरणन की जय श्री

48:11

स्वामी मलूक देवाचार्य जी महाराज की जय जय

48:16

श्री सदगुरुदेव भगवान की जय

48:21

सब संतन की जय जय जय श्री सीताराम

48:27

[संगीत]

48:29

जय जय श्री राधे श्याम हर हर महादेव

48:40

हरि

48:42

शरणम भक्त वांछा कल्प

48:45

तरु भक्त व्सल शरणागत

48:50

व्सल भगवान श्री उमा महेश्वर की महती कृपा

48:54

करुणा

48:56

से श्री दत्त भगवान की चरण सन्निधि

49:01

में भारतवर्ष के पूज्य

49:04

गण्यमान संतों की महापुरुषों की मंगलमय

49:08

उपस्थिति

49:11

में बाल योगी

49:14

गोवत्स श्री वेंकटेश स्वामी जी

49:20

के समायोजकत्व

49:23

में हम आप सबको मानव जीवन का सर्वोत्कृष्ट

49:28

फल

49:30

सत्संग श्री शिव महापुराण की मंगलमयी कथा

49:34

के माध्यम

49:37

से प्राप्त हो रहा

49:42

है। आज पूज्य छोटे सरकार जी ने धनी वाले

49:48

दादा जी का स्मरण

49:50

किया। जो साक्षात भगवान शिव का ही स्वरूप

49:54

के रूप में विराजमान

49:58

है। आपने पूरी परंपरा का स्मरण किया। श्री

50:02

बड़े दादा

50:04

जी श्री छोटे दादा जी हरिहर भोले भगवान

50:09

जी और तृतीय पीढ़ी के आचार्य के रूप में

50:14

श्री बड़े सरकार और आज उसी पवित्र परंपरा

50:19

के वर्तमान आचार्य श्री छोटे सरकार हम

50:22

लोगों के मध्य विराजमान है। आपकी अपूर्व

50:25

गुरु निष्ठा है। गुरु निष्ठा किसको कहते

50:29

हैं? किसी को सीखना हो, देखना हो तो खेड़ी

50:33

घाट जाकर दादा दरबार जाकर के स्वयं

50:37

प्रत्यक्ष दर्शन करना

50:40

चाहिए। ऐसे छोटे सरकार जी का आज मंगलमय

50:44

आशीर्वाद मिला। और अत्यंत प्रसन्नता का

50:48

विषय है कि

50:52

हमारे श्री

50:54

गुरुद्वारा गुरु गोविंद सिंह देव जी का

50:57

गुरुद्वारा श्री हजूर साहिब नांदेड़

51:00

गुरुद्वारा से पूज्य संत पधारे हैं। उनका

51:05

दर्शन करके मन बहुत प्रसन्न है और हम तो

51:11

पहले से ही यह निश्चय किए हुए थे कि जब भी

51:14

नांदेड़ की यात्रा होगी तो श्री

51:16

गुरुद्वारा साहब में जाकर मत्थ जरूर

51:22

टेकना

51:23

क्योंकि आज पूरे विश्व

51:27

में जो हिंदू वैदिक सनातन धर्म का

51:30

अस्तित्व बचा है और इस रूप में दिखाई पड़

51:34

रहा है। इसके मूल

51:37

में प्रथम बादशाह गुरु श्री नानक देव जी

51:42

महाराज से लेकर दशम गुरु श्री गुरु गोविंद

51:46

सिंह देव जी महाराज का अनुपम अविस्मरणीय

51:50

योगदान है। यह दसों गुरु ना होते तो आज

51:54

इतनी बड़ी संगत का दर्शन यहां ना होता।

51:57

हिंदू का नाम निशान धरती से मिट जाता।

52:05

कितना कष्ट सहा

52:08

है। कितना तप किया

52:13

है। हम अपने हृदय की श्रद्धा निवेदित कर

52:17

रहे हैं। इन सिख परंपरा के दसों गुरुओं को

52:22

हम सनातन धर्म का बहुत श्रेष्ठ आचार्य

52:25

स्वीकार करते हैं। और इन दसों गुरुओं के

52:28

चरणों में अत्यंत श्रद्धा भक्ति पूर्वक

52:31

साष्टांग प्रणाम निवेदित करते

52:38

हैं। श्री गुरु ग्रंथ

52:41

साहब गुरु

52:44

वाणी साक्षात गुरुओं का स्वरूप

52:50

है। भगवत स्वरूप माना

52:55

गया। अभी आप लोग शिव पुराण की कथा का

52:58

श्रवण कर रहे

53:00

थे तो आप लोगों ने

53:03

सुना यह शिव महापुराण जो ग्रंथ है यह कोई

53:08

पुस्तक ग्रंथ नहीं है। यह साक्षात भगवान

53:12

सदा शिव का वांगमय स्वरूप है। शब्दमय

53:15

स्वरूप है।

53:25

गुरु की जो वाणी

53:29

है वस्तुत वही उसका स्वरूप

53:36

है। हम लोगों के

53:41

शरीर किसी काल विशेष में उत्पन्न होते

53:45

हैं। और इन शरीरों की अवधि पूरी हो जाती

53:50

है तो फिर यह शरीर दिखाई नहीं पड़ते।

53:54

लेकिन आचार्यों की, महापुरुषों की, गुरुओं

53:57

की, संतों की वाणी इस धरती पर सदा

54:00

विराजमान रहती है। इसलिए गुरु वाणी ही

54:04

गुरु विग्रह है। यह सिद्धांत है और इस

54:08

सिद्धांत को साकार स्वरूप दिया है। मूर्त

54:13

स्वरूप दिया है। श्री गुरु गोविंद सिंह

54:16

देव जी महाराज ने। जिन्होंने संतों की

54:19

वाणी को ही गुरु के रूप में प्रतिष्ठित

54:22

किया।

54:23

अकाल तख्त पर विराजमान

54:26

किया और सभी संतों को एक स्थान पर

54:30

विराजमान कर दिया।

54:33

हमारे श्री रामानंद संप्रदाय के प्रवर्तक

54:37

आचार्य श्री कबीर साहिब के गुरुदेव श्री

54:40

रेदास महाराज के गुरुदेव श्री

54:43

रामानंदाचार्य जी महाराज की भी वाणी गुरु

54:46

ग्रंथ साहब में दो पद है एक पद दो

54:49

पद दो शब्द श्री रामानंदाचार्य भगवान के

54:53

गुरु ग्रंथ साहब

54:55

में श्री कबीर साहब के शब्द तो बहुत है

54:59

श्री रेदास जी के

55:03

श्री धन जी, श्री पीपा जी, श्री सेन

55:08

जी पांच रामानंदाचार्य की परंपरा के

55:12

महापुरुषों की वाणियां गुरु ग्रंथ साहब

55:15

में और हमारे लिए तो विशेष सौभाग्य की बात

55:19

इसलिए

55:20

है कि हमारे रेवासा धाम के आचार्य चरण

55:24

श्री स्वामी अग्रदेव आचार्य जी महाराज का

55:28

प्रथम गुरु श्री गुरु नानक देव साहब के

55:31

साथ बड़ा बड़ा घनिष्ठ प्रेम था। श्री

55:33

प्रथम गुरु महाराज रेवासा धाम पधारे और

55:37

वहां

55:39

विराजे और दशम गुरु श्री गुरु गोविंद सिंह

55:42

देव जी भी वहां

55:44

पधारे। इसलिए हमको तो जिस स्थान में झाड़ू

55:47

लगाने का अवसर मिल रहा है। वहां प्रथम

55:50

गुरु से दशम गुरुओं तक की वह पवित्र चरण

55:53

रज वहां बिछी हुई

55:58

है। अद्भुत है।

56:03

और वृंदावन

56:05

में जिस मलूक पीठ में

56:08

हमें सेवा करने का

56:12

सौभाग्य संतों ने प्रदान किया

56:16

है। वह श्री मलुक दास जी महाराज का भी

56:19

संबंध पंजाब की धरती

56:22

से अमृतसर क्षेत्र से ही उनके पूर्वज

56:26

प्रयाग के पास कड़ा गांव में आए थे।

56:30

और अपनी वाणी में मलूक दास जी ने गुरुओं

56:33

का बहुत श्रद्धा पूर्वक स्मरण किया और

56:36

उनकी गुरु वाणी में मलूक दास जी की वाणी

56:39

में पंजाबी शब्दों का बहुत प्रयोग है।

56:41

उर्दू, फारसी, पंजाबी इनका बहुत प्रयोग

56:44

है। उससे लगता है कि उनके घर

56:49

में पंजाबी ही बोली जाती होगी। जैसे

56:52

मारवाड़ी लोग कहीं दुनिया में चले जाए

56:54

जहां भी बस जाते वहां घर में मारवाड़ी

56:57

बोलते हैं। ऐसे लगता है कि भले ही उनके

57:00

पूर्वज आकर वहां बस गए हो लेकिन उनके घर

57:04

में पंजाबी बोली जाती होगी क्योंकि उनकी

57:06

वाणी में पंजाबी शब्द बहुत

57:12

है। कई पद तो ऐसे

57:15

हैं कि जिनमें एकदम

57:22

शुद्ध

57:30

पंजाबी जैसे हम एक उदाहरण दें

57:50

वे कह रहे

57:53

हैं माई इम नाची मना नंददा कान्हा खेलदा

57:59

ग्वाली दी गोद बिछे

58:04

तीहु महीने दा बोलदा चालदा त अहीरनी गल

58:11

पूछे छोहरा चंचल कुन हरी

58:14

चाटदा माखन शामनु बहुत रुचे दास मलूक ते

58:20

गुजराना ही नैन तनो जान

58:23

चुके अब इस पद को देखकर लगता है कि हिंदी

58:26

नहीं बिल्कुल पंजाबी

58:29

पंजाबी तो उनकी वाणी में इस प्रकार

58:34

से बहुत सुंदर सुंदर

58:39

भाव गुरु वाणी

58:42

में दया के ऊपर बहुत जोर दिया

58:46

गया। प्राणी मात्र पर दया

58:49

करो। सब में एक आत्मा का दर्शन करो। इस

58:53

बात पर बहुत जोर दिया गया और उसका प्रभाव

58:57

भी श्री मलुक दास जी की वाणी पर दिखाई

58:59

पड़ता

59:01

है। वे कहते हैं

59:06

यही घट

59:09

दया तहां प्रभु

59:13

[प्रशंसा]

59:15

आय घट

59:18

दया कहां प्रभु आ

59:24

अपना सा

59:27

दुख सबका जाने

59:32

अपना सा

59:35

दुख सबका जाने

59:39

[संगीत]

59:41

ताके निकट ना आवे

59:49

ताके निकट ना आवे

59:57

जे घट

1:00:00

दया कहां प्रभु

1:00:05

आय घट

1:00:09

दया प्रभु आ

1:00:13

[संगीत]

1:00:14

तीरथ

1:00:17

जाए करे जो कोई

1:00:20

[संगीत]

1:00:23

तीरथ

1:00:25

जाए करे जो

1:00:30

कोई बिना दया

1:00:34

सब निष्फल

1:00:38

हो बिना

1:00:41

दया

1:00:42

सब निष्फल

1:00:46

होय में दया नहीं है तो सारे धरती में

1:00:50

गोता सारे धरती के तीर्थों में गोता लगा

1:00:53

के आओ आप पवित्र नहीं

1:00:56

होगे प्राणी मात्र के प्रति दया का भाव तो

1:00:59

होना ही

1:01:01

चाहिए चाहे जितने पोची पत्रा पढ़ लो दया

1:01:05

नहीं है तो तुम्हारा ज्ञान तुम्हारा

1:01:07

कल्याण नहीं

1:01:10

करेगा पंडित

1:01:14

पोथी पढ़े

1:01:18

पचास पंडित मृत

1:01:22

[संगीत]

1:01:27

बोस विनु

1:01:29

दया

1:01:31

सब होई

1:01:36

निरासु

1:01:38

दया

1:01:39

सब

1:01:45

हो कहता है गाय मत मारो

1:01:52

मुसलमान कहता हमारे धर्म में तो है हम तो

1:01:57

मारेंगे पर हिंदू भी कई बार देवी देवताओं

1:02:00

के नाम पर बकरा भेड़ा काटता

1:02:02

है संत तो निष्पक्ष भाव से मानव जाति के

1:02:08

कल्याण की बात

1:02:10

बोलते वो कहते यदि गाय काटने वाला नरक

1:02:13

जाएगा तो बकरे काटने वाला भी स्वर्ग नहीं

1:02:16

जाएगा।

1:02:18

इसलिए ना गाय का वध करो ना बकरा बकरी का

1:02:21

वध करो किसी प्राणी की हत्या मत

1:02:24

करो जैसी

1:02:28

बकरी तैसी

1:02:36

[संगीत]

1:02:41

गा

1:02:43

इनके कुहे

1:02:45

[संगीत]

1:02:46

नरक को

1:02:48

[प्रशंसा]

1:02:50

जाए

1:02:52

[प्रशंसा]

1:02:54

इनके नरक को

1:02:57

[प्रशंसा]

1:02:58

जा बांधी

1:03:01

बांधी मुख

1:03:04

खून

1:03:05

[संगीत]

1:03:07

कराई बांधी

1:03:10

बांधी मुख खून कराई

1:03:17

भाड़

1:03:18

पड़ो

1:03:21

ऐसी पंडिताई

1:03:25

भाड़

1:03:27

पड़ो

1:03:29

ऐसी पंडिताई

1:03:34

जीवत

1:03:37

जीव अग्नि में परे

1:03:45

देव

1:03:48

[प्रशंसा]

1:03:50

अग

1:03:52

ऐसा

1:03:54

जग

1:03:55

कसाई

1:03:58

करे

1:04:00

ऐसा

1:04:02

जग

1:04:04

कसाई

1:04:07

करे जे घट

1:04:11

दया कहां

1:04:13

[संगीत]

1:04:16

प्रभु

1:04:20

दया

1:04:21

[संगीत]

1:04:22

[प्रशंसा]

1:04:27

प्रभु संत वाणी गुरु वाणी बिल्कुल एक जैसी

1:04:31

है। चाहे जहां से उठाकर देख

1:04:37

लो। हम

1:04:38

अपनी हृदय की बात कहते हैं।

1:04:42

जैसे गीता, भागवत,

1:04:46

रामायण,

1:04:48

भक्तमाल आदि दिव्य ग्रंथों का प्रवचन होता

1:04:52

है, सत्संग होता है। ऐसे ही आज संपूर्ण

1:04:57

हिंदू सनातन धर्म को श्री गुरु वाणी के

1:05:01

सत्संग की भी आवश्यकता

1:05:03

है। पर

1:05:05

[संगीत]

1:05:07

हमको एक संत की कृपा से

1:05:15

श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी

1:05:19

का हिंदी संस्करण प्राप्त

1:05:23

हुआ और

1:05:28

हमने उस हिंदी संस्करण

1:05:31

को बड़ी श्रद्धा पूर्वक महाराज जी आद्यपंत

1:05:35

मैंने उसका एक पारायण किया।

1:05:39

हमको इतना आनंद हुआ, इतना आनंद हुआ जिसका

1:05:42

वर्णन हम नहीं कर

1:05:46

सकते। बड़ी प्रसन्नता की बात

1:05:50

है कि इस संत समागम

1:05:55

में बहुत सी विभूतियां कृपा पूर्वक पधारी

1:06:00

हैं। हम सबका यथा योग्य वंदन करते हैं और

1:06:04

अब सावधान होकर के मूल ग्रंथ का

1:06:09

आश्रय लेकर के हम लोग आज कथा का श्रवण

1:06:13

करेंगे।

1:06:16

ऋषियों

1:06:19

ने प्रश्न किया

1:06:21

है हे सूत जी महाराज लिंगाद शिव पूजा

1:06:28

[संगीत]

1:06:33

विधानमत शिवलिंग में

1:06:38

भगवान शिव की पूजा का विधान क्या है? आप

1:06:42

कृपा करके बताएं। सूत जी वर्णन करते हैं

1:06:46

कि

1:06:48

पहले लिंगों के क्रम का श्रवण करना

1:06:56

चाहिए। प्रथम लिंग क्या है? सूक्ष्म प्रणव

1:07:00

रूपम ही सूक्ष्म रूपम तू निष्कलम स्थूल

1:07:04

लिंगम ही सकलम त पंचाक्षर

1:07:08

मुते सूत जी कह रहे

1:07:12

हैं

1:07:14

प्रणव अर्थात

1:07:19

ओंकार जिसको कहा एक ओंकार वह एक ओमकार

1:07:24

प्रणव वह प्रथम सूक्ष्म लिंग है वो ओंकार

1:07:29

भी शिवलिंग ही

1:07:34

है। वह निष्कल

1:07:38

है। निष्कल का अर्थ होता है निराकार।

1:07:42

यह प्रणव ओंकार एक ओंकार प्रणव निष्कल

1:07:47

अर्थात निराकार लिंग

1:07:52

है। इसके लिए

1:07:54

इसीलिए गुरुओं ने कहा एक

1:07:58

ओकार करता पुरख निर्भव

1:08:02

निर्बैर और क्या है? अकाल मूरत अजून सेम

1:08:08

गुरु प्रसाद

1:08:12

एक

1:08:13

ओमकार यह भी शिवलिंग ही है और दूसरा

1:08:18

शिवलिंग है पंचाक्षर।

1:08:22

इन दोनों लिंगों की प्रतिष्ठा अंतःकरण में

1:08:26

होती है। प्रणव लिंग की प्रतिष्ठा भीतर है

1:08:30

और पंचाक्षर जिसमें नमः पद आरंभ में है और

1:08:35

शिव शब्द से चतुर्थी का एक वचन है। वह

1:08:39

पंचाक्षर महामंत्र वह भी हृदय में

1:08:42

प्रतिष्ठित शिवलिंग ही है। प्रणव लिंग

1:08:46

पंचाक्षर लिंग ये दो लिंग है। स्थूल लिंग

1:08:50

है।

1:08:52

पंचाक्षर और इन दोनों लिंगों का पूजन

1:08:56

ओंकार और प्रणव पंचाक्षर इनका पूजन ही तप

1:09:01

है और यह दोनों लिंग ही साक्षात मोक्ष

1:09:05

प्रदाता हैं। यह मोक्ष देने वाले

1:09:09

हैं। अब पौरुष लिंग और प्रकृति लिंग के

1:09:12

रूप में बहुत शिवलिंगों के भेद हैं। उनमें

1:09:17

विस्तार पूर्वक भगवान शिव ही जान सकते

1:09:20

हैं। दूसरा कोई इस तत्व को नहीं बता सकता

1:09:23

है। उनमें प्रथम है स्वयंभू

1:09:27

लिंग। हमारे भारतवर्ष की धरती पर अनेक ऐसे

1:09:30

स्थल हैं जहां अपने आप भूगर्भ से शिवलिंग

1:09:35

प्रकट

1:09:36

हुए। वह किसी व्यक्ति के द्वारा निर्मित

1:09:40

नहीं बनाए गए नहीं है। वह स्वयंभू लिंग वह

1:09:44

भी एक विशिष्ट लिंग है।

1:09:49

स्वयंभू लिंग का भीतर तक भीते नीचे तक

1:09:52

कहां तक है उसका कोई पारावार नहीं होता।

1:09:57

टीकमगढ़ के निकट जो कुंडेश्वर है वहां की

1:10:01

सत्य घटना है।

1:10:04

टीकमगढ़ बुंदेलखंड का मध्य प्रदेश का एक

1:10:08

शहर है। जिला है। उसके पास में एक शिव जी

1:10:12

का प्राचीन स्थान है। कुंडेश्वर महादेव।

1:10:17

स्वामी जी ने दर्शन

1:10:19

किया। वह स्वयंभू लिंग

1:10:21

है। तो उस जमाने के जो टीकमगढ़ महाराज थे

1:10:27

उनके मन में

1:10:28

आया कि मंदिर बहुत छोटा है शिवजी तो बड़ा

1:10:33

मंदिर बनाकर इनको ऊंची वेदिका पर पधरा

1:10:36

दिया जाए तो बहुत अच्छा है। तो ऊंची

1:10:39

वेदिका पर पधने के लिए शिवलिंग को उठाना

1:10:41

पड़ेगा।

1:10:45

तो

1:10:46

उन्होंने लोगों को लगाकर खुदाई शुरू करवा

1:10:50

दी। बड़ी संख्या में लोग खुदाई करने के

1:10:53

लिए लग

1:10:54

गए। खोदते खोदते नीचे पानी निकल आया लेकिन

1:10:58

शिवलिंग का कोई पार नहीं

1:11:01

पाया। बड़ी संख्या में लोग लगे

1:11:05

थे। इसके बाद फिर क्या हुआ? बोले अब ऐसा

1:11:09

करो कि हाथियों को साकल से इसको बांधकर

1:11:14

पिंडी को हाथियों से उसको

1:11:17

हिलाओ। हाथी साकल टूट गई। हाथी कुछ नहीं

1:11:21

कर सके। शिवलिंग यथावत रहा और इसका परिणाम

1:11:25

यह

1:11:26

हुआ कि महाराज सहित जितने लोग वहां काम कर

1:11:30

रहे थे सब मरणासन्न हो

1:11:34

गए। महाराज घबरा गए। बोले शांति करो भाई।

1:11:38

भोले बाबा को पुकारा तो स्वप्न में भगवान

1:11:42

शिव ने कहा अरे

1:11:44

मूर्ख ब्रह्मा जी और विष्णु भगवान ने तो

1:11:47

हमारा पार नहीं पाया तू क्या हमारा पार

1:11:51

पाएगा हम जिस रूप में है उसी रूप में

1:11:53

प्रतिष्ठित करो तो वर्तमान में जो मार्बल

1:11:57

का बना हुआ जो मंदिर है वह उस समय के टीम

1:11:59

महाराज का बनाया अभी

1:12:03

भी ये स्वयंभू लिंग भारतवर्ष के अनेक

1:12:07

क्षेत्रों में भगवान शिव स्वयं प्रकट रूप

1:12:10

में विराजते हैं। उन्हें स्वयंभू लिंग

1:12:12

कहते

1:12:14

हैं। दूसरा बिंदु लिंग है। तीसरा

1:12:18

प्रतिष्ठित लिंग है। चौथा चर लिंग है। और

1:12:22

पांचवा गुरु लिंग

1:12:25

है। पांचवा गुरु लिंग है। गुरु लिंग का

1:12:28

अर्थ होता है कि गुरुदेव भी साक्षात

1:12:32

महादेव का स्वरूप ही है। कोई शिवलिंग

1:12:35

उपलब्ध ना हो तो गुरु रूप में ही शिव जी

1:12:39

का पूजन किया जा सकता

1:12:43

है। इसलिए गोस्वामी तुलसीदास जी ने

1:12:47

रामचरितमानस के मंगलाचरण में कहा वंदे

1:12:51

बोधम नित्यम गुरु शंकर रूपणम यमा ही

1:12:57

वक्रोपी चंद्र सर्वत्र वंते गुरु शंकर रूप

1:13:02

गुरु लिंग गुरुदेव साक्षात शिव रूप है। यो

1:13:06

गुरु स शिव प्रोक्त जो गुरु है वह शिव है

1:13:11

और जो शिव है वह गुरु है। शिव और गुरु में

1:13:15

भेद नहीं

1:13:19

है। और आप लोग रोज बोलते हैं गुरु

1:13:23

ब्रह्मा गुरुर विष्णु गुरुर देवो

1:13:29

महेश्वरा गुरु साक्षात परब्रह्मा

1:13:33

तस्मै श्री गुरवे नमः

1:13:38

[प्रशंसा]

1:13:38

[संगीत]

1:13:56

भूमि को भेद करके भगवान शिव प्रकट होते

1:13:59

हैं। वह नाद लिंग

1:14:01

है। और यह नाद लिंग ही स्वयंभू शिव के रूप

1:14:06

में जाने जाते हैं। बोलो भक्तवत्सल

1:14:10

भगवान की जय।

1:14:22

केवल ओंकार को चंदन से लिखकर के यंत्र

1:14:27

में और शिव जी का पूजन किया जा सकता है।

1:14:30

बहुत ध्यान से सुने बड़ी महत्वपूर्ण बातें

1:14:33

हैं। केवल चंदन से पंचाक्षर मंत्र को

1:14:37

लिखकर के भी शिवलिंग के रूप में पूजन किया

1:14:39

जा सकता

1:14:41

है। और

1:14:43

फिर अग्नि में सूर्य में चंद्र में पृथ्वी

1:14:47

में जल

1:14:49

में आकाश में सर्वत्र शिव का स्मरण करके

1:14:53

कहीं भी शिव जी का ध्यान पूजन स्मरण वंदन

1:14:56

किया जा सकता

1:15:01

है। देवताओं ने ऋषियों

1:15:04

ने आत्म सिद्धि के लिए जो कठोर तपस्या

1:15:08

करके शिवलिंग प्रतिष्ठित किए हैं उन्हें

1:15:12

पौरुष लिंग कहा गया। उसकी भी बहुत बड़ी

1:15:15

महिमा है। और राजाओं ने अथवा जो

1:15:20

सामर्थ्यवान लोग हैं शिल्पियों को बुलाकर

1:15:23

के शिवलिंग की स्थापना की है।

1:15:27

वे प्राकृत लिंग कहे जाते हैं। वह प्राकृत

1:15:31

लिंग भी भोग ऐश्वर्य दोनों को देने वाले

1:15:35

हैं।

1:15:48

इस देह को भी देह में भी शिव जी का

1:15:52

अनुसंधान करते हुए लिंग नाभिवा नासिकाग्र

1:15:56

भाग और शिख के क्रम से कटी हृदय मस्तक और

1:16:00

तीनों स्थानों में शिवलिंग की भावना के

1:16:03

करके पूजन किया जाता है। उसको भी ये कहते

1:16:08

हैं। उसे आध्यात्मिक लिंग कहा जाता

1:16:12

है। चर लिंग जो

1:16:17

हैं

1:16:21

उनमें सबसे प्रथम है

1:16:26

रसलिंग। रसलिंग का अर्थ होता

1:16:31

है पारे के बनाए हुए

1:16:35

शिवलिंग। पारद लिंग। पारद लिंग को ही

1:16:38

रसलिंग कहा गया।

1:16:40

पारा भगवान शंकर का शुक्र है। तेज है।

1:16:47

उसको एक पद्धति से बांधा जाता है। फिर

1:16:50

उससे शिवलिंग का निर्माण किया जाता है। पर

1:16:54

वर्तमान समय में जो रसलिंग पारदलिंगों का

1:16:57

निर्माण हो रहा है और बाजार में दुकानों

1:17:01

पर बिक रहे हैं। यह शास्त्रीय मर्यादा

1:17:04

नहीं है। शास्त्रीय मर्यादा है कि त्रिकाल

1:17:09

संध उपासन संपन्न गायत्री के

1:17:14

परमोपासक किसी नष्टिक ब्रह्मचारी के

1:17:17

द्वारा अनुष्ठान पूर्वक रस लिंग का

1:17:20

निर्माण होना चाहिए। उसमें इत किसी का

1:17:23

स्पर्श नहीं होना चाहिए। फिर उसकी

1:17:26

प्रतिष्ठा हो के पूजन किया जाना चाहिए।

1:17:37

रस लिंगम ब्राह नाम सर्वा प्रद भवेत बाण

1:17:41

लिंगम क्षत्रिय नाम महाराज प्रद शुभम

1:17:45

स्वर्ण लिंगम

1:17:47

वैध लिंग लिंगम शद महा शुद्ध करम

1:17:52

शुभमटिकम बाण लिंग सर्वे सर्व कामया

1:17:57

भावे पूजा नते इस प्रकार से

1:18:02

अलग-अलग लोगों की पात्रता के अनुसार

1:18:05

अलग-अलग शिवलिंगों के पूजन का विधान किया

1:18:09

गया। भस्म की विशेष महिमा का वर्णन किया

1:18:13

गया। देवा यदिवा रात्र नारी वा नरोवा

1:18:18

पूार्थ सलम भस्म त्रिपुंड धारे सजल भस्म

1:18:22

सहित ही त्रिपुंड धारण करने का विधान है।

1:18:44

एक बड़ी ऊंची बात लिखी है स्वामी जी लिखा

1:18:50

है कि जो निरंतर

1:18:54

रुद्राक्ष शिवलिंग और भस्म को धारण करते

1:18:58

हैं। उन्हें अशच का स्पर्श नहीं होता।

1:19:03

वह सदा पवित्र रहते हैं। भस्म शिव

1:19:08

मंत्र भवेत शिवा संप्रो शिव परम शिव ही

1:19:15

जिनके परम आराध्य उपास देवता हैं। जो ऐसे

1:19:18

शिवती हैं शिवत निष् हैं। उन्हें ना असच

1:19:23

है ना उन्हें सूतक है जिनके ललाट में

1:19:27

मिट्टी से अथवा भस्म से त्रिपुंड विराजमान

1:19:30

है।

1:19:32

स्वस्ताद गुरु हस्तादवा अपने हाथ से

1:19:36

त्रिपुण धारण हो या गुरु जी के हाथ से

1:19:39

त्रिपुण धारण कराया जाए वह शिव भक्त का

1:19:42

लक्षण है। कहते हैं

1:19:47

ऐसे शिव भक्त की बड़ी महिमा

1:19:51

है। गुरु शब्द का अर्थ क्या है?

