LIVE DAY 3|| श्री शिवपुराण कथा || श्री राजेंद्रदास जी महाराज || नांदेड़ ||#jadkhorgaudham
मेरे मन में
ऐसी आवे
मेरे मन
में
ऐसी
[संगीत]
आवे मरू
[संगीत]
जहर मरू
जहर
विशखा छाड़ी
गए
विश्वास
बात
करे छाड़ी
गए
विश्वास
करे नेह के
नाम चला
[प्रशंसा]
श्री राधे श्री राधे
[प्रशंसा]
नित
हो
गए जी
हरि गीत गए
[संगीत]
मीरा के
प्रभु कब
मिलोगे मीरा के
प्रभु कब
मिलोगे रहे
[प्रशंसा]
मधु पूज्य गुरुदेव आगमन रहे
मधु व्यासपीठा
है हो जी
हरि
गए
लगा हो जी
हरि हित
गए
लगा हो जी
हरि हित गए ने लगा
[संगीत]
[प्रशंसा]
ओम मंगलम भगवान विष्णु
मंगलमध मंगलम पुंडरीक्ष मंगलाय तनो हरि
ओम नमः शंभवाय मयो भवाय च नम शंकराय चराय
च नम शिवाय शिवराय च श्री शिव पुराण
पुरुषोत्तमाय
[संगीत]
नमः समर्पयामि श्री शिव शक्तिभ्याम नमः
उमा महेश्वराभ्याम
नमः असतम
जलम सिंधु पात्रे सुरतर शाखा लेखनी पत्र
मुरवी लिख
यही शारदा
सर्वकालम
तदना मी पारम नया सर कर श्री सदा शिवाय
नमः श्री महामृत्युंजय नमः श्री
बाबुलनाथाय
नमः रामाय रामभद्राय
रामचय वेद
रघुनाथा नाथाय सीताया पतए नमः श्री
सीतारामाभ्याम नमः श्री लक्ष्मी
नारायणभ्याम नमः व्यासय विष्णु रूपाय
व्यास रूपाय विष्णवे नमो व ब्रह्म निधए
वासाय नमो नमः नमस्ते भगवनभ्यास
सर्व शास्तिक कोविदा ब्रह्म विष्णु महेश
नाम मूर्ति
सत्यवती श्रीमन नारायण नमः श्री यज्ञ
नारायण
नमः गुरुवर तक्त राज धन बनम पद्म प्याम
प्रिया पास
साक्षमाभ्यामत पथ जो यो हर्रा
जाभ्या वो सुर प्या प्रिय विरष
रोपित विजभो
त्रस्ताब सेतु
खलदना
कौशलेंद्रो अतुलित बलधाम हेम
शलादेहम धनुजवन कृष्णानम ज्ञान नाम
अग्रग्यम सकल गुण निधानम
वानराधीशम रघुपति प्रिय भक्तम वात
जातम नमाम श्री राम भक्ताय नमः श्री अंजनी
नंदनाय नमः श्री जानकी वल्लभाय नमः श्रीमन
नारायणाय नमः श्री लक्ष्मी नारायणाय नमः
कृपया
कृपया विनम्र विनंती है आप बड़े
प्रपाल
भवापोत्तम वंदे महापुरुष ते
चरणारविंदम वंदे महापुरुष ते
चरणारविंदम रत्नेश्वरी नमः ज्वाला मालिन
नमः
चला
चला कृपया विनती है अपन व्यास खाली कराव
आरती
ओम
प्रजनन सर्व आत्मस
प्रजास भयस अग्नि प्रजा बहुम
करतो असत
ओम चंद्रमा मन
सूरज श्व
शांति राहा शांति रोगया शांति वनस्पतया
शांति देवा शांति ब्रह्म शांति सर्वगम
शांति शांति रे शांति श्यामा शांति रेधि
ओम जगने जगज देवा धर्म
प्रथना महिमान सत्र पूर्ववे साध्या
शवा नाना सुगंध पुष्पण यथा कालो भवा
[संगीत]
पुष्पांजलयात गड़ शिव शंकर गड़
परमेश्वर बोलिए श्री वृंदावन बिहारी लाल
की जय श्री राधा गोविंद भगवान की जय श्री
शिव पुराण कथा महोत्सव की जय श्री
विट्ठलेश्वर महादेव की जय श्री दत्तात्रेय
भगवान की जय श्री अनुसू
माता की जय श्री मलुक बिहारणी बिहारी जी
महाराज की जय श्री खाशक बिहारणी बिहारी जी
महाराज की जय यज्ञेश्वरी जगत जननी श्री गौ
माता की जय पूज्य पूज्य सदगुरुदेव श्री
भक्तमाली जी महाराज की जय पूज्य सदगुरुदेव
श्री पहाड़ी बाबा जी महाराज की जय पूज्य
सदगुरुदेव श्रीमद् जगत गुरु श्री श्री
मलुक पीठाधीश्वर जी महाराज की जय श्री
मलूक पीठ की जय श्री रेवासा धाम की जय सभी
भक्तों से मेरा विनम्र निवेदन है कि बड़े
भाव और श्रद्धा के साथ दोनों हाथ उठाकर के
तीन बार बोलेंगे महादेव
महादेव महादेव
महादेव महादेव
नमः पार्वती पतय हर हर
महादेव जय जय श्री राधे श्याम जय जय श्री
सीताराम पूज्य गुरुदेव के चरणों में इस
दास का कोटि कोटि
प्रणाम आपकी जीवनी के बारे में हम कितना
ही बता सकते
हैं नहीं स्वा स्वात्म
रामम विषय मृग
तृष्णा
भ्रमयति आपकी वाणी के द्वारा
यहां अमृत वर्षा हो रही
है। दो दिन के
बाद समाज का आंतरिक परिवर्तन होने जा रहा
है। अनंत जन्म जन्मांतर की पुण्य से हमें
श्री गुरु बाल योगी वेंकट स्वामी महाराज
मिल गए।
और उनके दर्शन का लाभ आप साक्षात शिव
स्वरूप आज हमें प्राप्त हुए
हैं। इस कथा
में नंदी्राम नांदेड़ स्थित गुरु गोविंद
साहिब दरबार
से महानुभाव यहां पधारे हुए हैं।
हम आपसे विनती करते
हैं सचखंड गुरुद्वारा बोर्ड द्वारा संत
सिंह और ज्ञानी सिंह महाराज जी ज्ञानी
तनवीर सिंह महाराज जी दर्शन सिंह महाराज
जी यहां आए
हैं। पूज्य गुरुदेव का दर्शन के अभिलाषी
है। आपसे विनती
है आप ग्रंथ का और पूज्य गुरुदेव का
स्वागत करिए
ताली
बाजवा इनका होगा इनका
होगा और बाद में श्री गुरु जी के
मुखारविंद
से शिव कथा आरंभ होगी बड़ी विनम्र भाव से
इस यह दास आपसे विनती करती है
आप यह समाज को आशीर्वचन दीजिए।
नित्यम महेश रजत निगम चारु
चंद्राम रत्ना
कल्पोम प्रसम
पद्मा व्या
[संगीत]
विश्व
विश्वमिक
पंच
ब्रह्मानंदम परम सुखदम केवल ज्ञान
[संगीत]
मूर्तिमक्षा लक्ष एक नित्य विमल वचन
सर्वदे साक्षी
[संगीत]
भावम त्रिगुणम श्री सगुरु तम नम श्री
सदगुरु
तम
सगुरु नम
पार्वती हर हर महादेव
श्री महाराज जी राजेंद्र महाराज जी को
हमारा नमन और कथा मंच पर विराजित सभी
संतों को यथा योग हमारा नमन साधुवाद और आप
सभी जितने प्रेमी बैठे हैं सबको भगवान
गुरुवाज की दया से दादा जी धनी वालों की
कृपा से आप सब और भगवान भोलेनाथ की जो कथा
सुन रहे
हैं कल भी हम कथा में बैठे हुए प्रसंग
हमें वही याद आ रहा था कि हमारे धनी वाले
दादा जी बड़े दादा जी श्री केशवानंद जी
महाराज ने गौरी शंकर महाराज
को शिव रूप में दर्शन दिए।
और यहां पर शिव पुराण की कथा हो रही
है। गौरी शंकर
[संगीत]
महाराज उत्तर भारत के थे। काबुल कंधार के
रहने वाले और संत बने थे। उनके मन में
शुरू से यही भाव था कि जब
भी मुझे भगवान भोलेनाथ का साक्षात्कार हो,
भौतिक रूप में भोलेनाथ के दर्शन हो।
इसीलिए वह संत बने
थे। उसी
परंपरा में वह उज्जैन पधारे और वहां पर
उन्होंने दत्त अखाड़े में
अपना सन्यास धारण किया। उसके
बाद उनको मन में ऐसी आवाज आई बद्रीनाथ
दर्शन के वहां के नर्मदा के अंकर सभी शंकर
काफी जगह वो गए लेकिन उनको भोलेनाथ का
साक्षात्कार जब नहीं हुआ तो नर्मदा जी की
परिक्रमा के लिए निकले। रमदास जी की
परिक्रमा भी लगाते लगाते 12 परिक्रमा जब
उनकी हो गई नमदास जी की परिक्रमा आप सब
जानते ही हैं तीन साल तीन महीने 13 दिन
में होती है तो जब नमदास जी की परिक्रमा
12 परिक्रमा होने के बाद भी जब उनका मनोरथ
पूरा नहीं हुआ मतलब भोलेनाथ के दर्शन नहीं
हुए तो उन्होंने यह सोचा कि अब अपना शरीर
पूरा कर देना चाहिए रोज सुबह 4:00 बजे
उठकर नवदा जी के स्नान करके वापस अपनी
जमात में आके अपना संध्या पूजन करके फिर
आगे जमात रात को चलाते थे। उस दिन वह रात
को 3:00 बजे जल्दी चले गए और अपना मनोरथ
किसी को नहीं बोला। लेकिन उनके मन में यही
था कि आज हम स्नान करने जाएंगे और वहीं
अपना शरीर जो है डूब के पूरा कर देंगे। जब
नबदा जी किनारे गए और किनारे जाकर नदा जी
में चल रहे थे तो चलते चलते पानी बढ़ता
गया लेकिन उनको कोई उनके ऊपर पानी नहीं
आया।
फिर उन्होंने कहा कि भाई रामदा जी में
बैठने लगे कि बैठ के डूब जाओ तो एकदम एक
छोटी सी कन्या तीन साल तीन चार साल की
कन्या ने उनके एकदम उनकी उंगली खींची और
उंगली खींच के उसने बोला क्यों
डूब के मरना चाहता है आत्महत्या करना
चाहता है तो उसने कहा उन्होंने कहा कि
इसको कैसे पता मैं तो किसी को बताया नहीं
कि मुझे हृदय में डूब के अपना शरीर पूरा
करना
तो बोले तुम
कौन? तो कन्या बोली मैं नर्मदा हूं। मुझे
सब पता है तू डूब के मरना चाहता
है। फिर उन्होंने कहा कि तुम कौन? तो बोले
मैं नर्मदा माई हूं। तो बोले मैं नहीं
मानता। ऐसा कह के उन्होंने हाथ छुड़ाया।
छुड़ा के फिर आगे बढ़ने लगे। तो फिर उसके
बाद माई ने उनको पूरा हाथ पूरे हाथ से
उनको जोर से पूरे बड़े हाथ से उनको जैसे
ही पकड़ा तो माई का पूरा रूप बंद नहीं
करना। तो उन्होंने कहा कौन है? बोले मैं
नर्मदा हूं। तो बोले पूरे रूप में दर्शन
दिखाओ जब हम मानेंगे। तो नर्मदा माई ने
पूरा अपना चतुर्भुज रूप में उनको दर्शन
दिए। माई को प्रणाम किया और प्रणाम करके
माई ने बोला कि देखो तुम्हारी जमात में
बहुत दिन से तुम्हारी जो परिक्रमा हो रही
है उसी के अंदर जमात के
अंदर प्रसन्न होकर भोलेनाथ स्वयं जो हैं
तुम्हारे भंडार में जो केशव नाम के हैं
किशोरा अवस्था के वो बर्तन मांगते हैं
भंडार बनाते हैं। वही भोलेनाथ हैं। उनको
एकदम आश्चर्य हुआ कि भाई भंडार बनाने वाला
कैसे भोलेनाथ हो सकते हैं। यह उनके मन में
तर्क वितर्क हुआ तो माई ने कहा जाकर देख
ले तो बोले नहीं हुआ तो बोले मुझे याद
करना मैं आ जाऊंगी अब वापस आए अब मरने का
तो सब छोड़ा वापस अपने डेरे में जब जमात
में आए आने के बाद उन्होंने जब
देखा तो केशव जी जो है बर्तन एक बड़ा
तपेला था सुबह ही भंडार के लिए हलवा बनाने
के लिए तपेला मांझ रहे थे तो उनके आते-आते
मन में यही आया कि भाई वो चमत्कारी तो हो
सकते हैं क्योंकि अकेले 100 डे0 संतों का
भोजन बना देते हैं। हलवा बना देते हैं। एक
बार
जल घी कम हो गया था तो घी कम होने से
उन्होंने नमदास जी का जल मंगा के उसमें
पूरी बनाकर सबको खिला दी थी। वो प्रसंग भी
उनको याद आया। उन्होंने कहा ठीक है भाई ये
सब बातें चमत्कारी हो सकते हैं। लेकिन
भगवान शिव कैसे हो सकते हैं? यह बात उनके
मन में विश्वास नहीं हो रहा था। तो जैसे
ही और वह पास में गए तो तपेला माजते
उन्हें छोड़ के ऐसे देखा जब ऐसे देखा तो
उनका मुंह जो है वह भोलेनाथ वाला दर्शन
हुए उनको शिव जी के दर्शन हुए और बाकी
शरीर वैसे ही लगा फिर उन्होंने अपनी आंख
को मसला कि मैं भाई कोई भ्रमित हो रहा हूं
सपना देख रहा हूं क्या बात है गौरी शंकर
महाराज ने फिर जब ध्यान से अपनी आंख को
मला
देखा फिर उनको इतनी देर में जो केशव जी थे
दादा जी धोनी वाले वो जो बाल बाल रूप में
किशोरा अवस्था में थे वह पद्मासन पे बैठ
गए। फिर पद्मासन पर बैठ के इतने में
नर्दाई आ गए। बोले अच्छा अब भी विश्वास
नहीं हो रहा है। छू के देख ले। फिर
उन्होंने उनको साष्टांग प्रणाम किया। चरण
छुए। उनको पूरा साक्षात्कार हुआ। उनसे
भोलेनाथ से उनकी बात हुई। पूरा उनको भगवान
भोलेनाथ ने शिव रूप में पूरा दर्शन देके।
फिर उसके बाद गौरी शंकर महाराज को जैसे ही
दर्शन हुए
फिर माई अलोपित हो गई, अदृश्य हो गई और
गौरी शंकर महाराज ने अच्छी तरह भगवान
भोलेनाथ के दर्शन किए और फिर उन्होंने यही
कहा भोलेनाथ ने दादा जी महाराज ने बोले
अच्छा अब तुमने हमें पहचान लिया है। हमने
तुम्हें पहचान लिया। अब तुम्हारा मनोरथ हो
गया। तुम अपनी जमात ले जाओ और यह बात जो
है कुछ 100 मील दूर जाकर आगे सबको बताना।
और हम तो जा रहे हैं। ऐसा कह के और जंगल
में दौड़ गए। जंगल में दौड़ने के बाद साईं
खेड़ा के पास की बात है। फिर कुछ टाइम बाद
साईं खेड़ा में ही दास जी महाराज प्रकट
हुए और वही बच्चों को डंडा मारना किसी को
का पत्थर
मारना और उसी से उनका जल कल्याण होता था।
तो भगवान भोलेनाथ ने इसी तरह से उनको
दर्शन देकर और बाद में दादा जी ने और
भक्तों का भी सबका किसी को डंडा मार के
कल्याण कर दे जिनका काम हो बोले हमारा यह
काम हो जाएगा डंडा मार देते उसका हो जाता
और कोई कोई आते डंडा खाने के लिए तो दादा
जी उनसे बोलते थे हमारा डंडा फालतू नहीं
है जी अपनी इच्छा हो तो मारते नहीं तो
नहीं मारते तो ऐसे धनि वाले दादा जी
महाराज जो हैं केशवानंद जी महाराज जी फिर
शिव रूप में ही उन्होंने औरों को भी कई को
दर्शन दिए और हम सब लोग जो हैं गुरु
महाराज की दया से धनी लाल दाया जी बड़े
दाया जी महाराज को शिव रूप में आराधते हैं
और उन्हीं की यहां पर शिव पुराण की कथा हो
रही यह प्रसंग हमें याद आया और आप में से
बहुत लोग यहां से इस एरिया से सब पैदल
निशान गुरु पूर्णिमा पे तो आप सभी भाइयों
जो हैं और जितने आप कथा सुन रहे हैं
सभी को महाराज जी जो कथा सुना रहे हैं कथा
का प्रसंग जो भी है लेकिन आपके मन में
भगवान के लिए भोलेनाथ के लिए खूब श्रद्धा
और विश्वास बढ़े और भगवान दया करें कि
आपके मन में भक्ति जो है वो उच्च रूप से
स्थाई हो यही हमारी इच्छा है और भगवान
गुरु महाराज दादा धन वालों की कृपा है बोल
री बेलिया हिमत वाणी हर हर हर
महादेव बोलो री बेलिया
हिमत हर हर हर
महादेव बोलो रे बेलिया हिमत हर हर हर हर
महादेव जय श्री दादा जी की जय
जय श्री राधा जी की जय श्री जय श्री राधा
जी की जय श्री पूज्य गुरुदेव के चरणों में
कोटि कोटि प्रणाम इस दिव्य समारोह
में हमारे वेंकट स्वामी महाराज जी का जो
प्रमुख अंग है वह है गुरु निष्ठा
और वह गुरु
निष्ठा ब्रह्मांड के सारे तत्वों को यहां
पर खींच कर ला रही है। यह हमारा परम
सौभाग्य है। नक्षत्र तारा मंडल सब प्रसन्न
है। इस उचित समय
पर गुरु गोविंद सिंह दरबार से नांदेड़ से
ज्ञानी तनवीर सिंह जी इनका आगमन हुआ
है। उनका आशीर्वचन
वह हमें दे रहे हैं। आपसे विनती है। आप
हमें आशीर्वचन देने का प्रयास
करें। श्री वाहेगुरु साहिब जी।
आदि गुरु नमः।
जुगाद गुरु
नम
सतगुरु
नमः श्री गुरु
देव
नमः
आज इस पावन पवित्र अवसर पर
उपस्थित सभी साधु महात्मा
त्माग संत
भगत और यहां के क्षेत्र के इस नगर के इस
इलाके
की अगर हमारी भाषा में कहा जाए तो साध
संगत जो साध
संगत बहुत
ही
दूर दुर्गम इलाकों से यहां पर आज इस
सत्संगत का लाभ लेने के लिए पहुंची है और
ऐसे महानुभाव ऐसे संत साधु जन जिनके आप
दर्शन कर रहे
हो यह बहुत ही
भागों वाली निशानी है। बहुत बड़ी बात
है।
अगर श्री गुरु ग्रंथ साहिब महाराज जी
के वचन जो
है वह हम अपना सके सुन सके
तो उसमें सदगुरु जी ने श्री गुरु नानक देव
साहिब महाराज जी ने दसों गुरुओं ने
सत्संगत की महिमा नाम की महिमा और साधु
संतों की महिमा का जिक्र किया
है। सच्चे पाशाह जी कहते
हैं अगर कोई
नगर जहां पर कभी सत्संगत नहीं
होती जहां पर कभी नाम नहीं जप्या जाता वो
नगर नगर नहीं होते वो क्षेत्र नहीं होते
वो उजाड़ होते हैं जिथे नाम जपिए प्रभु
प्यारे से अस्थन सोई न
चुबारे जिथे नाम ना जपिए मेरे
गोविंदा से नगर उजाड़े जियो।
आज गुरु साहब जी की बड़ी कृपा हुई है। इस
नांदेड़ की पावन पवित्र भूमि
में आज ऐसा सौभाग्य हमारे सब नांदेड़
वासियों को सारे इलाके के लोगों को
प्राप्त हुआ है कि आज ऐसे
महानुभाव जो केवल केवल परमेश्वर के नाम और
भक्ति और संकीर्तन और साधुओं की महिमा
द्वारा इस देश को
यहां के लोगों को हमें सबको शुभ मार्ग
प्रदान करने के लिए आए
है।
इसलिए हमें भी
यहां इस कथा के दौरान शिव पुराण के महाकथा
के
दौरान हमें जो
पूज्य सत्कार
योग द्वार जो हमारे यहां पर मौजूद है कथा
करने के लिए मुख्य
प्रवक्ता अग्र पीठाधीश्वर मलुक
पीठाधीश्वर संत श्री राजेंद्र दास जी और
जिनके द्वारा यह कार्यक्रम जो करवा करवाया
जा रहा है। हमारे इस क्षेत्र के बहुत ही
प्यारे बहुत ही निम्रता जिनके अंदर
निम्रता है। गुरुणी में संतों की व्याख्या
की गई है। जिन्ना सास गिरास ना विसरे हर
नामा मन मंत तन से से नानका पूर्ण सोई
संत। कहते संत कौन
है? संत वो है जो आप जपे अवरह नाम जपावे।
जो खुद भी परमेश्वर की भक्ति करता है और
दूसरों को भी परमेश्वर की भक्ति में
जोड़ता है उसे संत कहा गया।
आज गौ
वत्स परम
पूज्य वेंकट स्वामी जी महाराज बाल
योगी जिन्होंने यह इतना बड़ा कार्यक्रम
इतना बड़ा यह कथा
का जिन्होंने यहां पर यह हमारे सामने यह
दृश्य खड़ा किया है। वह बहुत ही भाग्यशाली
है और उन्हें बहुत-बहुत बधाइयां है।
जिन्होंने इस क्षेत्र के कल्याण के लिए कल
राजेंद्र दास महाराज जी कह रहे थे कि उनकी
इच्छा है कि इस क्षेत्र के जितने भी जीव
है जो हमारे सदृश्य है या जो हमारे सदृश्य
नहीं है उन सबका कल्याण हो उन सब की
मुक्ति हो इसे कहते हैं
साधु सतगुरु पाशाह जी ने
कहा संसार में आकर के जो परोपकार करते हैं
वही असल साधु है। वही असल संत है। आया सफल
ताहू को गनिए जास रसन हर हर जस बनिए आए
बसे साधु के संगे आज देखो हमारा भी जन्म
सफल है कि साधु का संग मिल गया आए बसे
साधु के संगे हर हर नाम धव रंगे और हृदय
में हम यहां बैठ के नाम जप रहे आवत सो जन
नाम में है राता संसार में आकर के जिसकी
नाम से भक्ति से प्रीति हो गई आवत सो जन
नाम है राता जाको दया मया नया विधाता जिन
पर विधाता परमेश्वर की कृपा है उनको यह
साधु संग और नाम प्राप्त होता है। फिर आगे
पाशाह जी कहते हैं एक आवन फिर जोन ना आया
नानक हर के दर्श समाया जो यहां पर संसार
में आकर के साधु का संग भक्ति सत्संग कर
लेता है फिर उसे जन्म मरण के गे में नहीं
आना पड़ता। इसलिए सबसे बड़ा जो परोपकार है
सतगुरु श्री गुरु गोविंद सिंह साहिब
महाराज उनकी पावन पवित्र नांदेड़ जो है वो
सतयुगी तपोस्थान की भूमि है महाराज जी
गुरु गोविंद सिंह साहिब महाराज जी ने यहां
पे सतयुग में दुष्ट दमन के रूप में बहुत
भारी तपस्या की और जब महाराज कलयुग के समय
में गुरु गोविंद सिंह साहब के अवतार में
यहां आए तो सिखों ने पूछा आपका यहां आने
का कारण क्या है तो महाराज ने गोदावरी के
तट
पर अपने कमान और हाथ में तीर लेकर के धनुष
लेकर के तीर चलाया और कहा जहां पर जाकर के
तीर लगेगा वो हमारे सतयुग का तपोस्थान
होवेगा तो जब महाराज जी ने गोदावरी के तट
पर से तीर चलाया वह तीर जहां पर जाके लगा
वह कहीं जो है मलेशों का स्थान था
तो उन्होंने कहा यह तो हमारा स्थान है। हम
कैसे मान ले कि आपका स्थान है। तो महाराज
जी ने कहा जब आप यहां पर जमीन जो है जब इस
धरती में आप खोदोगे तो आपको हमारे तप के
चिन्ह प्रकट हुए वह नजर आएंगे। तो जब जमीन
को वहां पर साध संगत जी खोदा गया तो वहां
पर तप के चिन्ह गुरु गोविंद सिंह जी के
प्रकट हो गए। मृगशाला कमंडल आसन और महाराज
जी ने उसी स्थान को जो है इस हजूर साहिब
नांदड़ के नाम से निवाज करके अब चल नगर
गोविंद गुरु का नाम जपत सुख पाया राम
महाराज जी ने कहा यहां जो नाम जपता है उसे
बहुत ज्यादा फल मिलता है। कारण ही हमारी
तपोभूमि है। यहां पर एक बार नाम जप्या गया
वह 100 गुना वध फल देता है और एक पाप
कमाया गया वह भी 100 गुना फल देता है। तो
इसलिए यह सिखों के लिए तो बहुत ही पावन
पवित्र धरती है। जहां पर दसवें गुरु
गोविंद सिंह साहिब जी ने श्री गुरु ग्रंथ
साहिब महाराज जी को गुरुता गद्दी भी इसी
स्थान पर प्रदान की। और जो महाराज जी का
आदि स्थान था। वहां पर ही सच्चे बादशाह
महाराज जी अंत में विलीन हो गए। और महाराज
जी सदे बैकुंठ गए। इसी स्थान से सच्चे
पाशाह महाराज जी सदे बैकुंठ सदे सचखंड जा
विराजे। जब दूसरे दिन अंगीठा खोल्या गया
तो वहां पर कोई चिन्ह कोई अस्त्र कोई फूल
नहीं वहां पर मिले। केवल केवल एक शस्त्र
प्राप्त होया। जिस शस्त्र के आज भी वहां
पर दर्शन करवाए जाते हैं। सो ऐसी यह पावन
पवित्र भूमि है। और यहां पर आज दूर दराडो
से जो साधु संत, कोई चित्रकूट, कोई
वृंदावन, कोई बद्रीनाथ, कोई बद्री विशाल
और महाराज जी प्रयागराज में भी दर्शन हुए
थे। यहां पर भी दूसरे बार सुग समा प्राप्त
होया। महाराज जी भी यहां पर पहुंचे हैं।
सो हमारे सबके लिए बहुत ही खुशी की बात
है। श्रीमान जठेदार संत बाबा कुलवंत सिंह
जी जो यहां के मुख्य जठेदार है उनके हम
सेवादार हैं। उनकी सेवा के वजह से
महापुरुष जो इतनी दूर आ नहीं सकते पर
उन्होंने वेंकट स्वामी जी बाल योगी जी और
पूज्य राजेंद्र दास जी महाराज जी को बहुत
साधुवाद और बहुत उनका सत्कार जो है भेजा
है। इसके लिए हम उनके तहे दिल से धन्यवादी
है। सतगुरु सच्चे पाशाह महाराज जी कृपा
करें हमारे सों के मन में नाम का रंग साध
का संग बना रहे इतनी सेवा आप प्रवाण करना
छोटा सा बालक हूं बोलते समय कोई भूलचक हो
जाए तो आप सब ने क्षमा करना यहां पर अपने
बच्चों को विराम देता हुए वाहे गुरु जी का
खासा वाहे गुरु जी की फते
धन्यवाद गुरुदेव नाम साधना के बारे में
थोड़ा सा परिचय बाल योगी वट स्वामी महाराज
जी का देता हूं। पूज्य गुरुदेव हमारे इस
पंचक्रोशी में जो 25 खेड़ा गांव है उस
गांव में श्रावण मास में एक महीना भर सभी
लोगों से अपने अपने मंदिर में नाम स्मरण
करवा लेते हैं और हर तीन साल बाद आने वाले
अधिक मास में 25ों गांव में रात दिन नाम
स्मरण चलता रहता है। सेवा आरंभ
हरि
[संगीत]
ओम
तत्सत
[संगीत]
श्रीमते
[संगीत]
रामचंद्राय नमः
[संगीत]
ओम
नमः परम
हंसा
स्वादित चरण कमल चिन
[संगीत]
मकरंदाय भक्त जन मानस निवासाय
[संगीत]
श्री
रामचंद्राय बागीशा
[संगीत]
यस
[संगीत]
बदने
लक्ष्मी यस चवक्षसी
[संगीत]
यस्यास्ते
हृदय
समित तम
नम विश्व सर्ग
विसर्ग नव लक्षण
[संगीत]
लक्षितम श्री कृष्णा
[संगीत]
कृष्णाम
परमधाम
[संगीत]
जगत प्रहलाद नारद पराशर
[संगीत]
पुंडरीक
[संगीत]
व्यासम्बी सुख सौक भीष्म दालभान
[संगीत]
रुकमादार वशिष्ठ
विभीषणादी
पुण्यमान परम
भागवता
[संगीत]
नमः
वांछा कल्प तरुभ्यस्त
[प्रशंसा]
कृपा
[संगीत]
सिंधुभ्यवच पत नाम
पावने
वैष्णवे नमो
नम श्री
सीतानाथ
[संगीत]
समारंभा श्री
रामंदा
[संगीत]
मध्यमा भक्त भक्ति भगवंत
गुरु चतुर नाम बुवे
एक इनके पद वंदन किए नाश विघ्न हरे
बंदो गुरु पद
कंज कृपा सिंधु नर रूप
हरि
महाम
कुंज जासु वचन
रवि कुंज इंदु
समदे उम रमण करुणायन
जाह दीन
परने करो
कृपा मर
श्री राम जय
राम जय जय
राम श्री राम जय
राम जय जय राम
श्री राम जय
राम जय जय राम
श्री राम जय
राम जय जय राम
श्री राम जय
राम जय जय राम
श्री राम राम जय
राम जय जय
राम श्री राम जय
राम जय जय राम
श्री
राम जय
राम जय जय राम
श्री राम जय राम
जय जय
राम श्री राम जय राम जय जय
[संगीत]
राम
सीताराम
जय
सीताराम
सीताराम
जय सीताराम
सीताराम
जय
सीताराम
सीताराम
जय
सीताराम राधे श्याम
जय राधे
श्याम राधे श्याम
राधे राधे
श्याम जय
रघुनंदन
जय
[संगीत]
सियाराम जय
रघुनंदन जय जय सियाराम
[प्रशंसा]
[संगीत]
जानकी
वल्लभ सीताराम
जानकी
वल्लभ
सीताराम कमला
[संगीत]
विमला मिथिला
धाम कमला
[प्रशंसा]
[संगीत]
विमला मिथिला
धाम अवध
सर
सीताराम
सीताराम जय जय
श्यामा
जय जय
श्यामा जय जय
श्यामा जय जय जय
श्याम जय जय श्री
वृंदावन
धा जय जय श्री
[प्रशंसा]
वृंदावन
धा जय गौ
माता जय गौ
माता जय जय गौ
माता, जय
गौ भक्त
वत्सल
प्रभु दीन
दयाल भक्त वत्सल
प्रभु दीन
[प्रशंसा]
दयाल
रक्षा करो
हे
गोपाल
रक्षा करो हे
गोपाल
घर
पले
गोपाल
घर
फले गोपाल
[प्रशंसा]
गाय सुखी
हो
नंदलाल गाय सुखी हो हे
नंदलाल जय गौ
माता जय गौ
माता जय गौ
गोपाल जय
गोपाल भक्त
वत्सल
प्रभु दीन
दयाल भक्त
व्सल
प्रभु दीन
दयाल
महादेव हर शंकर
[संगीत]
शंभू
महादेव हर
शंकर
[प्रशंसा]
शंभू
उमाकांत हर
त्रिपुर
उमाकांत हर
त्रिभुर मृत्युंजय
जय वृषभ ध्वज
[संगीत]
सूरनी
मृत्युंज
गंगाधर
ब्रज मदना
रे
गंगाधर ब्रज मदना
हर शिव
शंकर गौरी
शंकर हर शिव
शंकर गौरी
शं
वंदे
गंगाधर
मीम वंदे गंगा
[संगीत]
रुद्रम
पशुपति निशानम
रुद्रम
पशुपति
[संगीत]
निशानम कलय
काशी गुरुनाथम
[संगीत]
[प्रशंसा]
[संगीत]
श्री महादेव हर शंकर शंभू उमाकांत हर
त्रिपुर
[संगीत]
मृत्युंजय गंगाधर ब्रज
मदारी हर शिव शंकर
गौरी वंदे गंगाधर नीचे
रुद्र
पशुति
काशी
महादेव हर शंकर
शंभू
उमा हर
त्रिपुर
मृत्युंजय वृषभू
[संगीत]
गंगाधर
नंदना हर शिव शंकर
गौरीम वंदे गंगाधरम
रूदं
पशुपतिशारम
काशीम श्री राम जय
राम जय जय राम
श्री राम जय राम जय जय
राम श्री राम जय
राम जय जय
राम श्री राम जय राम जय जय राम
[प्रशंसा]
[संगीत]
श्री सीता रामचंद्र भगवान की जय जय श्री
राधा कृष्ण भगवान की जय श्री लक्ष्मी
नारायण भगवान की जय श्री गौरी शंकर भगवान
की जय श्री काशी विश्वनाथ भगवान की जय
श्री द्वादश ज्योतिर्लिंग भगवान की जय
श्री गोपीश्वर महादेव की जय श्री
कृष्णेश्वर महादेव की जय श्री नागेश्वर
महादेव की जय श्री त्रंबकेश्वर महादेव की
जय श्री भीम शंकर महादेव की जय श्री शिव
पुराण कथा महा महोत्सव की जय
श्री गुरु गोविंद सिंह देव जी महाराज की
जय
श्री नांदेड़ साहिब की जय श्री दत्त भगवान
की जय
श्री शिव पुराण कथा महा महोत्सव की जय
श्री जानकीनाथ भगवान की जय श्री चंद्र कला
अवतार परम रसिकाचार्य श्रीमद् स्वामी
अग्रदेवाचार्य भगवान की जय समस्त
रसिकाचार्य पूर्वाचार्य चरणन की जय श्री
स्वामी मलूक देवाचार्य जी महाराज की जय जय
श्री सदगुरुदेव भगवान की जय
सब संतन की जय जय जय श्री सीताराम
[संगीत]
जय जय श्री राधे श्याम हर हर महादेव
हरि
शरणम भक्त वांछा कल्प
तरु भक्त व्सल शरणागत
व्सल भगवान श्री उमा महेश्वर की महती कृपा
करुणा
से श्री दत्त भगवान की चरण सन्निधि
में भारतवर्ष के पूज्य
गण्यमान संतों की महापुरुषों की मंगलमय
उपस्थिति
में बाल योगी
गोवत्स श्री वेंकटेश स्वामी जी
के समायोजकत्व
में हम आप सबको मानव जीवन का सर्वोत्कृष्ट
फल
सत्संग श्री शिव महापुराण की मंगलमयी कथा
के माध्यम
से प्राप्त हो रहा
है। आज पूज्य छोटे सरकार जी ने धनी वाले
दादा जी का स्मरण
किया। जो साक्षात भगवान शिव का ही स्वरूप
के रूप में विराजमान
है। आपने पूरी परंपरा का स्मरण किया। श्री
बड़े दादा
जी श्री छोटे दादा जी हरिहर भोले भगवान
जी और तृतीय पीढ़ी के आचार्य के रूप में
श्री बड़े सरकार और आज उसी पवित्र परंपरा
के वर्तमान आचार्य श्री छोटे सरकार हम
लोगों के मध्य विराजमान है। आपकी अपूर्व
गुरु निष्ठा है। गुरु निष्ठा किसको कहते
हैं? किसी को सीखना हो, देखना हो तो खेड़ी
घाट जाकर दादा दरबार जाकर के स्वयं
प्रत्यक्ष दर्शन करना
चाहिए। ऐसे छोटे सरकार जी का आज मंगलमय
आशीर्वाद मिला। और अत्यंत प्रसन्नता का
विषय है कि
हमारे श्री
गुरुद्वारा गुरु गोविंद सिंह देव जी का
गुरुद्वारा श्री हजूर साहिब नांदेड़
गुरुद्वारा से पूज्य संत पधारे हैं। उनका
दर्शन करके मन बहुत प्रसन्न है और हम तो
पहले से ही यह निश्चय किए हुए थे कि जब भी
नांदेड़ की यात्रा होगी तो श्री
गुरुद्वारा साहब में जाकर मत्थ जरूर
टेकना
क्योंकि आज पूरे विश्व
में जो हिंदू वैदिक सनातन धर्म का
अस्तित्व बचा है और इस रूप में दिखाई पड़
रहा है। इसके मूल
में प्रथम बादशाह गुरु श्री नानक देव जी
महाराज से लेकर दशम गुरु श्री गुरु गोविंद
सिंह देव जी महाराज का अनुपम अविस्मरणीय
योगदान है। यह दसों गुरु ना होते तो आज
इतनी बड़ी संगत का दर्शन यहां ना होता।
हिंदू का नाम निशान धरती से मिट जाता।
कितना कष्ट सहा
है। कितना तप किया
है। हम अपने हृदय की श्रद्धा निवेदित कर
रहे हैं। इन सिख परंपरा के दसों गुरुओं को
हम सनातन धर्म का बहुत श्रेष्ठ आचार्य
स्वीकार करते हैं। और इन दसों गुरुओं के
चरणों में अत्यंत श्रद्धा भक्ति पूर्वक
साष्टांग प्रणाम निवेदित करते
हैं। श्री गुरु ग्रंथ
साहब गुरु
वाणी साक्षात गुरुओं का स्वरूप
है। भगवत स्वरूप माना
गया। अभी आप लोग शिव पुराण की कथा का
श्रवण कर रहे
थे तो आप लोगों ने
सुना यह शिव महापुराण जो ग्रंथ है यह कोई
पुस्तक ग्रंथ नहीं है। यह साक्षात भगवान
सदा शिव का वांगमय स्वरूप है। शब्दमय
स्वरूप है।
गुरु की जो वाणी
है वस्तुत वही उसका स्वरूप
है। हम लोगों के
शरीर किसी काल विशेष में उत्पन्न होते
हैं। और इन शरीरों की अवधि पूरी हो जाती
है तो फिर यह शरीर दिखाई नहीं पड़ते।
लेकिन आचार्यों की, महापुरुषों की, गुरुओं
की, संतों की वाणी इस धरती पर सदा
विराजमान रहती है। इसलिए गुरु वाणी ही
गुरु विग्रह है। यह सिद्धांत है और इस
सिद्धांत को साकार स्वरूप दिया है। मूर्त
स्वरूप दिया है। श्री गुरु गोविंद सिंह
देव जी महाराज ने। जिन्होंने संतों की
वाणी को ही गुरु के रूप में प्रतिष्ठित
किया।
अकाल तख्त पर विराजमान
किया और सभी संतों को एक स्थान पर
विराजमान कर दिया।
हमारे श्री रामानंद संप्रदाय के प्रवर्तक
आचार्य श्री कबीर साहिब के गुरुदेव श्री
रेदास महाराज के गुरुदेव श्री
रामानंदाचार्य जी महाराज की भी वाणी गुरु
ग्रंथ साहब में दो पद है एक पद दो
पद दो शब्द श्री रामानंदाचार्य भगवान के
गुरु ग्रंथ साहब
में श्री कबीर साहब के शब्द तो बहुत है
श्री रेदास जी के
श्री धन जी, श्री पीपा जी, श्री सेन
जी पांच रामानंदाचार्य की परंपरा के
महापुरुषों की वाणियां गुरु ग्रंथ साहब
में और हमारे लिए तो विशेष सौभाग्य की बात
इसलिए
है कि हमारे रेवासा धाम के आचार्य चरण
श्री स्वामी अग्रदेव आचार्य जी महाराज का
प्रथम गुरु श्री गुरु नानक देव साहब के
साथ बड़ा बड़ा घनिष्ठ प्रेम था। श्री
प्रथम गुरु महाराज रेवासा धाम पधारे और
वहां
विराजे और दशम गुरु श्री गुरु गोविंद सिंह
देव जी भी वहां
पधारे। इसलिए हमको तो जिस स्थान में झाड़ू
लगाने का अवसर मिल रहा है। वहां प्रथम
गुरु से दशम गुरुओं तक की वह पवित्र चरण
रज वहां बिछी हुई
है। अद्भुत है।
और वृंदावन
में जिस मलूक पीठ में
हमें सेवा करने का
सौभाग्य संतों ने प्रदान किया
है। वह श्री मलुक दास जी महाराज का भी
संबंध पंजाब की धरती
से अमृतसर क्षेत्र से ही उनके पूर्वज
प्रयाग के पास कड़ा गांव में आए थे।
और अपनी वाणी में मलूक दास जी ने गुरुओं
का बहुत श्रद्धा पूर्वक स्मरण किया और
उनकी गुरु वाणी में मलूक दास जी की वाणी
में पंजाबी शब्दों का बहुत प्रयोग है।
उर्दू, फारसी, पंजाबी इनका बहुत प्रयोग
है। उससे लगता है कि उनके घर
में पंजाबी ही बोली जाती होगी। जैसे
मारवाड़ी लोग कहीं दुनिया में चले जाए
जहां भी बस जाते वहां घर में मारवाड़ी
बोलते हैं। ऐसे लगता है कि भले ही उनके
पूर्वज आकर वहां बस गए हो लेकिन उनके घर
में पंजाबी बोली जाती होगी क्योंकि उनकी
वाणी में पंजाबी शब्द बहुत
है। कई पद तो ऐसे
हैं कि जिनमें एकदम
शुद्ध
पंजाबी जैसे हम एक उदाहरण दें
वे कह रहे
हैं माई इम नाची मना नंददा कान्हा खेलदा
ग्वाली दी गोद बिछे
तीहु महीने दा बोलदा चालदा त अहीरनी गल
पूछे छोहरा चंचल कुन हरी
चाटदा माखन शामनु बहुत रुचे दास मलूक ते
गुजराना ही नैन तनो जान
चुके अब इस पद को देखकर लगता है कि हिंदी
नहीं बिल्कुल पंजाबी
पंजाबी तो उनकी वाणी में इस प्रकार
से बहुत सुंदर सुंदर
भाव गुरु वाणी
में दया के ऊपर बहुत जोर दिया
गया। प्राणी मात्र पर दया
करो। सब में एक आत्मा का दर्शन करो। इस
बात पर बहुत जोर दिया गया और उसका प्रभाव
भी श्री मलुक दास जी की वाणी पर दिखाई
पड़ता
है। वे कहते हैं
यही घट
दया तहां प्रभु
[प्रशंसा]
आय घट
दया कहां प्रभु आ
अपना सा
दुख सबका जाने
अपना सा
दुख सबका जाने
[संगीत]
ताके निकट ना आवे
ताके निकट ना आवे
जे घट
दया कहां प्रभु
आय घट
दया प्रभु आ
[संगीत]
तीरथ
जाए करे जो कोई
[संगीत]
तीरथ
जाए करे जो
कोई बिना दया
सब निष्फल
हो बिना
दया
सब निष्फल
होय में दया नहीं है तो सारे धरती में
गोता सारे धरती के तीर्थों में गोता लगा
के आओ आप पवित्र नहीं
होगे प्राणी मात्र के प्रति दया का भाव तो
होना ही
चाहिए चाहे जितने पोची पत्रा पढ़ लो दया
नहीं है तो तुम्हारा ज्ञान तुम्हारा
कल्याण नहीं
करेगा पंडित
पोथी पढ़े
पचास पंडित मृत
[संगीत]
बोस विनु
दया
सब होई
निरासु
दया
सब
हो कहता है गाय मत मारो
मुसलमान कहता हमारे धर्म में तो है हम तो
मारेंगे पर हिंदू भी कई बार देवी देवताओं
के नाम पर बकरा भेड़ा काटता
है संत तो निष्पक्ष भाव से मानव जाति के
कल्याण की बात
बोलते वो कहते यदि गाय काटने वाला नरक
जाएगा तो बकरे काटने वाला भी स्वर्ग नहीं
जाएगा।
इसलिए ना गाय का वध करो ना बकरा बकरी का
वध करो किसी प्राणी की हत्या मत
करो जैसी
बकरी तैसी
[संगीत]
गा
इनके कुहे
[संगीत]
नरक को
[प्रशंसा]
जाए
[प्रशंसा]
इनके नरक को
[प्रशंसा]
जा बांधी
बांधी मुख
खून
[संगीत]
कराई बांधी
बांधी मुख खून कराई
भाड़
पड़ो
ऐसी पंडिताई
भाड़
पड़ो
ऐसी पंडिताई
जीवत
जीव अग्नि में परे
देव
[प्रशंसा]
अग
ऐसा
जग
कसाई
करे
ऐसा
जग
कसाई
करे जे घट
दया कहां
[संगीत]
प्रभु
दया
[संगीत]
[प्रशंसा]
प्रभु संत वाणी गुरु वाणी बिल्कुल एक जैसी
है। चाहे जहां से उठाकर देख
लो। हम
अपनी हृदय की बात कहते हैं।
जैसे गीता, भागवत,
रामायण,
भक्तमाल आदि दिव्य ग्रंथों का प्रवचन होता
है, सत्संग होता है। ऐसे ही आज संपूर्ण
हिंदू सनातन धर्म को श्री गुरु वाणी के
सत्संग की भी आवश्यकता
है। पर
[संगीत]
हमको एक संत की कृपा से
श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी
का हिंदी संस्करण प्राप्त
हुआ और
हमने उस हिंदी संस्करण
को बड़ी श्रद्धा पूर्वक महाराज जी आद्यपंत
मैंने उसका एक पारायण किया।
हमको इतना आनंद हुआ, इतना आनंद हुआ जिसका
वर्णन हम नहीं कर
सकते। बड़ी प्रसन्नता की बात
है कि इस संत समागम
में बहुत सी विभूतियां कृपा पूर्वक पधारी
हैं। हम सबका यथा योग्य वंदन करते हैं और
अब सावधान होकर के मूल ग्रंथ का
आश्रय लेकर के हम लोग आज कथा का श्रवण
करेंगे।
ऋषियों
ने प्रश्न किया
है हे सूत जी महाराज लिंगाद शिव पूजा
[संगीत]
विधानमत शिवलिंग में
भगवान शिव की पूजा का विधान क्या है? आप
कृपा करके बताएं। सूत जी वर्णन करते हैं
कि
पहले लिंगों के क्रम का श्रवण करना
चाहिए। प्रथम लिंग क्या है? सूक्ष्म प्रणव
रूपम ही सूक्ष्म रूपम तू निष्कलम स्थूल
लिंगम ही सकलम त पंचाक्षर
मुते सूत जी कह रहे
हैं
प्रणव अर्थात
ओंकार जिसको कहा एक ओंकार वह एक ओमकार
प्रणव वह प्रथम सूक्ष्म लिंग है वो ओंकार
भी शिवलिंग ही
है। वह निष्कल
है। निष्कल का अर्थ होता है निराकार।
यह प्रणव ओंकार एक ओंकार प्रणव निष्कल
अर्थात निराकार लिंग
है। इसके लिए
इसीलिए गुरुओं ने कहा एक
ओकार करता पुरख निर्भव
निर्बैर और क्या है? अकाल मूरत अजून सेम
गुरु प्रसाद
एक
ओमकार यह भी शिवलिंग ही है और दूसरा
शिवलिंग है पंचाक्षर।
इन दोनों लिंगों की प्रतिष्ठा अंतःकरण में
होती है। प्रणव लिंग की प्रतिष्ठा भीतर है
और पंचाक्षर जिसमें नमः पद आरंभ में है और
शिव शब्द से चतुर्थी का एक वचन है। वह
पंचाक्षर महामंत्र वह भी हृदय में
प्रतिष्ठित शिवलिंग ही है। प्रणव लिंग
पंचाक्षर लिंग ये दो लिंग है। स्थूल लिंग
है।
पंचाक्षर और इन दोनों लिंगों का पूजन
ओंकार और प्रणव पंचाक्षर इनका पूजन ही तप
है और यह दोनों लिंग ही साक्षात मोक्ष
प्रदाता हैं। यह मोक्ष देने वाले
हैं। अब पौरुष लिंग और प्रकृति लिंग के
रूप में बहुत शिवलिंगों के भेद हैं। उनमें
विस्तार पूर्वक भगवान शिव ही जान सकते
हैं। दूसरा कोई इस तत्व को नहीं बता सकता
है। उनमें प्रथम है स्वयंभू
लिंग। हमारे भारतवर्ष की धरती पर अनेक ऐसे
स्थल हैं जहां अपने आप भूगर्भ से शिवलिंग
प्रकट
हुए। वह किसी व्यक्ति के द्वारा निर्मित
नहीं बनाए गए नहीं है। वह स्वयंभू लिंग वह
भी एक विशिष्ट लिंग है।
स्वयंभू लिंग का भीतर तक भीते नीचे तक
कहां तक है उसका कोई पारावार नहीं होता।
टीकमगढ़ के निकट जो कुंडेश्वर है वहां की
सत्य घटना है।