1:19:57

गुरु

1:19:58

गुान प्रो गुरु

1:20:03

शब्दस जो गुणों का रोध कर दे उसको गुरु

1:20:07

कहते हैं। शिव पुराण के अनुसार जो गुणों

1:20:12

का रोध कर दे उसको गुरु कहते

1:20:15

हैं। गुण क्या है? सत, रज, तम यह तीन गुण

1:20:20

है और यह संपूर्ण ब्रह्मांड त्रिगुणात्मक

1:20:24

है। यह सृष्टि ही त्रिगुणात्मिका

1:20:27

है। कुछ सतोगुण प्रधान, कुछ रजोगुण

1:20:31

प्रधान, कुछ तमोगुण प्रधान।

1:20:37

केवल सत से भी सृष्टि संभव नहीं

1:20:40

है। निर्माण के लिए रजोगुण की आवश्यकता

1:20:45

है। और रजोगुण और तमोगुण का ऐसा संबंध है

1:20:50

कि जहां रजोगुण रहेगा वहां किसी न किसी

1:20:53

रूप में किसी न किसी अंश में तमोगुण अवश्य

1:20:56

रहेगा।

1:20:58

और वेद भी त्रिगुण का ही प्रतिपादन करते

1:21:02

हैं। इसलिए श्रीमद् भगवत गीता में कहा

1:21:06

त्रगुण विषय वेदा निय गुण भार्जुन हे

1:21:11

अर्जुन वेद त्रिगुण का निरूपण करते हैं।

1:21:15

पर तू गुणातीत अवस्था को प्राप्त करे।

1:21:18

इसका अर्थ है जो शिष्य को गुणातीत अवस्था

1:21:22

में प्रतिष्ठित कर दे

1:21:26

आ गुणातीत बना दे उसी को गुरु कहते हैं।

1:21:33

त्रिगुण से ऊपर उठा दे। मरने के बाद

1:21:37

मुक्ति नहीं जो जीते जी मुक्ति का अनुभव

1:21:40

करा दे उसे गुरु कहते

1:21:43

हैं। जब तक त्रिगुण का लेश है, त्रिगुण के

1:21:47

संस्कार है तब तक बंधन है और गुणातीत

1:21:51

स्वरूप में प्रतिष्ठित होते हुए वह जीवन

1:21:53

मुक्त अवस्था को प्राप्त करता है। हमारे

1:21:56

यहां शास्त्रों में लिखा

1:22:00

है। अब मरने के बाद भले ही हम लोग कह दे

1:22:05

स्वर्गवासी नरकवासी तो किसी को कहा नहीं

1:22:07

जाता। कहा जाता है क्या? चाहे पापी आदमी

1:22:11

भी मर

1:22:12

जाए। तो यह नहीं कहते हैं कि नरकवासी अमुक

1:22:17

ऐसा बोलते हैं क्या?

1:22:19

यही बोला जाता स्वर्गवासी भले ही वह घोर

1:22:22

नरक में गया हो। कहते यही है स्वर्गवासी

1:22:25

सभ्यता यही है। अच्छी बात बोलनी चाहिए।

1:22:28

बुरी बात नहीं बोलनी चाहिए।

1:22:31

अपनी अपनी भावना के

1:22:35

अनुसार हम लोग कहते हैं वैुंठ वासी गोलोक

1:22:39

वासी साकेत वासी सचखंड वासी अमरलोक

1:22:45

वासी संतो ने बात सब एक ही है भगवान का

1:22:48

नित्य

1:22:51

धाम जिसके संबंध में गीता जी में कहा न

1:22:54

तसते सूर्य न शशको न पावका यत न निवते

1:23:00

परम

1:23:06

मम तो हम अपनी श्रद्धा भावना के अनुसार कह

1:23:09

देते हैं कि अमुक लोक में गया मान लेते

1:23:14

हैं लेकिन सच्ची बात यह है कि मरने वाला

1:23:18

कहां गया इसको परमात्मा के अलावा कोई नहीं

1:23:21

जानता जानता है

1:23:26

कोई इसलिए महाराज जी मुक्ति का जो निर्णय

1:23:30

है उसमें शास्त्रों में लिखा है विमुक्तस

1:23:35

विमुचते विमुक्तस विमुचते जिसने वर्तमान

1:23:40

जीवन में मुक्ति का अनुभव कर लिया है वही

1:23:43

मरने के बाद भी मुक्त होगा जिसने जीवन

1:23:46

मुक्ति का अनुभव नहीं किया वो मरने के बाद

1:23:48

भी मुक्त नहीं होगा बंधन में

1:23:51

रहेगा जीते जी अनुभव होना

1:23:54

चाहिए

1:23:56

इसलिए गोस्वामी तुलसीदास जी का यह वचन

1:23:59

हमें बहुत प्रिय लगता है विनय पत्रिका

1:24:06

में को

1:24:13

जाने को

1:24:16

[संगीत]

1:24:18

जाने को ज है

1:24:22

[संगीत]

1:24:24

जमपुर को

1:24:26

जाने को ज

1:24:31

जमपुर को

1:24:33

सुरपुर परधाम को

1:24:39

तुलसी मोह भो

1:24:43

लागत जग

1:24:45

जीवन राम गुलाम

1:24:50

को मरने के

1:24:53

बाद किसको पता है कि कौन यमलोक जाएगा

1:24:59

को जाने को जमपुर को सुरपुर कौन स्वर्ग

1:25:04

जाएगा और कौन परधाम को

1:25:07

जाएगा

1:25:09

नित्य साकेत वैुंठ कैलाश में कौन जाएगा

1:25:13

किसी को पता

1:25:15

नहीं इसलिए तुलसीदास जी कहते हैं हमको तो

1:25:19

यही अच्छा लगता है कि मरने के बाद कहां

1:25:23

जाएंगे सब राम जी पर छोड़

1:25:25

दो जब तक जियो

1:25:28

राम जी के गुलाम बनकर के जियो। राम जी के

1:25:31

सेवक बनकर के जियो। भगवान के शरणागत होकर

1:25:35

के

1:25:37

जियो। बोले शरणागत होने से क्या फायदा है

1:25:41

भाई? क्या लाभ

1:25:45

है? हम राम जी के गुलाम होकर, सेवक होकर,

1:25:49

भक्त होकर, शरणागत होकर जिए। इसका लाभ

1:25:52

क्या है?

1:25:54

इस बात को भी विनय पत्रिका में गोस्वामी

1:25:56

जी कह रहे

1:25:58

हैं

1:26:01

रोटी लुगा

1:26:04

नी के

1:26:06

[संगीत]

1:26:09

राखे आगे हु

1:26:12

की

1:26:14

[संगीत]

1:26:16

वेखे आप प्रभु के चरणों में निवेदित हो

1:26:19

जाओ शरणागत हो जाओ

1:26:23

तो रोटी और लुगा माने

1:26:27

कपड़ा। इसका अभाव नहीं

1:26:31

होगा। ये महापुरुष बैठे हैं सब सामने।

1:26:36

ऊपर विराजे हैं। सामने विराजे

1:26:40

हैं। ये संत कौन सा धंधा करते हैं?

1:26:45

ना तो इनका कोई व्यवसाय है। खोमचे की भी

1:26:50

दुकान नहीं है। खोमचा जानते हो थिलिया

1:26:53

लेकर के चलाते हैं। खोमचा का भी काम इनका

1:26:57

नहीं है। कि चलो भाई कोई टाइम पास मूंगफली

1:27:00

बेच लेते हो।

1:27:04

एक बीघा भी खेत नहीं

1:27:08

है। वेंकटेश स्वामी जी बैठे

1:27:12

हैं। कितनी खेती है

1:27:19

मटकी? एक बीघा भी खेती नहीं है। स्वामी जी

1:27:22

की

1:27:23

मटकी। कितना बैंक बैलेंस है, कितना करोड़

1:27:27

है, कुछ नहीं

1:27:30

है। आज

1:27:33

60 से 70 हजार संगत रोज लंगर छक रही है।

1:27:37

जी रही है। सबको भोजन की व्यवस्था

1:27:40

[प्रशंसा]

1:27:43

है। बड़े से बड़ा करोड़पति भी ये व्यवस्था

1:27:46

नहीं कर सकता। सब हाथ खड़े कर देंगे।

1:27:49

इंडस्ट्री वाले बड़े बड़े अधिकारी ऑफिसर

1:27:52

हाथ खड़े कर देंगे। पर यह कैसे हो रहा है?

1:27:56

यह है शरणागति की महिमा।

1:28:01

[संगीत]

1:28:05

अन्न वस्त्र का अभाव

1:28:07

[संगीत]

1:28:09

नहीं। महाराज जी कितने संतों के स्थान ऐसे

1:28:13

हैं जहां हाथ जोड़ना पड़ता है कि अब अन्न

1:28:16

की जरूरत नहीं है। अब आवश्यकता नहीं है।

1:28:19

मत

1:28:21

दो। ये कौन व्यवस्था कर रहा है?

1:28:29

[प्रशंसा]

1:28:31

संत दादू दयाल जी का एक वाक्य है। संत

1:28:35

दादू

1:28:36

जी राजस्थान की धरती के महान संत

1:28:43

नारायण हमारे रेवासा धाम में दादू दयाल जी

1:28:46

भी पधारे। दो बार आए दादू

1:28:51

दयाल। संत दादू दयाल जी कह रहे हैं।

1:28:55

[संगीत]

1:28:59

दादू दुनिया बाग

1:29:04

[संगीत]

1:29:09

दादू दुनिया

1:29:15

बाच करे

1:29:19

गली रोटी देसी राम जी तड़का

1:29:27

राजस्थानी शब्द

1:29:29

है। दुनिया पागल है। किस चीज में? केवल

1:29:34

खाने कमाने की चिंता में पागल है। क्या

1:29:37

खाएंगे? क्या

1:29:39

कमाएंगे? कमाएंगे नहीं तो खाएंगे

1:29:43

[संगीत]

1:29:45

क्या? और केवल खाएंगे खाएंगे तो कमाएंगे

1:29:49

कैसे? कमाना खाना इसी चक्कर में दुनिया

1:29:51

परेशान है।

1:29:54

और कई बार तो स्वामी जी बड़ी विचित्र

1:29:56

स्थिति होती है। हमारे परम पूज्य श्री गो

1:30:00

ऋषि पथड़ा महाराज मुंबई में एक बहुत बड़े

1:30:04

आदमी के फार्म हाउस में गए। बुलाया महाराज

1:30:09

सोचते थे कुछ गौ सेवा हो जाएगी। लेकिन वो

1:30:12

तो राम जी की इच्छा से ऐसे ही

1:30:17

निकले। उसने बोला महाराज बहुत बड़ा आदमी

1:30:20

था। कई हजार करोड़ का आदमी था। वो बोला

1:30:24

बाबा जी सेवा तो हम करेंगे गौ

1:30:29

सेवा पर आप हमें ठीक कर

1:30:33

दो तो महाराज ने पूछा तुम्हें क्या तकलीफ

1:30:36

है बोले डॉक्टर कहता है जिस दिन खा लोगे

1:30:40

उसी दिन मर जाओगे बोले तो तुम बिना खाए हो

1:30:44

क्या बोले नहीं नमक नहीं खा सकते मीठा

1:30:47

नहीं खा सकते मिर्च नहीं खा सकते घी नहीं

1:30:50

खा सकते तेल नहीं खा सकते फल फल नहीं खा

1:30:53

सकते, दूध नहीं पी सकते, दही नहीं खा

1:30:55

सकते। अरे राम महाराज बोले फिर खाते क्या

1:30:58

हो? बोले जौ का दलिया पानी में उबाल के

1:31:02

खाते हैं। इसके अलावा कुछ भी खा लेंगे तो

1:31:06

हमें ऐसी बीमारी है आंत में हम मर जाएंगे।

1:31:10

हमको ठीक कर दो।

1:31:16

अब व्यक्ति खाने के लिए तो कमाता है पर

1:31:19

हजारों करोड़ कमाने वाला व्यक्ति खा नहीं

1:31:25

सकता। हजारों करोड़ रुपए जिसके पास है 10

1:31:29

20 हजार करोड़ रुपए जिसके पास है वह खा

1:31:32

नहीं

1:31:35

सकता। तो दादू दुनिया बाबरी सोच करे गली

1:31:43

साधु बोले साधु को सोच करने की जरूरत नहीं

1:31:47

है। रोटी देसी राम

1:31:53

जी राम जी रोटी देंगे। कब देंगे राम जी

1:31:57

रोटी?

1:32:00

तड़का

1:32:02

पहली सूर्योदय पीछे

1:32:05

होगा और साधु के भोजन की व्यवस्था पहले हो

1:32:09

जाएगी। आज किस घर से भिक्षा मिलेगी? यह

1:32:12

राम जी का विधान

1:32:14

[संगीत]

1:32:20

[संगीत]

1:32:27

है। इस प्रकार

1:32:31

से यह वर्णन किया गया।

1:32:36

इसलिए जो गुणातीत अवस्था को प्रदान करा

1:32:41

दे उसी को गुरु कहते हैं।

1:32:45

सिकारान राजसादी

1:32:49

गुरुंधोति गुाती पर शिव गुरु रूपम

1:32:56

समाप शिवम

1:32:59

बोस्त

1:33:01

नाम गुरु

1:33:04

[संगीत]

1:33:05

विधते

1:33:07

जो रजोगुण तमोगुण विकारों को पैदा करने

1:33:11

वाले हैं उन रजोगुण तमोगुण को भी मिटा दे

1:33:16

और जो माया की परिधि वाला सतगुण है उसको

1:33:20

भी छोड़ दे। विशुद्ध सत जो निष्काम प्रेम

1:33:24

है उस निष्काम प्रेम में प्रतिष्ठित कर

1:33:30

दे। ऐसी परम शिवता का आविष्कार कर

1:33:36

दे। गुणातीत बनाकर शिव तत्व का बोध करा

1:33:40

दे। उसी को गुरु कहते हैं।

1:33:46

कहते जिस सद्गुरु ने कृपा

1:33:50

करके हमें गुणातीत अवस्था प्रदान की

1:33:54

है। हमें शिव तत्व का बोध कराया

1:33:59

है। शिष्य को उस गुरु तत्व में साक्षात

1:34:03

शिव जी को स्वीकार करना चाहिए। गुरु रूप

1:34:06

में साक्षात शिव तत्व ही

1:34:09

है। तस्मात गुरु शरीरम तू गुरु लिंगम

1:34:14

भवेधा गुरु लिंगस पूजा पूजात गुरु सुशम

1:34:20

भवे इसलिए गुरु पूजा भी शिवलिंग का अर्चन

1:34:24

है। शिवलिंग्चन है। महादेव की पूजा है।

1:34:29

गुरु पूजा महादेव की पूजा

1:34:33

है। अब गुरु पूजा क्या है? स्वामी जी

1:34:37

विवेक रखना पड़ेगा। अब गुरु जी है बिचारे

1:34:40

बड़े

1:34:42

बूढ़े। मान लो 100 वर्ष के हो गए

1:34:46

हैं और गुरु जी को उत्तराखंड में ले जाए

1:34:51

शिष्य। और बोले जैसे केदारनाथ जी पर जल

1:34:55

चढ़ाते हैं। ऐसे गुरु जी का ब्राह्मणों को

1:35:00

बुलाकर नमक चमक से अभिषेक कराएंगे।

1:35:03

तो गुरु जी जल्दी शिवलोक चले

1:35:09

[संगीत]

1:35:11

जाए। राजस्थान

1:35:14

में मारवाड़ क्षेत्र में वहां बालू ही

1:35:18

बालू है तो गर्मी भी खूब पड़ती है। ठंड भी

1:35:20

खूब पड़ती

1:35:23

है। तो एक भगत के घर में गांव

1:35:26

में गुरु जी आए। गर्मी के समय में आए तो

1:35:31

शिष्य बड़ा गुरु भक्ति वाला था। उसने कोरे

1:35:35

कोरे मिट्टी के घड़े मंगाए। राजस्थान में

1:35:39

पानी बड़ा दुर्लभ अब तो भगवान की दया से

1:35:41

कुछ सुलभ है। पहले बहुत दुर्लभ था। कहां

1:35:44

कहां से पानी की व्यवस्था करके हजार घड़ा

1:35:48

1000 घड़ा मिट्टी के सब में छान कर पानी

1:35:52

भराया और गुरु जी को कुल्ला करना हो तो

1:35:55

एकदम ठंडा पानी स्नान करना हो तो पानी खूब

1:35:58

अभिषेक कराया। गर्मी का समय था। गुरु जी

1:36:02

को भी बहुत आनंद

1:36:07

आया। भगवान की दया से शीत काल में पड़ोसी

1:36:11

के घर में भी उनके गुरु जी आ गए। वह बूढ़े

1:36:14

थे। उसने कहा हम पड़ोसी से किसी बात में

1:36:18

कमजोर थोड़ी है। हम भी अपने गुरु जी का

1:36:21

ऐसा ही सत्कार करेंगे। पर गुरु जी आए पूछ

1:36:25

के महीना में। भयंकर ठंड थी

1:36:28

महाराज। राजस्थान की सूखी ठंड कड़कड़ाने

1:36:32

वाली

1:36:33

ठंड। कोरे कोरे घड़ा मंगाए पानी छान करके

1:36:36

भरा और बोले गुरु जी पंडितों को बुला के

1:36:40

आज ही आपका अभिषेक करेंगे।

1:36:42

आज शिवरात्रि है। रात्रि के समय गुरु जी

1:36:45

मना करते रहे। जबरदस्ती अभिषेक शुरू किया।

1:36:49

गुरु जी पर जल ठंडा ठंडा पड़ते गुरु जी

1:36:51

पधार

1:36:54

गए।

1:36:57

इसलिए शिव जी का जैसा पूजन

1:37:01

होगा।

1:37:03

शिवजी वो तो हिमखंड के निवासी हैं। उनको

1:37:08

तो सब कुछ स्वीकार हो जाएगा। पर देह रूप

1:37:11

में जो गुरु है उनके देह का विचार करके

1:37:15

उनकी अवस्था का विचार करके उनकी सेवा क्या

1:37:18

है? तो महाराज जी लिखा है गुरु सुशम भवेत

1:37:22

गुरुदेव की श्री अंग की सेवा ही शिव पूजा

1:37:27

है। उनके शरीर को जिस किसी भी प्रकार की

1:37:31

सेवा की आवश्यकता है उस प्रकार की सेवा

1:37:35

शिष्य अत्यंत श्रद्धा पूर्वक करें। इसको

1:37:39

कहते हैं गुरु लिंगस पूजात गुरु सुश भवेत

1:37:43

अब गुरु सेवा क्या है बहुत ध्यान से सुने

1:37:46

सेवा का अर्थ

1:37:49

भी सेवा आज्ञा समन सुसाहिब

1:37:54

सेवा आज्ञा पालन से बड़ी कोई सेवा नहीं

1:38:00

है पीछे पड़ के गुरु जी के हाथ पाव दबावे

1:38:04

और गुरु जी जो कहे उसको बिल्कुल ना

1:38:06

सुने वो वो कहे बेटा पूर्व जाओ। बोले हम

1:38:09

तो पश्चिम

1:38:11

जाएंगे तो वो सेवा सेवा नहीं है। ऐसे

1:38:15

जो आज्ञा का उल्लंघन करने वाले शिष्य होते

1:38:18

हैं वो कई बार हाथ पैर दबाते दबाते गला भी

1:38:22

दबा देते हैं। पधारो गुरु जी जल्दी। गद्दी

1:38:27

खाली करो हमारे लिए। बुरा नहीं मानना।

1:38:30

साधु सही बात

1:38:34

है। इसलिए गुरुजनों की सबसे बड़ी सेवा है।

1:38:38

उनकी आज्ञा का पाल एकदम साफ रखते चाहे

1:38:42

जितने लोग आ जाए अपने हाथ से शौचालय

1:38:45

शौचालय साफ करते और गुरु जी सुंदर शौचालय

1:38:49

देखकर प्रसन्न होते तो छाती से लगा लेते।

1:38:52

भैया सैकड़ों जन्म तक तपस्या करने से जो

1:38:55

नहीं मिलेगा वह गुरु जी का हृदय कमल खिल

1:38:58

जाएगा तुम्हारी सेवा से वह एक ही जन्म में

1:39:01

मिल

1:39:03

जाएगा इसलिए गुरु सेवा करते हुए गुरु

1:39:07

आज्ञा का पालन करना इसको कहते हैं गुरु

1:39:11

लिंग पूजा ये महादेव की पूजा

1:39:16

है श्रुतम करोति

1:39:19

सुशष काय मनसा

1:39:22

गिराम य गुरु पूर्व शम

1:39:26

शक गुरु जी जो आज्ञा दें उसको तत्काल करें

1:39:31

हां जी

1:39:33

हां शरीर से मन से वाणी से उसको पूरा करने

1:39:37

का प्रयास करें यह कभी ना बोले गुरु जी से

1:39:40

कि यह गुरु जी हमसे नहीं

1:39:44

होगा वो कल वाली बात इसमें आ गई आज गुरु

1:39:48

जी के सामने कभी असंभव ना बोले बोले ना

1:39:51

बोले तुम्हारा जीवन बेकार चला जाएगा।

1:39:54

महापुरुष केवल आज्ञा नहीं देते हैं। आज्ञा

1:39:58

पालन की सामर्थ्य भी देते हैं। शक्ति भी

1:40:01

देते

1:40:04

हैं। कैसे होगा? कैसे होगा? होगा कैसे?

1:40:08

गुरु जी ने कह दिया तो होगा। क्यों नहीं

1:40:10

होगा? लाख बार होगा। क्यों नहीं होगा?