टीकमगढ़ बुंदेलखंड का मध्य प्रदेश का एक
शहर है। जिला है। उसके पास में एक शिव जी
का प्राचीन स्थान है। कुंडेश्वर महादेव।
स्वामी जी ने दर्शन
किया। वह स्वयंभू लिंग
है। तो उस जमाने के जो टीकमगढ़ महाराज थे
उनके मन में
आया कि मंदिर बहुत छोटा है शिवजी तो बड़ा
मंदिर बनाकर इनको ऊंची वेदिका पर पधरा
दिया जाए तो बहुत अच्छा है। तो ऊंची
वेदिका पर पधने के लिए शिवलिंग को उठाना
पड़ेगा।
तो
उन्होंने लोगों को लगाकर खुदाई शुरू करवा
दी। बड़ी संख्या में लोग खुदाई करने के
लिए लग
गए। खोदते खोदते नीचे पानी निकल आया लेकिन
शिवलिंग का कोई पार नहीं
पाया। बड़ी संख्या में लोग लगे
थे। इसके बाद फिर क्या हुआ? बोले अब ऐसा
करो कि हाथियों को साकल से इसको बांधकर
पिंडी को हाथियों से उसको
हिलाओ। हाथी साकल टूट गई। हाथी कुछ नहीं
कर सके। शिवलिंग यथावत रहा और इसका परिणाम
यह
हुआ कि महाराज सहित जितने लोग वहां काम कर
रहे थे सब मरणासन्न हो
गए। महाराज घबरा गए। बोले शांति करो भाई।
भोले बाबा को पुकारा तो स्वप्न में भगवान
शिव ने कहा अरे
मूर्ख ब्रह्मा जी और विष्णु भगवान ने तो
हमारा पार नहीं पाया तू क्या हमारा पार
पाएगा हम जिस रूप में है उसी रूप में
प्रतिष्ठित करो तो वर्तमान में जो मार्बल
का बना हुआ जो मंदिर है वह उस समय के टीम
महाराज का बनाया अभी
भी ये स्वयंभू लिंग भारतवर्ष के अनेक
क्षेत्रों में भगवान शिव स्वयं प्रकट रूप
में विराजते हैं। उन्हें स्वयंभू लिंग
कहते
हैं। दूसरा बिंदु लिंग है। तीसरा
प्रतिष्ठित लिंग है। चौथा चर लिंग है। और
पांचवा गुरु लिंग
है। पांचवा गुरु लिंग है। गुरु लिंग का
अर्थ होता है कि गुरुदेव भी साक्षात
महादेव का स्वरूप ही है। कोई शिवलिंग
उपलब्ध ना हो तो गुरु रूप में ही शिव जी
का पूजन किया जा सकता
है। इसलिए गोस्वामी तुलसीदास जी ने
रामचरितमानस के मंगलाचरण में कहा वंदे
बोधम नित्यम गुरु शंकर रूपणम यमा ही
वक्रोपी चंद्र सर्वत्र वंते गुरु शंकर रूप
गुरु लिंग गुरुदेव साक्षात शिव रूप है। यो
गुरु स शिव प्रोक्त जो गुरु है वह शिव है
और जो शिव है वह गुरु है। शिव और गुरु में
भेद नहीं
है। और आप लोग रोज बोलते हैं गुरु
ब्रह्मा गुरुर विष्णु गुरुर देवो
महेश्वरा गुरु साक्षात परब्रह्मा
तस्मै श्री गुरवे नमः
[प्रशंसा]
[संगीत]
भूमि को भेद करके भगवान शिव प्रकट होते
हैं। वह नाद लिंग
है। और यह नाद लिंग ही स्वयंभू शिव के रूप
में जाने जाते हैं। बोलो भक्तवत्सल
भगवान की जय।
केवल ओंकार को चंदन से लिखकर के यंत्र
में और शिव जी का पूजन किया जा सकता है।
बहुत ध्यान से सुने बड़ी महत्वपूर्ण बातें
हैं। केवल चंदन से पंचाक्षर मंत्र को
लिखकर के भी शिवलिंग के रूप में पूजन किया
जा सकता
है। और
फिर अग्नि में सूर्य में चंद्र में पृथ्वी
में जल
में आकाश में सर्वत्र शिव का स्मरण करके
कहीं भी शिव जी का ध्यान पूजन स्मरण वंदन
किया जा सकता
है। देवताओं ने ऋषियों
ने आत्म सिद्धि के लिए जो कठोर तपस्या
करके शिवलिंग प्रतिष्ठित किए हैं उन्हें
पौरुष लिंग कहा गया। उसकी भी बहुत बड़ी
महिमा है। और राजाओं ने अथवा जो
सामर्थ्यवान लोग हैं शिल्पियों को बुलाकर
के शिवलिंग की स्थापना की है।
वे प्राकृत लिंग कहे जाते हैं। वह प्राकृत
लिंग भी भोग ऐश्वर्य दोनों को देने वाले
हैं।
इस देह को भी देह में भी शिव जी का
अनुसंधान करते हुए लिंग नाभिवा नासिकाग्र
भाग और शिख के क्रम से कटी हृदय मस्तक और
तीनों स्थानों में शिवलिंग की भावना के
करके पूजन किया जाता है। उसको भी ये कहते
हैं। उसे आध्यात्मिक लिंग कहा जाता
है। चर लिंग जो
हैं
उनमें सबसे प्रथम है
रसलिंग। रसलिंग का अर्थ होता
है पारे के बनाए हुए
शिवलिंग। पारद लिंग। पारद लिंग को ही
रसलिंग कहा गया।
पारा भगवान शंकर का शुक्र है। तेज है।
उसको एक पद्धति से बांधा जाता है। फिर
उससे शिवलिंग का निर्माण किया जाता है। पर
वर्तमान समय में जो रसलिंग पारदलिंगों का
निर्माण हो रहा है और बाजार में दुकानों
पर बिक रहे हैं। यह शास्त्रीय मर्यादा
नहीं है। शास्त्रीय मर्यादा है कि त्रिकाल
संध उपासन संपन्न गायत्री के
परमोपासक किसी नष्टिक ब्रह्मचारी के
द्वारा अनुष्ठान पूर्वक रस लिंग का
निर्माण होना चाहिए। उसमें इत किसी का
स्पर्श नहीं होना चाहिए। फिर उसकी
प्रतिष्ठा हो के पूजन किया जाना चाहिए।
रस लिंगम ब्राह नाम सर्वा प्रद भवेत बाण
लिंगम क्षत्रिय नाम महाराज प्रद शुभम
स्वर्ण लिंगम
वैध लिंग लिंगम शद महा शुद्ध करम
शुभमटिकम बाण लिंग सर्वे सर्व कामया
भावे पूजा नते इस प्रकार से
अलग-अलग लोगों की पात्रता के अनुसार
अलग-अलग शिवलिंगों के पूजन का विधान किया
गया। भस्म की विशेष महिमा का वर्णन किया
गया। देवा यदिवा रात्र नारी वा नरोवा
पूार्थ सलम भस्म त्रिपुंड धारे सजल भस्म
सहित ही त्रिपुंड धारण करने का विधान है।
एक बड़ी ऊंची बात लिखी है स्वामी जी लिखा
है कि जो निरंतर
रुद्राक्ष शिवलिंग और भस्म को धारण करते
हैं। उन्हें अशच का स्पर्श नहीं होता।
वह सदा पवित्र रहते हैं। भस्म शिव
मंत्र भवेत शिवा संप्रो शिव परम शिव ही
जिनके परम आराध्य उपास देवता हैं। जो ऐसे
शिवती हैं शिवत निष् हैं। उन्हें ना असच
है ना उन्हें सूतक है जिनके ललाट में
मिट्टी से अथवा भस्म से त्रिपुंड विराजमान
है।
स्वस्ताद गुरु हस्तादवा अपने हाथ से
त्रिपुण धारण हो या गुरु जी के हाथ से
त्रिपुण धारण कराया जाए वह शिव भक्त का
लक्षण है। कहते हैं
ऐसे शिव भक्त की बड़ी महिमा
है। गुरु शब्द का अर्थ क्या है?
गुरु
गुान प्रो गुरु
शब्दस जो गुणों का रोध कर दे उसको गुरु
कहते हैं। शिव पुराण के अनुसार जो गुणों
का रोध कर दे उसको गुरु कहते
हैं। गुण क्या है? सत, रज, तम यह तीन गुण
है और यह संपूर्ण ब्रह्मांड त्रिगुणात्मक
है। यह सृष्टि ही त्रिगुणात्मिका
है। कुछ सतोगुण प्रधान, कुछ रजोगुण
प्रधान, कुछ तमोगुण प्रधान।
केवल सत से भी सृष्टि संभव नहीं
है। निर्माण के लिए रजोगुण की आवश्यकता
है। और रजोगुण और तमोगुण का ऐसा संबंध है
कि जहां रजोगुण रहेगा वहां किसी न किसी
रूप में किसी न किसी अंश में तमोगुण अवश्य
रहेगा।
और वेद भी त्रिगुण का ही प्रतिपादन करते
हैं। इसलिए श्रीमद् भगवत गीता में कहा
त्रगुण विषय वेदा निय गुण भार्जुन हे
अर्जुन वेद त्रिगुण का निरूपण करते हैं।
पर तू गुणातीत अवस्था को प्राप्त करे।
इसका अर्थ है जो शिष्य को गुणातीत अवस्था
में प्रतिष्ठित कर दे
आ गुणातीत बना दे उसी को गुरु कहते हैं।
त्रिगुण से ऊपर उठा दे। मरने के बाद
मुक्ति नहीं जो जीते जी मुक्ति का अनुभव
करा दे उसे गुरु कहते
हैं। जब तक त्रिगुण का लेश है, त्रिगुण के
संस्कार है तब तक बंधन है और गुणातीत
स्वरूप में प्रतिष्ठित होते हुए वह जीवन
मुक्त अवस्था को प्राप्त करता है। हमारे
यहां शास्त्रों में लिखा
है। अब मरने के बाद भले ही हम लोग कह दे
स्वर्गवासी नरकवासी तो किसी को कहा नहीं
जाता। कहा जाता है क्या? चाहे पापी आदमी
भी मर
जाए। तो यह नहीं कहते हैं कि नरकवासी अमुक
ऐसा बोलते हैं क्या?
यही बोला जाता स्वर्गवासी भले ही वह घोर
नरक में गया हो। कहते यही है स्वर्गवासी
सभ्यता यही है। अच्छी बात बोलनी चाहिए।
बुरी बात नहीं बोलनी चाहिए।
अपनी अपनी भावना के
अनुसार हम लोग कहते हैं वैुंठ वासी गोलोक
वासी साकेत वासी सचखंड वासी अमरलोक
वासी संतो ने बात सब एक ही है भगवान का
नित्य
धाम जिसके संबंध में गीता जी में कहा न
तसते सूर्य न शशको न पावका यत न निवते
परम
मम तो हम अपनी श्रद्धा भावना के अनुसार कह
देते हैं कि अमुक लोक में गया मान लेते
हैं लेकिन सच्ची बात यह है कि मरने वाला
कहां गया इसको परमात्मा के अलावा कोई नहीं
जानता जानता है
कोई इसलिए महाराज जी मुक्ति का जो निर्णय
है उसमें शास्त्रों में लिखा है विमुक्तस
विमुचते विमुक्तस विमुचते जिसने वर्तमान
जीवन में मुक्ति का अनुभव कर लिया है वही
मरने के बाद भी मुक्त होगा जिसने जीवन
मुक्ति का अनुभव नहीं किया वो मरने के बाद
भी मुक्त नहीं होगा बंधन में
रहेगा जीते जी अनुभव होना
चाहिए
इसलिए गोस्वामी तुलसीदास जी का यह वचन
हमें बहुत प्रिय लगता है विनय पत्रिका
में को
जाने को
[संगीत]
जाने को ज है
[संगीत]
जमपुर को
जाने को ज
जमपुर को
सुरपुर परधाम को
तुलसी मोह भो
लागत जग
जीवन राम गुलाम
को मरने के
बाद किसको पता है कि कौन यमलोक जाएगा
को जाने को जमपुर को सुरपुर कौन स्वर्ग
जाएगा और कौन परधाम को
जाएगा
नित्य साकेत वैुंठ कैलाश में कौन जाएगा
किसी को पता
नहीं इसलिए तुलसीदास जी कहते हैं हमको तो
यही अच्छा लगता है कि मरने के बाद कहां
जाएंगे सब राम जी पर छोड़
दो जब तक जियो
राम जी के गुलाम बनकर के जियो। राम जी के
सेवक बनकर के जियो। भगवान के शरणागत होकर
के
जियो। बोले शरणागत होने से क्या फायदा है
भाई? क्या लाभ
है? हम राम जी के गुलाम होकर, सेवक होकर,
भक्त होकर, शरणागत होकर जिए। इसका लाभ
क्या है?
इस बात को भी विनय पत्रिका में गोस्वामी
जी कह रहे
हैं
रोटी लुगा
नी के
[संगीत]
राखे आगे हु
की
[संगीत]
वेखे आप प्रभु के चरणों में निवेदित हो
जाओ शरणागत हो जाओ
तो रोटी और लुगा माने
कपड़ा। इसका अभाव नहीं
होगा। ये महापुरुष बैठे हैं सब सामने।
ऊपर विराजे हैं। सामने विराजे
हैं। ये संत कौन सा धंधा करते हैं?
ना तो इनका कोई व्यवसाय है। खोमचे की भी
दुकान नहीं है। खोमचा जानते हो थिलिया
लेकर के चलाते हैं। खोमचा का भी काम इनका
नहीं है। कि चलो भाई कोई टाइम पास मूंगफली
बेच लेते हो।
एक बीघा भी खेत नहीं
है। वेंकटेश स्वामी जी बैठे
हैं। कितनी खेती है
मटकी? एक बीघा भी खेती नहीं है। स्वामी जी
की
मटकी। कितना बैंक बैलेंस है, कितना करोड़
है, कुछ नहीं
है। आज
60 से 70 हजार संगत रोज लंगर छक रही है।
जी रही है। सबको भोजन की व्यवस्था
[प्रशंसा]
है। बड़े से बड़ा करोड़पति भी ये व्यवस्था
नहीं कर सकता। सब हाथ खड़े कर देंगे।
इंडस्ट्री वाले बड़े बड़े अधिकारी ऑफिसर
हाथ खड़े कर देंगे। पर यह कैसे हो रहा है?
यह है शरणागति की महिमा।
[संगीत]
अन्न वस्त्र का अभाव
[संगीत]
नहीं। महाराज जी कितने संतों के स्थान ऐसे
हैं जहां हाथ जोड़ना पड़ता है कि अब अन्न
की जरूरत नहीं है। अब आवश्यकता नहीं है।
मत
दो। ये कौन व्यवस्था कर रहा है?
[प्रशंसा]
संत दादू दयाल जी का एक वाक्य है। संत
दादू
जी राजस्थान की धरती के महान संत
नारायण हमारे रेवासा धाम में दादू दयाल जी
भी पधारे। दो बार आए दादू
दयाल। संत दादू दयाल जी कह रहे हैं।
[संगीत]
दादू दुनिया बाग
[संगीत]
दादू दुनिया
बाच करे
गली रोटी देसी राम जी तड़का
राजस्थानी शब्द
है। दुनिया पागल है। किस चीज में? केवल
खाने कमाने की चिंता में पागल है। क्या
खाएंगे? क्या
कमाएंगे? कमाएंगे नहीं तो खाएंगे
[संगीत]
क्या? और केवल खाएंगे खाएंगे तो कमाएंगे
कैसे? कमाना खाना इसी चक्कर में दुनिया
परेशान है।
और कई बार तो स्वामी जी बड़ी विचित्र
स्थिति होती है। हमारे परम पूज्य श्री गो
ऋषि पथड़ा महाराज मुंबई में एक बहुत बड़े
आदमी के फार्म हाउस में गए। बुलाया महाराज
सोचते थे कुछ गौ सेवा हो जाएगी। लेकिन वो
तो राम जी की इच्छा से ऐसे ही
निकले। उसने बोला महाराज बहुत बड़ा आदमी
था। कई हजार करोड़ का आदमी था। वो बोला
बाबा जी सेवा तो हम करेंगे गौ
सेवा पर आप हमें ठीक कर
दो तो महाराज ने पूछा तुम्हें क्या तकलीफ
है बोले डॉक्टर कहता है जिस दिन खा लोगे
उसी दिन मर जाओगे बोले तो तुम बिना खाए हो
क्या बोले नहीं नमक नहीं खा सकते मीठा
नहीं खा सकते मिर्च नहीं खा सकते घी नहीं
खा सकते तेल नहीं खा सकते फल फल नहीं खा
सकते, दूध नहीं पी सकते, दही नहीं खा
सकते। अरे राम महाराज बोले फिर खाते क्या
हो? बोले जौ का दलिया पानी में उबाल के
खाते हैं। इसके अलावा कुछ भी खा लेंगे तो
हमें ऐसी बीमारी है आंत में हम मर जाएंगे।
हमको ठीक कर दो।
अब व्यक्ति खाने के लिए तो कमाता है पर
हजारों करोड़ कमाने वाला व्यक्ति खा नहीं
सकता। हजारों करोड़ रुपए जिसके पास है 10
20 हजार करोड़ रुपए जिसके पास है वह खा
नहीं
सकता। तो दादू दुनिया बाबरी सोच करे गली
साधु बोले साधु को सोच करने की जरूरत नहीं
है। रोटी देसी राम
जी राम जी रोटी देंगे। कब देंगे राम जी
रोटी?
तड़का
पहली सूर्योदय पीछे
होगा और साधु के भोजन की व्यवस्था पहले हो
जाएगी। आज किस घर से भिक्षा मिलेगी? यह
राम जी का विधान
[संगीत]
[संगीत]
है। इस प्रकार
से यह वर्णन किया गया।
इसलिए जो गुणातीत अवस्था को प्रदान करा
दे उसी को गुरु कहते हैं।
सिकारान राजसादी
गुरुंधोति गुाती पर शिव गुरु रूपम
समाप शिवम
बोस्त
नाम गुरु
[संगीत]
विधते
जो रजोगुण तमोगुण विकारों को पैदा करने
वाले हैं उन रजोगुण तमोगुण को भी मिटा दे
और जो माया की परिधि वाला सतगुण है उसको
भी छोड़ दे। विशुद्ध सत जो निष्काम प्रेम
है उस निष्काम प्रेम में प्रतिष्ठित कर
दे। ऐसी परम शिवता का आविष्कार कर
दे। गुणातीत बनाकर शिव तत्व का बोध करा
दे। उसी को गुरु कहते हैं।
कहते जिस सद्गुरु ने कृपा
करके हमें गुणातीत अवस्था प्रदान की
है। हमें शिव तत्व का बोध कराया
है। शिष्य को उस गुरु तत्व में साक्षात
शिव जी को स्वीकार करना चाहिए। गुरु रूप
में साक्षात शिव तत्व ही
है। तस्मात गुरु शरीरम तू गुरु लिंगम
भवेधा गुरु लिंगस पूजा पूजात गुरु सुशम
भवे इसलिए गुरु पूजा भी शिवलिंग का अर्चन
है। शिवलिंग्चन है। महादेव की पूजा है।
गुरु पूजा महादेव की पूजा
है। अब गुरु पूजा क्या है? स्वामी जी
विवेक रखना पड़ेगा। अब गुरु जी है बिचारे
बड़े
बूढ़े। मान लो 100 वर्ष के हो गए
हैं और गुरु जी को उत्तराखंड में ले जाए
शिष्य। और बोले जैसे केदारनाथ जी पर जल
चढ़ाते हैं। ऐसे गुरु जी का ब्राह्मणों को
बुलाकर नमक चमक से अभिषेक कराएंगे।
तो गुरु जी जल्दी शिवलोक चले
[संगीत]
जाए। राजस्थान
में मारवाड़ क्षेत्र में वहां बालू ही
बालू है तो गर्मी भी खूब पड़ती है। ठंड भी
खूब पड़ती
है। तो एक भगत के घर में गांव
में गुरु जी आए। गर्मी के समय में आए तो
शिष्य बड़ा गुरु भक्ति वाला था। उसने कोरे
कोरे मिट्टी के घड़े मंगाए। राजस्थान में
पानी बड़ा दुर्लभ अब तो भगवान की दया से
कुछ सुलभ है। पहले बहुत दुर्लभ था। कहां
कहां से पानी की व्यवस्था करके हजार घड़ा
1000 घड़ा मिट्टी के सब में छान कर पानी
भराया और गुरु जी को कुल्ला करना हो तो
एकदम ठंडा पानी स्नान करना हो तो पानी खूब
अभिषेक कराया। गर्मी का समय था। गुरु जी
को भी बहुत आनंद
आया। भगवान की दया से शीत काल में पड़ोसी
के घर में भी उनके गुरु जी आ गए। वह बूढ़े
थे। उसने कहा हम पड़ोसी से किसी बात में
कमजोर थोड़ी है। हम भी अपने गुरु जी का
ऐसा ही सत्कार करेंगे। पर गुरु जी आए पूछ
के महीना में। भयंकर ठंड थी
महाराज। राजस्थान की सूखी ठंड कड़कड़ाने
वाली
ठंड। कोरे कोरे घड़ा मंगाए पानी छान करके
भरा और बोले गुरु जी पंडितों को बुला के
आज ही आपका अभिषेक करेंगे।
आज शिवरात्रि है। रात्रि के समय गुरु जी
मना करते रहे। जबरदस्ती अभिषेक शुरू किया।
गुरु जी पर जल ठंडा ठंडा पड़ते गुरु जी
पधार
गए।
इसलिए शिव जी का जैसा पूजन
होगा।
शिवजी वो तो हिमखंड के निवासी हैं। उनको
तो सब कुछ स्वीकार हो जाएगा। पर देह रूप
में जो गुरु है उनके देह का विचार करके
उनकी अवस्था का विचार करके उनकी सेवा क्या
है? तो महाराज जी लिखा है गुरु सुशम भवेत
गुरुदेव की श्री अंग की सेवा ही शिव पूजा
है। उनके शरीर को जिस किसी भी प्रकार की
सेवा की आवश्यकता है उस प्रकार की सेवा
शिष्य अत्यंत श्रद्धा पूर्वक करें। इसको
कहते हैं गुरु लिंगस पूजात गुरु सुश भवेत
अब गुरु सेवा क्या है बहुत ध्यान से सुने
सेवा का अर्थ
भी सेवा आज्ञा समन सुसाहिब
सेवा आज्ञा पालन से बड़ी कोई सेवा नहीं
है पीछे पड़ के गुरु जी के हाथ पाव दबावे
और गुरु जी जो कहे उसको बिल्कुल ना
सुने वो वो कहे बेटा पूर्व जाओ। बोले हम
तो पश्चिम
जाएंगे तो वो सेवा सेवा नहीं है। ऐसे
जो आज्ञा का उल्लंघन करने वाले शिष्य होते
हैं वो कई बार हाथ पैर दबाते दबाते गला भी
दबा देते हैं। पधारो गुरु जी जल्दी। गद्दी
खाली करो हमारे लिए। बुरा नहीं मानना।
साधु सही बात
है। इसलिए गुरुजनों की सबसे बड़ी सेवा है।
उनकी आज्ञा का पाल एकदम साफ रखते चाहे
जितने लोग आ जाए अपने हाथ से शौचालय
शौचालय साफ करते और गुरु जी सुंदर शौचालय
देखकर प्रसन्न होते तो छाती से लगा लेते।
भैया सैकड़ों जन्म तक तपस्या करने से जो
नहीं मिलेगा वह गुरु जी का हृदय कमल खिल
जाएगा तुम्हारी सेवा से वह एक ही जन्म में
मिल
जाएगा इसलिए गुरु सेवा करते हुए गुरु
आज्ञा का पालन करना इसको कहते हैं गुरु
लिंग पूजा ये महादेव की पूजा
है श्रुतम करोति
सुशष काय मनसा
गिराम य गुरु पूर्व शम
शक गुरु जी जो आज्ञा दें उसको तत्काल करें
हां जी
हां शरीर से मन से वाणी से उसको पूरा करने
का प्रयास करें यह कभी ना बोले गुरु जी से
कि यह गुरु जी हमसे नहीं
होगा वो कल वाली बात इसमें आ गई आज गुरु
जी के सामने कभी असंभव ना बोले बोले ना
बोले तुम्हारा जीवन बेकार चला जाएगा।
महापुरुष केवल आज्ञा नहीं देते हैं। आज्ञा
पालन की सामर्थ्य भी देते हैं। शक्ति भी
देते
हैं। कैसे होगा? कैसे होगा? होगा कैसे?