1:40:12

गुरु जी ने कह दिया तो जरूर हो

1:40:16

जाएगा। उसमें विचार ना करें।

1:40:23

अपने प्राण देकर, तन देकर, धन देकर गुरु

1:40:27

जी की आज्ञा का पालन करें उसे शिष्य कहते

1:40:30

हैं। कहां भाई कलम कहां

1:40:32

गई? बहुत सुंदर श्लोक

1:40:37

है। करो वही

1:40:41

पूतात्मा प्राण रप धन

1:40:45

रपि

1:40:46

तस्मा शासने योग्य

1:40:51

शिष्य

1:40:54

विधते सास अनुष्ट धातु से शिष्य शब्द

1:40:59

निष्पन्न होता है शास इससे इत होता है तो

1:41:04

शिष्य शब्द निष्पन्न होता है जिसका अर्थ

1:41:08

होता है शासित तुम योग्य माने गुरुजनों के

1:41:13

अनुशासन में जो रहने के योग्य हो उसे

1:41:17

शिष्य कहते हैं।

1:41:24

अब गुरु जी के अनुशासन में ना रहे।

1:41:32

आज हमारे बड़ी प्रसन्नता की बात है कि

1:41:35

श्री नर्मदा जी के तट

1:41:39

से श्री नरसिंह मंडल वाले पूज्य श्री महंत

1:41:42

जी महाराज श्री महंत श्री श्याम सुंदर दास

1:41:45

जी महाराज यही नाम है ना कृपा पूर्वक

1:41:48

पधारे हैं। मन में बड़ी प्रसन्नता है।

1:41:51

पुराने संत हैं। साधु सेवी स्थान है।

1:41:55

ओमकार ओमकारेश्वर का यह एकमात्र ऐसा स्थान

1:41:59

है जब आधी रात में भी कोई साधु चला जाए तो

1:42:04

सबको आसन लगाने की जगह है सबको प्रसाद

1:42:07

पाने

1:42:09

का प्रबंध है ऐसा स्थान है हम प्रणाम करते

1:42:14

हैं पूज्य महंत जी महाराज को

1:42:23

हां एक गुरु जी

1:42:26

थे। हमको लगता है कि ऐसी ऐसी विकृतियां

1:42:31

आने लग गई थी। इसीलिए गुरुओं ने सोचा कि

1:42:34

भाई अब यह पता नहीं देहधारी लोग कहां-कहां

1:42:37

ले जाएंगे। भगवान से नड़कर अपने से जोड़ने

1:42:41

लग जाएंगे। इसलिए सिख परंपरा के गुरुओं ने

1:42:44

विचार करके गुरु वाणी को ही गुरु का

1:42:47

स्वरूप माना। गुरु ग्रंथ साहब।

1:42:52

तो गुरु जी बहुत सरल थे। अच्छे महात्मा थे

1:42:56

और चेला थोड़ा चतुर चालाक

1:43:01

था। चतुर हो चालू खोपड़ी के होते हैं। तो

1:43:07

चेला थोड़ा चतुर चालाक

1:43:12

था। सवेरे गुरु जी ने

1:43:16

कहा बेटा माधवदास

1:43:20

हां

1:43:22

गुरुदेव कोई माधवदास जी बैठे हो तो बुरा

1:43:25

नहीं माने हम तो एक नाम ले रहे उदाहरण दे

1:43:28

ऐसा ना समझे कि कोई माधव माधवदासी नाम के

1:43:32

संत बैठे उनको देख के हम बोल रहे ऐसा अपने

1:43:34

मन में मत ले आना बेटा माधवदास कहां

1:43:39

गुरुदेव

1:43:41

आज्ञा बोले थोड़ी झाड़ू लगा लो मठ में

1:43:46

स्थान

1:43:47

में बोले गुरु जी

1:43:51

आपने ही कहा था कि झाड़ू लगाने में बहुत

1:43:55

सूक्ष्म जीव

1:43:57

बेचारे पधार जाते हैं। हिंसा हो जाती है।

1:44:01

आपने एक दिन प्रवचन में कहा था अहिंसा

1:44:04

परमो

1:44:06

धर्म तो हम तो उसी बात का विचार कर रहे

1:44:09

हैं कि आपकी वो वाली बात माने कि आज झाड़ू

1:44:12

लगाने वाली बात माने। गुरु जी बेचारे सीधे

1:44:15

थे। चुप हो गए। बोले कोई बात नहीं।

1:44:18

तो थोड़ी देर बाद गुरु जी ने कहा बेटा कोई

1:44:21

बात नहीं झाड़ू तो हमने लगा

1:44:25

ली। अब थोड़ा गौ सेवा

1:44:28

करो। बोले महाराज गौ सेवा की महिमा तो

1:44:31

आपने इतनी सुनाई कि हम बोल नहीं सकते। पर

1:44:34

समस्या यही है। हमें बड़ा डर लगता है गाय

1:44:38

से। क्यों? सामने जाओ तो सींग मार दे। पास

1:44:43

में जाओ लोग लात मार दे। तो फिर आप तो

1:44:47

वैसी उम्र हो रही है आपकी और आपके चेला का

1:44:51

अंग भंग हो जाए विकलांग हो जाए तो आपको

1:44:53

सेवा करनी पड़ेगी तो गुरु जी आप धीरेधीरे

1:44:57

हम जब भय हमारा खत्म हो जाएगा तो हम

1:45:00

धीरे-धीरे करेंगे गौ सेवा भी

1:45:03

करेंगे गुरु जी बहुत सीधे थे उन्होंने कहा

1:45:06

कोई बात नहीं ऐसा ही है ये थोड़ा हलाली है

1:45:11

तो गुरु जी ने गोबर भी उठा लिया गौशाला भी

1:45:14

साफ कर ली धार भी काट

1:45:17

ली और

1:45:20

चेला ने भी स्नान कर लिया गुरु जी ने भी

1:45:22

स्नान कर

1:45:25

लिया बोले बेटा अब ऐसा है तुम मंदिर में

1:45:28

जाकर भगवान की सेवा कर

1:45:31

लो गुरु जी सेवा का कार्य तो बहुत उत्तम

1:45:34

कार्य है भगवान की सेवा पर आपने एक दिन

1:45:37

बोला था कि सेवा में 32 अपराध होते हैं हम

1:45:42

तो नए-नए चेलाए हमसे 64 हो जाएंगे

1:45:46

हमसे तो डबल हो

1:45:49

जाएंगे। तो अपराध वाला काम हमसे क्यों

1:45:52

करवाते? गुरु जी ने कहा चलो हम सेवा पूजा

1:45:55

भी कर

1:45:57

ले। तब गुरु जी बोले ठीक है बच्चा हम सेवा

1:46:00

पूजा कर रहे हैं। तुम तब तक रसोई बना लो।

1:46:05

तो उसने कहा गुरु जी आप अन्यथा ना

1:46:11

माने हम सब काम करना जानते हैं। बस इतना

1:46:16

ही नहीं आता। रोटी बनाना नहीं आता। रसोई

1:46:18

बनाना और सब काम करना जानते

1:46:21

हैं। कितने शेर दाल में कितना शेर नमक

1:46:25

पड़ेगा ये हम नहीं जानते। अरे बच्चा कितनी

1:46:28

शेर दाल में कितने शेर नमक थोड़ी पड़ता

1:46:31

है। नमक तो नमक के हिसाब से पड़ता है। बस

1:46:33

यही गुरु जी बिल्कुल फिर रसोई बिगड़ जाए

1:46:36

भगवान को बढ़िया भोग ना लगे अतिथि सत्कार

1:46:39

ना हो तो आप नाराज होंगे। गुरु जी ने कहा

1:46:42

कोई बात नहीं रसोई भी बना लेते हैं। भोग

1:46:44

लगा लिया। बोले बेटा प्रसाद पा लो।

1:46:48

बोले देखो आपने ही एक दिन कहा था आज्ञा

1:46:52

गुरु नाम

1:46:53

अविचारणी आज्ञा गुरु नाम अनुपालनीया

1:46:57

गुरुजनों की आज्ञा पालन में बिल्कुल विचार

1:47:00

नहीं करना चाहिए जो मुख से आज्ञा निकले

1:47:03

तत्काल पालन करना चाहिए और सवेरे से तो हम

1:47:07

कुछ ना कुछ गड़बड़ी कर रहे हैं। यह आपकी

1:47:09

आखरी आज्ञा है। इसका हम तिरस्कार नहीं कर

1:47:13

सकते।

1:47:19

ऐसे चेलों के संबंध

1:47:21

में श्री कबीर दास जी ने

1:47:26

कहा उड़

1:47:29

जाएगा हंस

1:47:34

अकेला उड़

1:47:38

जाएगा हंस अकेला

1:47:42

[संगीत]

1:47:45

एक

1:47:47

डाल दो पंछी बैठे ये डाल है एक गुरु एक

1:47:55

चेला गुरु की

1:47:58

करनी गुरु जाएंगे

1:48:02

चेले की करनी

1:48:04

चेला

1:48:06

जाएगा हंस

1:48:10

अकेला ऐसे जो चतुर चालाक होते हैं। उनको

1:48:14

चाहे जितने समर्थ संत सद्गुरु मिल जाए वो

1:48:18

कहीं रह जाए उनके तो कल्याण में सदा संदेह

1:48:22

ही रहता है।

1:48:24

इसलिए शिव पुराण में यह सिद्धांत कहा जा

1:48:28

रहा

1:48:29

है कि जो गुरुजनों के अनुशासन में रहे

1:48:33

अपने तन मन प्राण की पूरी शक्ति लगा के

1:48:37

गुरु की आज्ञा का पालन करे उसे शिष्य कहते

1:48:41

हैं।

1:48:46

महर्षि धौम्य ने कहा महाभारत में महाराज

1:48:50

महर्षि धम ने कहा अपने शिष्य से कि बेटा

1:48:53

यह भगवान का खेत है धान का और यह धान के

1:48:58

खेत की मेड बार-बार टूट जा रही है और खेत

1:49:01

का पानी निकल जाएगा तो धान कैसे होगी तुम

1:49:05

इसमें सेवा करो शिष्य ने कहा जो आज्ञा अब

1:49:09

वो पानी बहुत बरस रहा था इधर मेड बांधे तो

1:49:12

उधर उधर बांधे तो उधर फूट जाए। तब वह

1:49:16

स्वयं ही मेड बन के और लेट गया। पानी को

1:49:20

बाहर नहीं निकलने दिया। पूरी रात ठंड के

1:49:23

समय में मेल बनकर पड़ा रहा। प्रातः काल

1:49:26

देखा गुरु जी ने महर्षि धम ने कि मेरा

1:49:29

शिष्य नहीं

1:49:32

आया। आप पहुंचे

1:49:35

बेटा कहां हो? कहा गुरु जी मैं आपकी आज्ञा

1:49:39

का पालन कर रहा हूं।

1:49:42

बोले बेटा वर्षा बंद हो चुकी है। क्या

1:49:44

कहां हो? तुम दिखाई नहीं पड़ रहे हो। बोले

1:49:47

मैं धान की खेत की मेड बनकर पड़ा हुआ हूं।

1:49:51

क्योंकि आपने आज्ञा दी थी कि पानी खेत का

1:49:55

बाहर ना हो जाए। बोले बेटा खेत में जितने

1:49:59

जल की आवश्यकता थी उतना जल तो अब है। अब

1:50:03

तुम आ जाओ। अब कोई खेती में नुकसान होने

1:50:06

वाला नहीं है। तो वह मेड तोड़ कर

1:50:11

आया तो गुरु जी ने उसका एक नया नाम दे

1:50:15

दिया उदालक। क्या नाम दिया? वे हुए महर्षि

1:50:20

उद्यालक। और उस शिष्य को कहा तुम उदालक

1:50:24

ऋषि हुए आज से और अपनी छाती से लगाकर कहा

1:50:28

बेटा संपूर्ण ब्रह्म विद्या तेरे हृदय में

1:50:32

प्रकाशित हो जाएगी।

1:50:39

शब्द ब्रह्म पर ब्रह्म दोनों का

1:50:43

तुझे संपूर्ण बोध हो जाए।

1:50:58

शरीरम

1:51:00

गुरु अगम

1:51:05

अग्रम शिष्या

1:51:07

पुत्र

1:51:10

सदा

1:51:13

मंत्र इस प्रकार से जो बिंदु सृष्टि में

1:51:17

पुत्र है वही नाद सृष्टि में शिष्य है

1:51:23

बोलो भक्तवत्सल

1:51:25

भगवान की जय जय। इस प्रकार से यह भगवान

1:51:31

शिव के विविध स्वरूपों का वर्णन किया और

1:51:34

कहा कि इनमें पार्थिव लिंग के पूजन का

1:51:38

विशेष महत्व है जो एक करोड़ पार्थिव लिंग

1:51:43

की का निर्माण करके उसकी विधिवत पूजन कर

1:51:48

लेता है वह जीते जी मुक्ति को प्राप्त कर

1:51:52

लेता है। ऐसा भी लिखा निष्काम भाव से

1:51:54

कामना होगी तो उस कामना की पूर्ति होगी।

1:51:57

केवल संसार चक्र से छूटने का संकल्प लेकर

1:52:02

सवा करोड़ मिट्टी के शिवलिंग बनाकर के यदि

1:52:05

पूजन कर ले तो वह जीवन मुक्ति को प्राप्त

1:52:08

करेगा। ऐसा लिखा

1:52:13

है। कौन-कौन से मंत्र से पूजन करना चाहिए?

1:52:18

उन वैदिक मंत्रों का उल्लेख भी किया और

1:52:22

भगवान शिव के ध्यान का उल्लेख किया। कामना

1:52:26

भेद से

1:52:28

अलग-अलग संख्या में पार्थिव लिंग के पूजन

1:52:32

का भी वर्णन किया और किस वस्तु की

1:52:35

प्राप्ति के लिए क्या करना चाहिए इसका भी

1:52:37

वर्णन किया। अब शिव नैवेद्य के संबंध में

1:52:42

एक बड़ा सुंदर विचार यहां प्रस्तुत किया

1:52:45

जा रहा है। बहुत ध्यान से सुने। सभी

1:52:48

सनातनी हिंदुओं को यह बात बड़े भाव से और

1:52:52

बड़े ध्यान से सुननी चाहिए। शिव नैवेद्य

1:52:55

के संबंध

1:52:57

में शिव जी के प्रसाद के संबंध

1:53:02

में

1:53:04

उछम शिवदम पूर्वत

1:53:08

व निर्णय

1:53:13

महात्मने शकाद ऋषियों ने तीर्थराज प्रयाग

1:53:16

की धरती पर सूत जी से

1:53:18

पूछा कि हमने सुना है कि शिव जी को अर्पित

1:53:23

जो नैवेद्य उनका जो प्रसाद है वह अग्रह

1:53:27

होता है। उसे ग्रहण नहीं किया जाता है। इस

1:53:30

संबंध में आप धर्म शास्त्र का विचार क्या

1:53:33

है? इसका ठीक ठीक निर्णय

1:53:35

सुनावे और बिल पत्र का महात्म बतावे। बिल

1:53:40

पत्र की महिमा क्या है? क्योंकि बिल्व

1:53:43

पत्र भगवान शिव को अत्यंत प्रिय है। यह

1:53:46

बिल्व के महात्म का वर्णन करें। श्री सूत

1:53:50

जी इन दोनों प्रश्नों का समाधान कर रहे

1:53:52

हैं।

1:53:57

पहले एक बात हम आपको स्पष्ट कर

1:54:02

दें। शिव संगीिता

1:54:06

अंतर्गत श्री रामचन महायज्ञ का विधान है।

1:54:10

श्री रामचन महायज्ञ रामर्चा होती है। वह

1:54:14

भी एक यज्ञ ही है। महान यज्ञ है। और बड़ा

1:54:18

चमत्कारिक प्रभाव होता है रामर्चन का।

1:54:21

असाध्य कार्य भी सिद्ध हो जाता है रामर्चन

1:54:24

से। उस रामार्चन के महात्म में एक कथा आती

1:54:30

है कि ब्रह्मलोक में ब्रह्मा जी महाराज ने

1:54:34

रामर्चन महायज्ञ

1:54:36

किया और उसका प्रसाद बांटने की सेवा नारद

1:54:40

जी को प्रदान की। नारद जी प्रसाद लेकर

1:54:43

कैलाश आए और उन्होंने भगवान शिव को

1:54:47

रामर्चन का प्रसाद दिया। शंकर जी आनंद में

1:54:50

भरकर नृत्य करने लगे और संपूर्ण प्रसाद पा

1:54:54

गए। सती जी थी उस समय पार्वती जी नहीं थी।

1:54:58

सती जी थी दक्ष पुत्री सती तो सती जी

1:55:01

स्नान के लिए गई थी। वो सखियों के साथ लौट

1:55:04

के आ रही थी। उन्होंने मार्ग में नारद जी

1:55:07

को

1:55:09

देखा। नारद जी से पूछा गुरु

1:55:13

जी आप कहां से पधार रहे हैं? बोले हम

1:55:15

भगवान शिव का दर्शन करके आ रहे हैं। तो

1:55:18

कैसे आए? बोले राम अर्चन का प्रसाद

1:55:22

ब्रह्मलोक से ले आए

1:55:24

थे। जाओ जाओ तुमको भी मिल जाएगा प्रसाद।

1:55:29

चले

1:55:30

जाओ। सती जी आई बोली प्रसाद लाओ हमारा।

1:55:34

भोले बाबा बोले हम तो भूल ही गए। कब क्या

1:55:37

किया? बोले हम तो प्रेम में भर के पूरा ही

1:55:41

पा गए। हमने तुम्हारे लिए कुछ भी बचाया

1:55:46

नहीं शेष नहीं

1:55:48

छोड़ा तो शिव संगीिता में ऐसा लिखा

1:55:52

है रामर्चन महात्म की कथा में कि सती जी

1:55:56

ने रुष्ट होकर शिव जी को श्राप दे दिया आप

1:56:00

हमारा हमारे हिस्से का भी प्रसाद खा गए पा

1:56:03

गए हमको नहीं दिया तो हम आपको श्राप देते

1:56:07

हैं जो आपका प्रसाद खाएंगे वह कुत्ते की

1:56:10

योनि में चले जाएंगे

1:56:14

कुत्ते हो

1:56:18

जाए। अब बहुत ध्यान से सुने हम क्या कहना

1:56:21

चाहते? बहुत ध्यान से सुने। आगे इस पुराण

1:56:24

की बात हम

1:56:25

कहेंगे। ऐसा क्यों कहा सती जी ने?

1:56:31

प्रसाद की

1:56:35

एक मर्यादा

1:56:38

है और महाराज प्रसाद की मर्यादा यह

1:56:43

है कि प्रसाद कभी अकेले नहीं खाना चाहिए।

1:56:47

प्रसाद हमेशा बांट कर खाना चाहिए। रामर्चन

1:56:51

के प्रसाद की तो बात है कि आपको एक लड्डू

1:56:53

भी मिला है तो किसी ने किसी को आप उसमें

1:56:56

से कुछ दो तब खाओ।

1:57:00

तो आशय वहां कहने का यह है कि भगवान का

1:57:03

प्रसाद जो बांट के नहीं खाता अकेले खा

1:57:06

जाता है उसे कुत्ता होना पड़ता है। यह

1:57:08

उसका मतलब

1:57:11

है। हमारे पूज्य गुरुदेव भक्तमाली जी से

1:57:14

किसी ने पूछा बोले महाराज जी ऐसा लिखा है

1:57:18

कुत्ता हो जाता है। महाराज जी तो बड़े

1:57:21

विलक्षण समाधान करते थे। महाराज जी हंसने

1:57:23

लगे। बोले कौन ऐसा बढ़िया सत्कर्म कर रहे

1:57:28

हैं कि हम इंद्र महेंद्र बनेंगे। भजन तो

1:57:32

कर नहीं रहे हैं। जीवन को नष्ट किए चले जा

1:57:35

रहे हैं। तो सुकर कूकर ही

1:57:38

बनेंगे। शिव जी का प्रसाद पाकर कुत्ता

1:57:42

बनेंगे तो हवाई जहाज में घूमेंगे।

1:57:46

डेढ़ करोड़ दो करोड़ की गाड़ी में बैठकर

1:57:49

घूमेंगे। बढ़िया सावन लगाकर नहाएंगे। दूध

1:57:52

रोटी खाएंगे।

1:57:56

यह तो हंसकर उन्होंने

1:57:59

कहा और दूसरी बात उन्होंने यह

1:58:04

कही

1:58:06

कि

1:58:08

प्रसाद के संबंध में विचार क्या है? इसको

1:58:13

ठीक से शिव पुराण को पढ़कर ही देख लेना

1:58:16

चाहिए। अब शिव पुराण में क्या लिखा हुआ

1:58:19

है? इस संबंध में हम आपको निवेदन कर रहे

1:58:21

हैं।

1:58:24

भगवान को निवेदित करके तुलसी दर पध कर

1:58:28

भगवत प्रसाद शिव जी को निवेदित करो और उस

1:58:31

प्रसाद को पाओ कोई संकोच की बात

1:58:38

नहीं

1:58:40

किंतु जो किसी मूर्तिकार के द्वारा टंकित

1:58:44

शिवलिंग

1:58:46

है माने पाषाण से जिनका निर्माण किया गया

1:58:50

है उनको टंकित स्वर टंकित स्वरूप कहा जाता

1:58:54

है। वह टंकित जो शिवलिंग है उसमें भगवान

1:58:58

शिव के चंड नाम के गण का अधिकार है। किसका

1:59:02

अधिकार है? चंडाधिकार है। भगवान शिव के एक

1:59:06

गण है चंड।

1:59:10

उनका नाम शिव्चन के बाद लिया जाता

1:59:17

है। बाण रावण

1:59:20

चंडीस श्रंगी रिटा दया सदा शिवस

1:59:25

नैवेद्यम सर्वे ग्रहण साभवा जब शिव जी का

1:59:29

पूजन पूरा हो जाता है तो शिव जी को भोग

1:59:33

लगने के बाद उनके पार्षदों को प्रसाद दिया

1:59:35

जाता है। यदि प्रसाद न देंगे तो पूजन सफल

1:59:39

नहीं होगा। उनमें कौन-कौन है शिव जी के

1:59:42

पार्षद बाण बाणासुर

1:59:45

रावण रावण एक रुद्र गण के रूप में भी रावण

1:59:49

सेवा में अभी भी है बाणासुर भी रुद्रगण के

1:59:52

रूप में शिव जी की सेवा में है बाण रावण

1:59:55

चंडीस चंडीस नाम के गण श्रंगी भृंगी और

1:59:59

रिट

2:00:01

आदि ये सभी जो रुद्र गण है वो भगवान शिव

2:00:05

के नैवेद्य को स्वीकार करें तो इनमें जो

2:00:09

चंड नाम के गण हैं। उन्होंने भगवान शिव

2:00:12

बहुत ध्यान से सुने। उन्होंने भगवान शिव

2:00:15

की उपासना करके भगवान शिव को प्रसन्न करके

2:00:19

वर मांगा कि आपको जो कुछ निवेदित किया जाए

2:00:23

उस पर संपूर्ण अधिकार मेरा

2:00:27

हो। दूसरे किसी का अधिकार ना हो।

2:00:36

भगवान शंकर ने कहा यह तो कठिन है। क्यों?

2:00:40

क्योंकि हमारे नैवेद्य को तो ब्रह्माद

2:00:43

देवता भी श्रद्धा पूर्वक लेते हैं। अब

2:00:45

केवल तुम्हारा अधिकार हो जाएगा तब तो किसी

2:00:49

को हमारे प्रसाद का सौभाग्य ही नहीं

2:00:53

मिलेगा। बोला नहीं हम तो बस यही चाहते

2:00:55

हैं। हमारा ही पूरा अधिकार है। होते हैं

2:00:59

बड़े निष्ठावान। कई चेले भी ऐसे होते हैं।

2:01:01

बोले गुरु जी की थाली पर तो हमारा ही

2:01:04

अधिकार हम किसी को एक कण नहीं देंगे।

2:01:06

उसमें से ऐसे होते हैं। लो चंड जी

2:01:12

बोले कि हम तो दूसरे में राजी नहीं है।

2:01:15

हमको तो पूरा पूरा

2:01:17

चाहिए। तब शंकर जी ने कहा जो

2:01:21

किसी मूर्तिकार के द्वारा

2:01:24

निर्मित शैल आदि की प्रतिमा होगी। की

2:01:28

पाषाण निर्मित प्रतिमा होगी। उसमें

2:01:31

तुम्हारा अधिकार होगा। द्वादश

2:01:33

ज्योतिर्लिंगों में तुम्हारा अधिकार नहीं

2:01:36

होगा। स्वयंभू लिंगों में तुम्हारा अधिकार

2:01:39

नहीं होगा। वाण लिंग माने नर्मदेश्वर लिंग

2:01:42

में तुम्हारा अधिकार नहीं होगा। रत्न

2:01:45

लिंग। रसलिंग में तुम्हारा अधिकार नहीं

2:01:47

होगा। रत्न लिंग माने होता है मणि माणिक्य

2:01:50

आदि के शिवलिंग अथवा रसलिंग माने पारद

2:01:54

लिंग अथवा धातु लिंग। धातु लिंग माने

2:01:58

स्वर्ण लिंग रजत लिंग इनमें भी आपका

2:02:01

अधिकार नहीं

2:02:06

होगा। इनसे जो बच

2:02:10

गया अर्थात किसी मूर्तिकार के द्वारा बनाई

2:02:14

हुई टंकित

2:02:16

प्रतिमा शिवलिंग उसमें तुम्हारा अधिकार

2:02:20

होगा और वह अधिकार भी तुम्हारा तुम्हारे

2:02:25

लिए होगा। किंतु जो शिव दीक्षा से युक्त

2:02:28

लोग हैं वह उस प्रसाद को भी ग्रहण करें

2:02:31

उनको दोष नहीं होगा। किंतु जो शिव दीक्षा

2:02:34

से युक्त नहीं है अन्य दीक्षा जिन्होंने

2:02:37

ले रखी है उनको तो स्वयंभू लिंग अथवा वाण

2:02:42

लिंग अथवा ज्योतिर्लिंग का ही नैवेद्य

2:02:44

लेना चाहिए। सामान्य टंकित स्वरूप का

2:02:47

प्रसाद नहीं लेना चाहिए। ये शिव पुराण में

2:02:49

लिखा

2:02:53

है। अब एक और बात है।

2:02:56

के भले ही आपके स्थान में टंकित शिवलिंग

2:02:59

विराजमान है पर भगवान को भोग लगाकर

2:03:02

निवेदित कर दिया तो उसमें चंडाधिकार नहीं

2:03:05

फिर तो भगवत प्रसाद है और शालिग्राम शिला

2:03:09

लग्न होने से इसलिए महाराज जी कई प्राचीन

2:03:12

शिवालयों में शालिग्राम को ऊपर पधराकर

2:03:16

शिवलिंग के ऊपर तप पूजन होता है।

2:03:18

हरिहरात्मक पूजन होता है। कई जगह ऐसी

2:03:21

व्यवस्था है। आप पशुपतिनाथ जी गए हैं।

2:03:25

पशुपतिनाथ जी पशुपतिनाथ जी में नेपाल गए

2:03:29

ना पशुपतिनाथ जी पशुपतिनाथ जी में भगवान

2:03:33

पशुपतिनाथ का पूजन शालिग्राम जी के साथ ही

2:03:37

होता है। आज भी होता है। उनके साथ ही उनका

2:03:40

अभिषेक होता है। उनके साथ ही उनका स्नान

2:03:42

होता

2:03:44

है। इधर आसाम में शिवालय एक जगह है। वहां

2:03:49

प्राचीन शिवलिंग है। वहां सब बहुत प्राचीन

2:03:53

हजारों वर्ष प्राचीन शालिग्रामों के साथ

2:03:56

उनका पूजन होता है। इसका

2:03:58

भी निरूपण ग्रंथ में लिखा हुआ है। बोलो

2:04:02

भक्तवत्सल

2:04:03

भगवान की जय। और शिव जी के नैवेद्य के

2:04:08

बारे में लिखा

2:04:10

है कि शिव जी के प्रसाद का दर्शन करने से

2:04:14

पाप नष्ट हो जाते हैं और कोई श्रद्धा

2:04:17

पूर्वक शिव प्रसाद ग्रहण कर ले तो उसको

2:04:20

करोड़ों करोड़ों गुना पुण्य की प्राप्ति

2:04:22

हो जाती

2:04:27

है। जो शिव नैवेद्य को मस्तक झुकाकर

2:04:30

प्रणाम नहीं करता शिव स्मरण पूर्वक उसे

2:04:33

ग्रहण नहीं करता है वह मनुष्य नारकीय है

2:04:37

यह भी लिखा हुआ है शिव दीक्षा भक्तो महा

2:04:41

प्रसाद संकम

2:04:43

सर्वे

2:04:45

नैवेद्यम जो शिव दीक्षा से युक्त है वो

2:04:49

सभी शिवलिंगों का प्रसाद ले सकता है किंतु

2:04:52

जो शिव दीक्षा से युक्त नहीं है अन्य

2:04:56

दीक्षा शिव शिव भक्ति रतात्म नाम अन्य

2:04:59

दीक्षा लिए हुए हैं पर शिव भक्ति भी करते

2:05:03

हैं। ऐसे लोगों को शिव नैवेद्य भक्षण में

2:05:07

कौन-कौन शिव जी का पूजन प्रसाद लेना

2:05:11

चाहिए? बड़ा सुंदर श्लोक है। यह

2:05:14

विश्वेश्वर संिता के 22 वे अध्याय का 13वा

2:05:18

श्लोक है। 13वा 14वा

2:05:21

श्लोक शाल

2:05:23

ग्रामोभवे लिंगे

2:05:26

[संगीत]

2:05:27

रस लिंगे

2:05:31

तथाजा पाषाण राजते

2:05:35

स्वर्ण सुरस प्रतिष्ठते

2:05:40

[संगीत]

2:05:42

कश्मीरेटिक

2:05:44

रत्ने

2:05:46

ज्योतिर्लिंग

2:05:48

सर्वस चांद्रय

2:05:52

समोर नैवेद्य भक्षणम

2:05:55

[प्रशंसा]

2:05:58

एक शिवलिंग होते हैं शालिग्रामोभव

2:06:03

लिंग। आप जाएंगे नेपाल में जहां शालिग्राम

2:06:08

जी प्रकट होते हैं। दामोदर कुंड से

2:06:12

शालिग्रामी गंडकी प्रकट होती है।

2:06:15

शालिग्राम पर्वत है। मुक्ति नारायण

2:06:17

क्षेत्र है। वहां महाराज

2:06:20

जी शालिग्राम स्वरूप में शिव जी भी निकलते

2:06:24

हैं।

2:06:26

आपको सुनकर आश्चर्य होगा अपने राम जब पहली

2:06:30

बार गए पहली एक ही बार गई है अभी दोबारा

2:06:32

नहीं जाने का अवसर

2:06:34

मिला तो गंडकी जी में स्नान

2:06:38

किया तो हमने गंडकी जी से प्रार्थना

2:06:43

की कि यहां से शालिग्राम तो लेकर जाएंगे

2:06:47

ही पर आप प्रसन्न होकर हमें भी कोई स्वरूप

2:06:51

प्रदान करें

2:06:54

यद्यपि वहां तो जल तो ऐसा है कि बिल्कुल

2:06:56

बर्फ से भी ठंडा है क्योंकि हिमालय है

2:06:59

बिल्कुल ग्लेशियर पिघल के आता

2:07:03

है और हमको थोड़ी ठंड से तकलीफ भी हो जाती

2:07:09

है लेकिन फिर

2:07:14

भी साधुओं का जल से प्रेम ना हो तो काहे

2:07:17

बात का

2:07:18

साधु तो आज भी नदी मिल जाए तो फिर हम

2:07:21

जल्दी बाहर निकलते नहीं तो वही संध्यापासन

2:07:25

किया खूब ठंडा जल था बर्फ जैसा ठंडा वही

2:07:28

थोड़ा जप भी किया शरीर शून्य पड़ गया और

2:07:32

हमने गोता

2:07:34

लगाया तो एक शिवलिंग एक शालिग्राम हमारे

2:07:38

हाथ में आए वो आज भी हमारी सेवा में

2:07:41

विराजमान है बिल्कुल जलहरी सहित साक्षात

2:07:44

शिव

2:07:46

जी तो हमने कहा देखो

2:07:49

भगवती गंडकी ने हमको को ऐसा स्वरूप प्रदान

2:07:53

किया जो शालिग्रामो भवलिंग

2:07:56

है। हरि भी है और हर भी

2:08:00

है। अभी भी हमारी सेवा में विराज अति

2:08:04

दुर्लभ स्वरूप है। उनको दर्शन करो तो श्री

2:08:07

यंत्र जैसे भी लगते हैं और जलहरी सहित

2:08:11

शिवजी स्वयं हमारे हाथ में आए।

2:08:15

यह शालिग्राम लिंग का सबसे पहले नाम शिव

2:08:19

पुराण में लिखा है। शालिग्राम से ही और

2:08:21

महाराज जी शालिग्राम स्वरूप में अन्य

2:08:24

देवों के स्वरूप भी मिलते हैं। हमारे

2:08:26

ठाकुर जी की सेवा में शालिग्राम जी

2:08:28

विराजमान है। साक्षात

2:08:33

गणपति कोई मूर्तिकार के बनाए हुए नहीं

2:08:39

है। कोई भी व्यक्ति उनका दर्शन करके कह गए

2:08:43

साक्षात गणेश जी

2:08:45

बिल्कुल शरपकरण सुंड दंत एकदंत चरण सब कुछ

2:08:51

है उनके

2:08:52

श्री वो भी हमको वही

2:08:55

मिल तो हमको तो सब राम जी के ही रूप में

2:08:58

मिल गए राम जी की बड़ी कृपा है तो भगवत

2:09:02

कृपा से ये शालिग्राम लिंग रस लिंग माने

2:09:06

होता है पारद लिंग

2:09:09

और जो पाषाण लिंग रजत लिंग पाषाण लिंग का

2:09:13

अर्थ है बनाए हुए लिंग नहीं जो स्वाभाविक

2:09:16

किसी पवित्र नदी के गोल शिवलिंगाकार पाषाण

2:09:19

है वो पाषाण लिंग है राजत माने चांदी के

2:09:22

शिवलिंग स्वर्ण के शिवलिंग अथवा देवताओं

2:09:26

ने जिनकी प्रतिष्ठा की है अथवा जो केसर से

2:09:30

निर्मित शिवलिंग है केसर से भी शिवलिंग

2:09:33

बनाने की विधि

2:09:35

है। हम समझते हैं कि केसर को खूब गहरा घोट

2:09:39

करके चंदन के साथ और उसका गोला बनाकर फिर

2:09:43

उसके जलहरी के साथ शिवलिंग बनाने का विधान

2:09:46

होगा। उसी को कश्मीर लिंग कहा है। स्वटिक

2:09:50

लिंग, रत्न लिंग और ज्योतिर्लिंग, द्वादश

2:09:54

ज्योतिर्लिंग इनका जो प्रसाद है चांदायण

2:09:59

समम प्रोक्तम इनका प्रसाद एक बार कोई ले

2:10:03

ले तो चांद्रयण व्रत करने से जो पुण्य

2:10:06

प्राप्त होता है वो इनका प्रसाद लेने

2:10:09

मात्र से प्राप्त हो जाता है। ब्रह्म

2:10:11

हत्या जैसा पाप भी नष्ट हो जाता है। जो

2:10:14

शिव निर्माल्य को अपने मस्तक पर धारण करता

2:10:17

है जो शिव जी के प्रसाद का को ग्रहण करता

2:10:21

है भक्षतम तस सर्व पाप प्रति उसके संपूर्ण

2:10:26

पाप नष्ट हो जाते

2:10:28

हैं। अब जो बात हमने कही थी उसको हम फिर

2:10:31

कह रहे हैं। 16वा श्लोक है चंडाधिकारो

2:10:37

यत्रास्तव्य मानव चंडाधिकारो नो यत्रिता

2:10:44

जिसमें चंड गण का

2:10:46

अधिकार

2:10:48

है।

2:10:50

उस नैवेद्य को सभी लोगों को नहीं लेना

2:10:55

चाहिए। और जिसमें चंडाधिकार नहीं है उस

2:10:59

प्रसाद को श्रद्धा पूर्वक लेना चाहिए।

2:11:02

किंतु जो शिव दीक्षा से युक्त हैं, वह

2:11:06

चंडाधिकार वाले शिवलिंग का प्रसाद भी ले

2:11:10

सकते हैं। उनको कोई दोष नहीं।

2:11:15

अब अंतिम समाधान दे रहे हैं सूत जी 19 वे

2:11:19

श्लोक में बोले अगम शिव नैवेद्यम पत्रम

2:11:24

पुष्पम फलम जलम शालिग्राम शिला संग सर्वम

2:11:28

यात

2:11:30

पवित्रता जो लोग कहते हैं कि शिव नैवेद्य

2:11:33

चाहे पत्र हो पुष्प हो फल हो जल हो वह अग

2:11:37

है वो दोष भी शालिग्राम शिला संग जब

2:11:42

शालिग्राम जी कैसे शिव जी का पूजन होता है

2:11:46

तो सर्वम याति पवित्रताम सब कुछ ग्राह्य

2:11:50

हो जाता

2:11:51

है एक और बात है शिवलिंग के ऊपर चढ़ा दिया

2:11:56

उसमें किसी विशेष व्यक्ति का अधिकार है

2:11:59

किंतु जो बाहर निवेदित किया गया उसको कोई

2:12:02

लेता है पुराने जमाने में ब्राह्मण भी

2:12:05

माली आदि को शिवलिंग पर चढ़ा हुआ पदार्थ

2:12:09

दे देते थे मालियों को दे देते

2:12:11

गोसाइयों को दे देते थे और जो बाहर

2:12:15

निवेदित है वह ब्राह्मण लेते

2:12:18

थे। हमने तो यह भी देखा है कि नवग्रह की

2:12:23

पीठ की दक्षिणा ब्राह्मण नहीं लेते

2:12:26

थे। अब तो नवग्रह को ही खा जाए। नवग्रह

2:12:30

पीठ की दक्षिणा क्या है?

2:12:32

नवग्रह पीठ की दक्षिणा हमने अपने जिस

2:12:35

परिवार में जन्म लिया उसमें यही काम होता

2:12:38

था पीढ़ी दर पीढ़ी से पंडिताई वाला काम तो

2:12:42

हमने देखा वो कलश और वहां का जो कुछ भी

2:12:46

सामान दक्षिणा तो चढ़ती वहां पर उसको जोगी

2:12:50

को दे दिया जाता था या माली को दे दिया

2:12:52

जाता था उसको ब्राह्मण नहीं लेते थे

2:12:55

नवग्रह का नहीं लेते

2:12:58

थे इसलिए राहु केतु आदि का दान भी डकत जो

2:13:02

होते हैं उनको दिया जाता है। शनि राहु

2:13:05

केतु इनका दान ब्राह्मण नहीं

2:13:07

लेते। अब सब जय सियाराम हो

2:13:12

गए। तो इस प्रकार से

2:13:16

यह महिमा का वर्णन किया गया

2:13:20

[संगीत]

2:13:28

है। अब स्वामी जी सुन ले।

2:13:31

आज हमको पीपल को प्रणाम करना

2:13:36

था। तो एक जगह हम पीपल को प्रणाम करने गए।

2:13:40

आज शनिवार है। आज धर्म शास्त्र में लिखा

2:13:43

है पीपल के वृक्ष का स्पर्श अवश्य करना

2:13:46

चाहिए। प्रत्येक हिंदू सनातनी को आज पीपल

2:13:49

वृक्ष का स्पर्श उसमें यदि देसी गाय का

2:13:54

कच्चा दूध चढ़ावे तो बहुत अच्छी चीज है।

2:13:57

नहीं केवल जल ही चढ़ा दे और पीपल सबसे

2:14:00

अधिक पर्यावरण का शोधक वृक्ष है। पर्यावरण

2:14:04

को सबसे ज्यादा शुद्ध करता है

2:14:08

पीपल। अन्य वृक्षों के नीचे रात्रि में आप

2:14:11

नहीं रह सकते।

2:14:12

[संगीत]

2:14:15

क्योंकि वे कार्बन का विसर्जन करते हैं।

2:14:17

कार्बन डाई जो कार्बन डाई ऑक्सीजन

2:14:23

उसका ऑक्साइड उसका विसर्जन करते हैं। केवल

2:14:27

पीपल ऐसा है जो 24ों घंटे ऑक्सीजन देता

2:14:31

है। इसलिए रात्रि के समय भी पीपल के नीचे

2:14:34

रह जा सकता है। जिसको ऑक्सीजन की कमी है

2:14:38

वह पीपलों के बीच में रहे तो ऑक्सीजन की

2:14:41

बीमारी खत्म हो जाती है।

2:14:45

झांसी

2:14:46

में माता जी हैं वैद्यनाथ प्राणदा

2:14:50

वाली उनका चिकित्सा केंद्र है शतम

2:14:55

जीवा वहां उन्होंने एक पीपल का वन बनाया

2:15:00

है वो केवल इसलिए बनाया है प्राकृतिक

2:15:04

चिकित्सा का बहुत बढ़िया व्यवस्थित केंद्र

2:15:07

है हम भी दो बार तीन बार वहां रहे आए बहुत

2:15:10

अच्छा

2:15:12

तो वहां महाराज जी एक वन केवल पीपल का

2:15:15

बनाया है। इसलिए कि जिसके ऑक्सीजन लेवल कम

2:15:19

रहता है उसको वहां बिठाकर थोड़ी देर

2:15:22

प्राणायाम कराते हैं। वो वहां घूमे उससे

2:15:25

उसका ऑक्सीजन लेवल बढ़ जाता है। आज

2:15:27

प्रत्यक्ष चमत्कार है। यह प्रत्यक्ष

2:15:29

चमत्कार

2:15:31

है। पर पिंपल गांव में पीपल कम

2:15:36

है। तो गांव का नाम बदलना पड़ेगा फिर।

2:15:40

इसलिए भैया हमने यहां पूछा तो उन्होंने

2:15:44

बताया कि लोगों के मन में भावना है कि

2:15:46

पीपल को उखाड़ के फेंक देना चाहिए। पीपल

2:15:48

खराब होता है। यहां गांव के लोग ऐसा समझते

2:15:51

हैं। तो बोले यहां पीपल कोई रखता नहीं।

2:15:53

भैया पीपल बहुत पवित्र वृक्ष है। जैसी विल

2:15:57

वृक्ष की महिमा है ऐसे ही पीपल की महिमा

2:15:59

है। शनिवार के दिन लक्ष्मी जी के सहित

2:16:04

नारायण पीपल के नीचे सूर्योदय से

2:16:07

सूर्यास्त तक विराजते हैं। इसलिए जो चार

2:16:11

परिक्रमा शनिवार को पीपल की करता है। जल

2:16:15

चढ़ाता है। साष्टांग प्रणाम करता है।

2:16:18

माताएं पंचांग प्रणाम करें। पुरुष

2:16:20

साष्टांग प्रणाम करें और पीपल का स्पर्श

2:16:23

करें। वे हजारों जन्मों में भी दरिद्र

2:16:26

नहीं होते हैं। कभी उनके घर से लक्ष्मी का

2:16:29

अभाव नहीं

2:16:30

होता। घर में पीपल इसलिए नहीं लगाते हैं

2:16:34

क्योंकि घर में कोई शुद्ध अशुद्ध अवस्था

2:16:37

में कोई बच्चा गंदगी कर दे, कोई मलमूत्र

2:16:40

का त्याग कर दे या कोई माता अशुद्ध अवस्था

2:16:43

में उसका स्पर्श करे। उसका दोष है। इसलिए

2:16:46

घरों में लगाने की मनाई है। पर किसी के घर

2:16:50

में पहले से पीपल हो तो उसको कटवाना नहीं

2:16:53

चाहिए। उसको और बढ़िया उसकी उसकी व्यवस्था

2:16:57

बना के जिसमें उसकी छाया में कोई गंदगी ना

2:17:00

कर सके। बस फिर आप प्रेम से पूजा करो।

2:17:03

आपके घर में लक्ष्मी का निवास होगा।

2:17:08

पद्म पुराण में लिखा है 100 पीपल के पेड़

2:17:11

लगा दे तो उसके कुल में कभी दरिद्रता नहीं

2:17:15

आती। खानदान में पीढ़ी दर पीढ़ी में कभी

2:17:18

दरिद्रता नहीं

2:17:20

आती। तो एक पीपल मंगा लेना। हम आश्रम में

2:17:23

एक पीपल लगा के जाएंगे। जब जाएंगे तो एक

2:17:26

दिन पीपल लगा के जाएंगे। जिसमें हम जब

2:17:29

द्वारा आएंगे तो हमको इधर उधर ना जाना

2:17:32

पड़े। हम आश्रम में पीपल का स्पर्श कर ले।

2:17:35

ठीक है? आप लोग भी अपने खेत में खलिहान

2:17:38

में जगह जगह पीपल लगाओ। पिंपल गांव है। इस

2:17:42

गांव के नाम को ठीक रखो। नहीं तो सब

2:17:45

गड़बड़

2:17:46

है। पिंपल गांव में पीपल कम मिले यह ठीक

2:17:50

नहीं है। इसलिए भैया खूब पीपल लगाओ। पीपल

2:17:55

कोई बहुत पवित्र वृक्ष है

2:17:58

पीपल। अब हम बिल्व की महिमा का वर्णन कर

2:18:01

रहे हैं। बिल्व की महिमा का श्रवण करो।

2:18:06

यह सामने विल्व की माला ही शिव पुराण को

2:18:09

धारण है। और भगवान के प्रसाद रूप में हमने

2:18:14

भी विल पत्र की माला को धारण किया हुआ है।

2:18:17

बड़ी प्रसन्नता है। तुलसी दल की माला विल

2:18:20

पत्र की माला बहुत पवित्र मानी गई

2:18:24

है। पुण्य तीर्थानी

2:18:28

यावती बातचीत मत करो। बाबा रामचंद्र दास

2:18:32

कथा सुनो बातचीत मत करो।

2:18:35

पुण्य ती

2:18:37

यावती लोके सुत

2:18:41

प्रथ्य तानी सर्वाण

2:18:45

ती मूल

2:18:48

[संगीत]

2:18:51

वसती अच्छा एक बात

2:18:53

बताओ

2:18:56

आप विचार करो निश्चय करो कि हम सारी धरती

2:19:00

के तीर्थों में जाकर दर्शन करेंगे स्नान

2:19:03

करेंगे तो क्या संभव है? इतने तीर्थ हैं

2:19:07

कि कोई ना कोई छूट जाएगा। पर महाराज जी

2:19:10

लिखा है कि बिल्व वृक्ष के मूल में धरती

2:19:14

के संपूर्ण तीर्थ विराजमान है। जहां विल्व

2:19:18

का वृक्ष है वहां सारे तीर्थ विराजमान

2:19:22

[संगीत]

2:19:26

है। संसार में जितने प्रसिद्ध अप्रसिद्ध

2:19:30

तीर्थ हैं सब बिल वृक्ष के मूल में है।

2:19:33

बिल्व मूले महादेवम लिंग

2:19:37

रूपम पूजे पुण्यत्मा सवं

2:19:42

प्राप्त बिल्व के मूल में जो शिव जी का

2:19:45

अभिषेक करता है शिवलिंग को स्वीकार करके

2:19:47

अभिषेक करता है वह पुण्य आत्मा शिव जी को

2:19:51

प्राप्त करता है इसमें संदेह नहीं है

2:19:54

बिल्व के मूल में साक्षात शिवजी

2:20:01

है बिल्व वृक्ष का थाला बनाकर के थाला

2:20:04

जानते हो ना घरवा बना के जिसमें जल भरा

2:20:06

जाए और उस जल से जो अपने सिर को सींचता है

2:20:11

उसने धरती के सारे तीर्थों में स्नान कर

2:20:15

लिया विल मूल जलस्त

2:20:19

मुति सर्व

2:20:21

[संगीत]

2:20:23

तीर्थ वो धरती पर पवित्र

2:20:26

[संगीत]

2:20:29

है कहते जो अपने बिल वृक्ष को लगाता है।

2:20:34

उसमें थाला बनाता है और उसको जल से

2:20:37

परिपूर्ण करता है। तो भगवान देखकर शिव

2:20:41

प्रसन्न हो जाते हैं और उस व्यक्ति पर

2:20:44

द्रवित हो जाते हैं। इसने वृक्ष रूप में

2:20:47

मेरा अर्चन करके मुझे प्रसन्न कर लिया है।

2:20:50

जो विल वृक्ष का गंध पुष्प आदि से पूजन

2:20:54

करता है। उसे शिवलोक की प्राप्ति होती है

2:20:57

और उसकी संतति की भी और सुख की भी उसे

2:21:00

प्राप्ति होती है। बस सोमवार के दिन बिल

2:21:04

वृक्ष का पत्र नहीं तोड़ना चाहिए और

2:21:07

अमावस्या पूर्णिमा संक्रांति को भी बिल

2:21:10

वृक्ष का पत्र नहीं तोड़ना चाहिए। पूजन

2:21:13

नित्य किया जा सकता है। तो फिर एक दिन

2:21:17

पूर्व बिल पत्र उतार ले दूसरे दिन शिव जी

2:21:20

की पूजा के लिए 15 दिन तक भी बिल पत्र

2:21:23

बासी नहीं माना जाता है। परित नहीं माना

2:21:26

जाता है। 15 दिन तक भी वह

2:21:30

ताजा ही माना जाता है। ऐसा शास्त्रों में

2:21:32

लिखा हुआ

2:21:34

है। जो बिल वृक्ष के निकट दीप दान करता

2:21:38

है, दीप माला करता है, वह तत्व ज्ञान

2:21:41

संपन्न होकर भगवान शिव को प्राप्त करता

2:21:44

है। महादेव के सानिध्य को प्राप्त करता

2:21:46

है। और जो बिल्व शाखा को हाथ से पकड़ कर

2:21:51

उसके छोटे छोटे नए पल्लव ग्रहण करके भगवान

2:21:55

शिव की पूजा करता है वह संपूर्ण पापों से

2:21:58

मुक्त हो जाता है। और जो बिल वृक्ष की जड़

2:22:01

में किसी शिव भक्त ब्राह्मण को भोजन कराता

2:22:05

है अथवा शिव भक्त यति को साधु सन्यासी को

2:22:08

भोजन कराता है उसको एक ब्राह्मण को भोजन

2:22:12

कराने पर एक करोड़ ब्राह्मण को जमाने का

2:22:14

पुण्य प्राप्त होता है। एक साधु को जमा दो

2:22:17

तो एक करोड़ साधु जमाने का पुण्य प्राप्त

2:22:20

हो जाएगा। इतनी विल की महिमा

2:22:25

है। और क्या करना चाहिए?