गुरु जी ने कह दिया तो होगा। क्यों नहीं
होगा? लाख बार होगा। क्यों नहीं होगा?
गुरु जी ने कह दिया तो जरूर हो
जाएगा। उसमें विचार ना करें।
अपने प्राण देकर, तन देकर, धन देकर गुरु
जी की आज्ञा का पालन करें उसे शिष्य कहते
हैं। कहां भाई कलम कहां
गई? बहुत सुंदर श्लोक
है। करो वही
पूतात्मा प्राण रप धन
रपि
तस्मा शासने योग्य
शिष्य
विधते सास अनुष्ट धातु से शिष्य शब्द
निष्पन्न होता है शास इससे इत होता है तो
शिष्य शब्द निष्पन्न होता है जिसका अर्थ
होता है शासित तुम योग्य माने गुरुजनों के
अनुशासन में जो रहने के योग्य हो उसे
शिष्य कहते हैं।
अब गुरु जी के अनुशासन में ना रहे।
आज हमारे बड़ी प्रसन्नता की बात है कि
श्री नर्मदा जी के तट
से श्री नरसिंह मंडल वाले पूज्य श्री महंत
जी महाराज श्री महंत श्री श्याम सुंदर दास
जी महाराज यही नाम है ना कृपा पूर्वक
पधारे हैं। मन में बड़ी प्रसन्नता है।
पुराने संत हैं। साधु सेवी स्थान है।
ओमकार ओमकारेश्वर का यह एकमात्र ऐसा स्थान
है जब आधी रात में भी कोई साधु चला जाए तो
सबको आसन लगाने की जगह है सबको प्रसाद
पाने
का प्रबंध है ऐसा स्थान है हम प्रणाम करते
हैं पूज्य महंत जी महाराज को
हां एक गुरु जी
थे। हमको लगता है कि ऐसी ऐसी विकृतियां
आने लग गई थी। इसीलिए गुरुओं ने सोचा कि
भाई अब यह पता नहीं देहधारी लोग कहां-कहां
ले जाएंगे। भगवान से नड़कर अपने से जोड़ने
लग जाएंगे। इसलिए सिख परंपरा के गुरुओं ने
विचार करके गुरु वाणी को ही गुरु का
स्वरूप माना। गुरु ग्रंथ साहब।
तो गुरु जी बहुत सरल थे। अच्छे महात्मा थे
और चेला थोड़ा चतुर चालाक
था। चतुर हो चालू खोपड़ी के होते हैं। तो
चेला थोड़ा चतुर चालाक
था। सवेरे गुरु जी ने
कहा बेटा माधवदास
हां
गुरुदेव कोई माधवदास जी बैठे हो तो बुरा
नहीं माने हम तो एक नाम ले रहे उदाहरण दे
ऐसा ना समझे कि कोई माधव माधवदासी नाम के
संत बैठे उनको देख के हम बोल रहे ऐसा अपने
मन में मत ले आना बेटा माधवदास कहां
गुरुदेव
आज्ञा बोले थोड़ी झाड़ू लगा लो मठ में
स्थान
में बोले गुरु जी
आपने ही कहा था कि झाड़ू लगाने में बहुत
सूक्ष्म जीव
बेचारे पधार जाते हैं। हिंसा हो जाती है।
आपने एक दिन प्रवचन में कहा था अहिंसा
परमो
धर्म तो हम तो उसी बात का विचार कर रहे
हैं कि आपकी वो वाली बात माने कि आज झाड़ू
लगाने वाली बात माने। गुरु जी बेचारे सीधे
थे। चुप हो गए। बोले कोई बात नहीं।
तो थोड़ी देर बाद गुरु जी ने कहा बेटा कोई
बात नहीं झाड़ू तो हमने लगा
ली। अब थोड़ा गौ सेवा
करो। बोले महाराज गौ सेवा की महिमा तो
आपने इतनी सुनाई कि हम बोल नहीं सकते। पर
समस्या यही है। हमें बड़ा डर लगता है गाय
से। क्यों? सामने जाओ तो सींग मार दे। पास
में जाओ लोग लात मार दे। तो फिर आप तो
वैसी उम्र हो रही है आपकी और आपके चेला का
अंग भंग हो जाए विकलांग हो जाए तो आपको
सेवा करनी पड़ेगी तो गुरु जी आप धीरेधीरे
हम जब भय हमारा खत्म हो जाएगा तो हम
धीरे-धीरे करेंगे गौ सेवा भी
करेंगे गुरु जी बहुत सीधे थे उन्होंने कहा
कोई बात नहीं ऐसा ही है ये थोड़ा हलाली है
तो गुरु जी ने गोबर भी उठा लिया गौशाला भी
साफ कर ली धार भी काट
ली और
चेला ने भी स्नान कर लिया गुरु जी ने भी
स्नान कर
लिया बोले बेटा अब ऐसा है तुम मंदिर में
जाकर भगवान की सेवा कर
लो गुरु जी सेवा का कार्य तो बहुत उत्तम
कार्य है भगवान की सेवा पर आपने एक दिन
बोला था कि सेवा में 32 अपराध होते हैं हम
तो नए-नए चेलाए हमसे 64 हो जाएंगे
हमसे तो डबल हो
जाएंगे। तो अपराध वाला काम हमसे क्यों
करवाते? गुरु जी ने कहा चलो हम सेवा पूजा
भी कर
ले। तब गुरु जी बोले ठीक है बच्चा हम सेवा
पूजा कर रहे हैं। तुम तब तक रसोई बना लो।
तो उसने कहा गुरु जी आप अन्यथा ना
माने हम सब काम करना जानते हैं। बस इतना
ही नहीं आता। रोटी बनाना नहीं आता। रसोई
बनाना और सब काम करना जानते
हैं। कितने शेर दाल में कितना शेर नमक
पड़ेगा ये हम नहीं जानते। अरे बच्चा कितनी
शेर दाल में कितने शेर नमक थोड़ी पड़ता
है। नमक तो नमक के हिसाब से पड़ता है। बस
यही गुरु जी बिल्कुल फिर रसोई बिगड़ जाए
भगवान को बढ़िया भोग ना लगे अतिथि सत्कार
ना हो तो आप नाराज होंगे। गुरु जी ने कहा
कोई बात नहीं रसोई भी बना लेते हैं। भोग
लगा लिया। बोले बेटा प्रसाद पा लो।
बोले देखो आपने ही एक दिन कहा था आज्ञा
गुरु नाम
अविचारणी आज्ञा गुरु नाम अनुपालनीया
गुरुजनों की आज्ञा पालन में बिल्कुल विचार
नहीं करना चाहिए जो मुख से आज्ञा निकले
तत्काल पालन करना चाहिए और सवेरे से तो हम
कुछ ना कुछ गड़बड़ी कर रहे हैं। यह आपकी
आखरी आज्ञा है। इसका हम तिरस्कार नहीं कर
सकते।
ऐसे चेलों के संबंध
में श्री कबीर दास जी ने
कहा उड़
जाएगा हंस
अकेला उड़
जाएगा हंस अकेला
[संगीत]
एक
डाल दो पंछी बैठे ये डाल है एक गुरु एक
चेला गुरु की
करनी गुरु जाएंगे
चेले की करनी
चेला
जाएगा हंस
अकेला ऐसे जो चतुर चालाक होते हैं। उनको
चाहे जितने समर्थ संत सद्गुरु मिल जाए वो
कहीं रह जाए उनके तो कल्याण में सदा संदेह
ही रहता है।
इसलिए शिव पुराण में यह सिद्धांत कहा जा
रहा
है कि जो गुरुजनों के अनुशासन में रहे
अपने तन मन प्राण की पूरी शक्ति लगा के
गुरु की आज्ञा का पालन करे उसे शिष्य कहते
हैं।
महर्षि धौम्य ने कहा महाभारत में महाराज
महर्षि धम ने कहा अपने शिष्य से कि बेटा
यह भगवान का खेत है धान का और यह धान के
खेत की मेड बार-बार टूट जा रही है और खेत
का पानी निकल जाएगा तो धान कैसे होगी तुम
इसमें सेवा करो शिष्य ने कहा जो आज्ञा अब
वो पानी बहुत बरस रहा था इधर मेड बांधे तो
उधर उधर बांधे तो उधर फूट जाए। तब वह
स्वयं ही मेड बन के और लेट गया। पानी को
बाहर नहीं निकलने दिया। पूरी रात ठंड के
समय में मेल बनकर पड़ा रहा। प्रातः काल
देखा गुरु जी ने महर्षि धम ने कि मेरा
शिष्य नहीं
आया। आप पहुंचे
बेटा कहां हो? कहा गुरु जी मैं आपकी आज्ञा
का पालन कर रहा हूं।
बोले बेटा वर्षा बंद हो चुकी है। क्या
कहां हो? तुम दिखाई नहीं पड़ रहे हो। बोले
मैं धान की खेत की मेड बनकर पड़ा हुआ हूं।
क्योंकि आपने आज्ञा दी थी कि पानी खेत का
बाहर ना हो जाए। बोले बेटा खेत में जितने
जल की आवश्यकता थी उतना जल तो अब है। अब
तुम आ जाओ। अब कोई खेती में नुकसान होने
वाला नहीं है। तो वह मेड तोड़ कर
आया तो गुरु जी ने उसका एक नया नाम दे
दिया उदालक। क्या नाम दिया? वे हुए महर्षि
उद्यालक। और उस शिष्य को कहा तुम उदालक
ऋषि हुए आज से और अपनी छाती से लगाकर कहा
बेटा संपूर्ण ब्रह्म विद्या तेरे हृदय में
प्रकाशित हो जाएगी।
शब्द ब्रह्म पर ब्रह्म दोनों का
तुझे संपूर्ण बोध हो जाए।
शरीरम
गुरु अगम
अग्रम शिष्या
पुत्र
सदा
मंत्र इस प्रकार से जो बिंदु सृष्टि में
पुत्र है वही नाद सृष्टि में शिष्य है
बोलो भक्तवत्सल
भगवान की जय जय। इस प्रकार से यह भगवान
शिव के विविध स्वरूपों का वर्णन किया और
कहा कि इनमें पार्थिव लिंग के पूजन का
विशेष महत्व है जो एक करोड़ पार्थिव लिंग
की का निर्माण करके उसकी विधिवत पूजन कर
लेता है वह जीते जी मुक्ति को प्राप्त कर
लेता है। ऐसा भी लिखा निष्काम भाव से
कामना होगी तो उस कामना की पूर्ति होगी।
केवल संसार चक्र से छूटने का संकल्प लेकर
सवा करोड़ मिट्टी के शिवलिंग बनाकर के यदि
पूजन कर ले तो वह जीवन मुक्ति को प्राप्त
करेगा। ऐसा लिखा
है। कौन-कौन से मंत्र से पूजन करना चाहिए?
उन वैदिक मंत्रों का उल्लेख भी किया और
भगवान शिव के ध्यान का उल्लेख किया। कामना
भेद से
अलग-अलग संख्या में पार्थिव लिंग के पूजन
का भी वर्णन किया और किस वस्तु की
प्राप्ति के लिए क्या करना चाहिए इसका भी
वर्णन किया। अब शिव नैवेद्य के संबंध में
एक बड़ा सुंदर विचार यहां प्रस्तुत किया
जा रहा है। बहुत ध्यान से सुने। सभी
सनातनी हिंदुओं को यह बात बड़े भाव से और
बड़े ध्यान से सुननी चाहिए। शिव नैवेद्य
के संबंध
में शिव जी के प्रसाद के संबंध
में
उछम शिवदम पूर्वत
व निर्णय
महात्मने शकाद ऋषियों ने तीर्थराज प्रयाग
की धरती पर सूत जी से
पूछा कि हमने सुना है कि शिव जी को अर्पित
जो नैवेद्य उनका जो प्रसाद है वह अग्रह
होता है। उसे ग्रहण नहीं किया जाता है। इस
संबंध में आप धर्म शास्त्र का विचार क्या
है? इसका ठीक ठीक निर्णय
सुनावे और बिल पत्र का महात्म बतावे। बिल
पत्र की महिमा क्या है? क्योंकि बिल्व
पत्र भगवान शिव को अत्यंत प्रिय है। यह
बिल्व के महात्म का वर्णन करें। श्री सूत
जी इन दोनों प्रश्नों का समाधान कर रहे
हैं।
पहले एक बात हम आपको स्पष्ट कर
दें। शिव संगीिता
अंतर्गत श्री रामचन महायज्ञ का विधान है।
श्री रामचन महायज्ञ रामर्चा होती है। वह
भी एक यज्ञ ही है। महान यज्ञ है। और बड़ा
चमत्कारिक प्रभाव होता है रामर्चन का।
असाध्य कार्य भी सिद्ध हो जाता है रामर्चन
से। उस रामार्चन के महात्म में एक कथा आती
है कि ब्रह्मलोक में ब्रह्मा जी महाराज ने
रामर्चन महायज्ञ
किया और उसका प्रसाद बांटने की सेवा नारद
जी को प्रदान की। नारद जी प्रसाद लेकर
कैलाश आए और उन्होंने भगवान शिव को
रामर्चन का प्रसाद दिया। शंकर जी आनंद में
भरकर नृत्य करने लगे और संपूर्ण प्रसाद पा
गए। सती जी थी उस समय पार्वती जी नहीं थी।
सती जी थी दक्ष पुत्री सती तो सती जी
स्नान के लिए गई थी। वो सखियों के साथ लौट
के आ रही थी। उन्होंने मार्ग में नारद जी
को
देखा। नारद जी से पूछा गुरु
जी आप कहां से पधार रहे हैं? बोले हम
भगवान शिव का दर्शन करके आ रहे हैं। तो
कैसे आए? बोले राम अर्चन का प्रसाद
ब्रह्मलोक से ले आए
थे। जाओ जाओ तुमको भी मिल जाएगा प्रसाद।
चले
जाओ। सती जी आई बोली प्रसाद लाओ हमारा।
भोले बाबा बोले हम तो भूल ही गए। कब क्या
किया? बोले हम तो प्रेम में भर के पूरा ही
पा गए। हमने तुम्हारे लिए कुछ भी बचाया
नहीं शेष नहीं
छोड़ा तो शिव संगीिता में ऐसा लिखा
है रामर्चन महात्म की कथा में कि सती जी
ने रुष्ट होकर शिव जी को श्राप दे दिया आप
हमारा हमारे हिस्से का भी प्रसाद खा गए पा
गए हमको नहीं दिया तो हम आपको श्राप देते
हैं जो आपका प्रसाद खाएंगे वह कुत्ते की
योनि में चले जाएंगे
कुत्ते हो
जाए। अब बहुत ध्यान से सुने हम क्या कहना
चाहते? बहुत ध्यान से सुने। आगे इस पुराण
की बात हम
कहेंगे। ऐसा क्यों कहा सती जी ने?
प्रसाद की
एक मर्यादा
है और महाराज प्रसाद की मर्यादा यह
है कि प्रसाद कभी अकेले नहीं खाना चाहिए।
प्रसाद हमेशा बांट कर खाना चाहिए। रामर्चन
के प्रसाद की तो बात है कि आपको एक लड्डू
भी मिला है तो किसी ने किसी को आप उसमें
से कुछ दो तब खाओ।
तो आशय वहां कहने का यह है कि भगवान का
प्रसाद जो बांट के नहीं खाता अकेले खा
जाता है उसे कुत्ता होना पड़ता है। यह
उसका मतलब
है। हमारे पूज्य गुरुदेव भक्तमाली जी से
किसी ने पूछा बोले महाराज जी ऐसा लिखा है
कुत्ता हो जाता है। महाराज जी तो बड़े
विलक्षण समाधान करते थे। महाराज जी हंसने
लगे। बोले कौन ऐसा बढ़िया सत्कर्म कर रहे
हैं कि हम इंद्र महेंद्र बनेंगे। भजन तो
कर नहीं रहे हैं। जीवन को नष्ट किए चले जा
रहे हैं। तो सुकर कूकर ही
बनेंगे। शिव जी का प्रसाद पाकर कुत्ता
बनेंगे तो हवाई जहाज में घूमेंगे।
डेढ़ करोड़ दो करोड़ की गाड़ी में बैठकर
घूमेंगे। बढ़िया सावन लगाकर नहाएंगे। दूध
रोटी खाएंगे।
यह तो हंसकर उन्होंने
कहा और दूसरी बात उन्होंने यह
कही
कि
प्रसाद के संबंध में विचार क्या है? इसको
ठीक से शिव पुराण को पढ़कर ही देख लेना
चाहिए। अब शिव पुराण में क्या लिखा हुआ
है? इस संबंध में हम आपको निवेदन कर रहे
हैं।
भगवान को निवेदित करके तुलसी दर पध कर
भगवत प्रसाद शिव जी को निवेदित करो और उस
प्रसाद को पाओ कोई संकोच की बात
नहीं
किंतु जो किसी मूर्तिकार के द्वारा टंकित
शिवलिंग
है माने पाषाण से जिनका निर्माण किया गया
है उनको टंकित स्वर टंकित स्वरूप कहा जाता
है। वह टंकित जो शिवलिंग है उसमें भगवान
शिव के चंड नाम के गण का अधिकार है। किसका
अधिकार है? चंडाधिकार है। भगवान शिव के एक
गण है चंड।
उनका नाम शिव्चन के बाद लिया जाता
है। बाण रावण
चंडीस श्रंगी रिटा दया सदा शिवस
नैवेद्यम सर्वे ग्रहण साभवा जब शिव जी का
पूजन पूरा हो जाता है तो शिव जी को भोग
लगने के बाद उनके पार्षदों को प्रसाद दिया
जाता है। यदि प्रसाद न देंगे तो पूजन सफल
नहीं होगा। उनमें कौन-कौन है शिव जी के
पार्षद बाण बाणासुर
रावण रावण एक रुद्र गण के रूप में भी रावण
सेवा में अभी भी है बाणासुर भी रुद्रगण के
रूप में शिव जी की सेवा में है बाण रावण
चंडीस चंडीस नाम के गण श्रंगी भृंगी और
रिट
आदि ये सभी जो रुद्र गण है वो भगवान शिव
के नैवेद्य को स्वीकार करें तो इनमें जो
चंड नाम के गण हैं। उन्होंने भगवान शिव
बहुत ध्यान से सुने। उन्होंने भगवान शिव
की उपासना करके भगवान शिव को प्रसन्न करके
वर मांगा कि आपको जो कुछ निवेदित किया जाए
उस पर संपूर्ण अधिकार मेरा
हो। दूसरे किसी का अधिकार ना हो।
भगवान शंकर ने कहा यह तो कठिन है। क्यों?