2:22:30

बोले देखो बिल वृक्ष की जड़

2:22:33

में बढ़िया वेद लक्षणा भारतीय देसी गाय के

2:22:39

अधोटा दूध की खीर ऐसा लिखा है खीरम युक्तम

2:22:44

अन्न माजन

2:22:46

संयुक्तम बढ़िया सुंदर गाढ़ी खीर जिसमें

2:22:50

घी पड़ा हुआ हो कुछ शहद भी पड़ा हुआ हो

2:22:53

इलायची मेवा वगैरह पड़ा हुआ हो ऐसी सुंदर

2:22:57

अधोटा दूध की रबड़ी को लज्जित करने वाली

2:23:01

खीर किसी ब्राह्मण को किसी संत को किसी

2:23:05

शिव भक्त को तृप्त तृप्ति पूर्वक जमा दो

2:23:09

तो सा दरिद्रो न जाते वो कभी दरिद्र नहीं

2:23:12

होता है जिनके घर में देसी गैया है वह

2:23:16

प्रयोग कर सकते हैं ज्यादा प्रयोग नहीं

2:23:19

करना तो स्वामी जी को बिलाकर जमा देना घर

2:23:22

में देसी गैया हो बेल का पेड़ हो तो

2:23:25

बढ़िया अधोटा दूध की खीर बनाकर स्वामी जी

2:23:27

को जिमा देना

2:23:29

एक करोड़ साधु जमाने का पुण्य आपको मिल

2:23:32

[संगीत]

2:23:34

जाएगा। इस प्रकार से बिल्व की बड़ी भारी

2:23:38

महिमा का वर्णन है। बिल वृक्ष को काटने का

2:23:41

निषध किया गया। बिल वृक्ष को काटना नहीं

2:23:44

चाहिए। बिल वृक्ष को काटने से बड़ा दोष

2:23:47

लगता है। बहुत से लोग क्या करते

2:23:51

हैं? बेल पत्री लेने वाले लोग पूरा पेड़

2:23:55

का पेड़ जय आराम कर देंगे। सावन

2:23:59

में बिल्व के पेड़ बेचारे हाहाकार करते

2:24:02

होंगे। क्यों? इतना ज्यादा लोग उसको

2:24:05

परेशान करते हैं। पता चल जाता है कि सावन

2:24:08

महीना आ गया। पत्ता ढूंढना मुश्किल हो

2:24:11

जाता है। भैया खूब ज्यादा विल वृक्ष लगाओ।

2:24:14

ऐसी तुलसी भक्ति मत करो कि तुलसी का पौधा

2:24:17

ही संकट में पड़ जाए। ऐसी शिव भक्ति मत

2:24:20

करो कि बिल वृक्ष ही संकट में पड़ जाए।

2:24:23

उसी तरह की सेवा करना चाहिए जिससे वृक्ष

2:24:26

को नुकसान ना हो। अब बट सावित्री व्रत आता

2:24:30

है अमावस्या का तो बट के पास तो लोग अब

2:24:32

जाते नहीं। बंबई कोलकाता में क्या करते

2:24:34

हैं? बट के पेड़ की डाली मंगा मंगा के

2:24:37

पूजा कर लेते हैं। तो कहा तो पेड़ लगाना

2:24:40

चाहिए। और महाराज उस तिथि पर पर्व आने पर

2:24:46

लाखों लोग वट वृक्ष की शाखाएं लेते हैं और

2:24:49

एक प्रकार से वृक्ष का बड़ा नुकसान होता

2:24:51

है। संत मलूक दास जी ने

2:24:54

कहा बट पीपल और विलब नहीं हरी डाल मत

2:25:01

तोड़िए।

2:25:05

किसी भी वृक्ष की हरी डाली को मत। हरी

2:25:09

डाल मत

2:25:12

तोड़िए। लागे

2:25:15

छुरा

2:25:16

[संगीत]

2:25:18

बान आप किसी धारदार हथियार से किसी को

2:25:21

स्पर्श करेंगे तो उसको पीड़ा होगी कि नहीं?

2:25:24

दास

2:25:26

मलूका यू कहे अपना साउ जाने।

2:25:33

आपकी कोई उंगली काट दे आपको कितनी पीड़ा

2:25:35

होगी।

2:25:38

किसी वृक्ष को निरर्थक वृक्ष छेदन

2:25:45

जब ब्राह्मणों का उपाकर्म होता है श्रावण

2:25:49

उपाकर श्रावणी कर्म उस समय जो महा संकल्प

2:25:52

बोला जाता है उसमें निरर्थक वृक्ष छेदन यह

2:25:57

भी बोला जाता है व्यर्थ में यदि किसी

2:25:59

वृक्ष को हम काटते हैं उसका पाप हमको

2:26:02

लगेगा यज्ञ के लिए किसी विशेष कार्य के

2:26:06

लिए आपने लिया है तो कोई हानि नहीं

2:26:11

है। भस्म रुद्राक्ष और शिव नाम के महात्म

2:26:16

का वर्णन है। ऋषियों ने कहा महाराज भस्म

2:26:19

का महात्म रुद्राक्ष का महात्म और भगवान

2:26:22

शिव के पवित्र नाम के महात्म का आप वर्णन

2:26:26

करें।

2:26:29

सूत जी ने कहा आपने बहुत पवित्र प्रश्न

2:26:32

पूछा है। आप सबका कुल धन्य है। आपका शरीर

2:26:36

धारण करना सफल है। जो शिव उपासना की इतनी

2:26:40

सुंदर बात आप पूछ रहे

2:26:43

हैं। शिव नाम कितना पवित्र है।

2:26:49

शिव नाम मुखे

2:26:53

यस सदा शिव

2:26:57

[संगीत]

2:26:59

शिव

2:27:02

[संगीत]

2:27:03

[प्रशंसा]

2:27:04

[संगीत]

2:27:06

पासवराकम

2:27:09

यथा जिसके मुख में शिव नाम है जो सदा शिव

2:27:15

शिव शिव शिव शिव शिव शिव शिव शिव शिव शिव

2:27:18

ऐसा उच्चारण करता है उसे पाप का स्पर्श

2:27:22

नहीं होता।

2:27:24

जैसे खैर के अंगार खैर की लकड़ी जलाकर जो

2:27:28

अंगार होते हैं वह बहुत ज्यादा धकते हैं।

2:27:31

उस खदीरा अंगार को छूते ही कोई चीज जल

2:27:35

जाती है। ऐसे ही शिव नाम लेने वाला खैर के

2:27:39

अंगार के समान तेजस्वी होता है। उसको पाप

2:27:43

छूकर भस्म हो जाता है। पाप का स्पर्श उसे

2:27:46

नहीं होता।

2:27:50

भगवती सती देवी कह रही है श्रीमद् भागवत

2:27:54

चतुर्थ स्कंद दक्ष यज्ञ के प्रकरण में सती

2:27:58

जी कह रही

2:28:01

यक्षम

2:28:03

नाम

2:28:07

गिरेमणा सक प्रसंगा दगमा सु

2:28:15

यक्षम नाम गिरे

2:28:21

सक प्रसंगा दगमा

2:28:23

सु पवित्र

2:28:27

कीर्तम

2:28:30

शासनम

2:28:34

शिवम भगवती सती कह रही है अरे पिता

2:28:39

दक्ष जिन भगवान शिव का पवित्र नाम धोखे से

2:28:43

मुख से निकल जाए शिव शिव ये धोखे से मुख

2:28:48

से निकल

2:28:50

जाए तो संपूर्ण पाप नष्ट हो जाते

2:28:56

हैं। ऐसे भगवान शिव से विद्वेष तुम्हारे

2:29:01

जैसा ही कोई अज्ञानी कर सकता

2:29:04

है। भरत

2:29:06

जी जो द नाम अपराध

2:29:10

है द नाम अपराध 32 सेवा अपराधों से बचकर

2:29:15

सेवा करनी चाहिए। द नाम अपराधों से बचकर

2:29:18

नाम जप करना चाहिए। द नामा अपराधों में

2:29:23

भगवान के नामों में और शिव जी के नामों

2:29:26

में भेद करना यह नाम अपराध

2:29:32

है। फिर से सुन

2:29:34

लो। जो महिमा राम नाम की है वही महिमा शिव

2:29:39

नाम की है। जो महिमा कृष्ण नाम की है वही

2:29:43

महिमा शिव नाम की है।

2:29:46

जो लोग कहते नहीं राम नाम की महिमा ज्यादा

2:29:48

शिव नाम की नहीं है अथवा शिव नाम की

2:29:51

ज्यादा है राम नाम की नहीं है उनको नामा

2:29:54

अपराध लग जाता है हरि और हरि के नाम में

2:29:58

भेद करना वो नामा अपराध

2:30:06

है अब लोगों ने इसका अर्थ भी बदलने की

2:30:10

कोशिश की है। इसका अर्थ भी लोग बदल देते

2:30:12

हैं।

2:30:16

लेकिन यह शास्त्र के प्रति अपराध नहीं

2:30:19

करना

2:30:21

चाहिए। पूरे ग्रंथों को देखो, बिना किसी

2:30:25

दुराग्रह के देखो, बिना किसी पक्षपात के

2:30:28

देखो तो सिद्धांत का अनुभव आपको हो जाएगा।

2:30:35

इसलिए हम निवेदन करते हैं भगवान कृष्ण

2:30:38

द्वपायन व्यास जी ही संपूर्ण वैदिक आस्तिक

2:30:42

सनातन धर्मियों के एकमात्र

2:30:46

आचार्य और जितने आचार्य हैं वह सब उनके

2:30:49

अनुवरती है। व्यास ही तो सबका प्रमाण

2:30:53

है। इसलिए व्यासम जगत सर्वम और व्यास वाणी

2:30:58

का आश्रय लेकर के आप चलेंगे तो हरि हर

2:31:02

रभदा हरि हर में भेद नहीं जब हरि हर में

2:31:05

भेद नहीं तो हरि हर के नाम में भी भेद

2:31:10

नहीं

2:31:12

है गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज ने तो

2:31:16

क्या कहना महाराज विनय पत्रिका में एक ऐसा

2:31:20

विलक्षण पद है

2:31:24

जिसका नाम है हरि शंकर क्या नाम है

2:31:29

उसका हरि शंकर हरि शंकर का अर्थ होता है

2:31:34

उस पद में छंद

2:31:41

में क्या भगवान की लीला हम छूते ही वही पद

2:31:45

प्रकट हो

2:31:48

गया एक ही पद में हरि और हर दोनों के नाम

2:31:57

ऊपर की पंक्ति में भगवान नारायण के राम

2:32:00

कृष्ण नारायण के

2:32:01

नाम और फिर दूसरी पंक्ति में शिव जी के

2:32:04

नाम बड़ा पवित्र पद

2:32:08

है। तनुज बन दहन

2:32:13

गुण गहन

2:32:17

गोविंद

2:32:19

नंदादी

2:32:24

आंदाता

2:32:27

विनाशी शंभू शिव

2:32:31

रुद्र

2:32:33

शंकर

2:32:35

भयंकर भीम घोर

2:32:40

तेजा तन क्रोध

2:32:46

रा

2:32:47

अनंत

2:32:50

भगवंत

2:32:52

जगदंत अंत

2:32:56

कत्रास शमन श्री

2:33:00

रमण

2:33:04

भवना भू धराधी

2:33:10

जगदीश

2:33:12

ईशान

2:33:14

विज्ञान घन

2:33:17

ज्ञान

2:33:19

कल्याण

2:33:20

[प्रशंसा]

2:33:22

धाम

2:33:24

वाना

2:33:25

व्यक्त

2:33:27

पावन

2:33:29

परावर

2:33:31

विभ प्रकट

2:33:35

परमात्मा प्रकृति

2:33:37

[संगीत]

2:33:39

स्वामी चंद्र

2:33:42

शेखर शूल

2:33:45

पानी हर अनग अज

2:33:50

अमित

2:33:52

अविछिन

2:33:54

वृषभ का

2:33:58

नील जल

2:34:00

दाब तनु

2:34:03

श्याम बहु काम छवि

2:34:07

[प्रशंसा]

2:34:08

राम

2:34:11

राजीव

2:34:13

लोचन

2:34:16

कृपाला

2:34:17

कंबु

2:34:19

कर्पूर बपु

2:34:21

धवल निर्मल

2:34:24

मौली जटा सुर

2:34:28

तटिनी शित सुमन

2:34:32

माला बसन किजिल

2:34:37

धर चक्र

2:34:40

सारंग

2:34:42

धर कंज को मो की अति

2:34:49

विशाला मार कर

2:34:53

मत मृगराज

2:34:57

त्रने हर नवमी

2:35:02

अपहरण संसार

2:35:06

जाला

2:35:08

कृष्ण करुणा

2:35:11

भवन धवन

2:35:14

काली

2:35:16

खल विपुल

2:35:19

कंसाद निरवंशकारी

2:35:24

त्रिपुर मद भंग

2:35:28

कर मत गज

2:35:32

च अंध

2:35:37

कोकस

2:35:41

पगारी ब्रह्म

2:35:44

व्यापक अकल सकल

2:35:48

परम

2:35:50

हित ज्ञान

2:35:54

गोती गुण व

2:35:57

[संगीत]

2:35:58

हर्ता सिंधु सुत गिर

2:36:04

वज्र

2:36:05

गौरी

2:36:07

समव दक्ष मख

2:36:11

अखिल

2:36:12

विध्वंस

2:36:13

[संगीत]

2:36:15

करता भक्ति प्रिय भक्त जन काम दुख देनु

2:36:23

हरि हरण

2:36:26

दुर्घट

2:36:27

विकट विपत्ति

2:36:31

भारी सुखद नर

2:36:35

वरद विरज

2:36:39

अनल विपिन

2:36:44

[संगीत]

2:36:47

आंद अंतिम में कह रहे हैं गोस्वामी जी

2:36:51

रुचिर हरि

2:36:54

शरी नाम

2:36:57

मंत्र ये हरि शंकर नाम मंत्रावली है एक

2:37:01

में हरि दूसरे में शिव इनके नाम मंत्रों

2:37:04

की यह श्रेणी है। दुख द्वंद दुख

2:37:10

हरनी

2:37:11

आंद

2:37:14

खानी द्वंद दुखों का हरण करने वाली आनंद

2:37:17

की खान है। विष्णु शिव

2:37:21

लोक सो पान समति

2:37:26

[प्रशंसा]

2:37:29

तुलसी विदास विद

2:37:35

जो इस हर शंकरी पद का नित्य पाठ करता है

2:37:39

उसको विष्णु लोक भी प्राप्त होता है

2:37:42

शिवलोक भी प्राप्त होता दोनों जगह ज्यादा

2:37:45

क्योंकि दोनों की सीढ़ी ही

2:37:48

है इसका मतलब है एक को करोगे तो एक ही जगह

2:37:52

रह जाओगे और ये हरि शंकर ही करोगे तो जब

2:37:55

इच्छा हो तब गोलोक वैकुंठ साकेत में रहो

2:37:58

और जब मन हो तब शंकर जी के पास चले जाओ जब

2:38:02

शंकर शंकर जी के पास से मन करे तो वैुंठ

2:38:04

चले जाओ। यह तुलसीदास जी महाराज बोल रहे

2:38:07

ये वैुठ और शिवलोक का सोपान है। यह हरि

2:38:12

शंकरी नाम मंत्रावली इसका जो पारायण करते

2:38:16

हैं उनको शिवलोक विष्णु लोक दोनों की युग

2:38:19

प्राप्ति हो जाती है। बोलो भक्तवत्सल

2:38:22

भगवान की

2:38:24

जय। इसलिए शिव जी के पवित्र नाम का खूब जप

2:38:29

करना चाहिए।

2:38:32

क्या करना चाहिए? श्री शिवाय

2:38:37

नमस्तुभ्यम मुखम व्याते सदा यदा तनुखम

2:38:43

पावनम तीर्थम सर्व

2:38:45

पाप श्री शिवाय नमस्तुभ्यम इसको जो

2:38:49

बार-बार अपने मुख से कीर्तन करता है उसका

2:38:52

मुख तीर्थ है उसका दर्शन करने वाले के पाप

2:38:56

नष्ट हो जाते

2:38:58

हैं तो हम लोग थोड़ी देर इसका कीर्तन कर

2:39:01

ले

2:39:05

श्री शिवाय

2:39:10

नमस्तुभ्यम श्री शिवाय

2:39:13

[संगीत]

2:39:15

नमस्तु शिवाय

2:39:18

[संगीत]

2:39:20

नमस्तुभ्यम श्री शिवाय

2:39:23

नमस्तुभ्यम

2:39:25

सभी

2:39:27

शिवाय

2:39:30

नमस्तुभ्यम श्री शिवाय

2:39:36

नमस्तुभ्यम शिवाय

2:39:39

[संगीत]

2:39:41

नमस्तुभ्यम शिवाय

2:39:45

नमस्तुभ्यम एक भी व्यक्ति बाकी नहीं रहना

2:39:48

चाहिए जिसके मुख से भगवान शिव का पवित्र

2:39:51

नाम

2:39:53

निकले नहीं समझ

2:39:57

लेना जो नाम लेने वाले हैं उनके पाप कही

2:40:00

ना कहीं तो जाएंगे

2:40:02

जो नाम नहीं लेंगे कीर्तन नहीं करेंगे

2:40:05

उनके सिर पर चढ़ जाएंगे खोपड़ी पर चढ़ जाएंगे

2:40:08

इसलिए भैया अपनी खोपड़ी पर पाप मत

2:40:12

चढ़ाओ गाइए पूरे उत्साह

2:40:15

से श्री

2:40:17

शिवाय

2:40:20

नमस्तुभ्यम श्री शिवाय

2:40:25

नमस्तुभ्यम श्री शिवाय नमस्तुभ्यम

2:40:31

श्री शिवाय

2:40:35

नमस्तुभ्यम श्री शिवाय

2:40:40

नमस्तुभ्यम श्री शिवाय

2:40:44

नमस्तुभ्यम श्री शिवाय

2:40:49

नमस्तुभ्यम श्री शिवाय

2:40:54

नमस्तुभ्यम श्री शिवाय

2:40:59

नमस्तुभ्यम श्री शिवाय

2:41:03

नमस्तुभ्यम श्री शिवाय

2:41:08

नमस्तुभ्यम श्री शिवाय

2:41:12

नमस्तुभ्यम श्री शिवाय

2:41:16

नमस्तुभ्यम श्री शिवाय

2:41:21

नमस्तु श्री शिवाय

2:41:25

नमस्तुभ्यम श्री शिवाय नमस्तुभ्यम

2:41:30

श्री शिवाय

2:41:33

नमः श्री शिवाय

2:41:37

नमः श्री शिवाय

2:41:41

नमः श्री शिवाय

2:41:45

नमः शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा

2:41:49

शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा

2:41:53

शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा

2:41:57

शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा

2:42:00

शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा

2:42:04

शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा

2:42:08

शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा

2:42:12

शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा

2:42:16

शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा

2:42:20

शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा

2:42:25

शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा

2:42:28

शिवा शिवा शिवा

2:42:31

शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा

2:42:35

शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा

2:42:40

शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा

2:42:45

शिवा

2:42:46

शिवा श्री शिवाय

2:42:49

नमस्तु श्री शिवाय

2:42:52

नमस्तु श्री शिवाय

2:42:56

नमस्तु श्री शिवाय नम

2:43:00

श्री शिवाय

2:43:02

नमस्तुभ्यम श्री

2:43:05

नमस्तुभ्यम श्री

2:43:09

नमस्तुभ्यम श्री शिवाय

2:43:12

नमस्तुभ्यम शिवाय

2:43:15

नमस्तुभ्यम श्री नमोस्तु जब से कथा शुरू

2:43:20

है तब

2:43:22

नमोस्तु श्रीय

2:43:26

नमस्तुभ्यम बार इशारा कर आप नहीं समझ ये

2:43:30

माइक बंद है ये बंद

2:43:33

[संगीत]

2:43:37

है भाई तो लगा नहीं रहे पैसा लोगे बाबा जी

2:43:41

से ठीक करो

2:43:43

[संगीत]

2:43:53

इसको श्री शिवाय नमस्तुभ्यम

2:43:58

श्री शिवाय

2:44:01

नम शिवाय

2:44:04

नम शिवाय

2:44:07

नम श्री शिवाय

2:44:10

नम शिवाय

2:44:13

नम शिवाय

2:44:17

नम शिवाय

2:44:19

नम शिवाय शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा

2:44:23

शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा

2:44:26

शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा

2:44:29

शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा

2:44:33

शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा

2:44:36

शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा

2:44:39

शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा

2:44:43

शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा

2:44:46

शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा

2:44:49

शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा

2:44:52

शिवा शिवा श्री शिवाय

2:44:57

श्री शिवाय

2:44:59

नम श्री शिवाय

2:45:02

नम शिवाय

2:45:05

नम श्री शिवाय

2:45:08

नमस्तुभ्यम श्री शिवाय

2:45:11

नमस्तुभ्यम श्री शिवाय

2:45:15

नमस्तुभ्यम शिवाय

2:45:17

नमस्तुभ्यम श्री शिवाय

2:45:20

नमस्तुभ्यम मुख्या हरते यदा

2:45:24

[संगीत]

2:45:25

पावन

2:45:27

तीर्थम सर्व पाप

2:45:30

प्रणाम श्री शिवाय

2:45:33

[संगीत]

2:45:35

[प्रशंसा]

2:45:39

नमस्तुम सर्व पाप

2:45:42

विनाम श्री शिवाय

2:45:45

नमस्तुभ्यम श्री शिवाय

2:45:49

नमस्तुभ्यम शिवाय नमस्तुभ्यम

2:45:53

श्री शिवाय

2:45:55

नमस्तुभ्यम श्री शिवाय

2:45:58

नमस्तुभ्यम श्री शिवाय

2:46:01

नमस्तुभ्यम श्री शिवाय

2:46:04

नमस्तुभ्यम शिवाय

2:46:06

[प्रशंसा]

2:46:08

नम्य हर हर

2:46:14

महादेव

2:46:16

महादेव

2:46:18

[प्रशंसा]

2:46:19

महादेव महादेव

2:46:23

[प्रशंसा]

2:46:25

महादेव

2:46:27

महादेव

2:46:30

महादेव

2:46:33

महादेव

2:46:39

[प्रशंसा]

2:46:42

महादेव अच्छा एक बात बताओ बैठ जाओ सभी

2:46:48

तीर्थराज प्रयाग में जाकर त्रिवेणी संगम

2:46:51

में किस किस ने स्नान

2:46:56

किया? बहुत लोगों ने हाथ खड़े किए। बहुत

2:46:59

लोगों ने तो अभी सुना ही नहीं।

2:47:02

लेकिन बहुत से लोग ऐसे बच गए होंगे

2:47:06

जिन्होंने नहीं कर पाया होगा

2:47:09

स्नान। आप लोग अपने मन में ग्लानि का

2:47:12

अनुभव नहीं करना।

2:47:15

अब हम आपको ऐसा उपाय बता रहे हैं कि आपका

2:47:20

रोज त्रिवेणी स्नान हो

2:47:22

जाएगा। रोज

2:47:24

नित्य दो पैसा खर्च नहीं होंगे। त्रिवेणी

2:47:28

स्नान रोज हो

2:47:31

जाएगा। क्या उपाय बताओ?

2:47:36

त्रिवेणी में तीन धाराएं हैं। श्री गंगा

2:47:39

जी, श्री यमुना

2:47:41

जी और श्री सरस्वती

2:47:44

जी। ये तीन धाराएं त्रिवेणी संगम में है।

2:47:48

सीता सीते यत्र तरंग

2:47:51

चामरे सती राजो जयति प्रयाग। यह त्रिवेणी

2:48:02

है।

2:48:06

इसमें शिव

2:48:09

नाम बहुत ध्यान से सुने शिव

2:48:12

नाम विभूति

2:48:15

भस्म और

2:48:17

रुद्राक्ष ये तीनों त्रिवेणी

2:48:25

शिव नाम गंगा

2:48:32

है। श्री भस्म सरस्वती

2:48:36

है। और रुद्राक्ष यमुना

2:48:40

है। जो भस्म धारण करता

2:48:44

है जो शिव नाम लेता

2:48:47

है और जो रुद्राक्ष धारण करता है उसका तो

2:48:52

नित्य त्रिवेणी

2:48:55

स्नान कितनी महिमा है त्रयम यत्र

2:49:04

सदामजा दर्शन

2:49:07

मात्र जिसके मस्तक पर भस्म हो

2:49:13

जिसके कंठ में रुद्राक्ष हो, जिसके मुख

2:49:16

में शिव नाम हो, ऐसे व्यक्ति का दर्शन

2:49:20

करने वाले को भी त्रिवेणी स्नान का पुण्य

2:49:22

मिल जाता

2:49:25

है। हमारे

2:49:28

यहां पुराने संतों में तो सब पहले विभूति

2:49:31

धारण करते थे।

2:49:34

अभी भी कुछ त्यागी तपस्वी संतों ने उस

2:49:37

परंपरा को जीवित रखा है। उन संतों के

2:49:40

चरणों में हमारा प्रणाम है।

2:49:43

देखिए अब समय ऐसा आ गया स्वामी

2:49:50

जी के पुरानी रेक-टेक वेशभूषा वाले संत अब

2:49:54

दुर्लभ होते चले जा रहे हैं।

2:49:57

धीरे-धीरे आप लोग बुरा मत मानना। और बुरा

2:50:01

मानो तो हमारा कोई घाटा नहीं है। क्यों?