क्योंकि हमारे नैवेद्य को तो ब्रह्माद
देवता भी श्रद्धा पूर्वक लेते हैं। अब
केवल तुम्हारा अधिकार हो जाएगा तब तो किसी
को हमारे प्रसाद का सौभाग्य ही नहीं
मिलेगा। बोला नहीं हम तो बस यही चाहते
हैं। हमारा ही पूरा अधिकार है। होते हैं
बड़े निष्ठावान। कई चेले भी ऐसे होते हैं।
बोले गुरु जी की थाली पर तो हमारा ही
अधिकार हम किसी को एक कण नहीं देंगे।
उसमें से ऐसे होते हैं। लो चंड जी
बोले कि हम तो दूसरे में राजी नहीं है।
हमको तो पूरा पूरा
चाहिए। तब शंकर जी ने कहा जो
किसी मूर्तिकार के द्वारा
निर्मित शैल आदि की प्रतिमा होगी। की
पाषाण निर्मित प्रतिमा होगी। उसमें
तुम्हारा अधिकार होगा। द्वादश
ज्योतिर्लिंगों में तुम्हारा अधिकार नहीं
होगा। स्वयंभू लिंगों में तुम्हारा अधिकार
नहीं होगा। वाण लिंग माने नर्मदेश्वर लिंग
में तुम्हारा अधिकार नहीं होगा। रत्न
लिंग। रसलिंग में तुम्हारा अधिकार नहीं
होगा। रत्न लिंग माने होता है मणि माणिक्य
आदि के शिवलिंग अथवा रसलिंग माने पारद
लिंग अथवा धातु लिंग। धातु लिंग माने
स्वर्ण लिंग रजत लिंग इनमें भी आपका
अधिकार नहीं
होगा। इनसे जो बच
गया अर्थात किसी मूर्तिकार के द्वारा बनाई
हुई टंकित
प्रतिमा शिवलिंग उसमें तुम्हारा अधिकार
होगा और वह अधिकार भी तुम्हारा तुम्हारे
लिए होगा। किंतु जो शिव दीक्षा से युक्त
लोग हैं वह उस प्रसाद को भी ग्रहण करें
उनको दोष नहीं होगा। किंतु जो शिव दीक्षा
से युक्त नहीं है अन्य दीक्षा जिन्होंने
ले रखी है उनको तो स्वयंभू लिंग अथवा वाण
लिंग अथवा ज्योतिर्लिंग का ही नैवेद्य
लेना चाहिए। सामान्य टंकित स्वरूप का
प्रसाद नहीं लेना चाहिए। ये शिव पुराण में
लिखा
है। अब एक और बात है।
के भले ही आपके स्थान में टंकित शिवलिंग
विराजमान है पर भगवान को भोग लगाकर
निवेदित कर दिया तो उसमें चंडाधिकार नहीं
फिर तो भगवत प्रसाद है और शालिग्राम शिला
लग्न होने से इसलिए महाराज जी कई प्राचीन
शिवालयों में शालिग्राम को ऊपर पधराकर
शिवलिंग के ऊपर तप पूजन होता है।
हरिहरात्मक पूजन होता है। कई जगह ऐसी
व्यवस्था है। आप पशुपतिनाथ जी गए हैं।
पशुपतिनाथ जी पशुपतिनाथ जी में नेपाल गए
ना पशुपतिनाथ जी पशुपतिनाथ जी में भगवान
पशुपतिनाथ का पूजन शालिग्राम जी के साथ ही
होता है। आज भी होता है। उनके साथ ही उनका
अभिषेक होता है। उनके साथ ही उनका स्नान
होता
है। इधर आसाम में शिवालय एक जगह है। वहां
प्राचीन शिवलिंग है। वहां सब बहुत प्राचीन
हजारों वर्ष प्राचीन शालिग्रामों के साथ
उनका पूजन होता है। इसका
भी निरूपण ग्रंथ में लिखा हुआ है। बोलो
भक्तवत्सल
भगवान की जय। और शिव जी के नैवेद्य के
बारे में लिखा
है कि शिव जी के प्रसाद का दर्शन करने से
पाप नष्ट हो जाते हैं और कोई श्रद्धा
पूर्वक शिव प्रसाद ग्रहण कर ले तो उसको
करोड़ों करोड़ों गुना पुण्य की प्राप्ति
हो जाती
है। जो शिव नैवेद्य को मस्तक झुकाकर
प्रणाम नहीं करता शिव स्मरण पूर्वक उसे
ग्रहण नहीं करता है वह मनुष्य नारकीय है
यह भी लिखा हुआ है शिव दीक्षा भक्तो महा
प्रसाद संकम
सर्वे
नैवेद्यम जो शिव दीक्षा से युक्त है वो
सभी शिवलिंगों का प्रसाद ले सकता है किंतु
जो शिव दीक्षा से युक्त नहीं है अन्य
दीक्षा शिव शिव भक्ति रतात्म नाम अन्य
दीक्षा लिए हुए हैं पर शिव भक्ति भी करते
हैं। ऐसे लोगों को शिव नैवेद्य भक्षण में
कौन-कौन शिव जी का पूजन प्रसाद लेना
चाहिए? बड़ा सुंदर श्लोक है। यह
विश्वेश्वर संिता के 22 वे अध्याय का 13वा
श्लोक है। 13वा 14वा
श्लोक शाल
ग्रामोभवे लिंगे
[संगीत]
रस लिंगे
तथाजा पाषाण राजते
स्वर्ण सुरस प्रतिष्ठते
[संगीत]
कश्मीरेटिक
रत्ने
ज्योतिर्लिंग
सर्वस चांद्रय
समोर नैवेद्य भक्षणम
[प्रशंसा]
एक शिवलिंग होते हैं शालिग्रामोभव
लिंग। आप जाएंगे नेपाल में जहां शालिग्राम
जी प्रकट होते हैं। दामोदर कुंड से
शालिग्रामी गंडकी प्रकट होती है।
शालिग्राम पर्वत है। मुक्ति नारायण
क्षेत्र है। वहां महाराज
जी शालिग्राम स्वरूप में शिव जी भी निकलते
हैं।
आपको सुनकर आश्चर्य होगा अपने राम जब पहली
बार गए पहली एक ही बार गई है अभी दोबारा
नहीं जाने का अवसर
मिला तो गंडकी जी में स्नान
किया तो हमने गंडकी जी से प्रार्थना
की कि यहां से शालिग्राम तो लेकर जाएंगे
ही पर आप प्रसन्न होकर हमें भी कोई स्वरूप
प्रदान करें
यद्यपि वहां तो जल तो ऐसा है कि बिल्कुल
बर्फ से भी ठंडा है क्योंकि हिमालय है
बिल्कुल ग्लेशियर पिघल के आता
है और हमको थोड़ी ठंड से तकलीफ भी हो जाती
है लेकिन फिर
भी साधुओं का जल से प्रेम ना हो तो काहे
बात का
साधु तो आज भी नदी मिल जाए तो फिर हम
जल्दी बाहर निकलते नहीं तो वही संध्यापासन
किया खूब ठंडा जल था बर्फ जैसा ठंडा वही
थोड़ा जप भी किया शरीर शून्य पड़ गया और
हमने गोता
लगाया तो एक शिवलिंग एक शालिग्राम हमारे
हाथ में आए वो आज भी हमारी सेवा में
विराजमान है बिल्कुल जलहरी सहित साक्षात
शिव
जी तो हमने कहा देखो
भगवती गंडकी ने हमको को ऐसा स्वरूप प्रदान
किया जो शालिग्रामो भवलिंग
है। हरि भी है और हर भी
है। अभी भी हमारी सेवा में विराज अति
दुर्लभ स्वरूप है। उनको दर्शन करो तो श्री
यंत्र जैसे भी लगते हैं और जलहरी सहित
शिवजी स्वयं हमारे हाथ में आए।
यह शालिग्राम लिंग का सबसे पहले नाम शिव
पुराण में लिखा है। शालिग्राम से ही और
महाराज जी शालिग्राम स्वरूप में अन्य
देवों के स्वरूप भी मिलते हैं। हमारे
ठाकुर जी की सेवा में शालिग्राम जी
विराजमान है। साक्षात
गणपति कोई मूर्तिकार के बनाए हुए नहीं
है। कोई भी व्यक्ति उनका दर्शन करके कह गए
साक्षात गणेश जी
बिल्कुल शरपकरण सुंड दंत एकदंत चरण सब कुछ
है उनके
श्री वो भी हमको वही
मिल तो हमको तो सब राम जी के ही रूप में
मिल गए राम जी की बड़ी कृपा है तो भगवत
कृपा से ये शालिग्राम लिंग रस लिंग माने
होता है पारद लिंग
और जो पाषाण लिंग रजत लिंग पाषाण लिंग का
अर्थ है बनाए हुए लिंग नहीं जो स्वाभाविक
किसी पवित्र नदी के गोल शिवलिंगाकार पाषाण
है वो पाषाण लिंग है राजत माने चांदी के
शिवलिंग स्वर्ण के शिवलिंग अथवा देवताओं
ने जिनकी प्रतिष्ठा की है अथवा जो केसर से
निर्मित शिवलिंग है केसर से भी शिवलिंग
बनाने की विधि
है। हम समझते हैं कि केसर को खूब गहरा घोट
करके चंदन के साथ और उसका गोला बनाकर फिर
उसके जलहरी के साथ शिवलिंग बनाने का विधान
होगा। उसी को कश्मीर लिंग कहा है। स्वटिक
लिंग, रत्न लिंग और ज्योतिर्लिंग, द्वादश
ज्योतिर्लिंग इनका जो प्रसाद है चांदायण
समम प्रोक्तम इनका प्रसाद एक बार कोई ले
ले तो चांद्रयण व्रत करने से जो पुण्य
प्राप्त होता है वो इनका प्रसाद लेने
मात्र से प्राप्त हो जाता है। ब्रह्म
हत्या जैसा पाप भी नष्ट हो जाता है। जो
शिव निर्माल्य को अपने मस्तक पर धारण करता
है जो शिव जी के प्रसाद का को ग्रहण करता
है भक्षतम तस सर्व पाप प्रति उसके संपूर्ण
पाप नष्ट हो जाते
हैं। अब जो बात हमने कही थी उसको हम फिर
कह रहे हैं। 16वा श्लोक है चंडाधिकारो
यत्रास्तव्य मानव चंडाधिकारो नो यत्रिता
जिसमें चंड गण का
अधिकार
है।
उस नैवेद्य को सभी लोगों को नहीं लेना
चाहिए। और जिसमें चंडाधिकार नहीं है उस
प्रसाद को श्रद्धा पूर्वक लेना चाहिए।
किंतु जो शिव दीक्षा से युक्त हैं, वह
चंडाधिकार वाले शिवलिंग का प्रसाद भी ले
सकते हैं। उनको कोई दोष नहीं।
अब अंतिम समाधान दे रहे हैं सूत जी 19 वे
श्लोक में बोले अगम शिव नैवेद्यम पत्रम
पुष्पम फलम जलम शालिग्राम शिला संग सर्वम
यात
पवित्रता जो लोग कहते हैं कि शिव नैवेद्य
चाहे पत्र हो पुष्प हो फल हो जल हो वह अग
है वो दोष भी शालिग्राम शिला संग जब
शालिग्राम जी कैसे शिव जी का पूजन होता है
तो सर्वम याति पवित्रताम सब कुछ ग्राह्य
हो जाता
है एक और बात है शिवलिंग के ऊपर चढ़ा दिया
उसमें किसी विशेष व्यक्ति का अधिकार है
किंतु जो बाहर निवेदित किया गया उसको कोई
लेता है पुराने जमाने में ब्राह्मण भी
माली आदि को शिवलिंग पर चढ़ा हुआ पदार्थ
दे देते थे मालियों को दे देते
गोसाइयों को दे देते थे और जो बाहर
निवेदित है वह ब्राह्मण लेते
थे। हमने तो यह भी देखा है कि नवग्रह की
पीठ की दक्षिणा ब्राह्मण नहीं लेते
थे। अब तो नवग्रह को ही खा जाए। नवग्रह
पीठ की दक्षिणा क्या है?
नवग्रह पीठ की दक्षिणा हमने अपने जिस
परिवार में जन्म लिया उसमें यही काम होता
था पीढ़ी दर पीढ़ी से पंडिताई वाला काम तो
हमने देखा वो कलश और वहां का जो कुछ भी
सामान दक्षिणा तो चढ़ती वहां पर उसको जोगी
को दे दिया जाता था या माली को दे दिया
जाता था उसको ब्राह्मण नहीं लेते थे
नवग्रह का नहीं लेते
थे इसलिए राहु केतु आदि का दान भी डकत जो
होते हैं उनको दिया जाता है। शनि राहु
केतु इनका दान ब्राह्मण नहीं
लेते। अब सब जय सियाराम हो
गए। तो इस प्रकार से
यह महिमा का वर्णन किया गया
[संगीत]
है। अब स्वामी जी सुन ले।
आज हमको पीपल को प्रणाम करना
था। तो एक जगह हम पीपल को प्रणाम करने गए।
आज शनिवार है। आज धर्म शास्त्र में लिखा
है पीपल के वृक्ष का स्पर्श अवश्य करना
चाहिए। प्रत्येक हिंदू सनातनी को आज पीपल
वृक्ष का स्पर्श उसमें यदि देसी गाय का
कच्चा दूध चढ़ावे तो बहुत अच्छी चीज है।
नहीं केवल जल ही चढ़ा दे और पीपल सबसे
अधिक पर्यावरण का शोधक वृक्ष है। पर्यावरण
को सबसे ज्यादा शुद्ध करता है
पीपल। अन्य वृक्षों के नीचे रात्रि में आप
नहीं रह सकते।
[संगीत]
क्योंकि वे कार्बन का विसर्जन करते हैं।
कार्बन डाई जो कार्बन डाई ऑक्सीजन
उसका ऑक्साइड उसका विसर्जन करते हैं। केवल
पीपल ऐसा है जो 24ों घंटे ऑक्सीजन देता
है। इसलिए रात्रि के समय भी पीपल के नीचे
रह जा सकता है। जिसको ऑक्सीजन की कमी है
वह पीपलों के बीच में रहे तो ऑक्सीजन की
बीमारी खत्म हो जाती है।
झांसी
में माता जी हैं वैद्यनाथ प्राणदा
वाली उनका चिकित्सा केंद्र है शतम
जीवा वहां उन्होंने एक पीपल का वन बनाया
है वो केवल इसलिए बनाया है प्राकृतिक
चिकित्सा का बहुत बढ़िया व्यवस्थित केंद्र
है हम भी दो बार तीन बार वहां रहे आए बहुत
अच्छा
तो वहां महाराज जी एक वन केवल पीपल का
बनाया है। इसलिए कि जिसके ऑक्सीजन लेवल कम
रहता है उसको वहां बिठाकर थोड़ी देर
प्राणायाम कराते हैं। वो वहां घूमे उससे
उसका ऑक्सीजन लेवल बढ़ जाता है। आज
प्रत्यक्ष चमत्कार है। यह प्रत्यक्ष
चमत्कार
है। पर पिंपल गांव में पीपल कम
है। तो गांव का नाम बदलना पड़ेगा फिर।
इसलिए भैया हमने यहां पूछा तो उन्होंने
बताया कि लोगों के मन में भावना है कि
पीपल को उखाड़ के फेंक देना चाहिए। पीपल
खराब होता है। यहां गांव के लोग ऐसा समझते
हैं। तो बोले यहां पीपल कोई रखता नहीं।
भैया पीपल बहुत पवित्र वृक्ष है। जैसी विल
वृक्ष की महिमा है ऐसे ही पीपल की महिमा
है। शनिवार के दिन लक्ष्मी जी के सहित
नारायण पीपल के नीचे सूर्योदय से
सूर्यास्त तक विराजते हैं। इसलिए जो चार
परिक्रमा शनिवार को पीपल की करता है। जल
चढ़ाता है। साष्टांग प्रणाम करता है।
माताएं पंचांग प्रणाम करें। पुरुष
साष्टांग प्रणाम करें और पीपल का स्पर्श
करें। वे हजारों जन्मों में भी दरिद्र
नहीं होते हैं। कभी उनके घर से लक्ष्मी का
अभाव नहीं
होता। घर में पीपल इसलिए नहीं लगाते हैं
क्योंकि घर में कोई शुद्ध अशुद्ध अवस्था
में कोई बच्चा गंदगी कर दे, कोई मलमूत्र
का त्याग कर दे या कोई माता अशुद्ध अवस्था
में उसका स्पर्श करे। उसका दोष है। इसलिए
घरों में लगाने की मनाई है। पर किसी के घर
में पहले से पीपल हो तो उसको कटवाना नहीं
चाहिए। उसको और बढ़िया उसकी उसकी व्यवस्था
बना के जिसमें उसकी छाया में कोई गंदगी ना
कर सके। बस फिर आप प्रेम से पूजा करो।
आपके घर में लक्ष्मी का निवास होगा।
पद्म पुराण में लिखा है 100 पीपल के पेड़
लगा दे तो उसके कुल में कभी दरिद्रता नहीं
आती। खानदान में पीढ़ी दर पीढ़ी में कभी
दरिद्रता नहीं
आती। तो एक पीपल मंगा लेना। हम आश्रम में
एक पीपल लगा के जाएंगे। जब जाएंगे तो एक
दिन पीपल लगा के जाएंगे। जिसमें हम जब
द्वारा आएंगे तो हमको इधर उधर ना जाना
पड़े। हम आश्रम में पीपल का स्पर्श कर ले।
ठीक है? आप लोग भी अपने खेत में खलिहान
में जगह जगह पीपल लगाओ। पिंपल गांव है। इस
गांव के नाम को ठीक रखो। नहीं तो सब
गड़बड़
है। पिंपल गांव में पीपल कम मिले यह ठीक
नहीं है। इसलिए भैया खूब पीपल लगाओ। पीपल
कोई बहुत पवित्र वृक्ष है
पीपल। अब हम बिल्व की महिमा का वर्णन कर
रहे हैं। बिल्व की महिमा का श्रवण करो।
यह सामने विल्व की माला ही शिव पुराण को
धारण है। और भगवान के प्रसाद रूप में हमने
भी विल पत्र की माला को धारण किया हुआ है।
बड़ी प्रसन्नता है। तुलसी दल की माला विल
पत्र की माला बहुत पवित्र मानी गई
है। पुण्य तीर्थानी
यावती बातचीत मत करो। बाबा रामचंद्र दास
कथा सुनो बातचीत मत करो।
पुण्य ती
यावती लोके सुत
प्रथ्य तानी सर्वाण
ती मूल
[संगीत]
वसती अच्छा एक बात
बताओ
आप विचार करो निश्चय करो कि हम सारी धरती
के तीर्थों में जाकर दर्शन करेंगे स्नान
करेंगे तो क्या संभव है? इतने तीर्थ हैं
कि कोई ना कोई छूट जाएगा। पर महाराज जी
लिखा है कि बिल्व वृक्ष के मूल में धरती
के संपूर्ण तीर्थ विराजमान है। जहां विल्व
का वृक्ष है वहां सारे तीर्थ विराजमान
[संगीत]
है। संसार में जितने प्रसिद्ध अप्रसिद्ध
तीर्थ हैं सब बिल वृक्ष के मूल में है।
बिल्व मूले महादेवम लिंग
रूपम पूजे पुण्यत्मा सवं
प्राप्त बिल्व के मूल में जो शिव जी का
अभिषेक करता है शिवलिंग को स्वीकार करके
अभिषेक करता है वह पुण्य आत्मा शिव जी को
प्राप्त करता है इसमें संदेह नहीं है
बिल्व के मूल में साक्षात शिवजी
है बिल्व वृक्ष का थाला बनाकर के थाला
जानते हो ना घरवा बना के जिसमें जल भरा
जाए और उस जल से जो अपने सिर को सींचता है
उसने धरती के सारे तीर्थों में स्नान कर
लिया विल मूल जलस्त
मुति सर्व
[संगीत]
तीर्थ वो धरती पर पवित्र
[संगीत]
है कहते जो अपने बिल वृक्ष को लगाता है।
उसमें थाला बनाता है और उसको जल से
परिपूर्ण करता है। तो भगवान देखकर शिव
प्रसन्न हो जाते हैं और उस व्यक्ति पर
द्रवित हो जाते हैं। इसने वृक्ष रूप में
मेरा अर्चन करके मुझे प्रसन्न कर लिया है।
जो विल वृक्ष का गंध पुष्प आदि से पूजन
करता है। उसे शिवलोक की प्राप्ति होती है
और उसकी संतति की भी और सुख की भी उसे
प्राप्ति होती है। बस सोमवार के दिन बिल
वृक्ष का पत्र नहीं तोड़ना चाहिए और
अमावस्या पूर्णिमा संक्रांति को भी बिल
वृक्ष का पत्र नहीं तोड़ना चाहिए। पूजन
नित्य किया जा सकता है। तो फिर एक दिन
पूर्व बिल पत्र उतार ले दूसरे दिन शिव जी
की पूजा के लिए 15 दिन तक भी बिल पत्र
बासी नहीं माना जाता है। परित नहीं माना
जाता है। 15 दिन तक भी वह
ताजा ही माना जाता है। ऐसा शास्त्रों में
लिखा हुआ
है। जो बिल वृक्ष के निकट दीप दान करता
है, दीप माला करता है, वह तत्व ज्ञान
संपन्न होकर भगवान शिव को प्राप्त करता
है। महादेव के सानिध्य को प्राप्त करता
है। और जो बिल्व शाखा को हाथ से पकड़ कर
उसके छोटे छोटे नए पल्लव ग्रहण करके भगवान
शिव की पूजा करता है वह संपूर्ण पापों से
मुक्त हो जाता है। और जो बिल वृक्ष की जड़
में किसी शिव भक्त ब्राह्मण को भोजन कराता
है अथवा शिव भक्त यति को साधु सन्यासी को
भोजन कराता है उसको एक ब्राह्मण को भोजन
कराने पर एक करोड़ ब्राह्मण को जमाने का
पुण्य प्राप्त होता है। एक साधु को जमा दो
तो एक करोड़ साधु जमाने का पुण्य प्राप्त
हो जाएगा। इतनी विल की महिमा
है। और क्या करना चाहिए?
बोले देखो बिल वृक्ष की जड़
में बढ़िया वेद लक्षणा भारतीय देसी गाय के
अधोटा दूध की खीर ऐसा लिखा है खीरम युक्तम
अन्न माजन
संयुक्तम बढ़िया सुंदर गाढ़ी खीर जिसमें
घी पड़ा हुआ हो कुछ शहद भी पड़ा हुआ हो
इलायची मेवा वगैरह पड़ा हुआ हो ऐसी सुंदर
अधोटा दूध की रबड़ी को लज्जित करने वाली
खीर किसी ब्राह्मण को किसी संत को किसी
शिव भक्त को तृप्त तृप्ति पूर्वक जमा दो
तो सा दरिद्रो न जाते वो कभी दरिद्र नहीं
होता है जिनके घर में देसी गैया है वह
प्रयोग कर सकते हैं ज्यादा प्रयोग नहीं
करना तो स्वामी जी को बिलाकर जमा देना घर
में देसी गैया हो बेल का पेड़ हो तो
बढ़िया अधोटा दूध की खीर बनाकर स्वामी जी
को जिमा देना
एक करोड़ साधु जमाने का पुण्य आपको मिल
[संगीत]
जाएगा। इस प्रकार से बिल्व की बड़ी भारी
महिमा का वर्णन है। बिल वृक्ष को काटने का
निषध किया गया। बिल वृक्ष को काटना नहीं
चाहिए। बिल वृक्ष को काटने से बड़ा दोष
लगता है। बहुत से लोग क्या करते
हैं? बेल पत्री लेने वाले लोग पूरा पेड़
का पेड़ जय आराम कर देंगे। सावन
में बिल्व के पेड़ बेचारे हाहाकार करते
होंगे। क्यों? इतना ज्यादा लोग उसको
परेशान करते हैं। पता चल जाता है कि सावन
महीना आ गया। पत्ता ढूंढना मुश्किल हो
जाता है। भैया खूब ज्यादा विल वृक्ष लगाओ।
ऐसी तुलसी भक्ति मत करो कि तुलसी का पौधा
ही संकट में पड़ जाए। ऐसी शिव भक्ति मत
करो कि बिल वृक्ष ही संकट में पड़ जाए।
उसी तरह की सेवा करना चाहिए जिससे वृक्ष
को नुकसान ना हो। अब बट सावित्री व्रत आता
है अमावस्या का तो बट के पास तो लोग अब
जाते नहीं। बंबई कोलकाता में क्या करते
हैं? बट के पेड़ की डाली मंगा मंगा के
पूजा कर लेते हैं। तो कहा तो पेड़ लगाना
चाहिए। और महाराज उस तिथि पर पर्व आने पर
लाखों लोग वट वृक्ष की शाखाएं लेते हैं और
एक प्रकार से वृक्ष का बड़ा नुकसान होता
है। संत मलूक दास जी ने
कहा बट पीपल और विलब नहीं हरी डाल मत
तोड़िए।
किसी भी वृक्ष की हरी डाली को मत। हरी
डाल मत
तोड़िए। लागे
छुरा
[संगीत]
बान आप किसी धारदार हथियार से किसी को
स्पर्श करेंगे तो उसको पीड़ा होगी कि नहीं?