2:50:04

बुरा मानोगे तो हमको नहीं कहोगे कि यहां

2:50:08

आओ तो हमको कोई ना कहे कि आओ यह हमारे ऊपर

2:50:12

भगवान की सबसे बड़ी कृपा होगी। क्योंकि

2:50:15

हमारे मन से हमको कहीं जाने की इच्छा ही

2:50:17

नहीं होती।

2:50:19

यहां तो हम केवल स्वामी जी के प्रेम से

2:50:22

खींचे हुए आए

2:50:26

हैं। बाकी कोई अपेक्षा नहीं है।

2:50:31

बहुत दुनिया में भटक ली। भटकने की ज्यादा

2:50:33

इच्छा नहीं है। पर पता नहीं प्रारब्ध कब

2:50:36

तक ललाट पर किशोरी जी ने लिखा हुआ है। तब

2:50:39

तक तो भटकना पड़ेगा। यह बात

2:50:43

है। बाकी कहीं आने जाने का मन नहीं होता।

2:50:51

विरक्त संतों को जो दीक्षा दी जाती है,

2:50:54

विरक्त वेश दिया जाता है, सन्यास वेश दिया

2:50:57

जाता है। तो हम बड़ी विनम्रता से पूछते

2:51:00

हैं के चड्डी बनियान देते हैं

2:51:03

गुरुजी के कुर्ता पैजामा देते हैं गुरु

2:51:07

जी कि यह कुर्ता और चौबंदी और यह अमुक

2:51:12

तमुक देते क्या देते हैं गुरु जी ईमानदारी

2:51:15

से बताना सब साधु साधु बैठे घर के लोग

2:51:18

बाहर का कोई

2:51:19

नहीं। यही कहते हैं ना महाराज जी अचला

2:51:22

लंगोटी। इसका मतलब है अचला लंगोटी ही

2:51:26

हमारा पारंपरिक स्वरूप है। मनमाने तरीके

2:51:30

से अब ये ठीक है जो बेचारे बड़े बूढ़े हैं

2:51:33

शिला कपड़ा पहन लेते कोई बात नहीं। लेकिन

2:51:36

जहां तक चले वहां तक संतों की पुरानी रहनी

2:51:40

से ही रहना चाहिए। हमारे पूज्य सदगुरुदेव

2:51:43

श्री पहाड़ी बाबा महाराज बहुत बड़ी आयु तक

2:51:46

विराजमान रहे। हे महाराज जी अपने पूरे

2:51:48

जीवन में कभी शिला वस्त्र स्पर्श नहीं

2:51:51

किया। ना जूता ना छाता ना चप्पल ना खड़ा

2:51:55

कुछ नहीं लिया। एक ब्रह्म पात्र और 10

2:52:00

महीना तो एक लंगोटी पर ही रहते थे। दो

2:52:02

महीना के लिए एक अचला पहन लेते थे। बस एक

2:52:05

अंडी ओढ़ ली अचला पहन लिया।

2:52:11

एक बंगला भाषा की कहावत है शरीर नाम महाशय

2:52:15

जे सहाय से यह शरीर ही महाशय है महापुरुष

2:52:20

है इसको आप जैसा बनाओगे वैसा बन

2:52:25

जाएगा पूज्य

2:52:27

गुरुदेव श्री वीणा बाबा

2:52:32

महाराज आर स्वामी श्री पार्वतीकर जी

2:52:35

महाराज

2:52:38

आंध्र प्रदेश का शरीर था उनका दक्षिण भारत

2:52:42

का पवित्र विप्र का जन्म था विरक्त साधु

2:52:46

थे माधव संप्रदाय के साधु

2:52:52

थे दक्षिण में तो ठंड पड़ती

2:52:55

नहीं पड़ती है बहुत कम आंध्रा में

2:52:59

तमिलनाडु में कहां ठंड पड़ती है

2:53:03

गर्मी वहां का तो उनका का शरीर

2:53:07

था। उनका काल स्नान का नियम था। तो अभ्यास

2:53:11

करते करते इतना अभ्यास महाराज जी उन्होंने

2:53:14

किया था कि बद्री नारायण में रहते थे और

2:53:18

तप्त कुंड में नहीं अलकनंदा में तीन बार

2:53:22

गोता लगाकर स्नान करते थे। कितना ठंडा

2:53:24

पानी अलकनंदा का। त्रिकाल संध्या करते थे।

2:53:28

गीले वस्त्र से अपनी कुटिया तक पहुंचते

2:53:30

थे।

2:53:34

लोग कहते चाय पिए बिना काम नहीं चलेगा। गम

2:53:36

चीज तो खानी पीनी पड़ेगी। वहां रहकर छाछ

2:53:40

पीकर भजन किया। उन्होंने देवर्षि नारद जी

2:53:43

का दर्शन उनको हुआ। गरुड़ जी का दर्शन

2:53:46

उन्हें हुआ। भगवान नारायण का दर्शन हुआ

2:53:48

उन्हें प्रत्यक्ष और भैरव राग का उन्हें

2:53:52

दर्शन हुआ। बद्रीनाथ जी का कीर्तन

2:53:55

उन्होंने बनाया। बहुत सुंदर बड़े-बड़े

2:53:58

महापुरुष उनका दर्शन करने जाते थे। सेठ

2:54:01

श्री जयदयाल गोयनका जी उनका दर्शन करने

2:54:03

गए। भाई श्री हनुमान प्रसाद पोदार जी उनका

2:54:06

दर्शन करने

2:54:07

गए। वीणा बाबा बद्रीनाथ भगवान को सवेरे

2:54:11

वीणा सुनाते

2:54:13

थे। तो दास के ऊपर बड़ी कृपा थी। कुछ हमको

2:54:17

भी उन्होंने वीणा का सरगम सिखाया था।

2:54:20

थोड़े दिन हमको भी संगीत सिखाया

2:54:22

उन्होंने। अब उनका शरीर नहीं है। बहुत

2:54:25

अच्छे महापुरुष थे। बड़े पवित्र आत्मा

2:54:28

दिव्य आत्मा थे।

2:54:31

वो कहते थे अभ्यास करते करते दास को ऐसा

2:54:34

अभ्यास हो गया कि अलकंदा में भी तीन बार

2:54:37

गोता

2:54:39

लगाता और ठीक

2:54:42

है हमने कहा गुरु जी आपको ठंड नहीं लगती

2:54:46

बोले आपके गुरु जी ने हमको कोई ऐसी जोग

2:54:48

जुक्ति बता दी है कि हमको वहां भी पसीना आ

2:54:51

जाता है

2:54:54

युक्ति मुक्ति बता दी है गुरु महाराज ने

2:54:56

पहाड़ी बाबा ने महाराज जी को गुरु मानते

2:54:59

थे वो योग योग विद्या का गुरु महाराज जी

2:55:02

को मानते

2:55:03

हैं। इसलिए संतों को अपनी रेक टेक मर्यादा

2:55:08

में पुरानी वेशभूषा में रहना चाहिए। श्याम

2:55:11

सुंदर दास जी महाराज अखंड विभूति चढ़ाओगे

2:55:14

तो कपड़ा पहनने की जरूरत

2:55:17

रहेगी। फिर कपड़ा सुहाता नहीं है। विभूति

2:55:20

धारण करने वाले संतों को कपड़ा सुहाता

2:55:22

नहीं है। अच्छा नहीं लगता।

2:55:27

हटाओ और एक फायदा आपको बताएं

2:55:31

आपको

2:55:33

बढ़िया विभूति गीले शरीर पर चढ़ाई जाती है

2:55:37

और फिर विभूति पलटी जाती है। चढ़ाने का

2:55:40

मंत्र अलग है। पलटने का मंत्र अलग है। और

2:55:44

अखंड विभूति चढ़ा हुआ साधु।

2:55:47

ट्रेन में जाए तो उसके सटके कोई नहीं

2:55:49

बैठता। कपड़ा खराब हो जाएगा।

2:55:52

और माई दाई तो दूर भक्ति

2:55:55

है। इसलिए विभूति चढ़ाना इसलिए भी बढ़िया

2:55:58

है कि माया चिपकती नहीं है। आपको भरी बस

2:56:01

में भी जगह मिल जाएगी। बोलो वृंदावन

2:56:04

बिहारी लाल की

2:56:08

हमारे महाराज जी पहाड़ी बाबा महाराज ने

2:56:10

कहा बच्चा अब दुखो हमारी परंपरा विभूति की

2:56:15

है। तीन दिन विभूति तो कम से कम चढ़ा लो।

2:56:18

हमने कहा ठीक है जो आज्ञा

2:56:20

महाराज महाराज जी ने विभूति का भी संस्कार

2:56:23

किया यह गुरुजनों की कृपा है अब धीरेधीरे

2:56:27

विभूति धारी संत भी विलुप्त होते चले जा

2:56:32

रहे सब जैकेट और कुर्ता और चौबंदी और

2:56:37

लहंगा फरिया पहन वाले हो गए अब बुरा नहीं

2:56:40

मानना अब मठ मंदिरों में भी देवियों का

2:56:44

प्रवेश होने लग गया भैया विरक्तों के लिए

2:56:47

इससे इससे बड़ी शर्मनाक और कोई दूसरी बात

2:56:50

नहीं। माताओं को अपने घर में ही रहकर भजन

2:56:54

करना

2:56:57

चाहिए। उनके मन में वैराग्य है, त्याग है,

2:57:00

भजन का भाव है तो माता-पिता की सेवा करते

2:57:03

हुए भजन करो।

2:57:05

सन्यास वेशभूष बना के घूमना फिरना अब तो

2:57:09

दुख की बात है महाराज जी कैसी दुर्दशा हो

2:57:12

गई जो ना स्त्री है और ना पुरुष हैं

2:57:16

उन्हें जगतगुरु बनाया जा रहा उन्हें

2:57:18

महामंडलेश्वर बनाया जा रहा है अब की बार

2:57:21

कुंभ में ज्यादा भीड़ वही थी संतों के

2:57:24

दर्शन में भीड़ नहीं थी जो देखो सब वही जा

2:57:27

रहे थे जीवन सफल बनाने के

2:57:31

लिए जिस देश की मूल भाषा संस्कृत

2:57:36

है। उस देश में लोगों ने हिजड़ों को

2:57:39

किन्नर कह

2:57:41

दिया। किस शब्द कोश में लिखा है? किन्नर

2:57:44

माने होता

2:57:46

है। देवताओं की एक जाति है उसको किन्नर

2:57:49

कहा जाता

2:57:50

है। स्त्रीत्व और पुरुषत्व से विहीन

2:57:53

व्यक्ति को किन्नर नहीं कहा जाता।

2:57:57

हम उनके विरोधी नहीं

2:58:01

है। पुरुष नपुंसक नारीवा जीव चराचर कोई

2:58:05

गोस्वामी जी ने कहा

2:58:08

है जो सर्व भाव से मुझे भजता है मोह परम

2:58:13

प्रिय

2:58:14

सो स्त्री पुरुष नपुंसक सबको भजन करके

2:58:18

आत्म कल्याण का अधिकार है। लेकिन साधु

2:58:21

होने की, सन्यासी होने की, आचार्य पद पर

2:58:24

बैठने की, महामंडलेश्वर होने की एक

2:58:25

मर्यादा है प्राचीन। उस मर्यादा का

2:58:31

नाश बड़े पदों पर बैठे हुए लोगों को नहीं

2:58:34

करना चाहिए।

2:58:41

धीरेधीरे सब नष्ट भ्रष्ट होता चला जा रहा

2:58:45

है। बोलो भक्तवत्सल भगवान की

2:58:50

जय। महाराज जी शिव पुराण में लिखा 12 वर्ष

2:58:53

केवल विभूति चढ़ावे तो पशु बंधन से मुक्त

2:58:57

हो जाता। पशु बंधन माने जीव का माया के

2:59:01

बंधन में रहना यही पशुता है। केवल 12 वर्ष

2:59:04

विभूति धारण करे तो वह जीव बंधन से माया

2:59:08

के अविद्या के बंधन से मुक्त होता है। पर

2:59:11

एक बात और सुन लो। खरी खरी बात है। बुरा

2:59:13

मानो तो मान जाओ। विभूति चढ़ाओगे और खूब

2:59:17

व्यसन करोगे और खूब झूठ

2:59:20

बोलोगे तो खाली विभूति तुम्हारा कल्याण

2:59:23

नहीं करे। विभूति के साथ फिर वैसा तपो

2:59:26

युक्त जीवन हो, पवित्र जीवन हो, साधन

2:59:29

संपन्न जीवन हो तभी लाभ होगा। सब तरह से

2:59:34

एक तरह से बात नहीं बनती स्वामी जी सब तरह

2:59:37

से विचार करके जब जीवन बहुत धर्म और

2:59:40

सदाचार से युक्त होता है तब बात बनती

2:59:44

है एतत्रय महा पुण्यम त्रिवेणी सदसतम ये

2:59:49

विभूति रुद्राक्ष और भस्म भस्म रुद्राक्ष

2:59:53

और शिव नाम ये त्रिवेणी के समान

2:59:58

है विभूति

3:00:01

भाले नांग रुद्राक्ष धारणम नासोम

3:00:08

वाणी अब ये त्रिवेणी कौन सी

3:00:14

है शवम नाम यथा

3:00:20

गंगा विभूति यमुना मता

3:00:24

रुद्राक्षम

3:00:25

विधिजा सर्व पाप

3:00:28

विनाश शिव नाम गंगा है

3:00:34

रुद्राक्ष यमुना है और भस्म जो है वह

3:00:39

साक्षात सरस्वती है। ये गंगा यमुना

3:00:43

सरस्वती ये तीनों है।

3:01:01

ब्रह्मा जी ने

3:01:03

तराजू स्थापित की। एक पल पर त्रिवेणी

3:01:07

स्नान का पुण्य रखा। एक पल पर विभूति

3:01:10

रुद्राक्ष और शिव नाम का पुण्य रखा। तो

3:01:13

कहते विभूति रुद्राक्ष शिव नाम का पुण्य

3:01:16

ज्यादा भारी हो गया। इसका मतलब है इसकी

3:01:19

इतनी महिमा

3:01:20

है। आपने नाम सुना है माधव गौड़ी संप्रदाय

3:01:25

के एक महान सिद्ध संत

3:01:28

थे श्री ठाकुर विजय कृष्ण

3:01:33

गोस्वामी जटिया बाबा के नाम से प्रसिद्ध

3:01:36

थे। उनके शिष्य कुलदानंद ब्रह्मचारी हुए।

3:01:40

उन्होंने सद्गुरु संग लिखा है। वह पूरी

3:01:43

परंपरा सिद्धों की परंपरा है। उनके संतों

3:01:47

के चरित्र जरूर पढ़ने चाहिए। ऐसा है।

3:01:50

सद्गुरु संग पढ़ने योग्य है। जगन्नाथ पुर

3:01:54

में जटिया बाबा की समाधि

3:01:56

है। बड़े दिव्य महापुरुष थे जटिया बाबा।

3:02:04

गौ परंपरा

3:02:08

को और गौ में भी आचार्य वंश के थे श्री

3:02:12

अद्वैताचार्य जी जिनसे चैतन्य महाप्रभु ने

3:02:15

पढ़ा था जो महान आचार्य चैतन्य अवतार के

3:02:19

जो मुख्य घटक थे अद्वैताचार्य प्रभु उनके

3:02:23

वंश में उनका जन्म

3:02:26

हुआ श्री

3:02:32

ठाकुर विजय कृष्ण गोस्वामी जटिया

3:02:40

बाबा तो जटिया

3:02:44

बाबा जटा थे उनके बहुत बड़े

3:02:49

बड़े जो जटा तो धारण करते ही

3:02:54

थे का वस्त्र धारण करते थे

3:03:00

और तुलसी के मोटे मोटे कंठा पहनते थे।

3:03:03

उसमें रुद्राक्ष भी पहनते

3:03:05

थे। तो उस जमाने में बहुत पुरानी बात है।

3:03:10

100 साल पुरानी बात होगी

3:03:12

लगभग स्वामी जी 100 वर्ष पुरानी बात हुई

3:03:15

या इससे भी कुछ अधिक समय हो गया

3:03:17

होगा। तो उस समय साधु समाज में उनका बड़ा

3:03:21

भारी विरोध हुआ।

3:03:27

का पहनता है और यह जटा भी रखाता है। तिलक

3:03:31

तो घोड़िया लगाता है। रुद्राक्ष पहनता

3:03:35

है। उन जमान में कुछ लड़ाई झगड़े का

3:03:38

वातावरण ज्यादा

3:03:43

था। तो पंचायत

3:03:45

हुई अखाड़ों की वैष्णव अखाड़ों की चतुर

3:03:49

संप्रदाय की पंचायत हुई। बोले इनको

3:03:51

बहिष्कार करो।

3:03:55

तो उस

3:03:56

समय चतुर संप्रदाय खालसे

3:04:00

के नबार्क पीठ के नबार्क सीठ के श्री

3:04:05

महंत श्री रामदास जी काठिया

3:04:09

बाबा जो पुराने काठिया वृंदावन के

3:04:12

संस्थापक श्री रामदास जी काठिया बाबा वो

3:04:15

काठिया बाबा श्री रामदास जी महाराज ब्रज

3:04:18

विदेही महंत

3:04:20

थे विरोध करने वाले गौ ज्यादा

3:04:27

थे। हां धनंजय दास जी के गुरु जी तो संत

3:04:32

दास जी काठिया थे। धनंजय दास जी के दादा

3:04:35

गुरु जी

3:04:36

थे। धनंजय दास जी तो हमारे पूज्य गुरुदेव

3:04:40

पहाड़ी बाबा से बहुत प्रेम रखते थे। बहुत

3:04:43

ही प्रेम रखते थे। इतना अधिक प्रेम रखते

3:04:48

थे कि नए काठिया का शिलान्यास महाराज जी

3:04:51

के हाथ से हुआ।

3:04:54

और पूज्य श्री जी महाराज ने धनंजय दास जी

3:04:56

काठिया से ग्रंथ पढ़े

3:04:59

थे और पूज्य धनंजय दास जी काठिया ने पंडित

3:05:03

सम्राट वैष्णवाचार्य जी से पढ़ा

3:05:05

था और वैष्णवाचार्य जी महाराज हमारे

3:05:08

पहाड़ी बाबा महाराज के खास गुरु भाई थे

3:05:11

इसलिए महाराज जी में वो गुरु भाव रखते थे

3:05:14

धनंजय दासी काठिया साष्टांग प्रणाम करते

3:05:17

थे महाराज जी

3:05:19

को इस बात का हमें पता तब तब चला जब

3:05:23

वृंदावन में कुंभ की बैठक थी और हम पूज्य

3:05:27

महाराज जी के साथ उस समय श्री जी महाराज

3:05:29

अश्वस्थ थे तो महाराज जी नार्क नगर में

3:05:33

पधारे पहाड़ी बाबा महाराज हम उनके साथ में

3:05:35

आए हम हमारी अवस्था कम थी जैसे ही गए तो

3:05:39

श्री जी महाराज तत्काल उठकर खड़े हो गए और

3:05:43

बाहर तक दौड़े तो महाराज जी वापस जाने लगे

3:05:46

बोले मैं जा रहा हूं गुरु जी नाराज है

3:05:49

बोले नाराज हूं

3:05:51

आप खड़े क्यों हुए? आप यहां तक दौड़ के

3:05:54

क्यों आए? आप अश्वस्थ

3:05:55

हैं तो उन्होंने

3:05:57

कहा कि आप मुझे उसी अवस्था में देखिए जिस

3:06:01

अवस्था में आपने मुझे देखा था और मैं भी

3:06:04

आपका उसी स्वरूप में दर्शन कर रहा हूं।

3:06:07

मैं श्री धनंजय दासी जी काठिया का

3:06:09

विद्यार्थी हूं। तो आप के गुरु भाई के वो

3:06:12

शिष्य थे। मैं आपको गुरु रूप में मानता

3:06:15

हूं।

3:06:18

नीम गांव नबार्क तीर्थ की स्थापना मंदिर

3:06:22

की स्थापना में भी शिलान्यास हमारे

3:06:25

गुरुदेव पहाड़ी बाबा के हाथ से श्री जी

3:06:27

बाबा ने श्री जी महाराज ने

3:06:31

करवाया ये पुराने संबंध थे पुराने काठिया

3:06:34

के श्रीमंत लक्ष्मी नारायण दास जी महाराज

3:06:37

जब तक जीवित

3:06:38

रहे परंपरा से प्रत्येक गुरु पूर्णिमा में

3:06:41

पहाड़ी बाबा की समाधि का पूजन करने आते थे

3:06:44

महाराज जी का पूजन करने आते थे

3:06:49

यह पहाड़ी बाबा काठिया बाबा का ऐसा प्रेम

3:06:53

था। पुराने संतों में बहुत प्रेम

3:06:57

था। अब भी जो विचारवान संत है उनमें प्रेम

3:07:00

होता

3:07:01

है। हां तो बड़ा भारी विरोध

3:07:05

हुआ। रुद्राक्ष क्यों धारण करते हैं?

3:07:13

तो श्री ब्रज विदेही श्री महंत श्री

3:07:15

रामदास जी काठिया बाबा ने

3:07:21

कहा कान खोलकर सुन लो तुम लोग तुम लोगों

3:07:26

ने यदि श्री काठिया श्री जटिया बाबा का

3:07:29

तिरस्कार किया उनको समाज से बहिष्कृत किया

3:07:33

तो राधा रानी तुमको वृंदावन में घुसने

3:07:36

नहीं

3:07:38

देगी वो सिद्ध संत

3:07:41

शास्त्र विरुद्ध कोई कर्म नहीं कर सकते

3:07:45

वह तो किसी साधु ने कहा कि उनकी पत्नी भी

3:07:49

उनके पास आ जाती सन्या विरक्त थे लेकिन

3:07:53

उनका पूर्वाश्रम की पत्नी भी थी बच्चा भी

3:07:56

था वो भी आ जाते हैं उन्होंने कहा वो शिव

3:07:59

है तो वह पार्वती

3:08:01

है किसने कहा श्री रामदास जी काठिया बाबा

3:08:05

ने और कहा दंडवत करके क्षमा मांग लो नहीं

3:08:09

तो तुम लोगों उनको इतना भारी दंड मिलेगा

3:08:11

कि हम वाणी से नहीं बोल सकते। नरको में

3:08:14

ठोर नहीं रहेगा। ऐसे संत है वो। मैं जानता

3:08:17

हूं वो कितने उच्च कोटि के संत

3:08:19

है। तब बहिष्कार की दूसरे दिन की जो

3:08:22

मीटिंग थी वो फेल हो गई और सब साधु समाज

3:08:26

ने चार संप्रदाय खालसे में जटिया बाबा को

3:08:29

बुलाया। उनका पूजन किया और कहा महाराज हम

3:08:33

लोग बता जरूर दो हमको आप किस प्रमाण से

3:08:36

रुद्राक्ष पहनते हैं। तब श्री जटिया बाबा

3:08:38

ने

3:08:40

कहा ये श्लोक पद्म पुराण का

3:08:43

[संगीत]

3:08:45

है। क्या कह हम अपनी ओर से थूप नहीं रहे

3:08:49

कि आप भी ऐसा करो। हम तो एक बाद की बात

3:08:51

बता रहे हैं।

3:08:57

[संगीत]

3:09:03

ये कंठ लग्न

3:09:09

तुलसी

3:09:11

नलिनाक्ष

3:09:15

माला श्लोक सुन लो स्थान के अर्थ मत

3:09:21

करना ये कंठ लग्न तुलसी

3:09:25

[संगीत]

3:09:27

नलिनाक्ष

3:09:30

माला येव ललाट पटलेले लस दूध

3:09:36

पुन्रा ये बा

3:09:39

मूल परिचिनित शंख

3:09:43

चक्रास्ते

3:09:45

वैष्णवा भवन मास

3:09:48

[संगीत]

3:09:49

पवित्रती वेण त्रिभुवन को स पवित्र कर

3:09:54

देते हैं कौन

3:09:57

जिनके कंठ में तुलसी सदा विराजमान है। ये

3:10:01

कंठ लग्न तुलसी

3:10:05

तुलसी सदा धारण करना चाहिए।

3:10:08

शास्त्रों में लिखा य कठे तुलसी नास्त ते

3:10:12

नरा मू मानसा सुनो विसम चम जलम चमरा जिनके

3:10:19

कंठ में तुलसी नहीं है वे मूढ़ मनुष्य है

3:10:22

उनके द्वारा स्पर्श किया हुआ अन्न शान

3:10:25

विष्ठा के तुल्य होता है। उनके द्वारा

3:10:28

स्पर्श किया हुआ जल मदिरा के समान होता

3:10:30

है। पुराने टसाली साधु बिना कंठी वाले के

3:10:34

हाथ का छुआ पानी नहीं पीते थे।

3:10:42

बोले सूतक लग जाएगा तुलसी में बोले नहीं

3:10:46

लगेगा ब्रह्मवन निर्विका

3:10:52

ब्रह्म नासम विद्यते तस्या यस ब्रह्म

3:10:57

रूपणी तुलसी में असच नहीं होता क्यों

3:11:00

परबह्म का स्वरूप तुलसी पवित्र नहीं होता

3:11:03

बोले स्नान के समय तुलसी का जल पैर में

3:11:06

जाएगा अपराध लगेगा बोले नहीं लगेगा पुराण

3:11:09

में लिखा है स्नान काले यसंगे दृश्यते

3:11:14

तुलसी सुर्व ती स्नात भवते

3:11:18

[संगीत]