दास
मलूका यू कहे अपना साउ जाने।
आपकी कोई उंगली काट दे आपको कितनी पीड़ा
होगी।
किसी वृक्ष को निरर्थक वृक्ष छेदन
जब ब्राह्मणों का उपाकर्म होता है श्रावण
उपाकर श्रावणी कर्म उस समय जो महा संकल्प
बोला जाता है उसमें निरर्थक वृक्ष छेदन यह
भी बोला जाता है व्यर्थ में यदि किसी
वृक्ष को हम काटते हैं उसका पाप हमको
लगेगा यज्ञ के लिए किसी विशेष कार्य के
लिए आपने लिया है तो कोई हानि नहीं
है। भस्म रुद्राक्ष और शिव नाम के महात्म
का वर्णन है। ऋषियों ने कहा महाराज भस्म
का महात्म रुद्राक्ष का महात्म और भगवान
शिव के पवित्र नाम के महात्म का आप वर्णन
करें।
सूत जी ने कहा आपने बहुत पवित्र प्रश्न
पूछा है। आप सबका कुल धन्य है। आपका शरीर
धारण करना सफल है। जो शिव उपासना की इतनी
सुंदर बात आप पूछ रहे
हैं। शिव नाम कितना पवित्र है।
शिव नाम मुखे
यस सदा शिव
[संगीत]
शिव
[संगीत]
[प्रशंसा]
[संगीत]
पासवराकम
यथा जिसके मुख में शिव नाम है जो सदा शिव
शिव शिव शिव शिव शिव शिव शिव शिव शिव शिव
ऐसा उच्चारण करता है उसे पाप का स्पर्श
नहीं होता।
जैसे खैर के अंगार खैर की लकड़ी जलाकर जो
अंगार होते हैं वह बहुत ज्यादा धकते हैं।
उस खदीरा अंगार को छूते ही कोई चीज जल
जाती है। ऐसे ही शिव नाम लेने वाला खैर के
अंगार के समान तेजस्वी होता है। उसको पाप
छूकर भस्म हो जाता है। पाप का स्पर्श उसे
नहीं होता।
भगवती सती देवी कह रही है श्रीमद् भागवत
चतुर्थ स्कंद दक्ष यज्ञ के प्रकरण में सती
जी कह रही
यक्षम
नाम
गिरेमणा सक प्रसंगा दगमा सु
यक्षम नाम गिरे
सक प्रसंगा दगमा
सु पवित्र
कीर्तम
शासनम
शिवम भगवती सती कह रही है अरे पिता
दक्ष जिन भगवान शिव का पवित्र नाम धोखे से
मुख से निकल जाए शिव शिव ये धोखे से मुख
से निकल
जाए तो संपूर्ण पाप नष्ट हो जाते
हैं। ऐसे भगवान शिव से विद्वेष तुम्हारे
जैसा ही कोई अज्ञानी कर सकता
है। भरत
जी जो द नाम अपराध
है द नाम अपराध 32 सेवा अपराधों से बचकर
सेवा करनी चाहिए। द नाम अपराधों से बचकर
नाम जप करना चाहिए। द नामा अपराधों में
भगवान के नामों में और शिव जी के नामों
में भेद करना यह नाम अपराध
है। फिर से सुन
लो। जो महिमा राम नाम की है वही महिमा शिव
नाम की है। जो महिमा कृष्ण नाम की है वही
महिमा शिव नाम की है।
जो लोग कहते नहीं राम नाम की महिमा ज्यादा
शिव नाम की नहीं है अथवा शिव नाम की
ज्यादा है राम नाम की नहीं है उनको नामा
अपराध लग जाता है हरि और हरि के नाम में
भेद करना वो नामा अपराध
है अब लोगों ने इसका अर्थ भी बदलने की
कोशिश की है। इसका अर्थ भी लोग बदल देते
हैं।
लेकिन यह शास्त्र के प्रति अपराध नहीं
करना
चाहिए। पूरे ग्रंथों को देखो, बिना किसी
दुराग्रह के देखो, बिना किसी पक्षपात के
देखो तो सिद्धांत का अनुभव आपको हो जाएगा।
इसलिए हम निवेदन करते हैं भगवान कृष्ण
द्वपायन व्यास जी ही संपूर्ण वैदिक आस्तिक
सनातन धर्मियों के एकमात्र
आचार्य और जितने आचार्य हैं वह सब उनके
अनुवरती है। व्यास ही तो सबका प्रमाण
है। इसलिए व्यासम जगत सर्वम और व्यास वाणी
का आश्रय लेकर के आप चलेंगे तो हरि हर
रभदा हरि हर में भेद नहीं जब हरि हर में
भेद नहीं तो हरि हर के नाम में भी भेद
नहीं
है गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज ने तो
क्या कहना महाराज विनय पत्रिका में एक ऐसा
विलक्षण पद है
जिसका नाम है हरि शंकर क्या नाम है
उसका हरि शंकर हरि शंकर का अर्थ होता है
उस पद में छंद
में क्या भगवान की लीला हम छूते ही वही पद
प्रकट हो
गया एक ही पद में हरि और हर दोनों के नाम
ऊपर की पंक्ति में भगवान नारायण के राम
कृष्ण नारायण के
नाम और फिर दूसरी पंक्ति में शिव जी के
नाम बड़ा पवित्र पद
है। तनुज बन दहन
गुण गहन
गोविंद
नंदादी
आंदाता
विनाशी शंभू शिव
रुद्र
शंकर
भयंकर भीम घोर
तेजा तन क्रोध
रा
अनंत
भगवंत
जगदंत अंत
कत्रास शमन श्री
रमण
भवना भू धराधी
जगदीश
ईशान
विज्ञान घन
ज्ञान
कल्याण
[प्रशंसा]
धाम
वाना
व्यक्त
पावन
परावर
विभ प्रकट
परमात्मा प्रकृति
[संगीत]
स्वामी चंद्र
शेखर शूल
पानी हर अनग अज
अमित
अविछिन
वृषभ का
नील जल
दाब तनु
श्याम बहु काम छवि
[प्रशंसा]
राम
राजीव
लोचन
कृपाला
कंबु
कर्पूर बपु
धवल निर्मल
मौली जटा सुर
तटिनी शित सुमन
माला बसन किजिल
धर चक्र
सारंग
धर कंज को मो की अति
विशाला मार कर
मत मृगराज
त्रने हर नवमी
अपहरण संसार
जाला
कृष्ण करुणा
भवन धवन
काली
खल विपुल
कंसाद निरवंशकारी
त्रिपुर मद भंग
कर मत गज
च अंध
कोकस
पगारी ब्रह्म
व्यापक अकल सकल
परम
हित ज्ञान
गोती गुण व
[संगीत]
हर्ता सिंधु सुत गिर
वज्र
गौरी
समव दक्ष मख
अखिल
विध्वंस
[संगीत]
करता भक्ति प्रिय भक्त जन काम दुख देनु
हरि हरण
दुर्घट
विकट विपत्ति
भारी सुखद नर
वरद विरज
अनल विपिन
[संगीत]
आंद अंतिम में कह रहे हैं गोस्वामी जी
रुचिर हरि
शरी नाम
मंत्र ये हरि शंकर नाम मंत्रावली है एक
में हरि दूसरे में शिव इनके नाम मंत्रों
की यह श्रेणी है। दुख द्वंद दुख
हरनी
आंद
खानी द्वंद दुखों का हरण करने वाली आनंद
की खान है। विष्णु शिव
लोक सो पान समति
[प्रशंसा]
तुलसी विदास विद
जो इस हर शंकरी पद का नित्य पाठ करता है
उसको विष्णु लोक भी प्राप्त होता है
शिवलोक भी प्राप्त होता दोनों जगह ज्यादा
क्योंकि दोनों की सीढ़ी ही
है इसका मतलब है एक को करोगे तो एक ही जगह
रह जाओगे और ये हरि शंकर ही करोगे तो जब
इच्छा हो तब गोलोक वैकुंठ साकेत में रहो
और जब मन हो तब शंकर जी के पास चले जाओ जब
शंकर शंकर जी के पास से मन करे तो वैुंठ
चले जाओ। यह तुलसीदास जी महाराज बोल रहे
ये वैुठ और शिवलोक का सोपान है। यह हरि
शंकरी नाम मंत्रावली इसका जो पारायण करते
हैं उनको शिवलोक विष्णु लोक दोनों की युग
प्राप्ति हो जाती है। बोलो भक्तवत्सल
भगवान की
जय। इसलिए शिव जी के पवित्र नाम का खूब जप
करना चाहिए।
क्या करना चाहिए? श्री शिवाय
नमस्तुभ्यम मुखम व्याते सदा यदा तनुखम
पावनम तीर्थम सर्व
पाप श्री शिवाय नमस्तुभ्यम इसको जो
बार-बार अपने मुख से कीर्तन करता है उसका
मुख तीर्थ है उसका दर्शन करने वाले के पाप
नष्ट हो जाते
हैं तो हम लोग थोड़ी देर इसका कीर्तन कर
ले
श्री शिवाय
नमस्तुभ्यम श्री शिवाय
[संगीत]
नमस्तु शिवाय
[संगीत]
नमस्तुभ्यम श्री शिवाय
नमस्तुभ्यम
सभी
शिवाय
नमस्तुभ्यम श्री शिवाय
नमस्तुभ्यम शिवाय
[संगीत]
नमस्तुभ्यम शिवाय
नमस्तुभ्यम एक भी व्यक्ति बाकी नहीं रहना
चाहिए जिसके मुख से भगवान शिव का पवित्र
नाम
निकले नहीं समझ
लेना जो नाम लेने वाले हैं उनके पाप कही
ना कहीं तो जाएंगे
जो नाम नहीं लेंगे कीर्तन नहीं करेंगे
उनके सिर पर चढ़ जाएंगे खोपड़ी पर चढ़ जाएंगे
इसलिए भैया अपनी खोपड़ी पर पाप मत
चढ़ाओ गाइए पूरे उत्साह
से श्री
शिवाय
नमस्तुभ्यम श्री शिवाय
नमस्तुभ्यम श्री शिवाय नमस्तुभ्यम
श्री शिवाय
नमस्तुभ्यम श्री शिवाय
नमस्तुभ्यम श्री शिवाय
नमस्तुभ्यम श्री शिवाय
नमस्तुभ्यम श्री शिवाय
नमस्तुभ्यम श्री शिवाय
नमस्तुभ्यम श्री शिवाय
नमस्तुभ्यम श्री शिवाय
नमस्तुभ्यम श्री शिवाय
नमस्तुभ्यम श्री शिवाय
नमस्तुभ्यम श्री शिवाय
नमस्तु श्री शिवाय
नमस्तुभ्यम श्री शिवाय नमस्तुभ्यम
श्री शिवाय
नमः श्री शिवाय
नमः श्री शिवाय
नमः श्री शिवाय
नमः शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा
शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा
शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा
शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा
शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा
शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा
शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा
शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा
शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा
शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा
शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा
शिवा शिवा शिवा
शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा
शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा
शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा
शिवा
शिवा श्री शिवाय
नमस्तु श्री शिवाय
नमस्तु श्री शिवाय
नमस्तु श्री शिवाय नम
श्री शिवाय
नमस्तुभ्यम श्री
नमस्तुभ्यम श्री
नमस्तुभ्यम श्री शिवाय
नमस्तुभ्यम शिवाय
नमस्तुभ्यम श्री नमोस्तु जब से कथा शुरू
है तब
नमोस्तु श्रीय
नमस्तुभ्यम बार इशारा कर आप नहीं समझ ये
माइक बंद है ये बंद
[संगीत]
है भाई तो लगा नहीं रहे पैसा लोगे बाबा जी
से ठीक करो
[संगीत]
इसको श्री शिवाय नमस्तुभ्यम
श्री शिवाय
नम शिवाय
नम शिवाय
नम श्री शिवाय
नम शिवाय
नम शिवाय
नम शिवाय
नम शिवाय शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा
शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा
शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा
शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा
शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा
शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा
शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा
शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा
शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा
शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा शिवा
शिवा शिवा श्री शिवाय
श्री शिवाय
नम श्री शिवाय
नम शिवाय
नम श्री शिवाय
नमस्तुभ्यम श्री शिवाय
नमस्तुभ्यम श्री शिवाय
नमस्तुभ्यम शिवाय
नमस्तुभ्यम श्री शिवाय
नमस्तुभ्यम मुख्या हरते यदा
[संगीत]
पावन
तीर्थम सर्व पाप
प्रणाम श्री शिवाय
[संगीत]
[प्रशंसा]
नमस्तुम सर्व पाप
विनाम श्री शिवाय
नमस्तुभ्यम श्री शिवाय
नमस्तुभ्यम शिवाय नमस्तुभ्यम
श्री शिवाय
नमस्तुभ्यम श्री शिवाय
नमस्तुभ्यम श्री शिवाय
नमस्तुभ्यम श्री शिवाय
नमस्तुभ्यम शिवाय
[प्रशंसा]
नम्य हर हर
महादेव
महादेव
[प्रशंसा]
महादेव महादेव
[प्रशंसा]
महादेव
महादेव
महादेव
महादेव
[प्रशंसा]
महादेव अच्छा एक बात बताओ बैठ जाओ सभी
तीर्थराज प्रयाग में जाकर त्रिवेणी संगम
में किस किस ने स्नान
किया? बहुत लोगों ने हाथ खड़े किए। बहुत
लोगों ने तो अभी सुना ही नहीं।
लेकिन बहुत से लोग ऐसे बच गए होंगे
जिन्होंने नहीं कर पाया होगा
स्नान। आप लोग अपने मन में ग्लानि का
अनुभव नहीं करना।
अब हम आपको ऐसा उपाय बता रहे हैं कि आपका
रोज त्रिवेणी स्नान हो
जाएगा। रोज
नित्य दो पैसा खर्च नहीं होंगे। त्रिवेणी
स्नान रोज हो
जाएगा। क्या उपाय बताओ?
त्रिवेणी में तीन धाराएं हैं। श्री गंगा
जी, श्री यमुना
जी और श्री सरस्वती
जी। ये तीन धाराएं त्रिवेणी संगम में है।
सीता सीते यत्र तरंग
चामरे सती राजो जयति प्रयाग। यह त्रिवेणी
है।
इसमें शिव
नाम बहुत ध्यान से सुने शिव
नाम विभूति
भस्म और
रुद्राक्ष ये तीनों त्रिवेणी
शिव नाम गंगा
है। श्री भस्म सरस्वती
है। और रुद्राक्ष यमुना
है। जो भस्म धारण करता
है जो शिव नाम लेता
है और जो रुद्राक्ष धारण करता है उसका तो
नित्य त्रिवेणी
स्नान कितनी महिमा है त्रयम यत्र
सदामजा दर्शन
मात्र जिसके मस्तक पर भस्म हो
जिसके कंठ में रुद्राक्ष हो, जिसके मुख
में शिव नाम हो, ऐसे व्यक्ति का दर्शन
करने वाले को भी त्रिवेणी स्नान का पुण्य
मिल जाता
है। हमारे
यहां पुराने संतों में तो सब पहले विभूति
धारण करते थे।
अभी भी कुछ त्यागी तपस्वी संतों ने उस
परंपरा को जीवित रखा है। उन संतों के
चरणों में हमारा प्रणाम है।
देखिए अब समय ऐसा आ गया स्वामी
जी के पुरानी रेक-टेक वेशभूषा वाले संत अब
दुर्लभ होते चले जा रहे हैं।
धीरे-धीरे आप लोग बुरा मत मानना। और बुरा
मानो तो हमारा कोई घाटा नहीं है। क्यों?
बुरा मानोगे तो हमको नहीं कहोगे कि यहां
आओ तो हमको कोई ना कहे कि आओ यह हमारे ऊपर
भगवान की सबसे बड़ी कृपा होगी। क्योंकि
हमारे मन से हमको कहीं जाने की इच्छा ही
नहीं होती।
यहां तो हम केवल स्वामी जी के प्रेम से
खींचे हुए आए
हैं। बाकी कोई अपेक्षा नहीं है।
बहुत दुनिया में भटक ली। भटकने की ज्यादा
इच्छा नहीं है। पर पता नहीं प्रारब्ध कब
तक ललाट पर किशोरी जी ने लिखा हुआ है। तब
तक तो भटकना पड़ेगा। यह बात
है। बाकी कहीं आने जाने का मन नहीं होता।
विरक्त संतों को जो दीक्षा दी जाती है,
विरक्त वेश दिया जाता है, सन्यास वेश दिया
जाता है। तो हम बड़ी विनम्रता से पूछते
हैं के चड्डी बनियान देते हैं
गुरुजी के कुर्ता पैजामा देते हैं गुरु
जी कि यह कुर्ता और चौबंदी और यह अमुक
तमुक देते क्या देते हैं गुरु जी ईमानदारी
से बताना सब साधु साधु बैठे घर के लोग
बाहर का कोई
नहीं। यही कहते हैं ना महाराज जी अचला
लंगोटी। इसका मतलब है अचला लंगोटी ही
हमारा पारंपरिक स्वरूप है। मनमाने तरीके
से अब ये ठीक है जो बेचारे बड़े बूढ़े हैं
शिला कपड़ा पहन लेते कोई बात नहीं। लेकिन
जहां तक चले वहां तक संतों की पुरानी रहनी
से ही रहना चाहिए। हमारे पूज्य सदगुरुदेव
श्री पहाड़ी बाबा महाराज बहुत बड़ी आयु तक
विराजमान रहे। हे महाराज जी अपने पूरे
जीवन में कभी शिला वस्त्र स्पर्श नहीं
किया। ना जूता ना छाता ना चप्पल ना खड़ा
कुछ नहीं लिया। एक ब्रह्म पात्र और 10
महीना तो एक लंगोटी पर ही रहते थे। दो
महीना के लिए एक अचला पहन लेते थे। बस एक
अंडी ओढ़ ली अचला पहन लिया।
एक बंगला भाषा की कहावत है शरीर नाम महाशय
जे सहाय से यह शरीर ही महाशय है महापुरुष
है इसको आप जैसा बनाओगे वैसा बन
जाएगा पूज्य
गुरुदेव श्री वीणा बाबा
महाराज आर स्वामी श्री पार्वतीकर जी
महाराज
आंध्र प्रदेश का शरीर था उनका दक्षिण भारत
का पवित्र विप्र का जन्म था विरक्त साधु
थे माधव संप्रदाय के साधु
थे दक्षिण में तो ठंड पड़ती
नहीं पड़ती है बहुत कम आंध्रा में
तमिलनाडु में कहां ठंड पड़ती है
गर्मी वहां का तो उनका का शरीर
था। उनका काल स्नान का नियम था। तो अभ्यास
करते करते इतना अभ्यास महाराज जी उन्होंने
किया था कि बद्री नारायण में रहते थे और
तप्त कुंड में नहीं अलकनंदा में तीन बार
गोता लगाकर स्नान करते थे। कितना ठंडा
पानी अलकनंदा का। त्रिकाल संध्या करते थे।
गीले वस्त्र से अपनी कुटिया तक पहुंचते
थे।
लोग कहते चाय पिए बिना काम नहीं चलेगा। गम
चीज तो खानी पीनी पड़ेगी। वहां रहकर छाछ
पीकर भजन किया। उन्होंने देवर्षि नारद जी
का दर्शन उनको हुआ। गरुड़ जी का दर्शन
उन्हें हुआ। भगवान नारायण का दर्शन हुआ
उन्हें प्रत्यक्ष और भैरव राग का उन्हें
दर्शन हुआ। बद्रीनाथ जी का कीर्तन
उन्होंने बनाया। बहुत सुंदर बड़े-बड़े
महापुरुष उनका दर्शन करने जाते थे। सेठ
श्री जयदयाल गोयनका जी उनका दर्शन करने
गए। भाई श्री हनुमान प्रसाद पोदार जी उनका
दर्शन करने
गए। वीणा बाबा बद्रीनाथ भगवान को सवेरे
वीणा सुनाते
थे। तो दास के ऊपर बड़ी कृपा थी। कुछ हमको
भी उन्होंने वीणा का सरगम सिखाया था।
थोड़े दिन हमको भी संगीत सिखाया
उन्होंने। अब उनका शरीर नहीं है। बहुत
अच्छे महापुरुष थे। बड़े पवित्र आत्मा
दिव्य आत्मा थे।
वो कहते थे अभ्यास करते करते दास को ऐसा
अभ्यास हो गया कि अलकंदा में भी तीन बार
गोता
लगाता और ठीक
है हमने कहा गुरु जी आपको ठंड नहीं लगती
बोले आपके गुरु जी ने हमको कोई ऐसी जोग
जुक्ति बता दी है कि हमको वहां भी पसीना आ
जाता है
युक्ति मुक्ति बता दी है गुरु महाराज ने
पहाड़ी बाबा ने महाराज जी को गुरु मानते
थे वो योग योग विद्या का गुरु महाराज जी
को मानते
हैं। इसलिए संतों को अपनी रेक टेक मर्यादा
में पुरानी वेशभूषा में रहना चाहिए। श्याम
सुंदर दास जी महाराज अखंड विभूति चढ़ाओगे
तो कपड़ा पहनने की जरूरत
रहेगी। फिर कपड़ा सुहाता नहीं है। विभूति
धारण करने वाले संतों को कपड़ा सुहाता
नहीं है। अच्छा नहीं लगता।
हटाओ और एक फायदा आपको बताएं
आपको
बढ़िया विभूति गीले शरीर पर चढ़ाई जाती है
और फिर विभूति पलटी जाती है। चढ़ाने का
मंत्र अलग है। पलटने का मंत्र अलग है। और
अखंड विभूति चढ़ा हुआ साधु।
ट्रेन में जाए तो उसके सटके कोई नहीं
बैठता। कपड़ा खराब हो जाएगा।
और माई दाई तो दूर भक्ति
है। इसलिए विभूति चढ़ाना इसलिए भी बढ़िया
है कि माया चिपकती नहीं है। आपको भरी बस
में भी जगह मिल जाएगी। बोलो वृंदावन
बिहारी लाल की
हमारे महाराज जी पहाड़ी बाबा महाराज ने
कहा बच्चा अब दुखो हमारी परंपरा विभूति की
है। तीन दिन विभूति तो कम से कम चढ़ा लो।
हमने कहा ठीक है जो आज्ञा
महाराज महाराज जी ने विभूति का भी संस्कार
किया यह गुरुजनों की कृपा है अब धीरेधीरे
विभूति धारी संत भी विलुप्त होते चले जा
रहे सब जैकेट और कुर्ता और चौबंदी और
लहंगा फरिया पहन वाले हो गए अब बुरा नहीं
मानना अब मठ मंदिरों में भी देवियों का
प्रवेश होने लग गया भैया विरक्तों के लिए
इससे इससे बड़ी शर्मनाक और कोई दूसरी बात
नहीं। माताओं को अपने घर में ही रहकर भजन
करना
चाहिए। उनके मन में वैराग्य है, त्याग है,
भजन का भाव है तो माता-पिता की सेवा करते
हुए भजन करो।
सन्यास वेशभूष बना के घूमना फिरना अब तो
दुख की बात है महाराज जी कैसी दुर्दशा हो
गई जो ना स्त्री है और ना पुरुष हैं
उन्हें जगतगुरु बनाया जा रहा उन्हें
महामंडलेश्वर बनाया जा रहा है अब की बार
कुंभ में ज्यादा भीड़ वही थी संतों के
दर्शन में भीड़ नहीं थी जो देखो सब वही जा
रहे थे जीवन सफल बनाने के
लिए जिस देश की मूल भाषा संस्कृत
है। उस देश में लोगों ने हिजड़ों को
किन्नर कह
दिया। किस शब्द कोश में लिखा है? किन्नर
माने होता
है। देवताओं की एक जाति है उसको किन्नर
कहा जाता
है। स्त्रीत्व और पुरुषत्व से विहीन
व्यक्ति को किन्नर नहीं कहा जाता।
हम उनके विरोधी नहीं
है। पुरुष नपुंसक नारीवा जीव चराचर कोई
गोस्वामी जी ने कहा
है जो सर्व भाव से मुझे भजता है मोह परम
प्रिय
सो स्त्री पुरुष नपुंसक सबको भजन करके
आत्म कल्याण का अधिकार है। लेकिन साधु
होने की, सन्यासी होने की, आचार्य पद पर
बैठने की, महामंडलेश्वर होने की एक
मर्यादा है प्राचीन। उस मर्यादा का
नाश बड़े पदों पर बैठे हुए लोगों को नहीं
करना चाहिए।
धीरेधीरे सब नष्ट भ्रष्ट होता चला जा रहा
है। बोलो भक्तवत्सल भगवान की
जय। महाराज जी शिव पुराण में लिखा 12 वर्ष
केवल विभूति चढ़ावे तो पशु बंधन से मुक्त
हो जाता। पशु बंधन माने जीव का माया के
बंधन में रहना यही पशुता है। केवल 12 वर्ष
विभूति धारण करे तो वह जीव बंधन से माया
के अविद्या के बंधन से मुक्त होता है। पर
एक बात और सुन लो। खरी खरी बात है। बुरा
मानो तो मान जाओ। विभूति चढ़ाओगे और खूब
व्यसन करोगे और खूब झूठ
बोलोगे तो खाली विभूति तुम्हारा कल्याण
नहीं करे। विभूति के साथ फिर वैसा तपो
युक्त जीवन हो, पवित्र जीवन हो, साधन
संपन्न जीवन हो तभी लाभ होगा। सब तरह से
एक तरह से बात नहीं बनती स्वामी जी सब तरह
से विचार करके जब जीवन बहुत धर्म और
सदाचार से युक्त होता है तब बात बनती
है एतत्रय महा पुण्यम त्रिवेणी सदसतम ये
विभूति रुद्राक्ष और भस्म भस्म रुद्राक्ष
और शिव नाम ये त्रिवेणी के समान
है विभूति
भाले नांग रुद्राक्ष धारणम नासोम
वाणी अब ये त्रिवेणी कौन सी
है शवम नाम यथा
गंगा विभूति यमुना मता
रुद्राक्षम
विधिजा सर्व पाप
विनाश शिव नाम गंगा है
रुद्राक्ष यमुना है और भस्म जो है वह
साक्षात सरस्वती है। ये गंगा यमुना
सरस्वती ये तीनों है।
ब्रह्मा जी ने
तराजू स्थापित की। एक पल पर त्रिवेणी
स्नान का पुण्य रखा। एक पल पर विभूति
रुद्राक्ष और शिव नाम का पुण्य रखा। तो
कहते विभूति रुद्राक्ष शिव नाम का पुण्य
ज्यादा भारी हो गया। इसका मतलब है इसकी
इतनी महिमा
है। आपने नाम सुना है माधव गौड़ी संप्रदाय
के एक महान सिद्ध संत
थे श्री ठाकुर विजय कृष्ण
गोस्वामी जटिया बाबा के नाम से प्रसिद्ध
थे। उनके शिष्य कुलदानंद ब्रह्मचारी हुए।
उन्होंने सद्गुरु संग लिखा है। वह पूरी
परंपरा सिद्धों की परंपरा है। उनके संतों
के चरित्र जरूर पढ़ने चाहिए। ऐसा है।
सद्गुरु संग पढ़ने योग्य है। जगन्नाथ पुर
में जटिया बाबा की समाधि
है। बड़े दिव्य महापुरुष थे जटिया बाबा।
गौ परंपरा
को और गौ में भी आचार्य वंश के थे श्री
अद्वैताचार्य जी जिनसे चैतन्य महाप्रभु ने
पढ़ा था जो महान आचार्य चैतन्य अवतार के
जो मुख्य घटक थे अद्वैताचार्य प्रभु उनके
वंश में उनका जन्म
हुआ श्री
ठाकुर विजय कृष्ण गोस्वामी जटिया
बाबा तो जटिया
बाबा जटा थे उनके बहुत बड़े
बड़े जो जटा तो धारण करते ही
थे का वस्त्र धारण करते थे
और तुलसी के मोटे मोटे कंठा पहनते थे।
उसमें रुद्राक्ष भी पहनते
थे। तो उस जमाने में बहुत पुरानी बात है।
100 साल पुरानी बात होगी
लगभग स्वामी जी 100 वर्ष पुरानी बात हुई
या इससे भी कुछ अधिक समय हो गया
होगा। तो उस समय साधु समाज में उनका बड़ा
भारी विरोध हुआ।
का पहनता है और यह जटा भी रखाता है। तिलक
तो घोड़िया लगाता है। रुद्राक्ष पहनता
है। उन जमान में कुछ लड़ाई झगड़े का
वातावरण ज्यादा
था। तो पंचायत
हुई अखाड़ों की वैष्णव अखाड़ों की चतुर
संप्रदाय की पंचायत हुई। बोले इनको
बहिष्कार करो।
तो उस
समय चतुर संप्रदाय खालसे
के नबार्क पीठ के नबार्क सीठ के श्री
महंत श्री रामदास जी काठिया
बाबा जो पुराने काठिया वृंदावन के
संस्थापक श्री रामदास जी काठिया बाबा वो
काठिया बाबा श्री रामदास जी महाराज ब्रज
विदेही महंत
थे विरोध करने वाले गौ ज्यादा
थे। हां धनंजय दास जी के गुरु जी तो संत
दास जी काठिया थे। धनंजय दास जी के दादा
गुरु जी
थे। धनंजय दास जी तो हमारे पूज्य गुरुदेव
पहाड़ी बाबा से बहुत प्रेम रखते थे। बहुत
ही प्रेम रखते थे। इतना अधिक प्रेम रखते
थे कि नए काठिया का शिलान्यास महाराज जी
के हाथ से हुआ।
और पूज्य श्री जी महाराज ने धनंजय दास जी
काठिया से ग्रंथ पढ़े
थे और पूज्य धनंजय दास जी काठिया ने पंडित
सम्राट वैष्णवाचार्य जी से पढ़ा
था और वैष्णवाचार्य जी महाराज हमारे
पहाड़ी बाबा महाराज के खास गुरु भाई थे
इसलिए महाराज जी में वो गुरु भाव रखते थे
धनंजय दासी काठिया साष्टांग प्रणाम करते
थे महाराज जी
को इस बात का हमें पता तब तब चला जब
वृंदावन में कुंभ की बैठक थी और हम पूज्य
महाराज जी के साथ उस समय श्री जी महाराज
अश्वस्थ थे तो महाराज जी नार्क नगर में
पधारे पहाड़ी बाबा महाराज हम उनके साथ में
आए हम हमारी अवस्था कम थी जैसे ही गए तो
श्री जी महाराज तत्काल उठकर खड़े हो गए और
बाहर तक दौड़े तो महाराज जी वापस जाने लगे
बोले मैं जा रहा हूं गुरु जी नाराज है
बोले नाराज हूं
आप खड़े क्यों हुए? आप यहां तक दौड़ के
क्यों आए? आप अश्वस्थ
हैं तो उन्होंने
कहा कि आप मुझे उसी अवस्था में देखिए जिस
अवस्था में आपने मुझे देखा था और मैं भी
आपका उसी स्वरूप में दर्शन कर रहा हूं।
मैं श्री धनंजय दासी जी काठिया का
विद्यार्थी हूं। तो आप के गुरु भाई के वो
शिष्य थे। मैं आपको गुरु रूप में मानता
हूं।
नीम गांव नबार्क तीर्थ की स्थापना मंदिर
की स्थापना में भी शिलान्यास हमारे
गुरुदेव पहाड़ी बाबा के हाथ से श्री जी
बाबा ने श्री जी महाराज ने
करवाया ये पुराने संबंध थे पुराने काठिया
के श्रीमंत लक्ष्मी नारायण दास जी महाराज
जब तक जीवित
रहे परंपरा से प्रत्येक गुरु पूर्णिमा में
पहाड़ी बाबा की समाधि का पूजन करने आते थे
महाराज जी का पूजन करने आते थे
यह पहाड़ी बाबा काठिया बाबा का ऐसा प्रेम
था। पुराने संतों में बहुत प्रेम
था। अब भी जो विचारवान संत है उनमें प्रेम
होता
है। हां तो बड़ा भारी विरोध
हुआ। रुद्राक्ष क्यों धारण करते हैं?
तो श्री ब्रज विदेही श्री महंत श्री
रामदास जी काठिया बाबा ने
कहा कान खोलकर सुन लो तुम लोग तुम लोगों
ने यदि श्री काठिया श्री जटिया बाबा का
तिरस्कार किया उनको समाज से बहिष्कृत किया
तो राधा रानी तुमको वृंदावन में घुसने
नहीं
देगी वो सिद्ध संत
शास्त्र विरुद्ध कोई कर्म नहीं कर सकते
वह तो किसी साधु ने कहा कि उनकी पत्नी भी
उनके पास आ जाती सन्या विरक्त थे लेकिन
उनका पूर्वाश्रम की पत्नी भी थी बच्चा भी
था वो भी आ जाते हैं उन्होंने कहा वो शिव
है तो वह पार्वती
है किसने कहा श्री रामदास जी काठिया बाबा
ने और कहा दंडवत करके क्षमा मांग लो नहीं
तो तुम लोगों उनको इतना भारी दंड मिलेगा
कि हम वाणी से नहीं बोल सकते। नरको में
ठोर नहीं रहेगा। ऐसे संत है वो। मैं जानता
हूं वो कितने उच्च कोटि के संत
है। तब बहिष्कार की दूसरे दिन की जो
मीटिंग थी वो फेल हो गई और सब साधु समाज
ने चार संप्रदाय खालसे में जटिया बाबा को
बुलाया। उनका पूजन किया और कहा महाराज हम
लोग बता जरूर दो हमको आप किस प्रमाण से
रुद्राक्ष पहनते हैं। तब श्री जटिया बाबा
ने
कहा ये श्लोक पद्म पुराण का
[संगीत]
है। क्या कह हम अपनी ओर से थूप नहीं रहे
कि आप भी ऐसा करो। हम तो एक बाद की बात
बता रहे हैं।
[संगीत]
ये कंठ लग्न
तुलसी
नलिनाक्ष
माला श्लोक सुन लो स्थान के अर्थ मत
करना ये कंठ लग्न तुलसी
[संगीत]
नलिनाक्ष
माला येव ललाट पटलेले लस दूध
पुन्रा ये बा
मूल परिचिनित शंख
चक्रास्ते
वैष्णवा भवन मास
[संगीत]
पवित्रती वेण त्रिभुवन को स पवित्र कर
देते हैं कौन
जिनके कंठ में तुलसी सदा विराजमान है। ये
कंठ लग्न तुलसी
तुलसी सदा धारण करना चाहिए।
शास्त्रों में लिखा य कठे तुलसी नास्त ते
नरा मू मानसा सुनो विसम चम जलम चमरा जिनके
कंठ में तुलसी नहीं है वे मूढ़ मनुष्य है
उनके द्वारा स्पर्श किया हुआ अन्न शान
विष्ठा के तुल्य होता है। उनके द्वारा
स्पर्श किया हुआ जल मदिरा के समान होता
है। पुराने टसाली साधु बिना कंठी वाले के
हाथ का छुआ पानी नहीं पीते थे।
बोले सूतक लग जाएगा तुलसी में बोले नहीं
लगेगा ब्रह्मवन निर्विका
ब्रह्म नासम विद्यते तस्या यस ब्रह्म
रूपणी तुलसी में असच नहीं होता क्यों
परबह्म का स्वरूप तुलसी पवित्र नहीं होता
बोले स्नान के समय तुलसी का जल पैर में
जाएगा अपराध लगेगा बोले नहीं लगेगा पुराण
में लिखा है स्नान काले यसंगे दृश्यते
तुलसी सुर्व ती स्नात भवते
[संगीत]
संसया स्नान के समय तुलसी का एक दाना भी
जिसके शरीर पर है उसको छूकर जल जब शरीर पर
पड़ता है तो धरती के सारे तीर्थों में
स्नान का पुण्य प्राप्त हो जाता
है। बोले तुलसी कभी रख लेंगे कभी उतार के
धर देंगे बोले बिल्कुल नहीं क्षणारधही
यज्ञ पवित्र कठे तुलसी मालिका क्षणार्ध
तही विष्णु द्रोही
भर आधे क्षण के लिए तुलसी से रिक्त कंठ हो
जाए तो विष्णु द्रोही हो जाता है आप लोगों
ने धर्म सम्राट पूज्यपा स्वामी कृपात्री
जी का नाम सुना
है दर्शन भी किया होगा वो रुद्राक्ष भी
धारण करते थे तुलसी भी धारण करते थे। किसी
ने उनके बारे में कह दिया कि कर कृपात्री
जी तो आधे वैष्णव है। तो जिस व्यक्ति ने
कहा था उससे शास्त्रार्थ करने पहुंच गए।
बोले हमको आधा वैष्णव कैसे कहा? हम एकादशी
व्रत करते हैं। प्रत्येक निर्जल तुलसी से
शालिग्राम जी का नित्य सहस्त्रार्चन करते।
के लोग तुलसी से शालिग्राम जी का अर्चन
करते हैं। शालिग्राम नर्मदेश्वर का पूजन
करते हैं। एकादशी प्रत्येक एकादशी निर्जल
करते हैं। निरंतर नाम का जप करते हैं। हम
तुलसी धारण करते हैं। हमको आपने आधा
वैष्णव कैसे कह दिया? हम पूरे वैष्णव
हैं। और यदि केवल त्रिपुण के कारण किया है
तो भैया भोले बाबा कौन सा? भोले बाबा भी
तो त्रिपुंड धारण करते हैं। वैष्णव
शिरोमणि है भोले बाबा। शिवजी से बड़ा
वैष्णव कोई
नहीं। सब चुप हो
गए। बहुत से लोग पूछते हैं कि तुलसी के
साथ रुद्राक्ष धारण करें कि ना करें? हमने
अब तक जितने पुराणों का मूल पारण किया है
उनमें कहीं ऐसा निषध वचन नहीं आया कि
तुलसी के साथ रुद्राक्ष धारण नहीं करना
चाहिए अथवा रुद्राक्ष के साथ तुलसी धारण
नहीं करना चाहिए। दोनों की महिमा है।
दोनों ही धार है।
इसलिए यह कंठ लग्न तुलसी नलिनाक्ष माला
नलिन माने होता है कमल और अक्ष माने होता
है
रुद्राक्ष अब लोग अर्थ बदलते हैं नलिनाक्ष
माने कमल गट्टा उसको नलिन उसको नलिन कहते
हैं और अक्ष माने होता है रुद्राक्ष कमल
गट्टे की माला भी और रुद्राक्ष की माला जो
धारण करते
हैं जिनकी बाहु ऊपर धनुर्न शंख चक्र चक्र
अंकित हैं। ऐसे जो वैष्णव हैं वो त्रिभुवन
को पवित्र करते हैं। इसलिए महाराज जी
रुद्राक्ष की भस्म की इन सब की बड़ी भारी
महिमा
है।
श्री सूत जी महाराज वर्णन कर रहे
हैं कि पाप रूपी महान पर्वत शिव नाम लेते
ही वो प्रचंड दावा नल से जलकर भस्म हो
जाता है। इसमें कोई संदेह तुम अपने मन में
मत करना जो कुछ नहीं करता है एक अक्षर
पढ़ा लिखा नहीं है केवल शिव शिव शिव शिव
जपता रहता है उसके भीतर वेदों का ज्ञान
अपने आप प्रकट हो जाता है वो पुण्यत्मा है
वो धन्यवाद का पात्र है वो विद्वान है भले
ही संपूर्ण वेद वेदांग कंठस्थ कर लिए हो
पर शिव नाम में प्रीति ना हो शिव नाम का
जप न करता हो तो वह अधम उसे मानना चाहिए
चाहिए। भस्म के महात्म का भी निरूपण किया
गया। बोलो भक्तवत्सल
भगवान की जय। अग्नि अग्निहोत्र से उत्पन्न
जो भस्म है
उसको वैदिक भस्म कहा गया। श्रत भस्म कहा
गया। वह त्रिपुण के लिए श्रेष्ठ माना गया
है। अन्य यज्ञ से उत्पन्न जो भस्म है वह
भी त्रिपुण धारण के लिए श्रेष्ठ
है। सजल ही भस्म धारण करना चाहिए। इसलिए
हमारे यहां महात्माओं में जो विभूति
चढ़ाते हैं वह गीले शरीर पर ही विभूति
चढ़ाते हैं। शरीर को बिना पोछे ही विभूति
धारण करते हैं। गीले में ही विभूति धारण
करने का विधान है। और महाराज
जी इस प्रकार से विस्तार पूर्वक इसका
वर्णन किया गया और कैसे कैसे करना चाहिए
और महाराज जी इसमें एक बात और लिखी हुई
है। वो लिखी यह है
कि भस्म धारण करने वाले को सत्य, दया,
दान, पवित्रता इन सब जो सहज नियम है उन
नियमों को भी अपने जीवन में धारण करना
चाहिए। बोलो भक्तवत्सल भगवान की जय। जो
त्रिपुंड की निंदा करते हैं, जो शिव जी की
निंदा करते हैं, कहते हैं वो लोग अधम है,
नारकीय हैं। ऐसा ही समझना चाहिए। जिस गांव
में शिवालय ना हो, उस गांव में निवास नहीं
करना चाहिए।
और देखिए भारतवर्ष की कितनी पवित्र परंपरा
है। पूरे भारतवर्ष में भगवान का मंदिर भले
ही ना हो पर भोले बाबा का और हनुमान जी का
मंदिर सब जगह मिल जाए। हनुमान जी का मंदिर
भी ज्यादा खर्च नहीं लगता। महात्मा कहीं
बैठे मूर्ति कहां से लावे? एक पत्थर शिला
ले आए। उसी में दो नेत्र चिपका दिए।
विभूति बढ़िया घी में मथकर सिंदूर लगा
दिया वही रामचरितमानस का पाठ करने लगे वही
हनुमान चालीसा पढ़ने लगे वही राम राम करने
लगे वही सिद्ध हनुमान जी हो
जाते हनुमान जी के मंदिर शिव जी शिव जी का
मंदिर भी इसलिए बनता है ज्यादा कि ज्यादा
खट चक्कर नहीं है एक लोटा जल चढ़ा दो बिल
पत्र चढ़ा दो अक्षत चढ़ा दो इतने में भोले
बाबा राजी
प्रसन्न शिव जी का मंदिर जहां ना हो उस
गांव में निवास नहीं करना
चाहिए। बोलो भक्तवत्सल
भगवान की जय।
रुद्राक्षम यस
गाते ललाटे तत्र
पुंडकम
संडालोप
समज सर्व
[संगीत]
वर्णोत्तम जिसके शरीर में भस्म है मस्तक
पर त्रिपुंड है गले में रुद्राक्ष है वो
भले ही चांडा कुल में ही पैदा क्यों ना
हुआ हो वह पूज्य है। वह तिरस्कार के योग्य
नहीं है। वह आदर के योग्य
है। इस प्रकार से यह वर्णन किया
गया। त्रिपुंड्र में तीन रेखाएं होना
चाहिए। ऐसा यहां लिखा हुआ है। अब बहुत
ध्यान से सुने इस संबंध में। बहुत से लोग
त्रिपुंड लगाते हैं। पुंड्र शब्द का अर्थ
क्या है?
संस्कृत भाषा में पुंड्र शब्द का अर्थ
होता है
उंगली। पुंड्र माने क्या होता है?
उंगली। तो त्रिपुंड शब्द का संस्कृत अर्थ
क्या है? त्रह पुंड धारते
त्रिपुंड्रा जो तीन उंगलियों से धारण किया
जाए उसको त्रिपुंड कहते
हैं। आप दो उंगली से धारण करोगे तो रेखा
तो तीन बन जाएगी। एक एक बीच के ऊपर की
लेकिन वो त्रिपुंड नहीं होगा वो द्विपुंड
होगा और जब तीन से धारण करेंगे तो रेखाएं
चार होगी पर घर तीन होंगे ध्यान में आई
बात कि नहीं आई ऐसे धारण करेंगे तो रेखाएं
तो तीन एक रेखा एक हो गई एक ये हो गई एक
हो गई चार रेखा हो गई ठीक है पर जो खाने
बनेंगे स्थान बनेंगे वह तीन बनेंगे
इसलिए तीन उंगलियों से ही त्रिपुंड धारण
करने का विधान है और अंगुष् कृत रेखा
अंगुष् से फिर मध्य के भस्म या चंदन का
थोड़ा अलग करके फिर उसको स्वच्छ करना
चाहिए। यह त्रिपुंड धारण का विधान है।
त्रिपुंड
में आदि ब्रह्मा यहां की जो रेखा है इसमें
ब्रह्मा जी है। मध्य विष्णु मध्य की रेखा
में विष्णु है। उध्व रेखा सदा शिवा ऊपर की
जो रेखा है उसमें शिव जी हैं। और जो बिंदी
है वो क्या है? बिंद की शक्ति रूपण
त्रिपुंडम धारे द्विजा। जो बिंदी है वो
भगवती परंबा जगदंबा का स्वरूप है। दुर्गा
का स्वरूप है। आज्ञा शक्ति का स्वरूप है।
ये त्रिपुंड का है। ऐसे ही वैष्णव तिलक भी
उंगली से धारण करने का विधान है। क्योंकि
इसको भी कहते उर्ध पुंड्र। क्या कहते हैं?
तो पुंड्र माने क्या होता है? उंगली।
उंगली से धारण किया जाता। अब हम लोग थोड़ा
हम तो उंगली से ही लगाते हैं लेकिन कई लोग
सजावट के लिए बढ़िया उसको सलाई वलाई से
बढ़िया सजा के बढ़िया से लगाते हैं। ठीक
है। स्वरूप सजाते हैं। अच्छी बात है। अपने
तो उंगली से ही सब लगा लेते हैं। बोलो
भक्तवत्सल भगवान की जय। इस प्रकार से
त्रिपुंड की बड़ी भारी महिमा है।
मध्यमा
नामिकांगुल्या मध्य
प्रतिलोमता अंगुष् कृत रेखा त्रिपुंडा
विधते मध्यमा उंगली और अनामिका
उंगली ये दो रेखाएं फिर अंगुष्ट से एक
रेखा और ये त्रिपुंड्र हो गई ये ये
त्रिपुंड्र जो है उसको त्रिपुंड कहा जाता
है त्रिशणा प्रख नाम प्रत्य नव देवता फिर
सबके अलग-अलग देवताओं का भी वर्णन है कहां
कहां त्रिपुण धारण करना चाहिए उसका भी
वर्णन
है सूत जी ने कहा सोनक जी ने पूछा था कि
महाराज रुद्राक्ष की महिमा का भी वर्णन
कीजिए तो रुद्राक्ष का भी बड़ा सुंदर
वर्णन किया है बोलो भक्तवत्सल भगवान की जय
महेशानी दिव्य वर्ष
सहण महेशानी पुन पुरा
तपस्त
मनसम व
[संगीत]
मम एक बार भगवती जगदंबा पार्वती ने शिव जी
से पूछा कि हे प्रभु आप सदा रुद्राक्ष का
श्रृंगार धारण करते हैं। इसका कारण क्या
है? आपको रुद्राक्ष इतना प्रिय क्यों है?