3:11:20

संसया स्नान के समय तुलसी का एक दाना भी

3:11:23

जिसके शरीर पर है उसको छूकर जल जब शरीर पर

3:11:27

पड़ता है तो धरती के सारे तीर्थों में

3:11:30

स्नान का पुण्य प्राप्त हो जाता

3:11:34

है। बोले तुलसी कभी रख लेंगे कभी उतार के

3:11:37

धर देंगे बोले बिल्कुल नहीं क्षणारधही

3:11:42

यज्ञ पवित्र कठे तुलसी मालिका क्षणार्ध

3:11:46

तही विष्णु द्रोही

3:11:48

भर आधे क्षण के लिए तुलसी से रिक्त कंठ हो

3:11:52

जाए तो विष्णु द्रोही हो जाता है आप लोगों

3:11:55

ने धर्म सम्राट पूज्यपा स्वामी कृपात्री

3:11:57

जी का नाम सुना

3:11:59

है दर्शन भी किया होगा वो रुद्राक्ष भी

3:12:03

धारण करते थे तुलसी भी धारण करते थे। किसी

3:12:07

ने उनके बारे में कह दिया कि कर कृपात्री

3:12:09

जी तो आधे वैष्णव है। तो जिस व्यक्ति ने

3:12:12

कहा था उससे शास्त्रार्थ करने पहुंच गए।

3:12:15

बोले हमको आधा वैष्णव कैसे कहा? हम एकादशी

3:12:19

व्रत करते हैं। प्रत्येक निर्जल तुलसी से

3:12:21

शालिग्राम जी का नित्य सहस्त्रार्चन करते।

3:12:24

के लोग तुलसी से शालिग्राम जी का अर्चन

3:12:26

करते हैं। शालिग्राम नर्मदेश्वर का पूजन

3:12:29

करते हैं। एकादशी प्रत्येक एकादशी निर्जल

3:12:32

करते हैं। निरंतर नाम का जप करते हैं। हम

3:12:35

तुलसी धारण करते हैं। हमको आपने आधा

3:12:38

वैष्णव कैसे कह दिया? हम पूरे वैष्णव

3:12:41

हैं। और यदि केवल त्रिपुण के कारण किया है

3:12:46

तो भैया भोले बाबा कौन सा? भोले बाबा भी

3:12:49

तो त्रिपुंड धारण करते हैं। वैष्णव

3:12:51

शिरोमणि है भोले बाबा। शिवजी से बड़ा

3:12:54

वैष्णव कोई

3:12:56

नहीं। सब चुप हो

3:12:59

गए। बहुत से लोग पूछते हैं कि तुलसी के

3:13:02

साथ रुद्राक्ष धारण करें कि ना करें? हमने

3:13:05

अब तक जितने पुराणों का मूल पारण किया है

3:13:08

उनमें कहीं ऐसा निषध वचन नहीं आया कि

3:13:11

तुलसी के साथ रुद्राक्ष धारण नहीं करना

3:13:13

चाहिए अथवा रुद्राक्ष के साथ तुलसी धारण

3:13:16

नहीं करना चाहिए। दोनों की महिमा है।

3:13:19

दोनों ही धार है।

3:13:23

इसलिए यह कंठ लग्न तुलसी नलिनाक्ष माला

3:13:28

नलिन माने होता है कमल और अक्ष माने होता

3:13:32

है

3:13:33

रुद्राक्ष अब लोग अर्थ बदलते हैं नलिनाक्ष

3:13:36

माने कमल गट्टा उसको नलिन उसको नलिन कहते

3:13:40

हैं और अक्ष माने होता है रुद्राक्ष कमल

3:13:43

गट्टे की माला भी और रुद्राक्ष की माला जो

3:13:46

धारण करते

3:13:47

हैं जिनकी बाहु ऊपर धनुर्न शंख चक्र चक्र

3:13:51

अंकित हैं। ऐसे जो वैष्णव हैं वो त्रिभुवन

3:13:55

को पवित्र करते हैं। इसलिए महाराज जी

3:13:58

रुद्राक्ष की भस्म की इन सब की बड़ी भारी

3:14:02

महिमा

3:14:03

है।

3:14:05

श्री सूत जी महाराज वर्णन कर रहे

3:14:09

हैं कि पाप रूपी महान पर्वत शिव नाम लेते

3:14:14

ही वो प्रचंड दावा नल से जलकर भस्म हो

3:14:17

जाता है। इसमें कोई संदेह तुम अपने मन में

3:14:22

मत करना जो कुछ नहीं करता है एक अक्षर

3:14:25

पढ़ा लिखा नहीं है केवल शिव शिव शिव शिव

3:14:28

जपता रहता है उसके भीतर वेदों का ज्ञान

3:14:32

अपने आप प्रकट हो जाता है वो पुण्यत्मा है

3:14:36

वो धन्यवाद का पात्र है वो विद्वान है भले

3:14:40

ही संपूर्ण वेद वेदांग कंठस्थ कर लिए हो

3:14:43

पर शिव नाम में प्रीति ना हो शिव नाम का

3:14:46

जप न करता हो तो वह अधम उसे मानना चाहिए

3:14:52

चाहिए। भस्म के महात्म का भी निरूपण किया

3:14:56

गया। बोलो भक्तवत्सल

3:14:59

भगवान की जय। अग्नि अग्निहोत्र से उत्पन्न

3:15:04

जो भस्म है

3:15:13

उसको वैदिक भस्म कहा गया। श्रत भस्म कहा

3:15:17

गया। वह त्रिपुण के लिए श्रेष्ठ माना गया

3:15:21

है। अन्य यज्ञ से उत्पन्न जो भस्म है वह

3:15:25

भी त्रिपुण धारण के लिए श्रेष्ठ

3:15:28

है। सजल ही भस्म धारण करना चाहिए। इसलिए

3:15:32

हमारे यहां महात्माओं में जो विभूति

3:15:34

चढ़ाते हैं वह गीले शरीर पर ही विभूति

3:15:36

चढ़ाते हैं। शरीर को बिना पोछे ही विभूति

3:15:39

धारण करते हैं। गीले में ही विभूति धारण

3:15:42

करने का विधान है। और महाराज

3:15:46

जी इस प्रकार से विस्तार पूर्वक इसका

3:15:49

वर्णन किया गया और कैसे कैसे करना चाहिए

3:15:55

और महाराज जी इसमें एक बात और लिखी हुई

3:15:58

है। वो लिखी यह है

3:16:04

कि भस्म धारण करने वाले को सत्य, दया,

3:16:07

दान, पवित्रता इन सब जो सहज नियम है उन

3:16:12

नियमों को भी अपने जीवन में धारण करना

3:16:15

चाहिए। बोलो भक्तवत्सल भगवान की जय। जो

3:16:20

त्रिपुंड की निंदा करते हैं, जो शिव जी की

3:16:23

निंदा करते हैं, कहते हैं वो लोग अधम है,

3:16:27

नारकीय हैं। ऐसा ही समझना चाहिए। जिस गांव

3:16:32

में शिवालय ना हो, उस गांव में निवास नहीं

3:16:36

करना चाहिए।

3:16:39

और देखिए भारतवर्ष की कितनी पवित्र परंपरा

3:16:42

है। पूरे भारतवर्ष में भगवान का मंदिर भले

3:16:46

ही ना हो पर भोले बाबा का और हनुमान जी का

3:16:49

मंदिर सब जगह मिल जाए। हनुमान जी का मंदिर

3:16:53

भी ज्यादा खर्च नहीं लगता। महात्मा कहीं

3:16:56

बैठे मूर्ति कहां से लावे? एक पत्थर शिला

3:17:00

ले आए। उसी में दो नेत्र चिपका दिए।

3:17:04

विभूति बढ़िया घी में मथकर सिंदूर लगा

3:17:07

दिया वही रामचरितमानस का पाठ करने लगे वही

3:17:11

हनुमान चालीसा पढ़ने लगे वही राम राम करने

3:17:14

लगे वही सिद्ध हनुमान जी हो

3:17:17

जाते हनुमान जी के मंदिर शिव जी शिव जी का

3:17:20

मंदिर भी इसलिए बनता है ज्यादा कि ज्यादा

3:17:23

खट चक्कर नहीं है एक लोटा जल चढ़ा दो बिल

3:17:27

पत्र चढ़ा दो अक्षत चढ़ा दो इतने में भोले

3:17:29

बाबा राजी

3:17:31

प्रसन्न शिव जी का मंदिर जहां ना हो उस

3:17:34

गांव में निवास नहीं करना

3:17:39

चाहिए। बोलो भक्तवत्सल

3:17:42

भगवान की जय।

3:17:47

रुद्राक्षम यस

3:17:49

गाते ललाटे तत्र

3:17:54

पुंडकम

3:17:56

संडालोप

3:17:58

समज सर्व

3:18:01

[संगीत]

3:18:05

वर्णोत्तम जिसके शरीर में भस्म है मस्तक

3:18:10

पर त्रिपुंड है गले में रुद्राक्ष है वो

3:18:13

भले ही चांडा कुल में ही पैदा क्यों ना

3:18:16

हुआ हो वह पूज्य है। वह तिरस्कार के योग्य

3:18:20

नहीं है। वह आदर के योग्य

3:18:24

है। इस प्रकार से यह वर्णन किया

3:18:29

गया। त्रिपुंड्र में तीन रेखाएं होना

3:18:32

चाहिए। ऐसा यहां लिखा हुआ है। अब बहुत

3:18:36

ध्यान से सुने इस संबंध में। बहुत से लोग

3:18:39

त्रिपुंड लगाते हैं। पुंड्र शब्द का अर्थ

3:18:41

क्या है?

3:18:42

संस्कृत भाषा में पुंड्र शब्द का अर्थ

3:18:46

होता है

3:18:47

उंगली। पुंड्र माने क्या होता है?

3:18:50

उंगली। तो त्रिपुंड शब्द का संस्कृत अर्थ

3:18:54

क्या है? त्रह पुंड धारते

3:18:59

त्रिपुंड्रा जो तीन उंगलियों से धारण किया

3:19:02

जाए उसको त्रिपुंड कहते

3:19:05

हैं। आप दो उंगली से धारण करोगे तो रेखा

3:19:08

तो तीन बन जाएगी। एक एक बीच के ऊपर की

3:19:11

लेकिन वो त्रिपुंड नहीं होगा वो द्विपुंड

3:19:14

होगा और जब तीन से धारण करेंगे तो रेखाएं

3:19:19

चार होगी पर घर तीन होंगे ध्यान में आई

3:19:23

बात कि नहीं आई ऐसे धारण करेंगे तो रेखाएं

3:19:27

तो तीन एक रेखा एक हो गई एक ये हो गई एक

3:19:31

हो गई चार रेखा हो गई ठीक है पर जो खाने

3:19:35

बनेंगे स्थान बनेंगे वह तीन बनेंगे

3:19:40

इसलिए तीन उंगलियों से ही त्रिपुंड धारण

3:19:43

करने का विधान है और अंगुष् कृत रेखा

3:19:47

अंगुष् से फिर मध्य के भस्म या चंदन का

3:19:51

थोड़ा अलग करके फिर उसको स्वच्छ करना

3:19:54

चाहिए। यह त्रिपुंड धारण का विधान है।

3:19:56

त्रिपुंड

3:19:57

में आदि ब्रह्मा यहां की जो रेखा है इसमें

3:20:01

ब्रह्मा जी है। मध्य विष्णु मध्य की रेखा

3:20:05

में विष्णु है। उध्व रेखा सदा शिवा ऊपर की

3:20:08

जो रेखा है उसमें शिव जी हैं। और जो बिंदी

3:20:12

है वो क्या है? बिंद की शक्ति रूपण

3:20:15

त्रिपुंडम धारे द्विजा। जो बिंदी है वो

3:20:18

भगवती परंबा जगदंबा का स्वरूप है। दुर्गा

3:20:22

का स्वरूप है। आज्ञा शक्ति का स्वरूप है।

3:20:24

ये त्रिपुंड का है। ऐसे ही वैष्णव तिलक भी

3:20:29

उंगली से धारण करने का विधान है। क्योंकि

3:20:32

इसको भी कहते उर्ध पुंड्र। क्या कहते हैं?

3:20:36

तो पुंड्र माने क्या होता है? उंगली।

3:20:40

उंगली से धारण किया जाता। अब हम लोग थोड़ा

3:20:44

हम तो उंगली से ही लगाते हैं लेकिन कई लोग

3:20:47

सजावट के लिए बढ़िया उसको सलाई वलाई से

3:20:50

बढ़िया सजा के बढ़िया से लगाते हैं। ठीक

3:20:53

है। स्वरूप सजाते हैं। अच्छी बात है। अपने

3:20:56

तो उंगली से ही सब लगा लेते हैं। बोलो

3:20:59

भक्तवत्सल भगवान की जय। इस प्रकार से

3:21:05

त्रिपुंड की बड़ी भारी महिमा है।

3:21:11

मध्यमा

3:21:13

नामिकांगुल्या मध्य

3:21:16

प्रतिलोमता अंगुष् कृत रेखा त्रिपुंडा

3:21:23

विधते मध्यमा उंगली और अनामिका

3:21:27

उंगली ये दो रेखाएं फिर अंगुष्ट से एक

3:21:30

रेखा और ये त्रिपुंड्र हो गई ये ये

3:21:35

त्रिपुंड्र जो है उसको त्रिपुंड कहा जाता

3:21:38

है त्रिशणा प्रख नाम प्रत्य नव देवता फिर

3:21:43

सबके अलग-अलग देवताओं का भी वर्णन है कहां

3:21:46

कहां त्रिपुण धारण करना चाहिए उसका भी

3:21:49

वर्णन

3:21:50

है सूत जी ने कहा सोनक जी ने पूछा था कि

3:21:54

महाराज रुद्राक्ष की महिमा का भी वर्णन

3:21:56

कीजिए तो रुद्राक्ष का भी बड़ा सुंदर

3:21:59

वर्णन किया है बोलो भक्तवत्सल भगवान की जय

3:22:05

महेशानी दिव्य वर्ष

3:22:08

सहण महेशानी पुन पुरा

3:22:12

तपस्त

3:22:13

मनसम व

3:22:15

[संगीत]

3:22:18

मम एक बार भगवती जगदंबा पार्वती ने शिव जी

3:22:22

से पूछा कि हे प्रभु आप सदा रुद्राक्ष का

3:22:26

श्रृंगार धारण करते हैं। इसका कारण क्या

3:22:29

है? आपको रुद्राक्ष इतना प्रिय क्यों है?

3:22:32

भगवती के प्रश्न करने पर भगवान शिव ने कहा

3:22:37

कि देवी एक समय की बात है कि मैंने अपने

3:22:41

मन को निग्रहित करके हजारों दिव्य वर्षों

3:22:45

तक मैंने कठोर तप

3:22:48

किया। उस

3:22:51

समय एक दिन

3:22:54

सहसा तप की अग्नि से मेरा चित्त शुद्ध हो

3:22:57

उठा।

3:22:59

और मैंने अपने लीलावश नेत्रों को

3:23:03

खोला और जैसे ही मैंने हजारों दिव्य

3:23:06

वर्षों के बाद नेत्र खोले तो मेरे नेत्र

3:23:09

से कुछ जल के बिंदु निकले। उन जल बिंदुओं

3:23:13

को जैसे ही मैंने पृथ्वी पर छोड़ा उससे

3:23:17

रुद्राक्ष नामक वृक्ष उत्पन्न हो गए।

3:23:19

रुद्र माने भगवान शिव उनके नेत्रों से

3:23:22

उत्पन्न होने से इनका नाम रुद्राक्ष हुआ।

3:23:25

तत्ता बिंदु तो जाता वृक्षा रुद्राक्ष

3:23:30

संजका रुद्राक्ष संज्ञक वृक्ष उनको कहा

3:23:35

गया कहीं कोई शिवलिंग ना हो एक रुद्राक्ष

3:23:39

के फल को ही रखकर शिव जी के रूप में पूजन

3:23:42

किया जा सकता प्रत्येक रुद्राक्ष का दाना

3:23:44

साक्षात शिव रूप ही है। शिव से उत्पन्न

3:23:47

होने के कारण वो शिव जी का ही स्वरूप

3:23:56

है। कहां कहां महाराज जी लिखा है किस किस

3:24:00

के लिए मैंने प्रकट किया रुद्राक्ष पुराण

3:24:04

में लिखा है स्थावर मन प्राप्त भक्त

3:24:07

अनुग्रह कारण ते दत्ता विष्णु

3:24:10

भक्त

3:24:13

चतुर्वे विष्णु भक्त वैष्णवों के लिए और

3:24:17

चारों वर्णों के लिए मैंने रुद्राक्ष

3:24:19

उत्पन्न किया शिव जी बोल रहे पार्वती जी

3:24:22

से

3:24:24

कहा ग देश में मथुरा

3:24:28

अयोध्या लंका मलय पर्वत सहगिरी काशी इन सब

3:24:35

क्षेत्रों का नाम आया है। इनमें मैंने

3:24:37

रुद्राक्ष वृक्षों को उत्पन्न किया। जहां

3:24:40

रुद्राक्ष उत्पन्न होते हैं। वे देश बड़े

3:24:44

पवित्र हैं। जो और रुद्राक्ष सभी को धारण

3:24:48

करना चाहिए। ब्राह्मण हो, क्षत्रिय हो,

3:24:50

वैश्य हो, शूद्र हो, स्त्री हो, पुरुष हो

3:24:53

सभी रुद्राक्ष धारण कर सकते हैं।

3:24:57

इसमें वर्ण भेद भी है। श्वत रक्त पीत

3:25:00

कृष्णा वर्णा गया क्रमा स्वजातीधार

3:25:04

रुद्राक्षम वर्णत क्रमात ब्राह्मण को

3:25:07

श्वेत वर्ण का रुद्राक्ष धारण करना चाहिए।

3:25:10

क्षत्रिय को रक्त वर्ण का वैश्य को पीत

3:25:12

वर्ण का चतुर्थ वर्ण को कृष्ण वर्ण का

3:25:15

रुद्राक्ष धारण करना चाहिए। यह इसका वर्णन

3:25:18

है। और फिर जो मिल जाए वही धारण कर लेना

3:25:22

चाहिए। छोटा श्रेष्ठ होता कि बड़ा तो लिखा

3:25:25

है धात्री फल

3:25:27

प्रमाणम यष्टत उदाम बद्री फल मात्र मध्यम

3:25:32

परकीर्तितम अधम च मात्रम

3:25:36

प्रक्रते कहते जो आंवले के फल के बराबर है

3:25:40

वो उत्तम है जो बेर के फल के बराबर

3:25:43

रुद्राक्ष है वो मध्यम है और जो चने के

3:25:46

बराबर रुद्राक्ष है वो अधम है निम्न कोटि

3:25:48

का है इसलिए उत्तम तो जो आंवले के फल के

3:25:53

समान रुद्राक्ष है वही श्रेष्ठ कहा गया

3:25:57

है। अब एक बात और इसी प्रकरण में लिखे कि

3:26:01

कुछ रुद्राक्षों की प्रजाति ऐसी होती है

3:26:04

जिनमें बड़े फल आते ही नहीं है। छोटे ही

3:26:07

फल आते हैं। तो उनमें लिखा है कि गुंजया

3:26:11

सदश्यम यस्या सर्वार्थ फल साधनम। छोटे में

3:26:16

लोग छोटे दाने को छोटे अवस्था में होते तो

3:26:20

बड़े हैं। पर छोटी अवस्था में उनको तोड़

3:26:23

लेते हैं। तो बड़े को ही छोटा बना देते।

3:26:24

तो वो मना है हुआ

3:26:26

था और जो छोटी ही प्रजाति के हैं

3:26:30

जो उत्पत्ति से ही छोटे हैं उनमें भी जो

3:26:34

केवल गुंजा जानते हो ना

3:26:37

गुंजा गुंजा गुची

3:26:42

यहां मराठी में क्या बोलते

3:26:46

हैं गुंज बोलते हैं तो गुंज जो है

3:26:51

ना गुंज की माल गरे पैरोंगी भगवान हमारे

3:26:55

गुंजा माला धारण करते हैं हमारे वृंदावन

3:26:58

के ठाकुर जी तो गुंजा के समान जो छोटा है

3:27:02

उसको भी बहुत श्रेष्ठ माना गया है

3:27:07

संपूर्ण महात्म में उसको बहुत श्रेष्ठ

3:27:10

माना गया पर वो प्राय दुर्लभ है अब तो

3:27:13

विज्ञान इतना उन्नत हो गया कि नकली

3:27:16

रुद्राक्ष बहुत बनते फैक्टरी है नकली

3:27:19

रुद्राक्ष कहां बनते चाइना में

3:27:23

सब चीज चाइनीज हो

3:27:25

गई। शालिग्राम भी चाइना में बनने लग गए।

3:27:28

महाराज

3:27:29

जी असली शालिग्राम से नकली शालिग्राम इतने

3:27:33

बढ़िया होते हैं कि आप आश्चर्य में पड़

3:27:36

जाओगे। जो चिन्ह खजोगे सब मिल जाएंगे उसी

3:27:39

में। होते सब

3:27:41

नकली। ऐसे रुद्राक्ष भी नकली आ

3:27:48

गए। आदमी मिलावटी हो गया। आदमी ही नकली हो

3:27:52

गया तो क्या चीज असली रहेगी? केवल राम नाम

3:27:56

शिव नाम ऐसा है जिसमें चाहे जितना कलिकाल

3:28:00

आ जाए मिलावट संभव नहीं है। बाकी सब चीज

3:28:04

में मिलावट हो

3:28:06

गई। पर शुद्ध रुद्राक्ष भी मिलते

3:28:10

हैं। इसलिए विश्वास के योग्य शुद्ध

3:28:14

रुद्राक्ष ही धारण करना चाहिए। बाजार की

3:28:17

चीज पर जल्दी भरोसा नहीं करना चाहिए। उसके

3:28:20

अलग-अलग लक्षण है। कैसे पहचान हो कि सही

3:28:24

है कि सही नहीं है। उसकी पहचान हो जाती

3:28:30

है। हमको नकली शालिग्राम जी दिखाए

3:28:34

काठमांडू में एक बड़े

3:28:36

व्यवसाय और महाराज जी असली से वो ज्यादा

3:28:39

अच्छे लग रहे

3:28:40

थे। छोटे छोटे छोटे छोटे बढ़िया बढ़िया और

3:28:44

आप जितने कहो उतने ज्योतिष स्वरूप दे

3:28:46

देंगे। सब नकली कचटा

3:28:50

कांच के होते हैं ना उनमें कोई काला इतना

3:28:53

गहरा रंग डाल देते हैं कि वह देखने में

3:28:55

शालिग्राम जी लगते हैं। ऐसे करेंगे तो

3:28:58

ज्योति दिखाई पड़ेगी। किसी में लाल, किसी

3:29:00

में पीली पर प्राय नकली ज्योति स्वरूप भी

3:29:04

होते हैं लेकिन बाजारों में धन के लोभ में

3:29:09

सब काम गड़बड़ हो रहा है। शालिग्राम को

3:29:12

बेचने वाला, शालिग्राम को खरीदने वाला,

3:29:16

शालिग्राम का मूल्य लगाने वाला तीनों नरक

3:29:19

जाते हैं। ऐसा लिखा

3:29:22

है। आप कहेंगे अब तो आपने तो प्रतिबंध ही

3:29:26

लगा दिया।

3:29:28

और जो वहां रहते हैं खोजने वाले उनहीं को

3:29:31

बढ़िया मिलते हैं। हम लोग जाएंगे तो नहीं

3:29:33

मिलेंगे

3:29:34

बढ़िया। तब इसका उपाय यह है कि उनसे

3:29:38

मोलतोल ना करो। उनको न्योछावर दे दो। ले

3:29:41

लो भैया मोल हम ना करेंगे। ना तुम मोल

3:29:43

बताओ ना हम मोल लेंगे। आंख मूंद के लो

3:29:47

ज्यादा दो। कम क्यों दो पहाड़ में लोग

3:29:49

बेचारे गरीबी में रहते हैं। ज्यादा दे दो।

3:29:52

वो ₹100 चाहते हैं आप उनको ₹200 ₹00 दे

3:29:55

दो।

3:29:57

ले जाओ मिल जाएंगे।

3:29:59

अपने मलूक पीठ में तो बहुत बड़ी संख्या

3:30:03

में शालिग्राम भगवान विराजमान है। इस समय

3:30:06

लगभग एक लाख सा हजार शालिग्राम जी अपने

3:30:11

मलुक पीठ में विराजमान है। इतनी बड़ी

3:30:13

संख्या में पूरे भारतवर्ष में कहीं भी

3:30:15

शालिग्राम जी विराजमान नहीं है। गिनती से

3:30:18

एक लाख सा हजार

3:30:20

है। सबका नित्य

3:30:23

स्नान, नित्य चंदन धारण, नित्य इत्र,

3:30:27

नित्य आरती, पूजा, राग भोग सब होता है।

3:30:30

इसी तरह की व्यवस्था बनाई गई

3:30:35

है। बस मर्यादा यह बना के रखी है कि उसमें

3:30:39

से किसी को देते नहीं है उठा के। हां।

3:30:42

नहीं तो लोग मांगने वाले आते महाराज इतने

3:30:44

हमको दे दो। तो रहेंगे नहीं। शालिग्राम

3:30:46

जी। इसलिए अब तो ऐसा है कि जहां लोगों के

3:30:50

यहां मंदिरों में पुराने में सेवा पूजा

3:30:53

नहीं हो रही वह लोग भी आकर वहां पध जाते।

3:30:55

महाराज यहां बढ़िया सेवा हो रही है। यहां

3:30:59

रहेंगे। हमको यह प्रेरणा ऐसे

3:31:02

मिली। भगवान की इच्छा से तो सब होता ही

3:31:06

है। उसका एक दिव्य संकेत पहले हमको भगवत

3:31:12

प्रेरणा से प्राप्त हुआ था। वह सभा में

3:31:15

कहने योग्य बात नहीं है। फिर हमने उस बात

3:31:18

को पूज्य गुरुदेव भक्त माली जी को निवेदित

3:31:20

किया तो उन्होंने कहा कि पंडित जी इसका

3:31:22

मतलब है कि भगवान बड़ी संख्या में यहां

3:31:25

आकर इस स्थान को धन्य करना चाहते हैं। ऐसा

3:31:29

कुछ

3:31:32

एक अनुभव मान लो ऐसे ही समझ

3:31:37

लो। हमारे एक मलुक पीठ के संत है तुलसीदास

3:31:40

जी। उनको धुन सवार हुई और वह दामोदर कुंड

3:31:45

तक से शालिग्राम जी लाते लाते लाते लाते

3:31:48

वहां के जो पर्वती क्षेत्र के लोग हैं

3:31:50

उनको कुछ सेवा दे देते थे और वो बढ़िया

3:31:53

बढ़िया स्वरूप शालिग्राम जी के ले ठाकुर

3:31:56

जी की कृपा से विराजमान है तो हमारे मन

3:32:00

में भाव कैसे जगा महाराज जी लिखा है जहां

3:32:05

द्वादश चक्रांकित शिलाएं हैं शालिग्राम जी

3:32:08

की वो क्षेत्र 12 योजन का

3:32:12

क्षेत्र 48 कोस का क्षेत्र तीर्थ हो जाता

3:32:15

है और तीर्थ में हो तब तो कहना क्या है और

3:32:20

जहां सपाद लक्ष शालिग्राम होते हैं सवा

3:32:24

लाख शालिग्राम होते हैं वहां मरने वाले

3:32:27

कीट पतंग को भी स्या मुक्ति होती है। उसने

3:32:31

कोई साधन न किया हो तो भी उसको स्या

3:32:35

मुक्ति हो जाती।

3:32:36

हमारे मन में भैया भजन साधन तो होता नहीं

3:32:39

है। भगवान कृपा करें यदि एक लाख शालिग्राम

3:32:42

जी कम से कम विराज जाए सवा लाख तो इनके

3:32:45

सहारे नैया पार लग जाएगी सबकी तो ठाकुर जी

3:32:49

इतने करुणा में है कि वह बढ़ते बढ़ते आज

3:32:52

एक लाख 16 हजार हो गए पर कुंड में जो चले

3:32:56

जाते हैं उस सिंहासन में शेष सिंहासन में

3:33:00

फिर उनमें से हम उठाकर किसी को नहीं

3:33:04

देते मर्यादा ऐसी बनाकर रखी है कि वहां जो

3:33:07

विराजमान हो गए फिर वहां से नहीं जाएंगे

3:33:09

कहीं

3:33:10

फिर तो अखंड वृंदावन वास

3:33:13

करेंगे। बोलो वृंदावन बिहारी लाल की जय।

3:33:19

तो इस प्रकार से इनकी बड़ी भारी महिमा है।

3:33:23

रुद्राक्ष के शिवलिंग की भी बड़ी महिमा का

3:33:26

वर्णन किया गया

3:33:28

है।

3:33:30

इसलिए गुंजा मात्र प्रमाण के रुद्राक्ष को

3:33:33

भी श्रेष्ठ माना गया है। जो कीड़ों से

3:33:37

दूषित हो गया हो, खंडित हो, फूटा हुआ हो,

3:33:40

जिसमें उभरे हुए दाने ना हो, जो वृण युक्त

3:33:43

हो, पूरा गोल ना हो। इन छह प्रकार के

3:33:46

दोषों वाले रुद्राक्ष का त्याग कर देना

3:33:48

चाहिए। रुद्राक्ष में अपने आप छिद्र हो

3:33:52

जाता है। वही रुद्राक्ष श्रेष्ठ माना जाता

3:33:55

है। जो 1100 रुद्राक्ष को अपने देह पर

3:33:58

धारण करता है वो रुद्र रूप हो जाता है।

3:34:01

इसमें संदेह नहीं है। और महाराज जी लिखा

3:34:05

है कहां कहां किस अंग में कितने धारण करना

3:34:09

चाहिए। मस्तक पर कितने कान में भी

3:34:11

रुद्राक्ष धारण की विधि है। भुजाओं में

3:34:14

कंठ में सबकी अलग-अलग महिमा का वर्णन शिख

3:34:17

में एक सिर पर 30 गले में 50 भुजाओं में

3:34:20

161 16 मणिबों पर 121 स्कंधों में 500 और

3:34:26

108 रुद्राक्षों की माला बनाकर यज्ञपवित

3:34:29

के रूप में ये सब बातें लिखी हुई है। इनकी

3:34:32

बड़ी भारी महिमा है। अब एक बात और सुन लो

3:34:36

और सुन के याद कर लेना।

3:34:41

[संगीत]

3:34:48

यहां कई जगह लोग रुद्राक्ष पहनते हैं।

3:34:53

भस्म भी धारण करते हैं और प्याज लहसुन भी

3:34:57

खूब धड़ल्ले से खाते

3:35:02

हैं। और वारकरी लोग भी पीछे नहीं है। बड़े

3:35:06

वैष्णव है वारकरी। एकादशी व्रत भी करते

3:35:09

हैं। बड़ी निष्ठा से करते हैं। वारी

3:35:13

यात्रा में पंडरीनाथ जी का दर्शन करते

3:35:15

हैं। पर प्याज लहसुन नहीं छोड़

3:35:18

सकते। कान खोलकर सुन लो।

3:35:22

तुलसी धारण करने वाला या रुद्राक्ष धारण

3:35:25

करने वाला उसको जो वस्तु भगवान को भोग

3:35:28

नहीं लग सकती है। उस वस्तु को कभी भी आहार

3:35:32

के रूप में नहीं लेना चाहिए। क्या

3:35:34

पंडरीनाथ जी को प्याज लहसुन का भोग लगता

3:35:36

है? फिर आप क्यों खाते हैं?