भगवती के प्रश्न करने पर भगवान शिव ने कहा
कि देवी एक समय की बात है कि मैंने अपने
मन को निग्रहित करके हजारों दिव्य वर्षों
तक मैंने कठोर तप
किया। उस
समय एक दिन
सहसा तप की अग्नि से मेरा चित्त शुद्ध हो
उठा।
और मैंने अपने लीलावश नेत्रों को
खोला और जैसे ही मैंने हजारों दिव्य
वर्षों के बाद नेत्र खोले तो मेरे नेत्र
से कुछ जल के बिंदु निकले। उन जल बिंदुओं
को जैसे ही मैंने पृथ्वी पर छोड़ा उससे
रुद्राक्ष नामक वृक्ष उत्पन्न हो गए।
रुद्र माने भगवान शिव उनके नेत्रों से
उत्पन्न होने से इनका नाम रुद्राक्ष हुआ।
तत्ता बिंदु तो जाता वृक्षा रुद्राक्ष
संजका रुद्राक्ष संज्ञक वृक्ष उनको कहा
गया कहीं कोई शिवलिंग ना हो एक रुद्राक्ष
के फल को ही रखकर शिव जी के रूप में पूजन
किया जा सकता प्रत्येक रुद्राक्ष का दाना
साक्षात शिव रूप ही है। शिव से उत्पन्न
होने के कारण वो शिव जी का ही स्वरूप
है। कहां कहां महाराज जी लिखा है किस किस
के लिए मैंने प्रकट किया रुद्राक्ष पुराण
में लिखा है स्थावर मन प्राप्त भक्त
अनुग्रह कारण ते दत्ता विष्णु
भक्त
चतुर्वे विष्णु भक्त वैष्णवों के लिए और
चारों वर्णों के लिए मैंने रुद्राक्ष
उत्पन्न किया शिव जी बोल रहे पार्वती जी
से
कहा ग देश में मथुरा
अयोध्या लंका मलय पर्वत सहगिरी काशी इन सब
क्षेत्रों का नाम आया है। इनमें मैंने
रुद्राक्ष वृक्षों को उत्पन्न किया। जहां
रुद्राक्ष उत्पन्न होते हैं। वे देश बड़े
पवित्र हैं। जो और रुद्राक्ष सभी को धारण
करना चाहिए। ब्राह्मण हो, क्षत्रिय हो,
वैश्य हो, शूद्र हो, स्त्री हो, पुरुष हो
सभी रुद्राक्ष धारण कर सकते हैं।
इसमें वर्ण भेद भी है। श्वत रक्त पीत
कृष्णा वर्णा गया क्रमा स्वजातीधार
रुद्राक्षम वर्णत क्रमात ब्राह्मण को
श्वेत वर्ण का रुद्राक्ष धारण करना चाहिए।
क्षत्रिय को रक्त वर्ण का वैश्य को पीत
वर्ण का चतुर्थ वर्ण को कृष्ण वर्ण का
रुद्राक्ष धारण करना चाहिए। यह इसका वर्णन
है। और फिर जो मिल जाए वही धारण कर लेना
चाहिए। छोटा श्रेष्ठ होता कि बड़ा तो लिखा
है धात्री फल
प्रमाणम यष्टत उदाम बद्री फल मात्र मध्यम
परकीर्तितम अधम च मात्रम
प्रक्रते कहते जो आंवले के फल के बराबर है
वो उत्तम है जो बेर के फल के बराबर
रुद्राक्ष है वो मध्यम है और जो चने के
बराबर रुद्राक्ष है वो अधम है निम्न कोटि
का है इसलिए उत्तम तो जो आंवले के फल के
समान रुद्राक्ष है वही श्रेष्ठ कहा गया
है। अब एक बात और इसी प्रकरण में लिखे कि
कुछ रुद्राक्षों की प्रजाति ऐसी होती है
जिनमें बड़े फल आते ही नहीं है। छोटे ही
फल आते हैं। तो उनमें लिखा है कि गुंजया
सदश्यम यस्या सर्वार्थ फल साधनम। छोटे में
लोग छोटे दाने को छोटे अवस्था में होते तो
बड़े हैं। पर छोटी अवस्था में उनको तोड़
लेते हैं। तो बड़े को ही छोटा बना देते।
तो वो मना है हुआ
था और जो छोटी ही प्रजाति के हैं
जो उत्पत्ति से ही छोटे हैं उनमें भी जो
केवल गुंजा जानते हो ना
गुंजा गुंजा गुची
यहां मराठी में क्या बोलते
हैं गुंज बोलते हैं तो गुंज जो है
ना गुंज की माल गरे पैरोंगी भगवान हमारे
गुंजा माला धारण करते हैं हमारे वृंदावन
के ठाकुर जी तो गुंजा के समान जो छोटा है
उसको भी बहुत श्रेष्ठ माना गया है
संपूर्ण महात्म में उसको बहुत श्रेष्ठ
माना गया पर वो प्राय दुर्लभ है अब तो
विज्ञान इतना उन्नत हो गया कि नकली
रुद्राक्ष बहुत बनते फैक्टरी है नकली
रुद्राक्ष कहां बनते चाइना में
सब चीज चाइनीज हो
गई। शालिग्राम भी चाइना में बनने लग गए।
महाराज
जी असली शालिग्राम से नकली शालिग्राम इतने
बढ़िया होते हैं कि आप आश्चर्य में पड़
जाओगे। जो चिन्ह खजोगे सब मिल जाएंगे उसी
में। होते सब
नकली। ऐसे रुद्राक्ष भी नकली आ
गए। आदमी मिलावटी हो गया। आदमी ही नकली हो
गया तो क्या चीज असली रहेगी? केवल राम नाम
शिव नाम ऐसा है जिसमें चाहे जितना कलिकाल
आ जाए मिलावट संभव नहीं है। बाकी सब चीज
में मिलावट हो
गई। पर शुद्ध रुद्राक्ष भी मिलते
हैं। इसलिए विश्वास के योग्य शुद्ध
रुद्राक्ष ही धारण करना चाहिए। बाजार की
चीज पर जल्दी भरोसा नहीं करना चाहिए। उसके
अलग-अलग लक्षण है। कैसे पहचान हो कि सही
है कि सही नहीं है। उसकी पहचान हो जाती
है। हमको नकली शालिग्राम जी दिखाए
काठमांडू में एक बड़े
व्यवसाय और महाराज जी असली से वो ज्यादा
अच्छे लग रहे
थे। छोटे छोटे छोटे छोटे बढ़िया बढ़िया और
आप जितने कहो उतने ज्योतिष स्वरूप दे
देंगे। सब नकली कचटा
कांच के होते हैं ना उनमें कोई काला इतना
गहरा रंग डाल देते हैं कि वह देखने में
शालिग्राम जी लगते हैं। ऐसे करेंगे तो
ज्योति दिखाई पड़ेगी। किसी में लाल, किसी
में पीली पर प्राय नकली ज्योति स्वरूप भी
होते हैं लेकिन बाजारों में धन के लोभ में
सब काम गड़बड़ हो रहा है। शालिग्राम को
बेचने वाला, शालिग्राम को खरीदने वाला,
शालिग्राम का मूल्य लगाने वाला तीनों नरक
जाते हैं। ऐसा लिखा
है। आप कहेंगे अब तो आपने तो प्रतिबंध ही
लगा दिया।
और जो वहां रहते हैं खोजने वाले उनहीं को
बढ़िया मिलते हैं। हम लोग जाएंगे तो नहीं
मिलेंगे
बढ़िया। तब इसका उपाय यह है कि उनसे
मोलतोल ना करो। उनको न्योछावर दे दो। ले
लो भैया मोल हम ना करेंगे। ना तुम मोल
बताओ ना हम मोल लेंगे। आंख मूंद के लो
ज्यादा दो। कम क्यों दो पहाड़ में लोग
बेचारे गरीबी में रहते हैं। ज्यादा दे दो।
वो ₹100 चाहते हैं आप उनको ₹200 ₹00 दे
दो।
ले जाओ मिल जाएंगे।
अपने मलूक पीठ में तो बहुत बड़ी संख्या
में शालिग्राम भगवान विराजमान है। इस समय
लगभग एक लाख सा हजार शालिग्राम जी अपने
मलुक पीठ में विराजमान है। इतनी बड़ी
संख्या में पूरे भारतवर्ष में कहीं भी
शालिग्राम जी विराजमान नहीं है। गिनती से
एक लाख सा हजार
है। सबका नित्य
स्नान, नित्य चंदन धारण, नित्य इत्र,
नित्य आरती, पूजा, राग भोग सब होता है।
इसी तरह की व्यवस्था बनाई गई
है। बस मर्यादा यह बना के रखी है कि उसमें
से किसी को देते नहीं है उठा के। हां।
नहीं तो लोग मांगने वाले आते महाराज इतने
हमको दे दो। तो रहेंगे नहीं। शालिग्राम
जी। इसलिए अब तो ऐसा है कि जहां लोगों के
यहां मंदिरों में पुराने में सेवा पूजा
नहीं हो रही वह लोग भी आकर वहां पध जाते।
महाराज यहां बढ़िया सेवा हो रही है। यहां
रहेंगे। हमको यह प्रेरणा ऐसे
मिली। भगवान की इच्छा से तो सब होता ही
है। उसका एक दिव्य संकेत पहले हमको भगवत
प्रेरणा से प्राप्त हुआ था। वह सभा में
कहने योग्य बात नहीं है। फिर हमने उस बात
को पूज्य गुरुदेव भक्त माली जी को निवेदित
किया तो उन्होंने कहा कि पंडित जी इसका
मतलब है कि भगवान बड़ी संख्या में यहां
आकर इस स्थान को धन्य करना चाहते हैं। ऐसा
कुछ
एक अनुभव मान लो ऐसे ही समझ
लो। हमारे एक मलुक पीठ के संत है तुलसीदास
जी। उनको धुन सवार हुई और वह दामोदर कुंड
तक से शालिग्राम जी लाते लाते लाते लाते
वहां के जो पर्वती क्षेत्र के लोग हैं
उनको कुछ सेवा दे देते थे और वो बढ़िया
बढ़िया स्वरूप शालिग्राम जी के ले ठाकुर
जी की कृपा से विराजमान है तो हमारे मन
में भाव कैसे जगा महाराज जी लिखा है जहां
द्वादश चक्रांकित शिलाएं हैं शालिग्राम जी
की वो क्षेत्र 12 योजन का
क्षेत्र 48 कोस का क्षेत्र तीर्थ हो जाता
है और तीर्थ में हो तब तो कहना क्या है और
जहां सपाद लक्ष शालिग्राम होते हैं सवा
लाख शालिग्राम होते हैं वहां मरने वाले
कीट पतंग को भी स्या मुक्ति होती है। उसने
कोई साधन न किया हो तो भी उसको स्या
मुक्ति हो जाती।
हमारे मन में भैया भजन साधन तो होता नहीं
है। भगवान कृपा करें यदि एक लाख शालिग्राम
जी कम से कम विराज जाए सवा लाख तो इनके
सहारे नैया पार लग जाएगी सबकी तो ठाकुर जी
इतने करुणा में है कि वह बढ़ते बढ़ते आज
एक लाख 16 हजार हो गए पर कुंड में जो चले
जाते हैं उस सिंहासन में शेष सिंहासन में
फिर उनमें से हम उठाकर किसी को नहीं
देते मर्यादा ऐसी बनाकर रखी है कि वहां जो
विराजमान हो गए फिर वहां से नहीं जाएंगे
कहीं
फिर तो अखंड वृंदावन वास
करेंगे। बोलो वृंदावन बिहारी लाल की जय।
तो इस प्रकार से इनकी बड़ी भारी महिमा है।
रुद्राक्ष के शिवलिंग की भी बड़ी महिमा का
वर्णन किया गया
है।
इसलिए गुंजा मात्र प्रमाण के रुद्राक्ष को
भी श्रेष्ठ माना गया है। जो कीड़ों से
दूषित हो गया हो, खंडित हो, फूटा हुआ हो,
जिसमें उभरे हुए दाने ना हो, जो वृण युक्त
हो, पूरा गोल ना हो। इन छह प्रकार के
दोषों वाले रुद्राक्ष का त्याग कर देना
चाहिए। रुद्राक्ष में अपने आप छिद्र हो
जाता है। वही रुद्राक्ष श्रेष्ठ माना जाता
है। जो 1100 रुद्राक्ष को अपने देह पर
धारण करता है वो रुद्र रूप हो जाता है।
इसमें संदेह नहीं है। और महाराज जी लिखा
है कहां कहां किस अंग में कितने धारण करना
चाहिए। मस्तक पर कितने कान में भी
रुद्राक्ष धारण की विधि है। भुजाओं में
कंठ में सबकी अलग-अलग महिमा का वर्णन शिख
में एक सिर पर 30 गले में 50 भुजाओं में
161 16 मणिबों पर 121 स्कंधों में 500 और
108 रुद्राक्षों की माला बनाकर यज्ञपवित
के रूप में ये सब बातें लिखी हुई है। इनकी
बड़ी भारी महिमा है। अब एक बात और सुन लो
और सुन के याद कर लेना।
[संगीत]
यहां कई जगह लोग रुद्राक्ष पहनते हैं।
भस्म भी धारण करते हैं और प्याज लहसुन भी
खूब धड़ल्ले से खाते
हैं। और वारकरी लोग भी पीछे नहीं है। बड़े
वैष्णव है वारकरी। एकादशी व्रत भी करते
हैं। बड़ी निष्ठा से करते हैं। वारी
यात्रा में पंडरीनाथ जी का दर्शन करते
हैं। पर प्याज लहसुन नहीं छोड़
सकते। कान खोलकर सुन लो।
तुलसी धारण करने वाला या रुद्राक्ष धारण
करने वाला उसको जो वस्तु भगवान को भोग
नहीं लग सकती है। उस वस्तु को कभी भी आहार
के रूप में नहीं लेना चाहिए। क्या
पंडरीनाथ जी को प्याज लहसुन का भोग लगता
है? फिर आप क्यों खाते हैं?
अब साधुओं में और चल पड़ा
है। लिख लो
श्लोक शिव महापुराण के विदेश्वर संिता के
25 वे अध्याय का 43वा
श्लोक
मध्यम
मानसम तुलसम पंडुम
शव श्लेषंतकम विराम
भक्षण तथा व्यक्ति जब रुद्राक्ष धारण कर
ले तो खानपान में मदिरा और मांस का प्रयोग
ना करे लहसुन न ले प्याज ना खावे सहजन ना
खावे लसोड़ा ना खावे और विवराह नाम का एक
कंद होता है उसको भी ना खावे इतनी चीजों
को नहीं खाना चाहिए ब्रह्मचारी वानप्रस्थी
सन्यासी सबको धारण करना चाहिए बोलो
भक्तवत्सल भगवान की जय।
इस प्रकार से इसका वर्णन किया गया है।
रुद्राक्ष एक मुख से लेकर 14 मुख तक ही
होता है। इससे ज्यादा नहीं होता है। और
बहुत से लोग बड़े भोले होते हैं। एक सज्जन
हमको मिले नाम हम नहीं बताएंगे। बोले
हमारे पास 19 मुख वाला रुद्राक्ष
है। उसमें शिवलिंग बना है, त्रिशूल बना
है। हमको दिखा देखो इसमें गणेश जी बने
हैं। इसमें कार्तिकेय जी बने हैं। हमने
अपने मन में सोचा कि सब बने बनाए हैं। पर
इन विचारों ने लाखों रुपया खर्च किया है।
इनकी श्रद्धा को क्यों डिगाया जाए। इसलिए
हमने कहा वैसे होते तो नहीं है 14 से
ज्यादा लेकिन आप भाग्यशाली हैं। आपको मिल
गए तो पहरो कोई बात
नहीं। पर सुन लो 14 14 मुख से ज्यादा मिले
तो उसको नकली समझना। वो सब नकली बने हुए
हैं। आप जो चाहो सो बना के दे देंगे। इतना
बड़ा-बड़ा रुद्राक्ष दे देंगे उसमें।
शिवलिंग और शेष सब कितनी नकली बातें
हैं। एक मुखी रुद्राक्ष अत्यंत दुर्लभ है।
जो चपटा होता है काजू सेफ में वो एक मुखी
होने पर भी श्रेष्ठ नहीं माना जाता।
श्रेष्ठ एक मुखी वही माना जाता है जो एकदम
गोल हो। हमने पशुपतिनाथ जी के यहां दर्शन
किया। शुद्ध एक मुखी रुद्राक्ष का हजारों
लाखों वर्ष प्राचीन रुद्राक्ष का हमने
दर्शन
किया। हमने जो धारण कर रखा है गौरी शंकर
और 14 एक मुख से 14 मुख के रुद्राक्ष यह
भगवान श्री पशुपतिनाथ जी के ही श्री अंग
का प्रसाद है। वही का प्रसाद हमको भगवान
ने कृपा करके दिया
है। तो महाराज जी इसमें लिखा है एक मुखी
रुद्राक्ष का दर्शन करने से भक्ति मुक्ति
दोनों प्राप्त हो जाती है। एक मुखी
रुद्राक्ष के दर्शन मात्र से ब्रह्म हत्या
का पाप नष्ट हो जाता है। एक वक्त शिव
साक्षात भक्ति मुक्ति फल प्रदा तस दर्शन
मात्रे ब्रह्म हत्या विपति ब्रह्म हत्या
नष्ट हो जाती है। कहते हैं जो एक मुखी
रुद्राक्ष का पूजन करता है उससे लक्ष्मी
जी कभी दूर नहीं होती है। वहां कोई उपद्रव
नहीं होते हैं। उसकी सारी कामनाएं पूरी हो
जाती है और दुकानों पर लिखा रहता है यहां
एक मुखी रुद्राक्ष मिलता है और उनकी
विचारों की दुकान ही नहीं चलती है। कर्ज
में डूबे रहते तो भैया कहां से तुम्हारे
पास एक मुखी आ गया वो सब सब चीजें चलती
है। जो दो मुख वाला रुद्राक्ष है वो देव
देवेश्वर का स्वरूप है। उससे गोवध के पाप
का नाश हो जाता है। तीन मुख वाला
रुद्राक्ष संपूर्ण विद्याओं को देने वाला
है। और
चार मुख वाला रुद्राक्ष ब्रह्मा जी का
स्वरूप माना गया है। ब्रह्म हत्या के पाप
से मुक्ति देने वाला है। धर्म अर्थ काम
मोक्ष चारों पुरुषार्थों को देने वाला है।
पांच मुख वाला रुद्राक्ष अधिक संख्या में
प्राप्त होता है। यह कालाग्न रुद्र का
स्वरूप है। यह पांच मुख वाला रुद्राक्ष भी
संपूर्ण पापों से मुक्ति देता है। अगम्या
गमन का पाप किसी को लगा हो वह भी उससे दूर
हो जाता
है। छह मुख वाला रुद्राक्ष कार्तिकेय जी
का स्वरूप है। उसको यदि दाहिनी भुजा में
धारण किया जाए तो ब्रह्म हत्या जैसे पाप
नष्ट हो जाते। इसमें संदेह नहीं है। सात
मुख वाला रुद्राक्ष साक्षात अनंग अर्थात
कामदेव का स्वरूप होता है। उसको धारण करने
वाला दरिद्र व्यक्ति भी ऐश्वर्यशाली हो
जाता है। आठ मुख वाला रुद्राक्ष
अष्टमूर्ति भैरव का स्वरूप होता है। भैरव
जी के आठ रूप है। वो मनुष्य अष्ट मुख
रुद्राक्ष जो धारण करता है वह पूर्णायु
होता है। वो 100 साल से पहले मरता नहीं
है। और मरने के बाद त्रिशूल धारी शिव रूप
हो जाता है। नौ मुख वाला रुद्राक्ष भैरव
और कपिल देव भगवान का प्रतीक माना गया है।
अथवा नव दुर्गा का स्वरूप माना गया है।
इसलिए भैरव नवत्र कपिलस मुनिता दुर्गावा
तष्ठावा
नवूपाेश्वरी एक नाथ संप्रदाय के महात्मा
ने हमको नौ मुख वाले रुद्राक्ष की भी पूरी
माला दी। बोले भगवती दुर्गा का स्वरूप है।
ऐसे ही संत लोग दे देते हैं। इस तरह से
बड़ी महिमा है। द मुख वाला जो रुद्राक्ष
है वह साक्षात भगवान नारायण का स्वरूप है।
उस द मुख वाले विष्णु रूप रुद्राक्ष को
धारण करता है। उसकी संपूर्ण कामनाएं पूरी
हो जाती है। 11 मुख वाला रुद्राक्ष वो
एकादश रुद्र का प्रतीक है। उसको धारण करने
वाला कभी पराजित नहीं होता है। 12 मुख
वाला जो रुद्राक्ष है उसको जो केशव प्रदेश
में धारण करता है। मानो उसने द्वादश
सूर्यों को अपने मस्तक पर विराजमान कर
लिया। 13 मुख वाला रुद्राक्ष संपूर्ण
देवताओं का प्रतीक है। विश्व देवों का
प्रतीक है। उसको धारण करने वाला मनुष्य
संपूर्ण अभीष्ट को प्राप्त करता है। 14
मुख वाला रुद्राक्ष साक्षात भगवान सदा शिव
का स्वरूप है। जो उसको मस्तक पर धारण करता
है उसके संपूर्ण पापों का नाश हो जाता है।
इस तरह से एक मुख से लेकर 14 मुख तक कहा
गया। उसमें एक मुख भी दुर्लभ है। 14 मुख
भी दुर्लभ है। भगवान की कृपा से ही सुलभ
होते हैं। इनको मंत्रों से धारण करना
चाहिए। क्रमश मंत्र है। एक मुखी रुद्राक्ष
को ओम हंग नमः दो मुखी को ओम नमः तीन मुख
वाले को ओम कम नमः चार मुख वाले को हंग
नमः पांच मुख वाले को ओम हंग नमः ओम छे
मुख वाले को ओम ह्री हु नमः सात मुख वाले
को ओम हु नमः और आठ मुख वाले को ओम हु नमः
ओम ह्री हु नमः ये नौ मुख वाले को ओम हंग
नमः ये द मुख वाले को ओम ह्री हु नमः ये
11 मुख वाले को ओम क्र शंग रंग नमः ये 12
मुख वाले को और ओम ह्री नमः 13 मुख वाले
को और ओम नमः ये 14 मुख वाले रुद्राक्ष को
धारण करने का मंत्र है।
यहां विदेश्वर संगीिता संपन्न होती है और
कल से जो है रुद्र संगीिता का सृष्टिंड
आरंभ होगा। वो आप लोग भगवत कृपा से कल
सुनेंगे।
चार चार हो रहे हैं। यही कथा का
[संगीत]
विराम। एक पद विनय पत्रिका का रोज पढ़ते
हैं। तो वह शिव जी का एक पद उसको पढ़ लेते
हैं और इसके बाद फिर आप लोग आरती करेंगे।
[प्रशंसा]
[संगीत]
यद्यपि यह जो विदेश्वर खंड है और यह खंड
है जिनमें सिद्धांत का अधिक वर्णन है इनको
कथा कहने वाले लोग कम कहते हैं और कथानक
वाला भाग अधिक कहते हैं पर मेरा विचार यह
है कि कथानक वाला भाग तो सबके ज्ञान में
प्राय है पर जिसमें महात्म का वर्णन है
सिद्धांत का वर्णन है उसका विशेष रूप में
वर्णन होना चाहिए
इस दृष्टि से हमने इसका स्मरण किया।
[संगीत]
बावररो
रावरो ना
भवा
बावरो
राो ना भवा
बावररो
रावररो ना भवा
[संगीत]
[संगीत]
नाम दानी
बढ़ो
दिन
दये
बिनु दानी बढ़ो
वेदु
[प्रशंसा]
[संगीत]
वेद
बढ़ाई
[संगीत]
भानी
[संगीत]
बढ़ाई बावररो रावररो
ना
भवा पावर रावा
[संगीत]
[प्रशंसा]
निज घर की
वर बात
बिलो निज घर की
वर बात बिलो
हो तुम
परम
[प्रशंसा]
सयानी
परम
सयानी शिव की
दै संपदा देखत
शिव की
[प्रशंसा]
[संगीत]
श्री
शारदा
सिहानी श्री
शारदा सिहानी
[संगीत]
ो
राो नाम
[प्रशंसा]
[संगीत]
भवा
[संगीत]
रावा
आ आ
[संगीत]
[प्रशंसा]
[संगीत]
[प्रशंसा]
[संगीत]
आ जिनके
[संगीत]
भाल लिखी लिपि मेरी
जिनके
भाल लिखी लिपि मेरी
[प्रशंसा]
[संगीत]
सुख
की नहीं
[संगीत]
निशानी सुख की
नहीं
निशानी तिन
रंकन
को नाक समारत
[संगीत]
निरंकन
को नाथ
[प्रशंसा]
सम हो
आयो
नकवाणी हो
आयो
नवा बावरो
राो ना
भवानीो
राो ना भवानी
[संगीत]
[संगीत]
[प्रशंसा]
[संगीत]
दुख
[संगीत]
दीनता दुखी
इनके
दुख दुख
दीनता दुखी
इनके दुख
[संगीत]
जाचकता
[संगीत]
अकुलानी
[संगीत]
जाचकता यह
[संगीत]
अधिकार
सौपिए और रहीम
[प्रशंसा]
[संगीत]
[प्रशंसा]
अधिकार भीख
भली मैं
जानी भीख
भली मैं
[संगीत]
जानी बावररो रावररो
ना
[प्रशंसा]
[संगीत]
भवानी नाम
[प्रशंसा]
[संगीत]
[संगीत]
[संगीत]
आ प्रेम
[संगीत]
प्रशंसा विनय
व्यंगत प्रेम प्रेम
प्रसंग साय
[संगीत]
सुनी विधि
की बरबानी
सुनी विधि
की बरबानी
तुलसी मुदित
महेश मन ही मन
तुलसी
[प्रशंसा]
जगत मा तू
मुस्कानी जगत मा तू मुस्कानी
[संगीत]
बावररो
राो ना
भवानी बावररो
राो ना भवानी
बावररो रामरो नाम भवानी बावररो रामरो नाम
भवानी जय जय राम कृष्णा हरे हरि जय जय राम
कृष्ण हरि जय जय राम कृष्ण हरि जय जय राम
कृष्ण हरे जय जय राम कृष्ण हरि जय जय राम
कृष्ण हरे जय जय राम कृष्ण हरे जय जय राम
कृष्ण हरे जय जय राम कृष्ण हरे जय जय राम
कृष्ण हरे जय जय राम कृष्ण हरे जय जय राम
कृष्ण हरे राम कृष्ण हरे जय जय राम कृष्ण
हरे राम कृष्ण हरे जय जय राम
जय जय राम कृष्ण हरि जय जय राम जय जय राम
कृष्ण हरि जय जय राम कृष्ण
हरे हर हर हर
[प्रशंसा]
महादेव पूज्य गुरु जी के चरणों में
कोटि-कोटि नमन आज
हमने आपके मुखारविंद
से गुरु निष्ठा
सुनी
है। यह अनुभूति हमारे जीवन में आ जाए। यही
कृपा कीजिए।
आजचा या पुण्य पावन पर्व कालावर आरती
करिता उपस्थित डॉक्टर
विूपाक्ष
शिवाचार्य मनमत धाम मांजरसभा
डॉक्टर शिवंद शिवाचार्य महाराज मठ संस्थान
तंगलूर
योगी बापू उखड़ाई संस्थान
य आरतीला उपस्थिति लाली है त प्रमाण
आदरणीय प्रताप राव पाटिल चिकलीकर
साहब यानी आरती ला
है यह दास आपसे बड़ी विनम्र भाव
से प्रार्थना करता है कि
आज जागतिक महिला दिन है और इस जागतिक
महिला दिन के पावन अवसर
पर हदगांव तालुका की माननीय तहसीलदार
यहां पर उपस्थित
है आदरणीय सुरेखा जी नांदे सुरेखा जी
नांदे यनी आरती करिता व्यास पीठावर याव ही
विनती कृपया विनम्र भाव विनती
हेलो
कृपया व्यासपीठ और गर्दी को त्रास हरि ओम
चंद्र वानस
[संगीत]
ओम
नम्ला
नमः
चंद्रमा जय शिव
ओमकार भोले भज शिव ओम
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव भोले भोलेनाथ
महाशिव चरणा की धारा ओम जय शिव हर
महादेव एक कान
चतुरन
पंचानन राजे भोले
पंचानन
राजे
हंसासन गरुड़ासन
अनुशासन
करुणा वाहन
साम जय हर हर
महादेव दो भुज चार चतुरभुज
दसभुज सोहे बोले दस भुज सोहे
तीनो रूप निरखता प्रभु जी का रूप निरखता
त्रिभुवन जल
हरि ओम जय शिव हर
महादेव
अक्षमाला
वनमाला रुंद माला
धारी माला
धारी चंदन मृग मन सोहे चंदन मृगमन
सोहे त्रिपुरारी
ओम जय हर हर महादेव
सीतांबर
पीतांबर
बागांबर अंगे भोले
बागांबर
अंगे
सनकादिक
ब्रह्मादिक
सनकादिक
[संगीत]
ब्रह्मादिक
संगे जय हर हर
महादेव करके मध्य कमंडल चक्र त्रिशूलता
बोले चक्र त्रिशूल
धर्ता जग हर्ता जग भर्ता जग करता जग हर्ता
जग पालन करता ओम जय हर हर
महादेव ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत
अभिव बोले जानत
अभिव प्रणय अक्षर
[संगीत]
से तीनों
ओम जय हर हर
महादेव त्रिगुण स्वामी जी की आरती जो कोई
नर गावे भोले प्रेम सहित
गावे कहत शिवांद स्वामी भजत हरे हर स्वामी
मन वांछित फल
ओम जय हर हर
ओम जय शिव ओम बोले
हारा ब्रह्मा विष्णु सदा शिव भोले भोलेनाथ
महादे
ओम जय हर हर महादेव ओम जय हर हर महादेव ओम
जय हर हर
ओम जय हो शांति अंतरिक्ष शांति पृथ्वी
शांति रा शांति रोगदया शांति वनस्पतया
शांति देवा शांति ब्रह्मा शांति सर्वगम
शांति शांति रे शांति सामा शधि अंजल
पुष्पदाय
ओम जगने
ज्ञान धर्म
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