3:35:43

अब साधुओं में और चल पड़ा

3:35:46

है। लिख लो

3:35:49

श्लोक शिव महापुराण के विदेश्वर संिता के

3:35:54

25 वे अध्याय का 43वा

3:35:59

श्लोक

3:36:01

मध्यम

3:36:02

मानसम तुलसम पंडुम

3:36:07

शव श्लेषंतकम विराम

3:36:11

भक्षण तथा व्यक्ति जब रुद्राक्ष धारण कर

3:36:15

ले तो खानपान में मदिरा और मांस का प्रयोग

3:36:18

ना करे लहसुन न ले प्याज ना खावे सहजन ना

3:36:23

खावे लसोड़ा ना खावे और विवराह नाम का एक

3:36:27

कंद होता है उसको भी ना खावे इतनी चीजों

3:36:30

को नहीं खाना चाहिए ब्रह्मचारी वानप्रस्थी

3:36:34

सन्यासी सबको धारण करना चाहिए बोलो

3:36:37

भक्तवत्सल भगवान की जय।

3:36:42

इस प्रकार से इसका वर्णन किया गया है।

3:36:46

रुद्राक्ष एक मुख से लेकर 14 मुख तक ही

3:36:51

होता है। इससे ज्यादा नहीं होता है। और

3:36:55

बहुत से लोग बड़े भोले होते हैं। एक सज्जन

3:36:57

हमको मिले नाम हम नहीं बताएंगे। बोले

3:37:00

हमारे पास 19 मुख वाला रुद्राक्ष

3:37:05

है। उसमें शिवलिंग बना है, त्रिशूल बना

3:37:09

है। हमको दिखा देखो इसमें गणेश जी बने

3:37:11

हैं। इसमें कार्तिकेय जी बने हैं। हमने

3:37:14

अपने मन में सोचा कि सब बने बनाए हैं। पर

3:37:16

इन विचारों ने लाखों रुपया खर्च किया है।

3:37:20

इनकी श्रद्धा को क्यों डिगाया जाए। इसलिए

3:37:23

हमने कहा वैसे होते तो नहीं है 14 से

3:37:27

ज्यादा लेकिन आप भाग्यशाली हैं। आपको मिल

3:37:30

गए तो पहरो कोई बात

3:37:33

नहीं। पर सुन लो 14 14 मुख से ज्यादा मिले

3:37:38

तो उसको नकली समझना। वो सब नकली बने हुए

3:37:42

हैं। आप जो चाहो सो बना के दे देंगे। इतना

3:37:44

बड़ा-बड़ा रुद्राक्ष दे देंगे उसमें।

3:37:47

शिवलिंग और शेष सब कितनी नकली बातें

3:37:53

हैं। एक मुखी रुद्राक्ष अत्यंत दुर्लभ है।

3:37:58

जो चपटा होता है काजू सेफ में वो एक मुखी

3:38:03

होने पर भी श्रेष्ठ नहीं माना जाता।

3:38:06

श्रेष्ठ एक मुखी वही माना जाता है जो एकदम

3:38:09

गोल हो। हमने पशुपतिनाथ जी के यहां दर्शन

3:38:13

किया। शुद्ध एक मुखी रुद्राक्ष का हजारों

3:38:17

लाखों वर्ष प्राचीन रुद्राक्ष का हमने

3:38:19

दर्शन

3:38:20

किया। हमने जो धारण कर रखा है गौरी शंकर

3:38:24

और 14 एक मुख से 14 मुख के रुद्राक्ष यह

3:38:29

भगवान श्री पशुपतिनाथ जी के ही श्री अंग

3:38:32

का प्रसाद है। वही का प्रसाद हमको भगवान

3:38:35

ने कृपा करके दिया

3:38:37

है। तो महाराज जी इसमें लिखा है एक मुखी

3:38:41

रुद्राक्ष का दर्शन करने से भक्ति मुक्ति

3:38:44

दोनों प्राप्त हो जाती है। एक मुखी

3:38:47

रुद्राक्ष के दर्शन मात्र से ब्रह्म हत्या

3:38:50

का पाप नष्ट हो जाता है। एक वक्त शिव

3:38:53

साक्षात भक्ति मुक्ति फल प्रदा तस दर्शन

3:38:56

मात्रे ब्रह्म हत्या विपति ब्रह्म हत्या

3:38:59

नष्ट हो जाती है। कहते हैं जो एक मुखी

3:39:02

रुद्राक्ष का पूजन करता है उससे लक्ष्मी

3:39:05

जी कभी दूर नहीं होती है। वहां कोई उपद्रव

3:39:08

नहीं होते हैं। उसकी सारी कामनाएं पूरी हो

3:39:11

जाती है और दुकानों पर लिखा रहता है यहां

3:39:15

एक मुखी रुद्राक्ष मिलता है और उनकी

3:39:18

विचारों की दुकान ही नहीं चलती है। कर्ज

3:39:20

में डूबे रहते तो भैया कहां से तुम्हारे

3:39:23

पास एक मुखी आ गया वो सब सब चीजें चलती

3:39:27

है। जो दो मुख वाला रुद्राक्ष है वो देव

3:39:31

देवेश्वर का स्वरूप है। उससे गोवध के पाप

3:39:34

का नाश हो जाता है। तीन मुख वाला

3:39:36

रुद्राक्ष संपूर्ण विद्याओं को देने वाला

3:39:40

है। और

3:39:43

चार मुख वाला रुद्राक्ष ब्रह्मा जी का

3:39:45

स्वरूप माना गया है। ब्रह्म हत्या के पाप

3:39:48

से मुक्ति देने वाला है। धर्म अर्थ काम

3:39:51

मोक्ष चारों पुरुषार्थों को देने वाला है।

3:39:54

पांच मुख वाला रुद्राक्ष अधिक संख्या में

3:39:56

प्राप्त होता है। यह कालाग्न रुद्र का

3:39:59

स्वरूप है। यह पांच मुख वाला रुद्राक्ष भी

3:40:02

संपूर्ण पापों से मुक्ति देता है। अगम्या

3:40:05

गमन का पाप किसी को लगा हो वह भी उससे दूर

3:40:08

हो जाता

3:40:10

है। छह मुख वाला रुद्राक्ष कार्तिकेय जी

3:40:13

का स्वरूप है। उसको यदि दाहिनी भुजा में

3:40:16

धारण किया जाए तो ब्रह्म हत्या जैसे पाप

3:40:18

नष्ट हो जाते। इसमें संदेह नहीं है। सात

3:40:21

मुख वाला रुद्राक्ष साक्षात अनंग अर्थात

3:40:24

कामदेव का स्वरूप होता है। उसको धारण करने

3:40:28

वाला दरिद्र व्यक्ति भी ऐश्वर्यशाली हो

3:40:30

जाता है। आठ मुख वाला रुद्राक्ष

3:40:33

अष्टमूर्ति भैरव का स्वरूप होता है। भैरव

3:40:35

जी के आठ रूप है। वो मनुष्य अष्ट मुख

3:40:40

रुद्राक्ष जो धारण करता है वह पूर्णायु

3:40:42

होता है। वो 100 साल से पहले मरता नहीं

3:40:45

है। और मरने के बाद त्रिशूल धारी शिव रूप

3:40:48

हो जाता है। नौ मुख वाला रुद्राक्ष भैरव

3:40:51

और कपिल देव भगवान का प्रतीक माना गया है।

3:40:55

अथवा नव दुर्गा का स्वरूप माना गया है।

3:40:59

इसलिए भैरव नवत्र कपिलस मुनिता दुर्गावा

3:41:04

तष्ठावा

3:41:06

नवूपाेश्वरी एक नाथ संप्रदाय के महात्मा

3:41:09

ने हमको नौ मुख वाले रुद्राक्ष की भी पूरी

3:41:13

माला दी। बोले भगवती दुर्गा का स्वरूप है।

3:41:16

ऐसे ही संत लोग दे देते हैं। इस तरह से

3:41:19

बड़ी महिमा है। द मुख वाला जो रुद्राक्ष

3:41:22

है वह साक्षात भगवान नारायण का स्वरूप है।

3:41:26

उस द मुख वाले विष्णु रूप रुद्राक्ष को

3:41:29

धारण करता है। उसकी संपूर्ण कामनाएं पूरी

3:41:31

हो जाती है। 11 मुख वाला रुद्राक्ष वो

3:41:35

एकादश रुद्र का प्रतीक है। उसको धारण करने

3:41:38

वाला कभी पराजित नहीं होता है। 12 मुख

3:41:41

वाला जो रुद्राक्ष है उसको जो केशव प्रदेश

3:41:44

में धारण करता है। मानो उसने द्वादश

3:41:47

सूर्यों को अपने मस्तक पर विराजमान कर

3:41:50

लिया। 13 मुख वाला रुद्राक्ष संपूर्ण

3:41:53

देवताओं का प्रतीक है। विश्व देवों का

3:41:55

प्रतीक है। उसको धारण करने वाला मनुष्य

3:41:59

संपूर्ण अभीष्ट को प्राप्त करता है। 14

3:42:02

मुख वाला रुद्राक्ष साक्षात भगवान सदा शिव

3:42:05

का स्वरूप है। जो उसको मस्तक पर धारण करता

3:42:08

है उसके संपूर्ण पापों का नाश हो जाता है।

3:42:11

इस तरह से एक मुख से लेकर 14 मुख तक कहा

3:42:15

गया। उसमें एक मुख भी दुर्लभ है। 14 मुख

3:42:18

भी दुर्लभ है। भगवान की कृपा से ही सुलभ

3:42:21

होते हैं। इनको मंत्रों से धारण करना

3:42:23

चाहिए। क्रमश मंत्र है। एक मुखी रुद्राक्ष

3:42:27

को ओम हंग नमः दो मुखी को ओम नमः तीन मुख

3:42:32

वाले को ओम कम नमः चार मुख वाले को हंग

3:42:35

नमः पांच मुख वाले को ओम हंग नमः ओम छे

3:42:39

मुख वाले को ओम ह्री हु नमः सात मुख वाले

3:42:42

को ओम हु नमः और आठ मुख वाले को ओम हु नमः

3:42:46

ओम ह्री हु नमः ये नौ मुख वाले को ओम हंग

3:42:50

नमः ये द मुख वाले को ओम ह्री हु नमः ये

3:42:54

11 मुख वाले को ओम क्र शंग रंग नमः ये 12

3:42:58

मुख वाले को और ओम ह्री नमः 13 मुख वाले

3:43:02

को और ओम नमः ये 14 मुख वाले रुद्राक्ष को

3:43:07

धारण करने का मंत्र है।

3:43:11

यहां विदेश्वर संगीिता संपन्न होती है और

3:43:15

कल से जो है रुद्र संगीिता का सृष्टिंड

3:43:20

आरंभ होगा। वो आप लोग भगवत कृपा से कल

3:43:23

सुनेंगे।

3:43:26

चार चार हो रहे हैं। यही कथा का

3:43:28

[संगीत]

3:43:30

विराम। एक पद विनय पत्रिका का रोज पढ़ते

3:43:34

हैं। तो वह शिव जी का एक पद उसको पढ़ लेते

3:43:38

हैं और इसके बाद फिर आप लोग आरती करेंगे।

3:43:43

[प्रशंसा]

3:43:45

[संगीत]

3:43:49

यद्यपि यह जो विदेश्वर खंड है और यह खंड

3:43:53

है जिनमें सिद्धांत का अधिक वर्णन है इनको

3:43:57

कथा कहने वाले लोग कम कहते हैं और कथानक

3:44:00

वाला भाग अधिक कहते हैं पर मेरा विचार यह

3:44:04

है कि कथानक वाला भाग तो सबके ज्ञान में

3:44:06

प्राय है पर जिसमें महात्म का वर्णन है

3:44:10

सिद्धांत का वर्णन है उसका विशेष रूप में

3:44:14

वर्णन होना चाहिए

3:44:16

इस दृष्टि से हमने इसका स्मरण किया।

3:44:20

[संगीत]

3:44:32

बावररो

3:44:37

रावरो ना

3:44:41

भवा

3:44:43

बावरो

3:44:46

राो ना भवा

3:44:52

बावररो

3:44:56

रावररो ना भवा

3:44:59

[संगीत]

3:45:08

[संगीत]

3:45:10

नाम दानी

3:45:13

बढ़ो

3:45:16

दिन

3:45:18

दये

3:45:19

बिनु दानी बढ़ो

3:45:25

वेदु

3:45:26

[प्रशंसा]

3:45:28

[संगीत]

3:45:30

वेद

3:45:33

बढ़ाई

3:45:38

[संगीत]

3:45:39

भानी

3:45:43

[संगीत]

3:45:47

बढ़ाई बावररो रावररो

3:45:53

ना

3:45:56

भवा पावर रावा

3:46:06

[संगीत]

3:46:50

[प्रशंसा]

3:46:52

निज घर की

3:46:56

वर बात

3:47:01

बिलो निज घर की

3:47:06

वर बात बिलो

3:47:11

हो तुम

3:47:14

परम

3:47:19

[प्रशंसा]

3:47:21

सयानी

3:47:24

परम

3:47:29

सयानी शिव की

3:47:33

दै संपदा देखत

3:47:39

शिव की

3:47:45

[प्रशंसा]

3:47:47

[संगीत]

3:47:48

श्री

3:47:51

शारदा

3:47:56

सिहानी श्री

3:48:00

शारदा सिहानी

3:48:05

[संगीत]

3:48:07

3:48:10

राो नाम

3:48:12

[प्रशंसा]

3:48:13

[संगीत]

3:48:16

भवा

3:48:22

[संगीत]

3:48:32

रावा

3:48:34

आ आ

3:48:37

[संगीत]

3:48:53

[प्रशंसा]

3:48:54

[संगीत]

3:48:55

[प्रशंसा]

3:48:57

[संगीत]

3:49:07

आ जिनके

3:49:09

[संगीत]

3:49:11

भाल लिखी लिपि मेरी

3:49:17

जिनके

3:49:20

भाल लिखी लिपि मेरी

3:49:24

[प्रशंसा]

3:49:24

[संगीत]

3:49:26

सुख

3:49:27

की नहीं

3:49:30

[संगीत]

3:49:34

निशानी सुख की

3:49:37

नहीं

3:49:43

निशानी तिन

3:49:46

रंकन

3:49:48

को नाक समारत

3:49:53

[संगीत]

3:49:55

निरंकन

3:49:57

को नाथ

3:49:59

[प्रशंसा]

3:50:02

सम हो

3:50:05

आयो

3:50:11

नकवाणी हो

3:50:14

आयो

3:50:20

नवा बावरो

3:50:24

राो ना

3:50:30

भवानीो

3:50:33

राो ना भवानी

3:50:39

[संगीत]

3:50:45

[संगीत]

3:50:52

[प्रशंसा]

3:50:56

[संगीत]

3:51:19

दुख

3:51:21

[संगीत]

3:51:23

दीनता दुखी

3:51:26

इनके

3:51:28

दुख दुख

3:51:32

दीनता दुखी

3:51:35

इनके दुख

3:51:37

[संगीत]

3:51:40

जाचकता

3:51:44

[संगीत]

3:51:46

अकुलानी

3:51:50

[संगीत]

3:51:55

जाचकता यह

3:51:58

[संगीत]

3:52:00

अधिकार

3:52:01

सौपिए और रहीम

3:52:05

[प्रशंसा]

3:52:06

[संगीत]

3:52:11

[प्रशंसा]

3:52:14

अधिकार भीख

3:52:17

भली मैं

3:52:23

जानी भीख

3:52:25

भली मैं

3:52:30

[संगीत]

3:52:32

जानी बावररो रावररो

3:52:37

ना

3:52:39

[प्रशंसा]

3:52:40

[संगीत]

3:52:44

भवानी नाम

3:52:47

[प्रशंसा]

3:52:48

[संगीत]

3:52:59

[संगीत]

3:53:08

[संगीत]

3:53:31

आ प्रेम

3:53:34

[संगीत]

3:53:36

प्रशंसा विनय

3:53:41

व्यंगत प्रेम प्रेम

3:53:43

प्रसंग साय

3:53:48

[संगीत]

3:53:51

सुनी विधि

3:53:53

की बरबानी

3:54:00

सुनी विधि

3:54:02

की बरबानी

3:54:09

तुलसी मुदित

3:54:13

महेश मन ही मन

3:54:18

तुलसी

3:54:21

[प्रशंसा]

3:54:27

जगत मा तू

3:54:35

मुस्कानी जगत मा तू मुस्कानी

3:54:42

[संगीत]

3:54:45

बावररो

3:54:48

राो ना

3:54:52

भवानी बावररो

3:54:56

राो ना भवानी

3:55:00

बावररो रामरो नाम भवानी बावररो रामरो नाम

3:55:07

भवानी जय जय राम कृष्णा हरे हरि जय जय राम

3:55:11

कृष्ण हरि जय जय राम कृष्ण हरि जय जय राम

3:55:15

कृष्ण हरे जय जय राम कृष्ण हरि जय जय राम

3:55:19

कृष्ण हरे जय जय राम कृष्ण हरे जय जय राम

3:55:23

कृष्ण हरे जय जय राम कृष्ण हरे जय जय राम

3:55:27

कृष्ण हरे जय जय राम कृष्ण हरे जय जय राम

3:55:31

कृष्ण हरे राम कृष्ण हरे जय जय राम कृष्ण

3:55:36

हरे राम कृष्ण हरे जय जय राम

3:55:40

जय जय राम कृष्ण हरि जय जय राम जय जय राम

3:55:45

कृष्ण हरि जय जय राम कृष्ण

3:55:48

हरे हर हर हर

3:55:53

[प्रशंसा]

3:55:56

महादेव पूज्य गुरु जी के चरणों में

3:55:59

कोटि-कोटि नमन आज

3:56:02

हमने आपके मुखारविंद

3:56:05

से गुरु निष्ठा

3:56:09

सुनी

3:56:10

है। यह अनुभूति हमारे जीवन में आ जाए। यही

3:56:14

कृपा कीजिए।

3:56:17

आजचा या पुण्य पावन पर्व कालावर आरती

3:56:21

करिता उपस्थित डॉक्टर

3:56:24

विूपाक्ष

3:56:26

शिवाचार्य मनमत धाम मांजरसभा

3:56:30

डॉक्टर शिवंद शिवाचार्य महाराज मठ संस्थान

3:56:33

तंगलूर

3:56:36

योगी बापू उखड़ाई संस्थान

3:56:40

य आरतीला उपस्थिति लाली है त प्रमाण

3:56:46

आदरणीय प्रताप राव पाटिल चिकलीकर

3:56:50

साहब यानी आरती ला

3:56:53

है यह दास आपसे बड़ी विनम्र भाव

3:56:57

से प्रार्थना करता है कि

3:57:01

आज जागतिक महिला दिन है और इस जागतिक

3:57:06

महिला दिन के पावन अवसर

3:57:08

पर हदगांव तालुका की माननीय तहसीलदार

3:57:15

यहां पर उपस्थित

3:57:18

है आदरणीय सुरेखा जी नांदे सुरेखा जी

3:57:22

नांदे यनी आरती करिता व्यास पीठावर याव ही

3:57:26

विनती कृपया विनम्र भाव विनती

3:57:36

हेलो

3:57:37

कृपया व्यासपीठ और गर्दी को त्रास हरि ओम

3:57:41

चंद्र वानस

3:57:49

[संगीत]

3:57:53

ओम

3:57:54

नम्ला

3:57:57

नमः

3:58:05

चंद्रमा जय शिव

3:58:08

ओमकार भोले भज शिव ओम

3:58:13

ब्रह्मा विष्णु सदाशिव भोले भोलेनाथ

3:58:19

महाशिव चरणा की धारा ओम जय शिव हर

3:58:27

महादेव एक कान

3:58:30

चतुरन

3:58:31

पंचानन राजे भोले

3:58:35

पंचानन

3:58:36

राजे

3:58:38

हंसासन गरुड़ासन

3:58:41

अनुशासन

3:58:43

करुणा वाहन

3:58:46

साम जय हर हर

3:58:50

महादेव दो भुज चार चतुरभुज

3:58:55

दसभुज सोहे बोले दस भुज सोहे

3:59:02

तीनो रूप निरखता प्रभु जी का रूप निरखता

3:59:08

त्रिभुवन जल

3:59:10

हरि ओम जय शिव हर

3:59:14

महादेव

3:59:16

अक्षमाला

3:59:18

वनमाला रुंद माला

3:59:21

धारी माला

3:59:24

धारी चंदन मृग मन सोहे चंदन मृगमन

3:59:31

सोहे त्रिपुरारी

3:59:34

ओम जय हर हर महादेव

3:59:40

सीतांबर

3:59:41

पीतांबर

3:59:43

बागांबर अंगे भोले

3:59:46

बागांबर

3:59:48

अंगे

3:59:49

सनकादिक

3:59:51

ब्रह्मादिक

3:59:52

सनकादिक

3:59:54

[संगीत]

3:59:56

ब्रह्मादिक

3:59:57

संगे जय हर हर

4:00:01

महादेव करके मध्य कमंडल चक्र त्रिशूलता

4:00:08

बोले चक्र त्रिशूल

4:00:11

धर्ता जग हर्ता जग भर्ता जग करता जग हर्ता

4:00:18

जग पालन करता ओम जय हर हर

4:00:24

महादेव ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत

4:00:30

अभिव बोले जानत

4:00:34

अभिव प्रणय अक्षर

4:00:38

[संगीत]

4:00:41

से तीनों

4:00:44

ओम जय हर हर

4:00:48

महादेव त्रिगुण स्वामी जी की आरती जो कोई

4:00:53

नर गावे भोले प्रेम सहित

4:00:58

गावे कहत शिवांद स्वामी भजत हरे हर स्वामी

4:01:05

मन वांछित फल

4:01:08

ओम जय हर हर

4:01:11

ओम जय शिव ओम बोले

4:01:15

हारा ब्रह्मा विष्णु सदा शिव भोले भोलेनाथ

4:01:20

महादे

4:01:24

ओम जय हर हर महादेव ओम जय हर हर महादेव ओम

4:01:29

जय हर हर

4:01:34

ओम जय हो शांति अंतरिक्ष शांति पृथ्वी

4:01:37

शांति रा शांति रोगदया शांति वनस्पतया

4:01:40

शांति देवा शांति ब्रह्मा शांति सर्वगम

4:01:44

शांति शांति रे शांति सामा शधि अंजल

4:01:48

पुष्पदाय

4:01:50

ओम जगने

4:01:54

ज्ञान धर्म

4:01:56

प्रथ हे

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